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# नीम करौली बाबा की अनसुनी कहानी: पौत्र डॉ. धनंजय शर्मा की जुबानी—चमत्कारों से परे एक दादा, एक फकीर और सेवा का जीवन

नीम करौली बाबा की अनसुनी कहानी: पौत्र डॉ. धनंजय शर्मा की जुबानी—चमत्कारों से परे एक दादा, एक फकीर और सेवा का जीवन

नीम करौली बाबा का नाम आते ही अलग-अलग लोगों के मन में अलग-अलग तस्वीरें उभरती हैं। किसी के लिए वे हनुमान भक्ति से जुड़े संत हैं, किसी के लिए कैंची धाम की आध्यात्मिक परंपरा का केंद्र, और किसी के लिए ऐसे गुरु जिनके साथ असाधारण घटनाओं और कथित चमत्कारों की अनगिनत कहानियाँ जुड़ी हुई हैं।

लेकिन परिवार के भीतर उनकी तस्वीर कैसी थी?

क्या उनके अपने नाती-पोते भी उन्हें उसी रहस्यमय संत के रूप में देखते थे, जैसा बाहर की दुनिया देखती थी?

बंसल न्यूज़ को दिए एक लंबे इंटरव्यू में नीम करौली बाबा के पौत्र डॉ. धनंजय शर्मा ने इसी सवाल का एक बेहद व्यक्तिगत उत्तर दिया। उनके लिए बाबा केवल आश्रमों में बैठे संत नहीं थे। वे परिवार के “बाबा” थे—गोद में बैठाने वाले, जलेबी खिलाने वाले, पतंग दिलाने वाले, हँसने-बोलने वाले और कभी-कभी ऐसी बातें कह देने वाले व्यक्ति, जिन्हें परिवार बाद में जीवन की घटनाओं से जोड़कर देखता रहा।

इस बातचीत की सबसे बड़ी विशेषता भी यही है। इसमें नीम करौली बाबा की कहानी किसी इतिहासकार, शोधकर्ता या बाहरी भक्त की नजर से नहीं, बल्कि परिवार के भीतर पले व्यक्ति की स्मृतियों से सामने आती है।

इसलिए यहां एक अंतर समझना जरूरी है। डॉ. शर्मा द्वारा सुनाई गई पारिवारिक स्मृतियां, चमत्कारों की कथाएं और आध्यात्मिक अनुभव उनके और उनके परिवार की आस्था तथा मौखिक परंपरा का हिस्सा हैं। इन सभी घटनाओं को स्वतंत्र ऐतिहासिक या वैज्ञानिक रूप से सत्यापित तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन वे यह समझने में महत्वपूर्ण जरूर हैं कि बाबा को उनके परिवार और भक्त किस तरह याद करते हैं।

संत नहीं, घर के बाबा

डॉ. धनंजय शर्मा बताते हैं कि बचपन में उन्हें यह महसूस ही नहीं कराया जाता था कि उनके सामने कोई प्रसिद्ध संत बैठा है।

जब परिवार गर्मियों में आगरा जाता, तब महाराज जी भी वहां आया करते थे। उनके अनुसार घर का वातावरण बिल्कुल पारिवारिक रहता था। बाबा बच्चों से उसी तरह व्यवहार करते जैसे कोई सामान्य दादा अपने नाती से करता है।

वे धनंजय को अपने पास बैठाते, प्यार करते और उनसे कहा करते—“डॉक्टर बनेगा।”

बाद में धनंजय वास्तव में चिकित्सा के क्षेत्र में गए और एमबीबीएस तथा एमडी की पढ़ाई की। लेकिन इस बचपन की स्मृति को वे किसी औपचारिक भविष्यवाणी से अधिक परिवार के भीतर कही गई स्नेहभरी बात के रूप में याद करते दिखाई देते हैं।

उनकी एक और स्मृति बेहद साधारण और मानवीय है।

बाबा उनसे पूछते कि क्या खाना है। बच्चा कहता—जलेबी।

जलेबी मंगाई जाती और बाबा अपने पास बैठाकर खिलाते।

पतंग उड़ाने का मौसम होता तो पतंगों के लिए पैसे या पतंगें दिलवा देते। स्वयं पतंग उड़ाने के बजाय बच्चे को उड़ाते देखते और खुश होते।

यह चित्र उस रहस्यमयी छवि से बिल्कुल अलग है जिसके साथ नीम करौली बाबा का नाम अक्सर प्रस्तुत किया जाता है।

यहां कोई मंच नहीं है।

कोई लंबा प्रवचन नहीं।

कोई औपचारिक गुरु-शिष्य संबंध नहीं।

बस एक परिवार है और उसके बीच बैठे एक बुजुर्ग, जिन्हें बाहर की दुनिया संत कहती थी।

1970 में भोपाल के घर में दस दिन

डॉ. शर्मा के अनुसार नीम करौली बाबा 1970 में उनके भोपाल स्थित घर भी आए थे और लगभग दस दिनों तक वहां रहे।

इसी दौरान घर में हनुमान चालीसा का अखंड पाठ आयोजित किया गया। उनके अनुसार बाबा जाते समय उनके पिता से एक ऐसी बात कह गए जिसे परिवार वर्षों तक याद करता रहा—“इस घर में मृत्यु नहीं होगी।”

डॉ. शर्मा बाद की दो पारिवारिक घटनाओं को इस कथन से जोड़ते हैं।

उन्होंने अपनी माता की मृत्यु के बारे में बताया कि तबीयत बिगड़ने के बाद परिवार उन्हें चिकित्सा के लिए ले जाना चाहता था। घटनाक्रम के दौरान उनकी मृत्यु घर के भीतर न होकर बाहर हुई।

इसी तरह उन्होंने अपने पिता की बीमारी और बाद में अस्पताल में हुई मृत्यु को भी उसी कथन से जोड़कर देखा।

डॉ. शर्मा स्वयं बातचीत में यह भी स्वीकार करते हैं कि अंततः जीवन और मृत्यु को वे ईश्वर पर छोड़ते हैं। उनके लिए बाबा का पुराना कथन व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक अनुभव का हिस्सा है, न कि किसी वैज्ञानिक सिद्धांत का प्रमाण।

यही वह बिंदु है जहां नीम करौली बाबा की कथाओं को पढ़ते समय आस्था और प्रमाण के बीच फर्क करना आवश्यक हो जाता है।

भक्त किसी घटना को आध्यात्मिक संकेत के रूप में देख सकते हैं।

दूसरा व्यक्ति उसे संयोग मान सकता है।

दोनों दृष्टियों के बीच अंतर बनाए रखना ही ऐसी कहानियों को जिम्मेदारी से समझने का तरीका है।

जन्म की खबर बाबा को कैसे मिली?

डॉ. धनंजय शर्मा ने अपने जन्म से जुड़ा एक और पारिवारिक प्रसंग साझा किया।

उनके अनुसार उनका जन्म 11 जुलाई को लगभग साढ़े बारह बजे हुआ था। उसी समय के आसपास नीम करौली बाबा भोपाल पहुंचे थे और राजभवन में ठहरे थे।

डॉ. शर्मा के परिवार का दावा है कि बाबा को औपचारिक रूप से यह सूचना नहीं दी गई थी कि घर में पुत्र का जन्म हुआ है। फिर भी उन्होंने एक अधिकारी को उनके पिता के पास भेजा और संदेश दिया कि “शर्मा के यहां लड़का पैदा हुआ है”, उन्हें बुलाकर लाया जाए।

परिवार इसे बाबा की असाधारण जानकारी या आध्यात्मिक क्षमता से जोड़कर देखता है। स्वतंत्र प्रमाण के अभाव में इसे एक पारिवारिक संस्मरण के रूप में ही देखा जाना उचित है।

तीन महीने बाद बच्चे को गांव ले जाया गया।

तीन पंडितों से जन्मपत्री बनवाई गई।

और फिर नामकरण हुआ।

डॉ. शर्मा के अनुसार उनका नाम “धनंजय” स्वयं नीम करौली बाबा ने रखा था।

आज जब वही धनंजय शर्मा अपने दादा के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलते हैं, तो उनकी कहानी में बार-बार यही दो स्तर दिखाई देते हैं—एक तरफ प्रसिद्ध आध्यात्मिक व्यक्तित्व और दूसरी तरफ घर के बुजुर्ग।

क्या बाबा ने वास्तव में परिवार छोड़ दिया था?

लोकप्रिय कथाओं में अक्सर संतों के जीवन को एक नाटकीय रेखा में प्रस्तुत किया जाता है—घर छोड़ना, तपस्या करना और फिर संसार से पूरी तरह अलग हो जाना।

लेकिन डॉ. शर्मा अपने पारिवारिक विवरण में तस्वीर को अधिक जटिल बताते हैं।

उनके अनुसार बाबा ने गांव और परिवार से संबंध पूरी तरह तुरंत समाप्त नहीं कर दिया था। वे बताते हैं कि बाद के वर्षों में जरूर उन्होंने गृहस्थ जीवन से दूरी बढ़ाई, विशेषकर तब जब भक्तों और मिलने वालों की संख्या लगातार बढ़ने लगी।

डॉ. शर्मा के अनुसार गर्मियों में वे कैंची क्षेत्र में रहते और सर्दियों में आगरा या वृंदावन की ओर आते थे।

उनका भोजन भी बेहद साधारण बताया गया।

डॉ. शर्मा के मुताबिक रोटी, मूंग की दाल, लौकी और गिलकी जैसी साधारण चीजें उनके सामान्य भोजन का हिस्सा थीं। परिवार की स्मृतियों में विलासिता से दूर रहना बाबा के व्यक्तित्व का प्रमुख गुण था।

यह सादगी केवल भोजन में ही नहीं दिखाई देती।

डॉ. शर्मा द्वारा सुनाए गए एक पुराने प्रसंग में बाबा उनके साथ आगरा की सड़क पर निकलते हैं। कुछ दूर जाने पर रिक्शा लेते हैं और रास्ते में ही रिक्शावाले को उस समय के हिसाब से बड़ी रकम—50 रुपये—दे देते हैं।

जब रिक्शावाला पैसे लेने में झिझकता है, तो बाबा कथित रूप से उसके घर में बीमार पत्नी के इलाज का उल्लेख करते हैं।

परिवार के लिए यह घटना बाबा की कथित अंतर्दृष्टि और करुणा का उदाहरण है। लेकिन फिर वही बात महत्वपूर्ण है—यह संस्मरण है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित चिकित्सा या ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं।

बाबा अपनी तपस्या के बारे में क्यों नहीं बताते थे?

नीम करौली बाबा के जीवन को लेकर सबसे बड़ा रहस्य शायद यही है कि उनकी आध्यात्मिक साधना के शुरुआती वर्षों के बारे में बहुत-सी बातें स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं।

डॉ. शर्मा कहते हैं कि उनके पिता और चाचा तक में यह साहस नहीं होता था कि बाबा से सीधे पूछ लें—आपने तपस्या कहां की? आपको यह शक्ति कैसे मिली? आपने क्या साधना की?

उनके अनुसार इस तरह के प्रश्न बाबा को पसंद नहीं थे और कई बार वे नाराज भी हो जाते थे।

यह बात उनकी सार्वजनिक छवि को समझने में महत्वपूर्ण है।

भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में कुछ संत अपने आध्यात्मिक अनुभवों को व्यवस्थित दर्शन या आत्मकथा में बदलते हैं।

कुछ आश्रम स्थापित करते हैं।

कुछ शिष्यों को औपचारिक दीक्षा देते हैं।

और कुछ अपने जीवन के बारे में बहुत कम बोलते हैं।

डॉ. शर्मा की स्मृतियों में नीम करौली बाबा आखिरी श्रेणी में दिखाई देते हैं।

वे स्वयं को केंद्र में रखने के बजाय लोगों को हनुमान भक्ति, सेवा और प्रेम की ओर मोड़ते दिखाई देते हैं।

नीम करौरी गांव, गुफा और तपस्या की कहानी

डॉ. शर्मा बताते हैं कि परिवार की परंपरा नीम करौरी क्षेत्र को बाबा की साधना से जोड़ती है।

उनके अनुसार वहां एक गुफा से बाबा से संबंधित बताई जाने वाली वस्तुएं, जैसे चिमटा और हनुमान जी की एक मूर्ति, मिलने की बात परिवार में कही जाती रही है। इसी क्षेत्र के साथ प्रसिद्ध ट्रेन वाली कहानी भी जुड़ी है।

ट्रेन की कहानी नीम करौली बाबा से जुड़े सबसे लोकप्रिय आख्यानों में से एक है।

डॉ. शर्मा के संस्करण के अनुसार बाबा कभी गंगा स्नान के लिए जाते थे। एक यात्रा में उनके पास टिकट नहीं था और जांच के दौरान उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया गया।

वे पास के एक नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ गए।

इसके बाद कथित रूप से ट्रेन आगे नहीं चली।

रेलवे कर्मचारियों द्वारा ब्रेक और इंजन की जांच करने तथा अतिरिक्त प्रयास करने के बावजूद समस्या बनी रही—ऐसा परिवार और भक्त परंपरा में बताया जाता है।

इस कथा के अलग-अलग संस्करण वर्षों से सुनाए जाते रहे हैं। स्वयं डॉ. शर्मा भी बातचीत में यह संकेत देते हैं कि फिल्मों और लोकप्रिय प्रस्तुतियों में कुछ विवरण बदले या नाटकीय बनाए जा सकते हैं।

इसलिए कहानी का सांस्कृतिक महत्व उसके प्रत्येक विवरण की ऐतिहासिक पुष्टि से अलग है।

यह घटना भक्तों के लिए विनम्रता, संत के सम्मान और अदृश्य आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बन चुकी है।

13 वर्षों की तपस्या—परिवार में सुनाई जाने वाली कथा

इंटरव्यू में डॉ. शर्मा एक और कथा अपने पिता से सुनी हुई बताते हैं।

उनके अनुसार बाबा ने एक समय लंबी अवधि तक एकांत साधना की। बातचीत में लगभग 13 वर्षों का उल्लेख आता है। बताया जाता है कि दिन में वे एक स्थान पर रहते और रात के समय बाहर निकलते। एक व्यक्ति द्वारा दूध पहुंचाने की बात भी इस पारिवारिक कथा में आती है।

इसके बाद एक बनिए की दुकान से जुड़ी कथा सुनाई जाती है, जिसमें भूख, मुल्तानी मिट्टी, गुड़ और मिर्चों से जुड़े कथित चमत्कार का वर्णन है।

ऐसी घटनाएं धार्मिक संत-कथाओं की उस परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें असाधारण घटनाओं के जरिए संत के क्रोध, करुणा या आध्यात्मिक शक्ति को व्यक्त किया जाता है।

इन कथाओं की ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध स्रोत में नहीं दी गई है। इसलिए इन्हें विश्वास-आधारित मौखिक स्मृतियों के रूप में समझना अधिक उचित है।

वृंदावन: जहां अंतिम अध्याय पूरा हुआ

नीम करौली बाबा के जीवन में वृंदावन का विशेष स्थान रहा।

डॉ. शर्मा के अनुसार बाबा के आश्रमों की परंपरा में वृंदावन एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। वहां हनुमान मंदिर और आश्रम विकसित हुए तथा आज भी बड़ी संख्या में लोग उस स्थान से आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।

इंटरव्यू में बाबा के जीवन के अंतिम दिनों की एक पारिवारिक स्मृति भी सामने आती है।

डॉ. शर्मा बताते हैं कि एक यात्रा के दौरान बाबा मथुरा स्टेशन पर उतरे। तब उन्हें घबराहट महसूस हुई।

परिजन उन्हें अस्पताल ले गए, जहां ऑक्सीजन आदि देने की कोशिश हुई। लेकिन कथन के अनुसार बाबा आश्रम लौटना चाहते थे।

आखिरकार उन्हें वृंदावन आश्रम लाया गया।

डॉ. शर्मा के मुताबिक वहीं अपनी कुटिया में “राम-राम” कहते हुए उन्होंने शरीर छोड़ा।

इस प्रसंग में भी भाषा महत्वपूर्ण है।

भक्त “निर्वाण” या “देह त्याग” जैसे शब्दों का उपयोग कर सकते हैं, जबकि तटस्थ ऐतिहासिक लेखन में इसे उनकी मृत्यु कहा जाएगा।

दोनों अभिव्यक्तियों का संबंध अलग-अलग विश्वास-परंपराओं से है।

प्रभाव केवल आम भक्तों तक सीमित नहीं था

डॉ. शर्मा ने बातचीत में पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और उनके परिवार से जुड़ा एक संस्मरण भी सुनाया।

उनके अनुसार शर्मा परिवार में नीम करौली बाबा के प्रति गहरी श्रद्धा थी।

इंटरव्यू में सुरेश पचौरी के हवाले से एक पुरानी कथा का उल्लेख आता है, जिसमें विमला शर्मा अपने पति के राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित थीं और बाबा से सहायता मांगने गई थीं। कथित रूप से बाबा ने कहा था कि वे केवल मंत्री नहीं, बल्कि देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचेंगे।

बाद में शंकर दयाल शर्मा भारत के राष्ट्रपति बने।

यहां भी यह साफ करना जरूरी है कि स्रोत इस कथन को संस्मरण के रूप में प्रस्तुत करता है; इंटरव्यू में इसके लिए स्वतंत्र समकालीन दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए।

इसी तरह डॉ. शर्मा बताते हैं कि उन्हें एक अवसर पर बाबा के हाथ से लिखा “राम-राम” वाला कागज दिखाया गया, जिसे श्रद्धा से सुरक्षित रखा गया था।

इन घटनाओं से कम-से-कम एक बात स्पष्ट होती है—नीम करौली बाबा का प्रभाव केवल ग्रामीण या सामान्य भक्त समुदाय तक सीमित नहीं था। प्रशासन, राजनीति और उच्च पदों पर रहे लोगों के परिवारों में भी उनके प्रति श्रद्धा की कथाएं मौजूद हैं।

भोपाल में आश्रम बनाने का सपना

इंटरव्यू का एक बड़ा हिस्सा अतीत के बजाय भविष्य की ओर भी जाता है।

डॉ. धनंजय शर्मा बताते हैं कि वे भोपाल में नीम करौली बाबा से जुड़ा एक बड़ा आध्यात्मिक और सेवा केंद्र स्थापित होते देखना चाहते हैं।

उनकी कल्पना में वहां बाबा की प्रतिमा हो, हनुमान जी का मंदिर हो, सत्संग की व्यवस्था हो, छोटी गौशाला और संस्कृत विद्यालय जैसी गतिविधियां हों।

उन्होंने बताया कि इसके लिए एक ट्रस्ट बनाया गया है जिसमें मुख्यतः परिवार के सदस्य जुड़े हैं। सरकारी जमीन के संदर्भ में प्रस्ताव और नक्शे दिए जाने की भी बात उन्होंने इंटरव्यू में कही।

यह योजना किस स्तर तक आगे बढ़ी है, इसकी स्वतंत्र नवीनतम पुष्टि इस स्रोत में नहीं है। इसलिए इसे डॉ. शर्मा द्वारा व्यक्त योजना और आकांक्षा के रूप में ही समझना चाहिए।

लेकिन यह विचार अपने आप में महत्वपूर्ण है।

कैंची धाम और वृंदावन जैसे स्थान पहले ही नीम करौली बाबा की स्मृति से जुड़े बड़े आध्यात्मिक केंद्र बन चुके हैं।

परिवार की भोपाल से लंबे समय की कड़ी को देखते हुए डॉ. शर्मा अब उसी स्मृति को मध्य भारत में भी एक संस्थागत रूप देने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

सादगी की विरासत

इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में बातचीत डॉ. शर्मा के अपने जीवन की ओर मुड़ती है।

इंटरव्यूअर उनके साधारण जीवन का उल्लेख करते हैं—चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बड़े अस्पताल या अत्यधिक संपत्ति के पीछे न भागना।

डॉ. शर्मा कहते हैं कि मनुष्य को उतना ही चाहिए जितने में उसका जीवन चल सके।

वे अपनी पेंशन से संतुष्ट होने और दान-पुण्य में योगदान देने की बात भी करते हैं।

यहां बाबा की विरासत का एक दूसरा पहलू दिखाई देता है।

अक्सर किसी संत की विरासत को चमत्कारों और भविष्यवाणियों से मापा जाता है।

लेकिन परिवार जिस मूल्य को सबसे अधिक महत्व देता दिखाई देता है, वह है—कम में संतोष।

धन कमाना गलत नहीं।

प्रतिष्ठा हासिल करना भी अपने आप में गलत नहीं।

लेकिन जब धन और प्रतिष्ठा ही जीवन का अंतिम उद्देश्य बन जाएं, तब आध्यात्मिक परंपराएं मनुष्य को दूसरी दिशा की याद दिलाती हैं।

हर मंगलवार खिचड़ी और सुंदरकांड

डॉ. शर्मा के अनुसार उनके ट्रस्ट की ओर से भोपाल में सेवा गतिविधियां भी चलाई जाती हैं।

उन्होंने बताया कि मंगलवार को लगभग डेढ़ क्विंटल खिचड़ी बांटी जाती है और एम्स भोपाल के एक गेट के पास इसका वितरण किया जाता है।

इसके अलावा महीने के पहले मंगलवार को सुंदरकांड के आयोजन की बात भी उन्होंने कही। पिछले कुछ वर्षों से बाबा का वार्षिक उत्सव आयोजित करने का भी उल्लेख किया गया।

यही शायद नीम करौली बाबा की विरासत को समझने का सबसे व्यावहारिक रास्ता है।

चमत्कारों पर विश्वास करना या न करना व्यक्तिगत मामला हो सकता है।

लेकिन भूखे व्यक्ति को भोजन देना प्रत्यक्ष सेवा है।

किसी दुखी व्यक्ति को सहारा देना प्रत्यक्ष सेवा है।

समुदाय को जोड़ना प्रत्यक्ष सेवा है।

और संभवतः यही वह क्षेत्र है जहां आस्था और सामाजिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से मिल सकती हैं।

बेटे की नौकरी के कागज क्यों फाड़ दिए?

डॉ. शर्मा ने अपने पिता अनेक सिंह शर्मा और बाबा से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी भी सुनाई।

उनके अनुसार उनके पिता ने इतिहास में उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी तलाशना शुरू किया।

उन्हें पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर की नौकरी मिली।

वे खुशी-खुशी नियुक्ति से जुड़े कागज लेकर बाबा के पास पहुंचे।

लेकिन डॉ. शर्मा के अनुसार बाबा ने उन कागजों को फाड़ दिया और पुलिस की नौकरी से असहमति जताई।

कुछ समय बाद असिस्टेंट जेलर की नौकरी मिली तो कथित रूप से उसे भी स्वीकार नहीं करने दिया गया।

आखिरकार जब गवर्नर हाउस में अनुवाद से जुड़ी नौकरी मिली तो बाबा खुश हुए और उसे स्वीकार करने की अनुमति दी।

इस प्रसंग को कई तरह से पढ़ा जा सकता है।

भक्त इसे बाबा की दूरदर्शिता मान सकते हैं।

परिवार के दृष्टिकोण से इसे पिता द्वारा बेटे के जीवन की दिशा तय करने जैसी भूमिका भी माना जा सकता है।

लेकिन एक बात साफ है—डॉ. शर्मा की स्मृतियों में बाबा केवल आध्यात्मिक निर्देश देने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे परिवार के रोजमर्रा के निर्णयों में भी उपस्थित रहते थे।

एक संत की पत्नी की कम सुनी गई कहानी

नीम करौली बाबा की कथा में उनकी पत्नी का उल्लेख बहुत कम होता है।

इंटरव्यू में डॉ. शर्मा ने अपनी दादी की भी कुछ स्मृतियां साझा कीं।

उनके अनुसार उनका विवाह बहुत कम उम्र में हुआ था, जैसा उस दौर के कई सामाजिक संदर्भों में होता था।

डॉ. शर्मा अपनी दादी को धार्मिक महिला और देवी उपासक के रूप में याद करते हैं। उनके अनुसार उनका स्वभाव मजबूत था और उनका ध्यान विशेष रूप से बच्चों तथा परिवार की जिम्मेदारियों की ओर रहा।

डॉ. शर्मा इसे आध्यात्मिक दृष्टि से देखते हुए कहते हैं कि शायद यही व्यवस्था बाबा को सांसारिक आसक्ति से मुक्त रहने में सहायक रही।

यह उनकी व्यक्तिगत व्याख्या है।

लेकिन इस हिस्से का व्यापक महत्व यह है कि किसी प्रसिद्ध संत की जीवनी अक्सर केवल संत पर केंद्रित रह जाती है, जबकि पीछे छूटे परिवार—पत्नी, बच्चे और रिश्तेदार—उस कहानी का कम दिखाई देने वाला हिस्सा होते हैं।

संत का वैराग्य किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं होता।

उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ सकता है।

“मानवता के लिए आए थे”—परिवार की सबसे बड़ी धारणा

डॉ. शर्मा बातचीत में बार-बार एक विचार पर लौटते हैं—उनके अनुसार नीम करौली बाबा ने अपना जीवन अपने लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए जिया।

उन्होंने उत्तर प्रदेश रोडवेज, न्यायपालिका और दूसरे क्षेत्रों में लोगों की नौकरी लगवाने से जुड़ी कई पारिवारिक कथाओं का उल्लेख किया।

इनमें दी गई संख्याओं की स्वतंत्र पुष्टि स्रोत में नहीं है, इसलिए उन्हें सत्यापित आंकड़ों की तरह नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन ये कथाएं यह जरूर दिखाती हैं कि बाबा की पारिवारिक स्मृति में “लोगों की मदद करना” केंद्रीय गुण है।

डॉ. शर्मा बाबा से जुड़े संदेश को लगभग तीन सरल विचारों में देखते हैं—सबको भोजन दो, सबकी सेवा करो और सबसे प्रेम करो।

इसी संदर्भ में वे यह भी कहते हैं कि बाबा ने अपने लिए कोई बड़ी गद्दी या वैभवपूर्ण जीवन तैयार नहीं किया।

परिवार और भक्तों की स्मृति में उनकी “फकीरी” इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रसिद्धि के बावजूद व्यक्तिगत संपत्ति या प्रदर्शन उनके व्यक्तित्व का केंद्र नहीं बना।

देवराहा बाबा से संबंध की कथा

बातचीत में एक और प्रसिद्ध संत—देवराहा बाबा—का नाम भी आता है।

डॉ. शर्मा और इंटरव्यूअर दोनों नीम करौली बाबा तथा देवराहा बाबा की सादगी की तुलना करते हैं।

इसके बाद डॉ. शर्मा एक भक्त-परंपरा में प्रचलित कथन सुनाते हैं कि नीम करौली बाबा की मृत्यु की खबर मिलने पर देवराहा बाबा ने कथित रूप से कहा था कि “नीम बाबा कहीं नहीं गए।”

उन्होंने इससे भी आगे जाकर एक ऐसा कथन सुनाया जिसमें बाबा की असाधारण शक्ति की प्रशंसा की गई थी।

यह कथा भी मौखिक आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है और स्रोत में इसका अलग ऐतिहासिक दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

फिर भी यह कहानी दो संत परंपराओं के बीच परस्पर सम्मान की छवि बनाती है।

डॉ. शर्मा के अनुसार दोनों एक-दूसरे के भक्तों को कभी-कभी दूसरे संत के पास भेज दिया करते थे।

अगर इस स्मृति को प्रतीकात्मक रूप से पढ़ें, तो यह एक दिलचस्प संदेश देती है—आध्यात्मिकता को व्यक्ति-पूजा तक सीमित नहीं होना चाहिए।

युधिष्ठिर की कहानी—आस्था और असाधारण दावे

इंटरव्यू का शायद सबसे असाधारण हिस्सा युधिष्ठिर नाम के एक व्यक्ति से जुड़ी कहानी है।

डॉ. शर्मा के अनुसार भूमियाधार आश्रम में युधिष्ठिर को सांप ने काट लिया था और मौजूद लोगों ने उन्हें मृत मान लिया था। डॉक्टर के आने और मृत्यु घोषित करने का दावा भी इस कथा में किया गया है।

सुबह बाबा को घटना बताई गई।

कथा के अनुसार उन्होंने मृत्यु स्वीकार करने के बजाय चाय बनवाने को कहा, युधिष्ठिर के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें चाय पीने के लिए कहा।

डॉ. शर्मा का दावा है कि युधिष्ठिर उठ बैठे और चाय पी। उन्होंने यह भी कहा कि युधिष्ठिर कई वर्षों तक जीवित रहे और बाद में स्वयं यह कहानी सुनाते थे।

यह एक बहुत बड़ा दावा है।

इसीलिए इसे सावधानी से पढ़ना जरूरी है।

स्रोत में मेडिकल रिकॉर्ड, चिकित्सकों की पहचान, मृत्यु प्रमाण या दूसरी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं कराई गई है।

इसलिए पत्रकारिता की दृष्टि से इसे “मृत व्यक्ति को जीवित कर देने की सिद्ध घटना” नहीं कहा जा सकता।

यह नीम करौली बाबा से जुड़ी भक्त-परंपरा में सुनाया गया एक संस्मरण है।

विश्वासी इसे चमत्कार मान सकते हैं।

संदेहवादी वैकल्पिक चिकित्सकीय या स्मृति-संबंधी व्याख्या खोज सकते हैं।

दोनों स्थितियों में तथ्य और आस्था के दावे के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

पान मसाले के पाउच में मिला लॉकेट

इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में डॉ. शर्मा अपने जीवन की एक हालिया घटना साझा करते हैं।

वे स्वीकार करते हैं कि लंबे समय से तंबाकू और पान मसाले का सेवन करते रहे हैं।

एक दिन उन्होंने पान मसाले का एक पैकेट खरीदा और घर ले आए।

अगली सुबह पैकेट खोलने पर कथित रूप से उसके भीतर एक छोटा-सा पेंडेंट मिला, जिसके एक तरफ नीम करौली बाबा और दूसरी तरफ हनुमान जी की तस्वीर थी।

डॉ. शर्मा इसे व्यक्तिगत रूप से “मिरेकल” यानी चमत्कार मानते हैं।

लेकिन इंटरव्यू का दिलचस्प हिस्सा इसके तुरंत बाद आता है।

उनसे पूछा जाता है—क्या इसके बाद उन्होंने पान मसाला छोड़ दिया?

जवाब पूरी तरह संत-कथा जैसा आदर्श नहीं है।

वे स्वीकार करते हैं कि आदत अब भी बनी हुई है और इसे गलत भी मानते हैं।

यही ईमानदारी इस इंटरव्यू को अलग बनाती है।

यहां पौत्र स्वयं को आध्यात्मिक व्यक्ति के रूप में महान साबित करने की कोशिश नहीं करते।

वे अपनी कमजोरी स्वीकार करते हैं।

शायद इसी वजह से उनका संस्मरण ज्यादा मानवीय लगता है।

नीम करौली बाबा की कहानी में आखिर सबसे महत्वपूर्ण क्या है?

नीम करौली बाबा से जुड़ी कहानियों की दुनिया बहुत विशाल है।

रुकती हुई ट्रेन।

अनकही बातों का पहले से पता चल जाना।

भविष्य से जुड़े कथन।

बीमारी और मृत्यु से जुड़े असाधारण प्रसंग।

अचानक दिखाई देने वाले संकेत।

ऐसी कहानियां किसी भी आध्यात्मिक व्यक्तित्व को रहस्य से घेर देती हैं।

लेकिन डॉ. धनंजय शर्मा का इंटरव्यू सुनने के बाद एक दूसरी तस्वीर भी उभरती है।

एक दादा जो नाती को जलेबी खिलाता है।

एक बुजुर्ग जो बच्चे को पतंग दिलाता है।

एक व्यक्ति जिसका भोजन बेहद साधारण बताया जाता है।

एक संत जो अपनी साधना का प्रचार नहीं करना चाहता।

एक परिवार जो दशकों बाद भी छोटी-छोटी बातों को याद रखता है।

और एक विरासत जिसे परिवार केवल चमत्कारों में नहीं, बल्कि भोजन वितरण, सुंदरकांड, सेवा और संतोष के विचार में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

शायद यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

चमत्कारों की सत्यता पर सहमति होना जरूरी नहीं।

आस्था प्रत्येक व्यक्ति का निजी विषय है।

लेकिन करुणा, सादगी और सेवा जैसे मूल्य उस सीमा से बाहर निकल जाते हैं।

उन्हें मानने के लिए किसी अलौकिक घटना में विश्वास करना जरूरी नहीं।

एक विरासत जो कहानी से बड़ी है

नीम करौली बाबा के पौत्र डॉ. धनंजय शर्मा की जुबानी सामने आई यह कहानी किसी औपचारिक जीवनी का विकल्प नहीं है। यह परिवार की स्मृति है—जिसमें इतिहास, प्रेम, आस्था, लोककथा और निजी अनुभव एक-दूसरे में घुले हुए हैं।

इसीलिए इसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए।

जो बातें ऐतिहासिक रूप से दर्ज हैं, उन्हें तथ्य की तरह देखा जा सकता है।

जो बातें परिवार या भक्तों ने अनुभव के रूप में सुनाई हैं, उन्हें उनके विश्वास की अभिव्यक्ति के रूप में।

और जिन कथाओं में चमत्कार का दावा है, वहां पाठक को स्वयं तय करना होगा कि वह उन्हें आध्यात्मिक अनुभव, संयोग, लोकस्मृति या किसी अन्य दृष्टि से कैसे समझता है।

लेकिन एक बात इस पूरे इंटरव्यू से बार-बार सामने आती है—डॉ. धनंजय शर्मा के लिए नीम करौली बाबा की पहचान केवल रहस्यमय घटनाओं से नहीं बनती।

उनकी सबसे गहरी पहचान है एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने सादगी को प्रतिष्ठा से ऊपर रखा, सेवा को प्रदर्शन से ऊपर और प्रेम को दूरी से ऊपर।

शायद इसी कारण दशकों बाद भी उनके परिवार की निजी यादें और भक्तों की सार्वजनिक आस्था एक ही बिंदु पर मिलती हैं—मनुष्य की सेवा में।

समाप्त!

डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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