जिस इंसान ने सिर्फ छप्पन सेकंड की देरी के लिए अक्षिता की चार साल की मेहनत पर एक ही झटके में लाल निशान लगा दिया था…

जिस इंसान ने सिर्फ छप्पन सेकंड की देरी के लिए अक्षिता की चार साल की मेहनत पर एक ही झटके में लाल निशान लगा दिया था…
उसी इंसान को कुछ दिनों बाद उसके सामने खड़े होकर ऐसी मदद मांगनी थी, जिसके बारे में सोचकर भी अक्षिता का खून खौल जाता।
और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस आदमी को अक्षिता दुनिया का सबसे पत्थरदिल इंसान समझती थी, वह उस रात अस्पताल के एक बंद कमरे में अपने बूढ़े दादा का हाथ पकड़कर रो रहा था।
उसे एक लड़की चाहिए थी।
सिर्फ दो घंटे के लिए।
एक ऐसी लड़की, जिसे वह अपने दादा के सामने अपनी प्रेमिका कह सके।
लेकिन उसे क्या पता था कि किस्मत ने उसके लिए जिस लड़की को चुना है…
वही लड़की थी जिसने कुछ घंटे पहले उससे कहा था—
“प्रोफेसर साहब, अगर दुनिया में कभी किसी इंसान से आपको प्यार हुआ ना… तब आपको पता चलेगा कि हर चीज नियमों से नहीं चलती।”
और शायद उस दिन से किस्मत ने दोनों की कहानी लिखनी शुरू कर दी थी।
अक्षिता देसाई की उम्र चौबीस साल थी।
ग्रेजुएशन का आखिरी सेमेस्टर चल रहा था और उसके पास जिंदगी को लेकर बहुत बड़े सपने नहीं थे।
बस एक नौकरी।
अपना छोटा-सा घर।
कुछ अपनी कमाई।
और एक ऐसी जिंदगी जिसमें उसे हर सुबह यह डर न रहे कि अगले महीने का खर्च कैसे चलेगा।
मां-पापा अब इस दुनिया में नहीं थे।
एक दुर्घटना ने कुछ साल पहले एक ही रात में उससे दोनों को छीन लिया था।
उसके बाद उसकी बड़ी बहन सांची ही उसका परिवार थी।
सांची एक अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्म के लिए काम करती थी और अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करती थी, मगर काम ने उसकी जिंदगी इतनी व्यस्त कर दी थी कि कई बार उसका प्यार सिर्फ फोन पर दिए गए निर्देशों में दिखाई देता था।
“अक्षिता, बिजली का बिल भरा?”
“अक्षिता, बैंक गई?”
“अक्षिता, इंटरव्यू दिया?”
“अक्षिता, कोई बेवकूफी तो नहीं की?”
और हर बार अक्षिता हंसकर कहती—
“दी, आप मेरी बहन कम और इनकम टैक्स ऑफिसर ज्यादा लगती हो।”
लेकिन सच यह था कि सांची की डांट में ही अक्षिता को अब मां की कमी थोड़ी कम महसूस होती थी।
उस सुबह भी वह इसी सोच में कॉलेज के पास बने छोटे से कैफे में बैठी थी।
अगले कुछ दिनों में उसकी थीसिस जमा होनी थी।
उसके बाद कॉलेज खत्म।
फिर नौकरी।
नई शुरुआत।
उसने अपनी घड़ी देखी।
“भैया, एक कॉफी।”
वेटर ने सिर हिलाया।
कुछ ही देर में उसने गरम कॉफी का कप अक्षिता की तरफ बढ़ाया।
“मैम, आपकी कॉफी।”
अक्षिता ने मुस्कुराकर कप लिया।
लेकिन जैसे ही उसने उसे उठाया, ढक्कन ढीला होने की वजह से उसके हाथ में रह गया।
“ओह!”
गरम कॉफी छलक गई।
अक्षिता अचानक पीछे हटी और किसी मजबूत चीज से टकराई।
नहीं…
किसी इंसान से।
वह संतुलन खोकर गिरने ही वाली थी कि किसी ने उसकी बांह पकड़ ली।
अक्षिता की सांस अटक गई।
उसने नजर उठाई।
सामने करीब अट्ठाईस साल का एक लंबा आदमी खड़ा था।
काला सूट।
सफेद शर्ट।
गोल फ्रेम वाला चश्मा।
चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे पूरी दुनिया ने उसका कुछ उधार लिया हो।
कुछ सेकंड तक अक्षिता उसे देखती रह गई।
फिर मुस्कुराकर बोली—
“थैंक्स। आपने बचा लिया।”
उस आदमी ने उसे सीधा किया।
अक्षिता को लगा शायद वह भी कुछ कहेगा।
लेकिन अगले ही पल वह नीचे झुका और अपने जूते पर गिरी कॉफी साफ करने लगा।
अक्षिता के चेहरे की मुस्कान वहीं जम गई।
उसने अपने बाल पीछे किए।
“आप ठीक हैं?”
वह आदमी खड़ा हुआ।
उसने अक्षिता की तरफ देखा तक नहीं।
बस वेटर से बोला—
“अगर इनकी कॉफी का कार्यक्रम खत्म हो गया हो तो क्या मुझे मेरी कॉफी मिल सकती है?”
अक्षिता ने आंखें सिकोड़ लीं।
“एक्सक्यूज मी?”
लेकिन वह आदमी तब तक काउंटर पर जा चुका था।
वेटर घबरा गया।
“यस सर।”
उसने जल्दी से कॉफी बनाई और सामने रख दी।
उस आदमी ने एक घूंट लेने से पहले कप देखा।
“कौन-सा दूध इस्तेमाल किया?”
वेटर ने कहा—
“सर, रेगुलर।”
उस आदमी के चेहरे पर नाराजगी उभरी।
“मैंने लैक्टोज-फ्री कहा था।”
“सॉरी सर, मैं दूसरी बना देता हूं।”
“ये वाली?”
“सर, मैं फेंक देता हूं।”
इतना सुनते ही अक्षिता आगे बढ़ी।
“रुकिए।”
उसने कप उठा लिया।
“मैं पी लूंगी।”
आदमी ने पहली बार उसे ठीक से देखा।
अक्षिता ने फोन निकाला और कॉफी के पैसे वेटर को भेज दिए।
फिर उस आदमी की तरफ देखकर बोली—
“और मिस्टर परफेक्शन… किसी गरीब वेटर का नुकसान मत कराया करो। कॉफी है, परमाणु रिएक्टर नहीं।”
वह आदमी कुछ बोल पाता, उससे पहले अक्षिता कॉफी लेकर बाहर निकल गई।
पीछे खड़ा आदमी उसे जाता हुआ देखता रहा।
उसकी भौंहों के बीच हल्की-सी शिकन आई।
जैसे उसने जिंदगी में पहली बार किसी को खुद से इस अंदाज में बात करते सुना हो।
अक्षिता को क्या पता था कि करीब दो घंटे बाद वही चेहरा फिर उसके सामने आने वाला है।
कॉलेज पहुंचते ही उसकी दोस्त मायरा दौड़कर उसके पास आई।
“अकू! सुना है नया प्रोफेसर आया है।”
अक्षिता ने बैग सीट पर रखा।
“तो मैं क्या करूं? आरती उतारूं?”
“पूरे कॉलेज में चर्चा है।”
“मेरा एक हफ्ता बचा है। थीसिस जमा, डिग्री खत्म और कॉलेज को बाय-बाय।”
मायरा मुस्कुराई।
“लेकिन लड़कियां कह रही हैं बंदा बहुत हैंडसम है।”
अक्षिता ने आंखें घुमाईं।
“मुझे नौकरी चाहिए, हैंडसम प्रोफेसर नहीं।”
उसी समय क्लास का दरवाजा खुला।
बातें बंद हो गईं।
हील नहीं…
पुरुषों के जूतों की स्थिर आवाज कमरे में गूंजी।
टक…
टक…
टक…
अक्षिता ने सामने देखा।
और उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
वही काला सूट।
वही गोल चश्मा।
वही ठंडी आंखें।
“नहीं…”
उसके मुंह से धीरे से निकला।
मायरा ने पूछा—
“क्या?”
अक्षिता ने माथा पकड़ लिया।
“मेरी किस्मत।”
वह आदमी पोडियम तक पहुंचा।
उसने घड़ी देखी।
फिर पूरी क्लास पर नजर घुमाई।
“हेलो स्टूडेंट्स। आई एम योहान ओबेरॉय।”
पूरी क्लास में फुसफुसाहट होने लगी।
“मैं आपका नया स्टैटिस्टिक्स और कॉम्प्लेक्स वैरिएबल्स प्रोफेसर हूं।”
उसकी आवाज में ऐसी दृढ़ता थी कि कुछ ही सेकंड में पूरा कमरा शांत हो गया।
“मेरी क्लास के कुछ नियम हैं।”
अक्षिता ने मन में कहा—
“शुरू हो गया टाइम मशीन।”
“कोई छात्र लेट नहीं आएगा।”
योहान ने कहा।
“कोई छात्र क्लास खत्म होने से पहले बाहर नहीं जाएगा। मेडिकल इमरजेंसी का प्रमाण चाहिए होगा। बहाने मेरे सामने काम नहीं करेंगे।”
एक छात्र ने धीरे से कहा—
“सर, आपका परिचय?”
योहान ने सपाट स्वर में जवाब दिया—
“मेरे बारे में जो जानना है, इंटरनेट पर उपलब्ध है। आपकी परफॉर्मेंस आपके बारे में मुझे बता देगी और मेरी परफॉर्मेंस मेरे बारे में आपको।”
पूरी क्लास प्रभावित थी।
बस एक अक्षिता थी जो मन ही मन उसे बीस गालियां दे चुकी थी।
कुछ देर बाद बच्चों ने चुपके से उसके बारे में इंटरनेट पर देखना शुरू किया।
“यार, ये तो गोल्ड मेडलिस्ट है।”
“इसने बहुत कम उम्र में पीएचडी कर ली।”
“इसके रिसर्च पेपर इंटरनेशनल जर्नल में हैं।”
“इतना ब्रिलियंट आदमी हमारे कॉलेज में क्यों पढ़ा रहा है?”
अक्षिता ने फोन बंद कर दिया।
“जो भी है… है तो खड़ूस।”
तभी उसके दोस्त का मैसेज आया—
“अकू, नए प्रोफेसर की फोटो भेज।”
अक्षिता के चेहरे पर शरारत उभरी।
फोटो लेने की जगह उसने नोटबुक में योहान का कार्टून बनाना शुरू कर दिया।
गोल चश्मा।
लंबी नाक।
मुंह के ऊपर लिखा—
“मिस्टर टाइम मशीन।”
वह ड्राइंग में इतनी खो गई कि उसे पता ही नहीं चला योहान कब उसके पास आकर खड़ा हो गया।
अचानक टेबल पर नोटबुक की आवाज हुई।
अक्षिता उछल पड़ी।
उसने ऊपर देखा।
योहान।
मायरा ने सामने बैठकर होंठ काटे ताकि हंसी न निकल जाए।
योहान ने ड्राइंग उठाई।
कुछ सेकंड उसे देखा।
फिर बेहद गंभीर आवाज में बोला—
“अगर पढ़ाई में रुचि नहीं है तो कम से कम जिस काम में रुचि है, उसमें तो ध्यान दीजिए।”
अक्षिता चुप।
योहान ने कागज उसकी तरफ किया।
“मेरे चश्मे का फ्रेम पूरी तरह गोल नहीं है।”
क्लास में दबी हंसी सुनाई दी।
“और मेरे कोट में तीन नहीं चार बटन हैं।”
अब कई बच्चे हंसने लगे।
अक्षिता शर्म से लाल हो गई।
योहान उसके करीब झुका।
“मिस देसाई, जिंदगी में जो काम करिए… सौ प्रतिशत करिए। आधे मन से किया गया काम सिर्फ समय बर्बाद करता है।”
फिर वह पोडियम पर लौट गया।
अक्षिता ने धीरे से कहा—
“खड़ूस।”
योहान पलटा।
“कुछ कहा?”
“नहीं सर।”
“गुड।”
उस शाम हॉस्टल में मायरा अक्षिता का मजाक उड़ाकर बेहाल थी।
“मिस्टर टाइम मशीन!”
मायरा पेट पकड़कर हंस रही थी।
अक्षिता ने कुशन उठाकर उसके ऊपर फेंक दिया।
“मर जा।”
“पहले दिन ही प्रोफेसर ने पूरी क्लास के सामने धो दिया।”
“वो इंसान नहीं है। चलता-फिरता नियमों का बोर्ड है।”
“लेकिन हैंडसम बहुत है।”
“हैंडसम माय फुट।”
अक्षिता ने गुस्से में कहा।
“कॉफी पर ड्रामा। ड्राइंग पर ड्रामा। क्लास पर ड्रामा। मुझे यकीन है सोने से पहले भी टाइमर लगाता होगा कि आठ घंटे एक मिनट नहीं, ठीक आठ घंटे सोना है।”
मायरा फिर हंस पड़ी।
कुछ देर बाद उसने पूछा—
“इंटरव्यू का क्या?”
अक्षिता का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
“परसों मेहता इंडस्ट्रीज।”
“तैयारी?”
“पूरी।”
असलियत में तैयारी इतनी पूरी नहीं थी।
दो दिन बाद जब अक्षिता इंटरव्यू रूम में बैठी, उसकी हथेलियां पसीने से भीग रही थीं।
सामने तीन लोग बैठे थे।
“अपना परिचय दीजिए।”
अक्षिता ने बोलना शुरू किया।
पहली लाइन में अटक गई।
दोबारा शुरू किया।
फिर गलती।
तीसरी बार किसी तरह पूरा किया।
मुख्य इंटरव्यूअर ने उसका रिज्यूमे देखा।
“आपके मेजर के अलावा आपकी कोई खास स्किल?”
अक्षिता तुरंत बोली—
“मैं कॉमिक्स बहुत अच्छी बनाती हूं।”
सामने बैठे तीनों लोग चुप हो गए।
अक्षिता को अपनी गलती समझ आई।
“मेरा मतलब… ड्रॉइंग…”
इंटरव्यूअर ने पूछा—
“कोई इंटर्नशिप?”
“नहीं।”
“वॉलंटियर एक्सपीरियंस?”
“नहीं।”
“कोई दूसरी भाषा?”
अक्षिता ने धीरे से सिर झुका दिया।
“नहीं।”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर सामने बैठी महिला ने कहा—
“सॉरी मिस देसाई। इस प्रोफाइल के लिए हमें थोड़ा ज्यादा एक्सपीरियंस चाहिए।”
अक्षिता के अंदर जैसे कुछ टूट गया।
यह उसका सातवां इंटरव्यू था।
छह महीने में सातवीं बार।
वह बाहर निकली और सीधे वॉशरूम में चली गई।
नल खोला।
चेहरे पर पानी डाला।
फिर आईने में खुद को घूरते हुए बोली—
“तुमसे कुछ होगा भी?”
उसकी आंखें भर आईं।
“छह महीने… सात इंटरव्यू…”
उसने मुट्ठियां भींच लीं।
“क्यों नहीं कर पाती मैं?”
तभी वॉशरूम का दरवाजा खुला।
करीब पचास साल की एक महिला अंदर आई।
उसकी सफेद शर्ट पर काला दाग लगा था और वह परेशान होकर उसे टिश्यू से साफ करने की कोशिश कर रही थी।
अक्षिता कुछ पल देखती रही।
फिर बोली—
“मैम, मैं मदद करूं?”
महिला ने थकी नजरों से उसे देखा।
“दस मिनट में बोर्ड मीटिंग है और ये दाग…”
अक्षिता ने अपना बैग खोला।
काला पेन निकाला।
“अगर आपको मुझ पर भरोसा हो…”
महिला ने शर्ट की तरफ देखा।
फिर पेन की तरफ।
“करो।”
अक्षिता ने दाग के चारों तरफ छोटे-छोटे स्ट्रोक बनाने शुरू किए।
कुछ ही मिनट में वह दाग एक खूबसूरत मिनिमलिस्ट फूल और पक्षी के डिजाइन में बदल गया।
महिला आईने में खुद को देखकर हैरान रह गई।
“तुमने ये अभी बनाया?”
“जी।”
महिला मुस्कुराई।
“नाम?”
“अक्षिता देसाई।”
“यहां?”
अक्षिता ने फीकी मुस्कान दी।
“इंटरव्यू था। रिजेक्ट हो गई।”
“ओह।”
“कोई बात नहीं। सातवीं बार है। अब आदत हो रही है।”
अक्षिता मुस्कुराकर बाहर निकल गई।
वह लिफ्ट का इंतजार कर रही थी कि पीछे से आवाज आई—
“मिस अक्षिता!”
वह पलटी।
वही इंटरव्यूअर दौड़ती हुई आ रही थी।
“वेट!”
अक्षिता हैरान रह गई।
“जी?”
महिला ने सांस संभाली।
“यू आर हायर्ड।”
अक्षिता कुछ सेकंड समझ ही नहीं पाई।
“क्या?”
“हमारी डायरेक्टर ने आपको हायर करने का फैसला किया है।”
“लेकिन…”
“जिस महिला की शर्ट पर आपने डिजाइन बनाया था।”
अक्षिता की आंखें चमक उठीं।
“वो डायरेक्टर थीं?”
इंटरव्यूअर मुस्कुराई।
“हम ऐसी टीम बना रहे हैं जहां समस्या देखकर सिर्फ शिकायत करने वाले नहीं, समाधान खोजने वाले लोग चाहिए।”
अक्षिता की आंखों में आंसू आ गए।
वह अचानक उछल पड़ी।
“यस!”
फिर तुरंत खुद को संभाला।
“सॉरी।”
उस दिन छह महीने की सारी निराशा जैसे एक पल में हल्की हो गई।
रात को मायरा और देव ने उसके साथ छोटी-सी पार्टी की।
कोल्ड ड्रिंक की बोतलें टकराईं।
देव ने कहा—
“मिस अक्षिता देसाई, मेहता इंडस्ट्रीज!”
मायरा ने उसे गले लगा लिया।
“देखा? मैं कहती थी ना तू बेकार नहीं है।”
अक्षिता ने आंखें पोंछीं।
“बस इंटरव्यू में बेकार हूं।”
तीनों हंस पड़े।
खुशी के बीच उसने अपनी बहन सांची को फोन किया।
“दी…”
दूसरी तरफ से बिना हेलो के आवाज आई—
“कल एक घर देखने जाना है।”
अक्षिता का चेहरा उतर गया।
“दी! पहले पूछो क्यों कॉल किया है।”
“तुम्हारी नौकरी लग गई। पता है।”
“आपको कैसे?”
“देव की पोस्ट।”
“फिर फोन क्यों नहीं किया?”
सांची कुछ पल चुप रही।
“बिजी थी बच्चा। कॉन्ग्रैचुलेशन्स।”
अक्षिता के चेहरे पर मुस्कान आई।
“थैंक यू।”
सांची ने कहा—
“अब जिम्मेदारी की बात सुन। मां-पापा के दुर्घटना बीमा के कुछ पैसे पड़े हैं। मैं चाहती हूं उनसे एक प्रॉपर्टी खरीद लें।”
अक्षिता गंभीर हो गई।
“लेकिन दी…”
“तुम चौबीस की हो गई हो। हमेशा हॉस्टल में नहीं रह सकती।”
सांची ने एक नंबर भेजा।
“राहुल है। दूर का रिश्तेदार। रियल एस्टेट कंसल्टेंट है। उससे बात कर लेना।”
अक्षिता का मन नहीं था।
लेकिन बड़ी बहन से जीतना आसान नहीं था।
अगले दिन वह राहुल से मिली।
राहुल जरूरत से ज्यादा फ्रेंडली था।
“ब्रदर मत कहो मुझे।”
“तो क्या कहूं?”
“जान कह सकती हो।”
अक्षिता ने ऐसी नजर से देखा कि राहुल तुरंत सीधा बैठ गया।
“मेरा मतलब… जैक। दोस्त मुझे जैक कहते हैं।”
उसने टैबलेट पर एक फ्लैट दिखाया।
हरी-भरी सोसायटी।
दो बेडरूम।
बालकनी।
सुरक्षा।
कीमत छियासठ लाख।
अक्षिता का मुंह खुल गया।
“इतने?”
राहुल हंस दिया।
“ईएमआई नाम की चीज सुनी है?”
अक्षिता ने फोटो फिर देखी।
उसे घर पसंद आ गया था।
उसने मां-पापा की याद में सुरक्षित जगह खरीदने का सपना वहीं देख लिया।
कुछ दिनों बाद उसकी थीसिस डिफेंस थी।
वह उसकी जिंदगी का सबसे जरूरी दिन था।
रात में उसने बीस अलार्म लगाए।
सुबह उठी।
तैयार हुई।
तभी राहुल का फोन आया।
“अक्षिता, बड़ी परेशानी हो गई।”
“क्या?”
“वो फ्लैट किसी और को बेचा जा सकता है।”
“लेकिन हमारा सौदा तय था।”
“मालिक विदेश में है। दूसरा खरीदार ज्यादा पैसे दे रहा है। अभी आकर पेपर साइन कर दो वरना फ्लैट चला जाएगा।”
अक्षिता ने घड़ी देखी।
डिफेंस में दो घंटे थे।
“जैक, आज मेरी थीसिस है।”
“सिर्फ साइन करना है। आधा घंटा।”
अक्षिता कुछ पल सोचती रही।
फिर बोली—
“ठीक है।”
यही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती बनने वाली थी।
आधा घंटा…
एक घंटा बीस मिनट बन गया।
वापसी में ऑटो वाले को गैस भरवानी पड़ी।
अक्षिता बार-बार घड़ी देख रही थी।
“भैया जल्दी।”
वह ऑडिटोरियम पहुंची।
भागते-भागते सांस फूल गई थी।
उसका नाम चार बार बुलाया जा चुका था।
वह पोडियम पर खड़ी हुई।
“सॉरी…”
वह प्रेजेंटेशन शुरू करने ही वाली थी कि एक ठंडी आवाज आई—
“मिस अक्षिता देसाई।”
उसकी सांस रुक गई।
योहान सामने बैठा था।
उसने घड़ी की तरफ देखा।
“आपका डिफेंस समाप्त हो चुका है।”
अक्षिता का चेहरा सफेद पड़ गया।
“सर?”
“आप लेट हैं।”
“सर, पांच मिनट की देरी अलाउड है।”
योहान ने अपनी घड़ी उसके सामने की।
“आप पांच मिनट छप्पन सेकंड लेट हैं।”
अक्षिता को लगा उसने गलत सुना।
“सर… सिर्फ छप्पन सेकंड।”
“छप्पन सेकंड भी समय है।”
“सर प्लीज।”
उसकी आवाज कांपी।
“मेरे चार साल…”
योहान ने पेपर उठाया।
“अगर यह इतना महत्वपूर्ण था तो आपको समय पर आना चाहिए था।”
अक्षिता की आंखों में आंसू भर आए।
“मैं जानबूझकर लेट नहीं हुई।”
“नियम कारण देखकर नहीं बदलते।”
“सर…”
योहान ने साइन कर दिया।
“योर डिफेंस इज फेल्ड।”
बस चार शब्द।
और अक्षिता की पूरी दुनिया जैसे वहीं रुक गई।
ऑडिटोरियम में बैठे बाकी शिक्षक भी असहज हो गए।
लेकिन योहान के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
अक्षिता ने अपना लैपटॉप बंद किया।
हाथ कांप रहे थे।
आंखों में भरे आंसुओं को गिरने नहीं दिया।
कुछ कदम चली।
फिर अचानक रुक गई।
वह पलटी।
पूरे ऑडिटोरियम के सामने बोली—
“सर, आप मेरी जिंदगी में मिले सबसे खड़ूस शिक्षक हैं।”
पूरा हॉल शांत।
योहान ने उसकी तरफ देखा।
अक्षिता की आवाज कांप रही थी, लेकिन शब्द साफ थे।
“अनुशासन जरूरी है। लेकिन इंसानियत उससे कम जरूरी नहीं होती।”
योहान की आंखें थोड़ी सिकुड़ीं।
“जब नियम में थोड़ी-सी रियायत किसी की चार साल की मेहनत बचा सकती हो, तब शायद किताब से ऊपर इंसान को देख लेना चाहिए।”
योहान ने ठंडे स्वर में कहा—
“धन्यवाद आपके सुझाव के लिए।”
अक्षिता के होंठ कांप गए।
“एक दिन आपको समझ आएगा।”
वह वहां से चली गई।
दरवाजा बंद हुआ।
और पहली बार योहान की नजर कुछ सेकंड उसी दरवाजे पर टिकी रही।
कॉलेज की छत पर पहुंचते ही अक्षिता टूट गई।
उसने मायरा को फोन किया।
“मायरा…”
“क्या हुआ?”
अक्षिता जोर-जोर से रोने लगी।
“मैं बर्बाद हो गई…”
मायरा घबरा गई।
“कहां है तू?”
कुछ देर में मायरा और देव उसके पास थे।
अक्षिता ने पूरी बात बताई।
मायरा गुस्से से बोली—
“मैं उस प्रोफेसर की…”
देव ने रोक दिया।
“रूल के अंदर किया है उसने। शिकायत मुश्किल होगी।”
अक्षिता ने आंसू पोंछे।
“छप्पन सेकंड…”
उसने आसमान की तरफ देखा।
“मेरी जिंदगी छप्पन सेकंड से हार गई।”
देव ने उसका हाथ पकड़ा।
“एक चीज तो है तेरे पास।”
“क्या?”
“घर।”
मायरा ने तुरंत कहा—
“हां! नया घर।”
अक्षिता ने धीरे से मुस्कुराने की कोशिश की।
“हां…”
कम से कम एक चीज तो ठीक हुई थी।
लेकिन किस्मत जैसे उसके धैर्य की परीक्षा खत्म करने के मूड में ही नहीं थी।
अगले दिन अक्षिता फ्लैट देखने पहुंची।
चाबी लगाई।
दरवाजा खुल गया।
घर बेहद खूबसूरत था।
बालकनी से शहर दिखाई देता था।
उसने मां-पापा की कल्पना की।
“मम्मी, ये कोना आपका होता।”
उसकी आंखें नम हो गईं।
फिर वह मुस्कुराई।
फोन निकाला।
कभी सोफे पर फोटो।
कभी किचन में।
तभी बाथरूम का दरवाजा खुला।
अक्षिता ने मुड़कर देखा।
और उसकी आंखें फैल गईं।
योहान ओबेरॉय सामने खड़ा था।
कमर पर सिर्फ तौलिया।
गीले बाल।
चेहरे पर वही कठोर भाव…
जो दो सेकंड में हैरानी में बदल गया।
“तुम?”
अक्षिता का फोन हाथ में था।
अनजाने में दो तस्वीरें क्लिक हो गईं।
योहान की आंखें और बड़ी हो गईं।
“फोन नीचे करो!”
अक्षिता भी होश में आई।
“आप यहां क्या कर रहे हैं?”
योहान ने तौलिया कसकर पकड़ा।
“मेरे घर में खड़े होकर मुझसे पूछ रही हो मैं यहां क्या कर रहा हूं?”
अक्षिता चार कदम आगे आई।
“आपका घर?”
“हां।”
“यह मेरा घर है!”
“क्या?”
दोनों एक-दूसरे को घूर रहे थे।
योहान ने हाथ बढ़ाया।
“पहले फोटो डिलीट करो।”
अक्षिता ने फोन पीछे कर लिया।
“पहले बताइए मेरे घर में कैसे आए?”
“मिस देसाई…”
“नहीं मिस्टर टाइम मशीन, आज नियम मैं बनाऊंगी।”
योहान ने पहली बार उसका फोन छीनने की कोशिश की।
अक्षिता पीछे हटी।
कुछ सेकंड दोनों के बीच अजीब-सी खींचतान हुई।
अक्षिता किसी तरह बाहर निकल गई।
लिफ्ट तक पहुंचते-पहुंचते उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
लेकिन रोमांच की वजह से नहीं।
एक डर उसके अंदर उतर चुका था।
योहान उस घर को अपना क्यों कह रहा था?
उसने राहुल को फोन किया।
नंबर बंद।
दोबारा।
बंद।
वह सीधे उस ऑफिस पहुंची जिसका कार्ड राहुल ने उसे दिया था।
रिसेप्शनिस्ट ने कंप्यूटर देखा।
फिर अक्षिता को।
“मैम, इस नाम का कोई व्यक्ति यहां काम नहीं करता।”
अक्षिता के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“राहुल?”
“नो मैम।”
“जैक?”
“नहीं।”
अक्षिता बाहर निकली।
सीढ़ियों पर बैठ गई।
आंखों से आंसू बहने लगे।
बीस लाख रुपये।
मां-पापा की आखिरी निशानी।
वह पैसा जो उनकी मौत के बाद मिला था।
उसने कांपते हाथ से मायरा को फोन किया।
“मायरा…”
उसके मुंह से आगे शब्द नहीं निकले।
मायरा सिर्फ उसकी आवाज सुनकर समझ गई।
“कहां है?”
कुछ देर बाद मायरा और देव पहुंच गए।
अक्षिता ने बताया।
मायरा गुस्से में राहुल को ऐसी-ऐसी बद्दुआ देने लगी कि देव को बीच में रोकना पड़ा।
देव ने कहा—
“पहले सबूत चाहिए।”
मायरा बोली—
“योहान।”
अक्षिता ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“अगर घर उसका है तो असली पेपर उसी के पास होंगे।”
अक्षिता का चेहरा उतर गया।
“मैं उसके पास नहीं जाऊंगी।”
मायरा ने उसकी तरफ देखा।
“बीस लाख।”
कुछ देर की चुप्पी।
अक्षिता खड़ी हो गई।
“चल।”
जब तीनों योहान के घर पहुंचे, अक्षिता दरवाजे के सामने खड़ी बहुत देर तक बेल ही नहीं बजा पाई।
मायरा ने कहा—
“बेटा, पंडित बुलाऊं?”
अक्षिता ने घूरा।
“चुप।”
“तो बेल बजा।”
उसने बेल दबाई।
दरवाजा खुला।
योहान सामने था।
अक्षिता को देखते ही उसका चेहरा सख्त हो गया।
उसने दरवाजा वापस बंद करना चाहा।
अक्षिता ने हाथ लगा दिया।
“सॉरी!”
योहान रुका।
“अब?”
“बस पांच मिनट।”
योहान ने आंखें बंद कीं।
गहरी सांस ली।
दरवाजा खोल दिया।
अक्षिता अंदर आने लगी।
उसने हाथ से रास्ता रोक दिया।
“फोटो।”
अक्षिता ने मासूम चेहरा बनाया।
“कौन-सी?”
योहान ने बिना कुछ कहे उसे घूरा।
अक्षिता ने फोन निकाला।
तस्वीरें डिलीट कीं।
“हो गया।”
“रिसेंटली डिलीटेड।”
अक्षिता का मुंह खुल गया।
“आपको इंसानों पर जरा भी भरोसा नहीं?”
“फिलहाल तुम पर नहीं।”
मायरा ने अपनी हंसी दबाई।
अक्षिता ने वहां से भी फोटो डिलीट की।
“अब खुश?”
“नहीं। अंदर आओ।”
बैठक में असली कागज सामने आए।
अक्षिता ने अपना कॉन्ट्रैक्ट दिखाया।
योहान ने ध्यान से पढ़ा।
फिर बहुत शांत स्वर में बोला—
“तुम्हारे साथ धोखा हुआ है।”
अक्षिता के चेहरे से रंग उड़ गया।
“नहीं।”
“ये सिग्नेचर नकली हैं।”
“लेकिन चाबी…”
योहान उसे दरवाजे तक ले गया।
उसने लॉक रीसेट किया।
“अब खोलो।”
अक्षिता ने चाबी लगाई।
दरवाजा नहीं खुला।
उसके हाथ कांप गए।
योहान ने कहा—
“यह डेकोरेशन कंपनी की पुरानी एक्सेस की है। असली डिजिटल लॉक लग चुका है।”
अक्षिता दीवार से टिक गई।
“मतलब…”
“जिसे तुम अपना रिश्तेदार कह रही हो उसने तुम्हें ऐसे दिन बुलाया जिस दिन तुम्हारा थीसिस डिफेंस था।”
योहान ने तारीख पर उंगली रखी।
“तुम जल्दबाजी में थीं। उसने उसी का फायदा उठाया।”
अक्षिता को पहली बार समझ आया।
उसकी थीसिस भी गई।
पैसे भी।
और दोनों चीजों के पीछे किसी न किसी रूप में राहुल था।
मायरा ने तुरंत कहा—
“पुलिस।”
लेकिन अक्षिता चुप रही।
पुलिस स्टेशन में शिकायत लिखी गई।
अधिकारी ने कहा—
“धोखाधड़ी की रकम बड़ी है। मामला साबित हुआ तो आरोपी को कई वर्षों की सजा हो सकती है।”
अक्षिता का चेहरा बदल गया।
कलम उसके हाथ में थी।
लेकिन साइन नहीं कर पाई।
वह बाहर निकल गई।
मायरा पीछे दौड़ी।
“क्या कर रही है?”
अक्षिता रोते हुए बोली—
“वो मेरा रिश्तेदार है।”
“रिश्तेदार?”
मायरा का गुस्सा फूट पड़ा।
“जिसने तुम्हारे मां-पापा के पैसे चुरा लिए, वह रिश्तेदार?”
अक्षिता चुप।
योहान दूर खड़ा सब देख रहा था।
उसने अक्षिता से फोन मांगा।
अक्षिता ने हैरानी से उसे दे दिया।
उसने अपना नंबर सेव किया।
फिर फोन वापस करते हुए कहा—
“जब समझ आ जाए कि अपराधी रिश्ता देखकर अपराध नहीं करता, तब कॉल कर देना। मैं लिखित बयान दे दूंगा।”
अक्षिता ने उसकी तरफ देखा।
कुछ पल दोनों की नजरें मिलीं।
फिर योहान बोला—
“और हां…”
अक्षिता को लगा शायद पहली बार वह उसे सांत्वना देगा।
योहान ने कहा—
“तुम्हारी दोस्त को तुम्हें पुलिस नहीं, मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए।”
अक्षिता का मुंह खुल गया।
योहान वहां से चला गया।
मायरा बोली—
“मैं इसका गला…”
देव ने तुरंत कहा—
“चलो।”
अक्षिता के पास रहने की जगह भी नहीं बची थी।
वह पहले ही हॉस्टल छोड़ चुकी थी।
मायरा ने अपने कमरे में रखा लेकिन वार्डन ने साफ मना कर दिया।
“बाहर के लोग नहीं रह सकते।”
मायरा भड़क गई।
“दूसरे कमरों में लोग रहते हैं तब नियम कहां होता है?”
वार्डन ने चेतावनी दे दी—
“इसे यहां रखा तो तुम्हें भी कमरा छोड़ना होगा।”
अक्षिता ने मायरा का हाथ पकड़ लिया।
“मेरी वजह से मत लड़।”
शाम तक देव ने अस्पताल के स्टाफ क्वार्टर में कुछ दिनों के लिए एक खाली बेड की व्यवस्था कर दी।
अक्षिता के लिए यह एहसान बहुत बड़ा था।
अस्पताल पहुंचते समय मायरा को उसकी डेट लेने आया लड़का मिल गया।
देव का चेहरा उसी समय बदल गया।
अक्षिता ने सब देख लिया।
मायरा उस लड़के के साथ चली गई।
अक्षिता ने देव को कोहनी मारी।
“जल रही है?”
“क्या?”
“दिल।”
“बकवास मत कर।”
“बोल दे उसे।”
देव बैग उठाकर आगे चल दिया।
अक्षिता पीछे हंसती रही।
उसे क्या मालूम था कि उसी अस्पताल में आज उसके अपने दिल की कहानी भी पहला मोड़ लेने वाली थी।
शाम को बोर होकर वह अस्पताल के पार्क में घूमने लगी।
तभी उसका पैर बेंच के नीचे किसी चीज से टकराया।
उसने झुककर देखा।
एक बुजुर्ग आदमी नीचे गिरे हुए थे।
“अरे!”
अक्षिता ने तुरंत उन्हें उठाया।
कुछ देर बाद दोनों बेंच पर बैठे थे।
बुजुर्ग जोर-जोर से हंस रहे थे।
“दादाजी, आप नीचे क्या कर रहे थे?”
उन्होंने धीरे से कहा—
“मेरी सिगरेट।”
अक्षिता ने आंखें बड़ी कर दीं।
“क्या?”
“पोता पीने नहीं देता। गमले के नीचे छिपाई थी। निकालने गया और गिर गया।”
अक्षिता ने माथा पकड़ लिया।
“आप अस्पताल में भर्ती हैं और सिगरेट छिपा रहे हैं?”
“अब इस उम्र में क्या डरना?”
अक्षिता ने उन्हें गौर से देखा।
उनकी आंखों में हंसी थी, लेकिन चेहरा थका हुआ।
“क्या हुआ है आपको?”
बुजुर्ग कुछ पल शांत रहे।
“पता नहीं। मेरा पोता असली बात छिपाता है।”
अक्षिता ने सिगरेट उनके हाथ से ले ली।
“तो आप भी उससे छिपकर अपनी हालत खराब करेंगे?”
“एक कश से क्या होगा?”
“एक कश से शायद कुछ नहीं। लेकिन अगर आपका पोता आपको बचाने के लिए हर दिन डर रहा है, तो उसे ये लगेगा कि उसकी कोशिशों की आपको परवाह नहीं।”
बुजुर्ग चुप हो गए।
अक्षिता की आवाज नरम हो गई।
“जिस इंसान को हम प्यार करते हैं ना दादाजी… उसके लिए हमें कई बार अपनी पसंद छोड़नी पड़ती है।”
बुजुर्ग ने उसे देखा।
फिर मुस्कुराए।
“बड़ी समझदार हो।”
“मेरी दोस्त ऐसा नहीं मानती।”
दोनों हंस दिए।
कुछ देर बाद दादाजी ने पूछा—
“बॉयफ्रेंड है?”
अक्षिता का मुंह खुल गया।
“क्या?”
“नहीं है?”
“नहीं।”
दादाजी की आंखें चमकीं।
“तो मेरे पोते से शादी कर लो।”
अक्षिता खांसने लगी।
“दादाजी!”
“अरे अच्छा लड़का है।”
“मैं आपको पांच मिनट पहले मिली हूं।”
“पांच मिनट में इंसान की नीयत पता चल जाती है।”
अक्षिता हंस दी।
“और आपके पोते की उम्र?”
“तुम्हारे लिए ठीक है।”
“नाम?”
दादाजी जवाब देने ही वाले थे कि नर्स आ गई।
“रूम 204! आप फिर यहां?”
दादाजी तुरंत सीधे हो गए।
“हवा लेने आया था।”
नर्स ने उन्हें घूरा।
वह जाते हुए अक्षिता के पास झुके।
“सोचना।”
अक्षिता हंस पड़ी।
उन्हें क्या मालूम…
जिनके पोते के बारे में वह मजाक सुन रही थी, उसे वह पहले से जानती थी।
और अच्छी तरह जानती थी।
अक्षिता अपने कमरे की तरफ लौट रही थी कि अचानक उसका पैर फिसला।
वह गिरने वाली थी।
एक मजबूत हाथ ने उसे पकड़ लिया।
अक्षिता ने ऊपर देखा।
फिर वही चेहरा।
योहान।
“आप?”
योहान ने उसे सीधा किया।
“तुम्हें हर जगह गिरने की आदत है?”
अक्षिता ने मन में कहा—
“रोमांटिक फिल्मों में हीरो लड़की को पकड़ता है तो संगीत बजता है। यहां तो बेइज्जती शुरू हो जाती है।”
योहान जाने लगा।
अक्षिता पीछे चली।
“आप अस्पताल में?”
“हां।”
“किससे मिलने?”
योहान रुका।
“आप मुझसे ये सवाल किस रिश्ते से पूछ रही हैं?”
अक्षिता ने आंखें घुमाईं।
“इंसानियत नाम की चीज होती है।”
“आपके सवाल का जवाब देने की बाध्यता नहीं है।”
“आप हर समय इतने खड़ूस क्यों रहते हैं?”
योहान ने कहा—
“और आप हर समय इतना बोलती क्यों हैं?”
अक्षिता चुप।
दो कदम चली।
फिर बोली—
“पुलिस स्टेशन वाली मदद के लिए थैंक यू।”
योहान रुका।
“मैं एहसान नहीं रखता।”
“मतलब?”
“एक सवाल पूछूंगा। जवाब दे देना।”
अक्षिता तुरंत उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
“पूछिए।”
योहान कुछ सेकंड चुप रहा।
चेहरे पर पहली बार तनाव दिखाई दिया।
“क्या किसी की भलाई के लिए झूठ बोलना सही है?”
अक्षिता ने उसकी आंखों को देखा।
यह सवाल सामान्य नहीं था।
उसके पीछे कोई कहानी थी।
“झूठ गलत होता है।”
योहान ने तुरंत कहा—
“यही तो।”
अक्षिता ने उंगली उठाई।
“लेकिन…”
वह रुक गया।
“अगर सच किसी को तोड़ दे और छोटा-सा झूठ उसे उम्मीद दे, तो मैं उसे गलत नहीं मानती।”
योहान का चेहरा सख्त हो गया।
“झूठ, झूठ ही है।”
“तो आपने कभी झूठ नहीं बोला?”
योहान ने सोचा।
“नहीं।”
अक्षिता मुस्कुराई।
“कभी-कभी जिंदगी आपको खुद जवाब दे देती है, प्रोफेसर साहब।”
योहान बिना कुछ कहे चला गया।
कुछ देर बाद वही योहान अस्पताल के कमरा नंबर 204 में दाखिल हुआ।
बिस्तर पर वही बुजुर्ग लेटे थे जिनसे अक्षिता पार्क में मिली थी।
रमेश चंद्र ओबेरॉय।
योहान के दादा।
“दादाजी।”
रमेश जी ने तुरंत जेब ढक ली।
योहान ने भौंहें चढ़ाईं।
“आज फिर सिगरेट?”
“नहीं।”
“दादाजी।”
“कसम से।”
योहान ने फूलदान के पीछे से लाइटर निकाल लिया।
फिर उनकी जेब में सिगरेट का पैकेट दिख गया।
“ये?”
दादाजी बच्चे की तरह बोले—
“पता नहीं जेब में कैसे आ गया।”
योहान की आंखों में गुस्सा नहीं आया।
बस थकान उतर गई।
वह उनके पास बैठा।
“कब तक मुझसे झूठ बोलेंगे?”
दादाजी ने कुछ क्षण बाद कहा—
“आज नहीं पी।”
“क्यों?”
“एक लड़की मिली थी।”
योहान ने ध्यान नहीं दिया।
उसने मेडिकल रिपोर्ट हाथ में ली।
कुछ देर पहले डॉक्टर की बातें अभी भी उसके कानों में थीं—
सर्जरी जरूरी है।
खतरा बड़ा है।
गारंटी नहीं।
योहान ने दादा का हाथ पकड़ लिया।
“सर्जरी करवा लीजिए।”
रमेश जी ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
“नहीं।”
“प्लीज।”
“योहान…”
“मुझे आपकी जरूरत है।”
योहान की आवाज पहली बार टूट गई।
रमेश जी धीरे से उसकी तरफ मुड़े।
उस कठोर, अनुशासित लड़के की आंखों में पहली बार डर था।
वही योहान जो छप्पन सेकंड के लिए छात्र को फेल कर सकता था…
आज जिंदगी से कुछ घंटे मांग रहा था।
रमेश जी का दिल पिघल गया।
लेकिन उनके मन में एक चिंता और थी।
“एक शर्त है।”
“क्या?”
“अपनी गर्लफ्रेंड से मिलवाओ।”
योहान की आंखें फैल गईं।
“क्या?”
“तूने कहा था ना कोई लड़की है?”
योहान का चेहरा बदल गया।
असल में उसने महीनों पहले दादा को सिर्फ इसलिए झूठ बोल दिया था ताकि वे उसकी शादी को लेकर चिंता न करें।
जिंदगी में पहली बार बोला गया एक छोटा-सा झूठ अब उसके सामने खड़ा था।
रमेश जी बोले—
“मेरे बाद तू अकेला रह जाएगा। अगर मुझे यकीन हो कि तेरी जिंदगी में कोई है… मैं सुकून से ऑपरेशन थिएटर में जाऊंगा।”
योहान कुछ नहीं बोल पाया।
उसे अस्पताल के कॉरिडोर में अक्षिता की बात याद आई—
“अगर छोटा-सा झूठ किसी को उम्मीद दे…”
उसने आंखें बंद कीं।
कितनी विडंबना थी।
कुछ घंटे पहले वह उसे झूठ पर ज्ञान दे रहा था।
और अब उसी झूठ को सच दिखाने के लिए उसे एक लड़की चाहिए थी।
“मिलवाएगा?”
दादा ने पूछा।
योहान ने बहुत देर बाद कहा—
“हां।”
रमेश जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“पक्का?”
“पक्का।”
उन्होंने सर्जरी के पेपर पर हस्ताक्षर कर दिए।
योहान के सीने से भारी पत्थर थोड़ा हट गया।
लेकिन अब नई समस्या सामने थी।
सर्जरी दो घंटे बाद थी।
और दो घंटे के अंदर उसे अपनी काल्पनिक गर्लफ्रेंड को सच बनाकर दादा के सामने लाना था।
वह कमरे से बाहर निकला।
कॉरिडोर में खड़ा रहा।
एक नर्स गुजरी।
फिर डॉक्टर।
फिर मरीजों के परिवार।
उसने फोन निकाला।
कॉन्टैक्ट लिस्ट खोली।
कोई ऐसा नाम नहीं था जिसे वह इस काम के लिए बुला सके।
उसकी जिंदगी में काम था।
रिसर्च थी।
नियम थे।
जिम्मेदारियां थीं।
दोस्त बहुत कम।
और प्रेमिका…
कोई नहीं।
उसने फोन बंद कर दिया।
तभी सामने से किसी की हंसने की आवाज आई।
वह आवाज उसे पहचान में आई।
“देव, मेरा बैग वापस दो!”
योहान ने धीरे से नजर उठाई।
कॉरिडोर के दूसरे छोर से अक्षिता चली आ रही थी।
हाथ में कॉफी।
बालों को ढीले-से बांधा हुआ।
चेहरे पर वही मासूम परेशानी।
देव उसका बैग उठाकर मजाक करता आगे जा रहा था।
अक्षिता उसके पीछे भाग रही थी।
योहान बिल्कुल स्थिर खड़ा रह गया।
उसे दादा की बात याद आई—
“बस एक बार अपनी गर्लफ्रेंड से मिलवा दे।”
फिर अक्षिता की बात—
“कभी-कभी जिंदगी आपको खुद जवाब दे देती है, प्रोफेसर साहब।”
योहान के चेहरे पर पहली बार ऐसा भाव आया जिसे कोई समझ नहीं सकता था।
उसकी नजर अक्षिता पर टिक गई।
उधर अक्षिता ने भी उसे देख लिया।
उसकी मुस्कान तुरंत गायब हो गई।
“ओह नो…”
वह बुदबुदाई।
योहान सीधे उसकी तरफ बढ़ने लगा।
अक्षिता पीछे हट गई।
“देखिए, अगर फिर नियम समझाने आए हैं तो मेरा आज का कोटा पूरा है।”
योहान नहीं रुका।
“मिस अक्षिता।”
उसकी आवाज असामान्य रूप से गंभीर थी।
“क्या?”
“मुझे आपकी मदद चाहिए।”
अक्षिता ने दो सेकंड उसे देखा।
फिर जोर से हंस पड़ी।
“आपको?”
योहान चुप।
अक्षिता ने हंसी रोकने की कोशिश की।
“सॉरी… लेकिन ये दिन भी देखना था।”
वह आगे बढ़ने लगी।
योहान ने कहा—
“यह मेरे दादा की जिंदगी का सवाल है।”
अक्षिता के कदम रुक गए।
उसके चेहरे की शरारत गायब हो गई।
वह धीरे से पलटी।
योहान की आंखों में पहली बार अहंकार नहीं था।
वहां डर था।
सच्चा डर।
“क्या हुआ?”
योहान ने होंठ भींचे।
“उनकी सर्जरी है।”
“तो?”
“वो सर्जरी करवाने को तभी राजी हुए हैं जब…”
योहान पहली बार वाक्य पूरा करने में हिचकिचाया।
अक्षिता ने पूछा—
“जब क्या?”
योहान ने उसकी आंखों में देखकर कहा—
“जब मैं उन्हें अपनी गर्लफ्रेंड से मिलवाऊं।”
अक्षिता ने पलकें झपकाईं।
“अच्छा।”
फिर दो सेकंड बाद पूछा—
“तो अपनी गर्लफ्रेंड को बुलाइए।”
योहान चुप रहा।
अक्षिता की आंखें धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं।
“रुकिए…”
उसने उंगली उसकी तरफ की।
“आपकी गर्लफ्रेंड है ही नहीं?”
योहान ने नजरें दूसरी तरफ कर लीं।
अक्षिता के चेहरे पर फिर वही खतरनाक मुस्कान लौट आई।
“ओह माय गॉड।”
“मिस देसाई…”
“प्रोफेसर योहान ओबेरॉय ने झूठ बोला?”
योहान ने दांत भींचे।
“धीरे।”
“जिस इंसान ने मुझे अभी थोड़ी देर पहले कहा था झूठ झूठ होता है?”
“परिस्थिति अलग है।”
अक्षिता ने दोनों हाथ कमर पर रखे।
“वाह! जब मेरी बात हो तो नियम। जब आपकी बात हो तो परिस्थिति?”
योहान ने घड़ी देखी।
“मेरे पास बहस के लिए समय नहीं है।”
“तो मैं क्या करूं?”
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर योहान ने वह वाक्य कहा जिसने अक्षिता की सांस रोक दी—
“दो घंटे के लिए मेरी गर्लफ्रेंड बन जाइए।”
अक्षिता का मुंह खुला रह गया।
कॉफी का कप उसके हाथ में स्थिर हो गया।
“क्या?”
उसी पल कमरा नंबर 204 का दरवाजा खुला।
रमेश चंद्र जी नर्स के सहारे बाहर आए।
उन्होंने दूर खड़ी अक्षिता को देखा।
उनकी आंखें चमक उठीं।
“अरे!”
योहान पलटा।
दादाजी ने अक्षिता की तरफ उंगली उठाई।
“यही तो है वो लड़की!”
अक्षिता जम गई।
योहान ने हैरानी से दादा को देखा।
“आप इसे जानते हैं?”
रमेश जी मुस्कुराए।
“यही तो वो बिटिया है जिसने पार्क में मेरी सिगरेट छुड़वाई थी।”
फिर उन्होंने योहान का हाथ पकड़ा।
दूसरा हाथ अक्षिता की तरफ बढ़ाया।
और मुस्कुराते हुए बोले—
“तो बेटा… यही है तेरी गर्लफ्रेंड?”
अक्षिता ने योहान को देखा।
योहान ने अक्षिता को।
दोनों के चेहरे पर एक ही सवाल था।
लेकिन जवाब देने के लिए सिर्फ कुछ सेकंड थे।
क्योंकि दादा की सर्जरी का समय आ चुका था…
और अगर अक्षिता ने उसी पल “नहीं” कह दिया, तो शायद रमेश चंद्र ओबेरॉय फिर ऑपरेशन थिएटर में जाने से इनकार कर देते।
योहान की उंगलियां मुट्ठी में बदल गईं।
अक्षिता की धड़कन तेज हो गई।
और तभी योहान धीरे से उसके पास झुका और इतना ही बोला—
“आज सिर्फ दो घंटे मेरा साथ दे दीजिए… उसके बाद जिंदगी में मुझसे जो कीमत मांगेंगी, मैं चुका दूंगा।”
अक्षिता की आंखें उसकी आंखों से मिलीं।
जिस आदमी ने उसका करियर छीन लिया था…
आज वही उसके सामने मदद के लिए खड़ा था।
लेकिन अक्षिता को अभी यह नहीं पता था कि अगर उसने उस एक झूठे रिश्ते के लिए “हां” कह दी…
तो यह नाटक सिर्फ दो घंटे में खत्म नहीं होने वाला था।
क्योंकि कमरे के अंदर रखी योहान के दादा की पुरानी फाइल में एक ऐसा नाम दर्ज था, जिसका संबंध अक्षिता के माता-पिता की दुर्घटना से था।
और वह सच सामने आते ही…
उन दोनों की नफरत, भरोसा और आने वाला रिश्ता—सब कुछ हमेशा के लिए बदलने वाला था।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।