मासूम पत्नी की पहली रात की शर्त ने घमंडी अभिनव को झुका दिया—दूसरी शादी में खुला पहली पत्नी का सबसे बड़ा राज

मासूम पत्नी की पहली रात की शर्त ने घमंडी अभिनव को झुका दिया—दूसरी शादी में खुला पहली पत्नी का सबसे बड़ा राज
“दरवाज़ा बंद करने से पहले मेरी एक शर्त सुन लीजिए, अभिनव जी।”
फूलों से सजे कमरे में नेहा की धीमी मगर साफ आवाज़ गूंजी तो अभिनव के कदम वहीं रुक गए।
बाहर शादी की आखिरी रस्मों की आवाज़ें धीरे-धीरे शांत हो रही थीं।
कमरे में गुलाब और मोगरे की खुशबू थी।
पीली रोशनी में लाल जोड़े में बैठी नेहा किसी तस्वीर की तरह खूबसूरत लग रही थी, मगर उसकी उंगलियां लगातार अपने दुपट्टे के किनारे को मरोड़ रही थीं।
अभिनव ने उसे देखा।
वही नेहा।
जिसे उसने पांच साल पहले ठुकरा दिया था।
वही लड़की जिसने उसकी बेटी को तब सीने से लगाया था जब उसकी अपनी दुनिया बिखर चुकी थी।
और आज वही नेहा उसकी पत्नी बनकर उसके सामने बैठी थी।
अभिनव ने धीमे स्वर में पूछा, “कैसी शर्त?”
नेहा ने अपनी नजरें उठाईं।
आंखों में डर था।
लेकिन उससे कहीं अधिक आत्मसम्मान।
“आज रात आप मुझे छुएंगे भी तभी… जब मैं खुद इसके लिए तैयार रहूंगी।”
अभिनव की आंखों में एक पल के लिए आश्चर्य उतर आया।
नेहा ने आगे कहा, “शादी आपको मेरा मालिक नहीं बनाती। पति होने का मतलब अधिकार नहीं… भरोसा होता है।”
कमरे में गहरी खामोशी फैल गई।
अभिनव की मुट्ठी धीरे-धीरे खुल गई।
पांच साल पहले यही आदमी उसके कमरे में खड़ा होकर कह चुका था—
“तुम मेरी जिंदगी संभाल ही नहीं पाओगी।”
और आज वही लड़की उसके सामने बैठी उसे शादी का सबसे बड़ा मतलब समझा रही थी।
लेकिन अभिनव जवाब देता, उससे पहले नेहा ने एक और बात कह दी।
“और दूसरी शर्त…”
“एक और?”
अभिनव के चेहरे पर अनजाने में हल्की मुस्कान आई।
नेहा ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“अपनी बेटी पर आज के बाद कभी अपनी पुरानी चोटों का गुस्सा नहीं निकालेंगे।”
अभिनव की मुस्कान गायब हो गई।
उसकी नजरें झुक गईं।
कमरे के बाहर अचानक छोटी-सी आवाज आई—
“नेहा मम्मा…”
दोनों चौंके।
अगले ही पल दरवाज़ा धीरे से खुला और छह साल की आर्या अपना तकिया सीने से लगाए भीतर खड़ी थी।
“मुझे अकेले नींद नहीं आ रही…”
नेहा के चेहरे का तनाव एक पल में पिघल गया।
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
“इधर आओ।”
आर्या दौड़कर उसके पास आ गई और उसके गले से लिपट गई।
अभिनव चुपचाप दोनों को देखता रहा।
उस पल उसके भीतर कहीं बहुत गहरे एक सवाल ने जन्म लिया—
जिस औरत को उसने कभी अपने लायक नहीं समझा था…
क्या वही उस टूटे हुए घर की आखिरी उम्मीद थी?
लेकिन अभिनव नहीं जानता था कि इस दूसरी शादी की पहली रात से पहले उसकी जिंदगी में जो कुछ घट चुका था, उसका असली सच अभी सामने आना बाकी था।
और उस सच के पीछे एक ऐसा नाम छिपा था जिसे सुनकर नेहा के पैरों तले भी जमीन खिसकने वाली थी।
पांच साल पहले की बात थी।
सुबह के करीब आठ बजे थे।
विशाल मल्होत्रा हाउस की डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार नाश्ते के लिए बैठा था।
घर की मुखिया नंदिनी मल्होत्रा ने चाय का कप नीचे रखा और सहजता से कहा—
“हमने अभिनव और नेहा की शादी का फैसला किया है।”
टेबल पर अचानक सन्नाटा छा गया।
नेहा की उंगलियां कटोरी के किनारे पर ठहर गईं।
उसकी नजरें अपने आप झुक गईं।
मगर सामने बैठा अभिनव जैसे अपनी कुर्सी से उछल पड़ा।
“नहीं मम्मा।”
नंदिनी ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“क्या मतलब?”
“मैं नेहा से शादी नहीं कर सकता।”
नेहा के चेहरे की रंगत बदल गई।
शालिनी चाची ने हैरानी से पूछा, “लेकिन क्यों?”
अभिनव ने बिना नेहा की तरफ देखे कहा—
“क्योंकि मैं किसी और को पसंद करता हूं।”
इस बार नेहा ने उसकी ओर देखा।
अभिनव की आवाज़ बिल्कुल सपाट थी।
“उसका नाम अवंतिका है।”
नेहा का हाथ मेज के नीचे धीरे से कांपा।
वह अभिनव को बचपन से जानती थी।
दोनों एक ही परिवार की तरह पले थे।
नेहा की मां की मृत्यु के बाद नंदिनी ने ही उसे अपनी बेटी की तरह घर में जगह दी थी।
शायद इसी कारण नेहा ने कभी यह सोचने की हिम्मत नहीं की थी कि अभिनव उसके बारे में क्या महसूस करता है।
लेकिन यह भी सच था कि उसका दिल बहुत पहले से अभिनव के नाम हो चुका था।
अभिनव उसकी पहली पसंद नहीं था।
अभिनव उसका पहला प्यार था।
जिसे उसने कभी बताया नहीं।
नंदिनी ने सख्त स्वर में पूछा, “यह अवंतिका कौन है?”
“मेरे साथ कॉलेज में थी। मैं उससे शादी करना चाहता हूं।”
“और हमें आज बता रहे हो?”
“क्योंकि आपने आज मेरी शादी तय करने का फैसला सुना दिया।”
नंदिनी कुछ क्षण उसे देखती रहीं।
फिर उन्होंने नेहा की ओर देखा।
“बेटा, तुम क्या चाहती हो?”
नेहा की आंखों में एक पल के लिए नमी चमकी।
लेकिन अगले ही क्षण उसने खुद को संभाल लिया।
“अगर अभिनव जी किसी और को पसंद करते हैं तो मैं इस शादी के लिए हां कैसे कह सकती हूं?”
अभिनव ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
उसे उम्मीद नहीं थी कि नेहा इतनी आसानी से पीछे हट जाएगी।
नंदिनी बोलीं, “लेकिन कल तक तो तुमने कोई आपत्ति नहीं की थी।”
नेहा ने बहुत शांत स्वर में कहा—
“मम्मा, रिश्ते किसी की इच्छा कुचलकर नहीं बनाए जाते।”
ये शब्द अभिनव के भीतर कहीं चुभ गए।
क्योंकि पिछली रात दोनों के बीच हुई बातचीत अभी भी उसकी यादों में ताजा थी।
रात करीब दस बजे अभिनव ने नेहा के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया था।
दरवाज़ा खुलते ही उसने बिना भूमिका के पूछा—
“तुमने शादी के लिए हां क्यों की?”
नेहा किताब बंद करते हुए बोली, “क्योंकि मम्मा ने पूछा था और मुझे कोई आपत्ति नहीं थी।”
“इतनी बड़ी जिंदगी का फैसला इतनी आसानी से?”
“आपको क्या परेशानी है?”
“तुम नहीं समझ रही।”
अभिनव ने बेचैनी में कमरे में चक्कर लगाया।
वह लंबा, मजबूत और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला आदमी था।
अपने बिजनेस के साथ-साथ फिटनेस को लेकर जुनूनी।
उसके मुकाबले नेहा बेहद शांत और नाजुक दिखाई देती थी।
अभिनव उसके सामने आकर रुक गया।
“हम दोनों बहुत अलग हैं।”
“तो?”
“तुम मेरे साथ खुश नहीं रहोगी।”
नेहा ने मुस्कुराकर पूछा, “ये फैसला भी आपने मेरी तरफ से कर लिया?”
“मैं गंभीर हूं।”
“मैं भी।”
“नेहा!”
“आवाज़ ऊंची करने से बात सही नहीं हो जाती।”
अभिनव ने गहरी सांस ली।
“मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहता।”
नेहा कुछ पल उसे देखती रही।
फिर धीमे से बोली—
“जो आदमी पहले से यह सोच रहा हो कि वह अपनी पत्नी को चोट पहुंचा सकता है, शायद उसे शादी से पहले खुद को समझने की जरूरत है।”
अभिनव चुप रह गया।
नेहा ने आगे कहा—
“पति होना ताकत दिखाने की प्रतियोगिता नहीं है।”
“तुम मुझे भाषण मत दो।”
“तो आप भी मुझे डराइए मत।”
दोनों की आंखें मिलीं।
नेहा ने पहली बार उसकी बेचैनी के पीछे छिपा सच महसूस किया।
अभिनव उसे खुद से दूर करना चाहता था।
क्यों?
अगली सुबह जवाब मिल गया।
अवंतिका।
नेहा नाश्ते की मेज से उठकर अपने कमरे में चली गई।
उसने दरवाज़ा बंद किया।
और पहली बार आंखों में रोके हुए आंसू बह निकले।
उसने आईने में खुद को देखा।
“तुम रो क्यों रही हो?”
उसने खुद से पूछा।
“उसने तुम्हें कभी कुछ वादा नहीं किया।”
लेकिन दिल तर्क कब समझता है?
एक सप्ताह बाद अवंतिका से अभिनव की शादी हो गई।
अवंतिका खूबसूरत थी।
आत्मविश्वासी थी।
बड़े सपनों वाली लड़की।
उसकी दुनिया ग्लैमर, बिजनेस इवेंट्स, यात्राओं और करियर के इर्द-गिर्द घूमती थी।
शादी के शुरुआती दिनों में दोनों बहुत खुश रहे।
अभिनव ने सचमुच उससे प्रेम किया।
उसने अवंतिका के हर फैसले का सम्मान किया।
वह नौकरी करना चाहती थी।
अभिनव ने कहा, “करो।”
वह अलग बिजनेस शुरू करना चाहती थी।
अभिनव ने निवेश करने में मदद की।
वह कुछ वर्षों तक परिवार बढ़ाने के लिए तैयार नहीं थी।
अभिनव ने दबाव नहीं डाला।
लेकिन धीरे-धीरे उनके बीच ऐसी दूरियां पैदा होने लगीं जिनकी भनक किसी को नहीं लगी।
अवंतिका घंटों फोन पर बिजनेस पार्टनर्स से बात करती।
कभी दिल्ली।
कभी मुंबई।
कभी दुबई।
कभी सिंगापुर।
एक नाम धीरे-धीरे उसकी बातचीत में सबसे ज्यादा आने लगा।
रोहन मेहरा।
अभिनव ने कई बार सुना।
“रोहन ने कहा है…”
“रोहन की टीम…”
“रोहन के निवेशक…”
“रोहन का प्रोजेक्ट…”
शुरुआत में उसने ध्यान नहीं दिया।
फिर एक शाम उसने पूछा—
“तुम्हारा ये रोहन काफी जरूरी आदमी लगता है।”
अवंतिका ने मोबाइल से नजर उठाए बिना कहा—
“कम से कम उसे मेरे सपनों की कीमत समझ आती है।”
अभिनव को बात चुभी।
“और मैं नहीं समझता?”
अवंतिका ने झुंझलाकर कहा—
“हर बात को अपने ऊपर मत लिया करो।”
उस रात पहली बार दोनों अलग-अलग तरफ मुंह करके सोए।
समय गुजरता गया।
उनकी एक बेटी हुई।
आर्या।
आर्या के जन्म के बाद पूरा घर खुशी से भर गया।
नंदिनी पोती को गोद से उतारती ही नहीं थीं।
शालिनी उसे छोटी राजकुमारी कहतीं।
और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि नेहा आर्या के साथ इस तरह घुल गई जैसे वह बच्ची उसके जीवन का हिस्सा हो।
नेहा अब भी उसी परिवार से जुड़ी हुई थी।
उसने अभिनव से दूरी बनाए रखी।
लेकिन आर्या से नहीं।
आर्या जैसे-जैसे बड़ी होती गई, नेहा उसकी पसंदीदा इंसान बन गई।
“नेहा बुआ खाना खिलाएंगी।”
“नेहा बुआ कहानी सुनाएंगी।”
“नेहा बुआ बाल बनाएंगी।”
अवंतिका अक्सर काम में व्यस्त रहती।
कई बार उसे बेटी के साथ समय बिताने में कठिनाई होती थी।
मगर वास्तविक समस्या सिर्फ इतनी नहीं थी।
उसके भीतर लगातार एक बेचैनी बढ़ रही थी।
उसे लगता था कि शादी और परिवार उसके करियर को रोक रहे हैं।
एक रात वह ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी लैपटॉप पर काम कर रही थी।
अभिनव कमरे में आया।
“आर्या तुम्हारा इंतजार करते-करते सो गई।”
“तो?”
अभिनव ठहर गया।
“तो मतलब… उसने कहा था मम्मा कहानी सुनाएंगी।”
“अभिनव, मैं मीटिंग में थी।”
“दस मिनट निकाल सकती थीं।”
अवंतिका ने लैपटॉप बंद कर दिया।
“हर बार मुझे अपराधी मत बनाया करो।”
“मैं सिर्फ…”
“तुम सिर्फ चाहते हो कि मैं घर, बच्चा और तुम्हारी जरूरतों में अपनी पहचान भूल जाऊं।”
अभिनव सन्न रह गया।
“मैंने कब कहा?”
“कहने की जरूरत नहीं है।”
“अवंतिका, मैंने तुम्हें हर चीज के लिए आजादी दी।”
“आजादी दी?”
वह कटुता से हंसी।
“सुन रहे हो खुद को? जैसे मेरी जिंदगी तुम्हारी थी और तुमने मुझे कुछ हिस्सा इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी।”
अभिनव चुप हो गया।
कई महीनों तक उनके बीच यही तनाव चलता रहा।
फिर एक दिन अवंतिका ने उसे बताया कि वह दूसरी बार गर्भवती है।
उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।
सिर्फ घबराहट।
“मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूं।”
अभिनव ने तुरंत कोई फैसला सुनाने के बजाय कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठते हुए कहा—
“ठीक है। पहले शांत होकर बात करते हैं।”
“बात करने के लिए कुछ नहीं है।”
“है।”
“मेरी जिंदगी है, अभिनव।”
“और तुम्हारा निर्णय तुम्हारा है। लेकिन हम पति-पत्नी हैं। इतना हक तो दो कि समझ सकूं तुम क्या महसूस कर रही हो।”
अवंतिका की आंखें भर आईं।
“मुझे डर लग रहा है कि मैं फिर वहीं फंस जाऊंगी।”
“कहां?”
“जहां मेरी पहचान सिर्फ किसी की पत्नी और किसी की मां बनकर रह जाए।”
अभिनव ने पहली बार उसकी बात पूरी तरह सुनी।
उसने धीरे से कहा—
“अगर तुमने ऐसा महसूस किया है तो शायद मुझसे भी कहीं गलती हुई है।”
अवंतिका उसकी ओर देखती रही।
अभिनव ने कहा—
“हम कोई फैसला गुस्से में नहीं करेंगे। डॉक्टर से बात करेंगे। काउंसलर से भी।”
अवंतिका ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसी रात अभिनव की जिंदगी का संतुलन बदल गया।
करीब दस बजे वह ऑफिस से लौट रहा था।
लॉन पार करते समय उसे आर्या की हंसी सुनाई दी।
नेहा घास पर बैठी थी।
आर्या उसके हाथ से छोटी-छोटी रोटियां खा रही थी।
“एक कौर चिड़िया वाला।”
“नहीं।”
“तो खरगोश वाला?”
आर्या खिलखिलाई।
“हाथी वाला!”
“इतना बड़ा मुंह खोलोगी?”
“हां!”
दोनों हंस पड़ीं।
अभिनव वहीं खड़ा देखता रहा।
नेहा ने उसे देखा।
“चाय लेंगे?”
बस इतना।
कोई शिकायत नहीं।
कोई पुरानी बात नहीं।
अभिनव ने धीमे से सिर हिला दिया।
नेहा उठकर अंदर चली गई।
अभिनव अपनी बेटी के पास बैठ गया।
आर्या ने मासूमियत से पूछा—
“डैडी, नेहा बुआ हमारे घर हमेशा रहेंगी?”
अभिनव ने उसके बाल सहलाए।
“क्यों?”
“क्योंकि जब वो नहीं होतीं तो घर अच्छा नहीं लगता।”
उस रात यह बात उसे सोने नहीं दे पाई।
दो दिन बाद एक और घटना हुई।
अभिनव घर लौटा तो आर्या सीढ़ियों के पास चुप बैठी थी।
उसकी आंखें लाल थीं।
अभिनव ने झुककर पूछा—
“क्या हुआ मेरी गुड़िया?”
आर्या होंठ भींचकर चुप रही।
“मम्मा ने डांटा?”
आंखों से दो बूंदें गिर गईं।
अभिनव ने उसे सीने से लगा लिया।
“क्या हुआ?”
“मैंने उनका मेकअप छू लिया था…”
“फिर?”
“मम्मा गुस्सा हो गईं।”
अभिनव का दिल भारी हो गया।
वह सीधा कमरे की ओर बढ़ा।
दरवाज़े तक पहुंचकर उसका हाथ हैंडल पर गया ही था कि भीतर से अवंतिका की आवाज आई।
वह फोन पर किसी से बात कर रही थी।
“मैंने कहा ना, मैं फैसला कर लूंगी।”
कुछ देर खामोशी रही।
फिर—
“नहीं रोहन, अभी अभिनव को शक नहीं है।”
अभिनव का हाथ दरवाज़े पर जम गया।
रोहन?
“तुम बस मुझसे वादा निभाना।”
दूसरी तरफ क्या कहा गया, अभिनव सुन नहीं पाया।
अवंतिका की आवाज फिर आई—
“तुमने कहा था कि सिंगापुर वाला प्रोजेक्ट मिलते ही हम यहां से निकल जाएंगे।”
अभिनव के कानों में जैसे किसी ने गर्म शीशा उड़ेल दिया।
उसने दरवाज़ा खोल दिया।
अवंतिका पलटी।
फोन उसके हाथ से लगभग गिर गया।
“अभिनव…”
“किसके साथ निकल जाओगी?”
चेहरे की रंगत उड़ गई।
“तुम गलत समझ रहे हो।”
“फोन दो।”
“यह मेरी प्राइवेसी है।”
“मैं तुम्हारा फोन नहीं देखना चाहता। मुझे बस सवाल का जवाब चाहिए।”
अवंतिका चुप रही।
अभिनव ने पूछा—
“रोहन कौन है तुम्हारी जिंदगी में?”
“बिजनेस पार्टनर।”
“सिंगापुर उसके साथ क्यों जाना है?”
“प्रोजेक्ट के लिए।”
“और मुझसे छिपाकर?”
अवंतिका की आवाज कठोर हो गई।
“क्योंकि तुम हर चीज को ड्रामा बना देते हो।”
“मैं?”
“हां!”
“तुम महीनों से मुझसे झूठ बोल रही हो।”
“मैंने कोई झूठ नहीं बोला।”
“अभी सुना मैंने!”
दोनों की आवाजें ऊंची होने लगीं।
बाहर गलियारे में नेहा ठहर गई।
नंदिनी भी कमरे से बाहर आईं।
तभी अवंतिका ने गुस्से में कहा—
“ठीक है! सुनना चाहते हो सच?”
अभिनव का चेहरा सफेद पड़ गया।
अवंतिका ने कहा—
“मैं खुश नहीं हूं इस शादी में।”
शब्द सीधे उसके सीने में लगे।
“कब से?”
“बहुत समय से।”
“तो बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि तुम सुनते कब हो?”
अभिनव हंसा।
लेकिन वह हंसी दर्द से भरी थी।
“और रोहन सुनता है?”
अवंतिका चुप रही।
बस वही खामोशी जवाब बन गई।
उस रात अवंतिका अपना सामान लेकर मायके चली गई।
अभिनव ने उसे रोका नहीं।
अगले कुछ दिनों तक परिवार ने कई बार दोनों को समझाने की कोशिश की।
काउंसलिंग का प्रस्ताव रखा गया।
मगर अवंतिका लौटने के लिए तैयार नहीं थी।
कुछ सप्ताह बाद उसने तलाक पर सहमति दे दी।
अभिनव के लिए सबसे मुश्किल बात अपनी शादी का टूटना नहीं थी।
सबसे मुश्किल था आर्या को समझाना।
“मम्मा वापस कब आएंगी?”
“कुछ समय बाद मिलोगी उनसे।”
“वो नाराज़ हैं?”
“नहीं।”
“मैंने कुछ किया?”
अभिनव का दिल टूट जाता।
“नहीं बेटा। आपकी कोई गलती नहीं।”
मगर उसके भीतर का गुस्सा कभी-कभी आवाज बनकर बाहर निकल आता।
एक शाम आर्या बार-बार अपनी मां के बारे में पूछ रही थी।
अभिनव तनाव में था।
अचानक वह ऊंची आवाज में बोल पड़ा—
“बस करो आर्या!”
बच्ची सहम गई।
उसी क्षण दरवाज़े पर नेहा आ गई।
उसने बिना कुछ सोचे आर्या को उठा लिया।
“बच्चे पर क्यों चिल्ला रहे हैं?”
अभिनव भी भड़का हुआ था।
“ये मेरे और मेरी बेटी के बीच की बात है।”
“बेटी है आपकी, गुस्सा निकालने की जगह नहीं।”
अभिनव ने आंखें तरेरीं।
“तुम्हें किसने अधिकार दिया?”
नेहा की आंखें नम हो गईं, मगर आवाज़ नहीं डगमगाई।
“किसी ने नहीं। लेकिन जिस बच्ची को मैं अपनी आंखों के सामने रोते नहीं देख सकती, उसके लिए बोलने की इजाजत किसी से नहीं लूंगी।”
“तुम उसकी मां नहीं हो।”
शब्द निकल चुके थे।
कमरा शांत हो गया।
नेहा के चेहरे पर दर्द की एक परछाईं आई।
फिर वह बहुत धीरे बोली—
“जानती हूं।”
आर्या ने उसी पल अपनी बांहें नेहा के गले में कस दीं।
“मेरी नेहा बुआ हैं।”
नेहा ने बच्ची के बालों में चेहरा छिपा लिया।
अभिनव का गुस्सा उसी पल शर्म में बदल गया।
लेकिन अहंकार ने उसे माफी मांगने नहीं दी।
चार महीने बीत गए।
अवंतिका और अभिनव का तलाक कानूनी रूप से पूरा हो गया।
आर्या अपनी मां से मिलने की जिद करती रही।
अभिनव टालता रहा।
एक दिन नेहा ने उसे समझाया—
“बड़ों के रिश्ते टूट सकते हैं। बच्चे का रिश्ता नहीं।”
“तुम नहीं जानती उसे।”
“शायद नहीं जानती। लेकिन आर्या को खुद समझने दीजिए।”
अभिनव ने कठोर स्वर में कहा—
“अगर उसे चोट लगी तो?”
नेहा बोली—
“तब उसे संभालेंगे। लेकिन सवालों के साथ बड़ा होने देना भी चोट ही है।”
आखिर अभिनव मान गया।
नंदिनी और नेहा आर्या को लेकर अवंतिका के मायके पहुंचीं।
नौकर ने उन्हें ड्राइंग रूम में बैठाया।
अवंतिका ऊपर अपने कमरे में थी।
खबर पहुंची।
लेकिन वह नीचे नहीं आई।
आधा घंटा।
एक घंटा।
फिर लगभग दो घंटे।
आर्या की उम्मीद धीरे-धीरे टूटने लगी।
“मम्मा क्यों नहीं आ रहीं?”
नेहा के पास जवाब नहीं था।
अचानक आर्या सोफे से उतरी और सीढ़ियों की ओर भाग गई।
“आर्या!”
नेहा उसके पीछे दौड़ी।
बच्ची ऊपर पहुंचकर एक दरवाज़े पर थपथपाने लगी।
“मम्मा…”
अंदर से कोई जवाब नहीं।
“मम्मा, मैं हूं…”
नेहा सीढ़ियों तक पहुंच चुकी थी।
आर्या पलटी।
उसकी आंखों में आंसू थे।
उसी क्षण उसका पैर सीढ़ी के किनारे से फिसला।
“आर्या!”
नेहा ने हाथ बढ़ाया।
मगर देर हो चुकी थी।
आर्या नीचे की दो-तीन सीढ़ियां लुढ़क गई।
नेहा ने उसे तुरंत अपनी बाहों में उठा लिया।
बच्ची रो रही थी।
माथे पर हल्की चोट आई थी।
नंदिनी घबराकर दौड़ीं।
ऊपर का दरवाज़ा खुला।
अवंतिका सामने खड़ी थी।
तीनों की नजरें मिलीं।
नेहा के चेहरे पर गुस्सा था।
“आपकी बेटी दो घंटे से आपका इंतजार कर रही थी।”
अवंतिका ने आर्या की तरफ देखा।
उसकी आंखों में कुछ टूटा।
लेकिन वह वहीं जड़ बनी रही।
नंदिनी बोलीं—
“कम से कम अब तो नीचे आओ!”
अवंतिका के होंठ कांपे।
लेकिन उसने अचानक दरवाज़ा बंद कर लिया।
धड़ाम!
आर्या की सिसकियां तेज हो गईं।
नेहा ने बच्ची को सीने से चिपका लिया।
“कुछ नहीं हुआ। मैं हूं।”
अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टर ने कहा चोट गंभीर नहीं थी।
अभिनव वहां पहुंचा तो चेहरे पर भय और गुस्सा दोनों थे।
उसने आर्या को देखा।
फिर नेहा की तरफ।
“मैंने मना किया था।”
नेहा चुप रही।
“मैंने कहा था कि उसे वहां मत ले जाना।”
“अभिनव!”
नंदिनी की तेज आवाज गूंजी।
“बस।”
वह पहली बार बेटे पर इस तरह बरसी थीं।
“नेहा को दोष देने की कोशिश मत करना।”
अभिनव चुप हो गया।
नंदिनी ने कहा—
“तुम्हारी बेटी सीढ़ियों से गिरी तो सबसे पहले नेहा उसके पीछे दौड़ी। अस्पताल तक इसने उसे गोद से नहीं उतारा। खुद देखो इसके हाथ।”
अभिनव की नजर नेहा की हथेली पर गई।
आर्या को बचाने की कोशिश में उसकी कलाई छिल गई थी।
अभिनव की आंखें झुक गईं।
रात को घर लौटकर उसने देखा—
नेहा आर्या के पास बैठी थी।
एक हाथ में दवा।
दूसरे हाथ से बच्ची के बाल सहला रही थी।
“दर्द हो रहा है?”
“थोड़ा।”
“मैं जादू करूं?”
“आपको आता है?”
“बहुत बड़ा जादू।”
नेहा ने उसके माथे पर हल्की फूंक मारी।
आर्या मुस्कुरा दी।
दरवाज़े से यह दृश्य देखकर अभिनव का गला भर आया।
उस रात वह अपनी मां के कमरे में गया।
“मम्मा…”
नंदिनी ने किताब बंद की।
अभिनव उनके पास बैठ गया।
काफी देर वह कुछ नहीं बोला।
फिर अचानक कहा—
“मैंने जिंदगी में सबसे बड़ी गलती किस दिन की थी?”
नंदिनी सब समझ गईं।
उन्होंने कहा—
“जब तुमने अपनी पसंद चुनी थी, उस दिन गलती नहीं की थी।”
अभिनव ने आश्चर्य से देखा।
“गलती तब होती अगर तुम अपनी पसंद के परिणाम से कुछ सीखते नहीं।”
“और मैंने क्या सीखा?”
“कि अच्छी पत्नी का मतलब वह नहीं जो तुम्हारे हिसाब से चले। अच्छा रिश्ता वह होता है जहां दोनों एक-दूसरे को इंसान समझें।”
अभिनव चुप रहा।
नंदिनी ने धीरे से कहा—
“और शायद यह भी कि किसी का प्यार चुप हो तो उसका मतलब यह नहीं कि वह कम है।”
अभिनव की नजरें अपने आप दरवाज़े की ओर चली गईं।
कुछ दिनों बाद नंदिनी ने सुबह नाश्ते पर घोषणा कर दी—
“हम नेहा के लिए रिश्ता देख रहे हैं।”
अभिनव का चम्मच थाली में गिरा।
“क्या?”
नेहा ने भी चौंककर देखा।
नंदिनी ने सहजता से कहा—
“क्यों? लड़की हमेशा यहीं बैठी रहेगी?”
अभिनव कुछ कह नहीं पाया।
पूरे दिन वह विचलित रहा।
ऑफिस में फाइल खोलता तो नेहा याद आती।
मीटिंग में बैठता तो सवाल दिमाग में घूमता—
किससे शादी करेगी?
कहां जाएगी?
आर्या का क्या होगा?
और…
मेरा क्या होगा?
शाम को वह घर लौटा तो लॉन में नेहा किसी से फोन पर बात कर रही थी।
“जी… मैं सोचकर बताऊंगी।”
अभिनव वहीं रुक गया।
कॉल खत्म हुआ।
उसने पूछा—
“कौन था?”
नेहा ने भौंह उठाई।
“आप कब से मेरे फोन की पूछताछ करने लगे?”
“मैंने सिर्फ पूछा।”
“रिश्ते वालों का फोन था।”
अभिनव के भीतर कुछ कस गया।
“क्या कहा?”
“सोचकर बताऊंगी।”
“मतलब?”
नेहा हंस पड़ी।
“मतलब हिंदी वाला ‘सोचकर बताऊंगी’।”
“तुम सच में शादी करना चाहती हो?”
नेहा की मुस्कान फीकी पड़ गई।
“कभी ना कभी तो करनी ही है।”
“आर्या?”
“आर्या आपकी बेटी है।”
शब्द जैसे हथौड़ा बनकर गिरे।
अभिनव ने तुरंत कहा—
“वो तुम्हारे बिना नहीं रह पाएगी।”
“रहना सीख जाएगी।”
“और तुम?”
नेहा की आंखें उससे मिलीं।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर नेहा बोली—
“मैं भी।”
वह चली गई।
अभिनव वहीं खड़ा रह गया।
उस रात उसे पहली बार अपने भीतर छिपे भय का नाम समझ आया।
वह नेहा को खोना नहीं चाहता था।
अगले सप्ताह रिश्ते वाले परिवार को घर आना था।
सुबह से तैयारी हो रही थी।
अभिनव चिड़चिड़ा घूम रहा था।
आर्या ने पूछा—
“डैडी, आज कौन आ रहा है?”
“पता नहीं।”
“दादी कह रही थीं नेहा मम्मा के लिए कोई अंकल।”
अभिनव जम गया।
“नेहा मम्मा?”
आर्या ने मासूमियत से कहा—
“मैं कभी-कभी बोलती हूं।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो मम्मा जैसी हैं।”
अभिनव ने आंखें बंद कर लीं।
शाम करीब छह बजे गाड़ी गेट के बाहर रुकी।
नेहा हल्के गुलाबी सूट में नीचे उतरी।
बाल खुले थे।
चेहरे पर कोई भारी श्रृंगार नहीं।
फिर भी अभिनव उसे देखता रह गया।
दरवाज़े की घंटी बजने ही वाली थी कि उसने अचानक कहा—
“मम्मा, ये रिश्ता नहीं होगा।”
पूरा परिवार उसे देखने लगा।
नंदिनी ने पूछा—
“क्यों?”
अभिनव ने नेहा की तरफ देखा।
“क्योंकि…”
उसकी आवाज रुक गई।
नेहा का दिल जोर से धड़कने लगा।
“क्योंकि मैं नेहा से शादी करना चाहता हूं।”
कमरे में इतनी खामोशी फैल गई कि घड़ी की सुई सुनाई दे रही थी।
नेहा का चेहरा सफेद पड़ गया।
नंदिनी ने कोई आश्चर्य नहीं दिखाया।
“तुम चाहते हो?”
“हां।”
“नेहा क्या चाहती है?”
यहीं अभिनव को अपनी पुरानी गलती समझ आई।
पांच वर्ष पहले उसने सबके सामने सिर्फ अपनी इच्छा बताई थी।
आज फैसला नेहा का था।
वह उसके सामने आया।
“मैं तुमसे जवाब अभी नहीं मांगूंगा।”
नेहा कुछ बोलना चाहती थी।
अभिनव ने रोक दिया।
“नहीं। इस बार फैसला तुम करोगी।”
उसकी आवाज भारी थी।
“मैंने तुम्हें पहले बहुत चोट पहुंचाई है। तुम्हें तब नहीं चुना जब तुम्हारा प्यार शायद मेरे सामने था। फिर जब मेरी जिंदगी बिखरी तो तुमने मेरी बेटी को संभाला। मुझे भी।”
उसने गहरी सांस ली।
“लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम मुझ पर कोई एहसान चुकाने के लिए शादी करो।”
नेहा की आंखें भर आईं।
अभिनव ने कहा—
“अगर तुम मना करोगी, मैं तुम्हारा फैसला मानूंगा।”
नंदिनी की आंखों में संतोष था।
नेहा पहली बार अभिनव में वह आदमी देख रही थी जो पांच वर्ष पहले उसके कमरे में आया था उससे बिल्कुल अलग था।
रातभर उसने सोचा।
अगली सुबह मंदिर में दिया जलाकर लौटते समय अभिनव बरामदे में मिला।
नेहा उसके सामने आकर रुकी।
“एक सवाल है।”
“पूछो।”
“अगर आर्या आपकी जिंदगी में ना होती तब भी आप मुझसे शादी करना चाहते?”
अभिनव बिना सोचे बोला—
“हां।”
नेहा की आंखें उसके चेहरे पर टिकी रहीं।
“अगर मैं कभी मां नहीं बनना चाहूं?”
इस बार अभिनव ने जवाब देने में दो सेकंड लिए।
फिर कहा—
“तब भी फैसला तुम्हारा होगा।”
नेहा के होंठ कांपे।
“अगर मैं आपके खिलाफ बोलूं?”
“तो सुनूंगा।”
“अगर गुस्सा करूं?”
“मनाऊंगा।”
“अगर कभी आप गलत हुए?”
“तो माफी मांगूंगा।”
नेहा की आंख से एक आंसू गिर गया।
“इतने समझदार कब हो गए?”
अभिनव हल्का-सा मुस्कुराया।
“बहुत महंगी फीस देकर।”
नेहा भी मुस्कुरा दी।
बस वही उनकी हां थी।
शादी हुई।
आर्या सबसे ज्यादा खुश थी।
वह हर किसी से कह रही थी—
“आज मेरी नेहा बुआ सच में मेरी मम्मा बनने वाली हैं।”
और शादी की पहली रात वही आर्या तकिया लेकर कमरे में पहुंच गई।
“नेहा मम्मा…”
वर्तमान में लौटते हुए अभिनव ने बेटी को देखा।
फिर नेहा की दो शर्तें याद कीं।
वह उनके सामने बैठ गया।
“तीसरी शर्त भी है?”
नेहा चौंकी।
“तीसरी?”
“हां। मैं भी रखता हूं।”
“क्या?”
अभिनव ने आर्या को अपने पास खींचा।
“इस घर में किसी को जबरदस्ती कुछ नहीं करना पड़ेगा। ना तुम्हें। ना मुझे। ना आर्या को।”
नेहा की आंखों में चमक आई।
“मंजूर।”
आर्या बीच में बोली—
“मेरी भी शर्त है।”
दोनों हंस पड़े।
“क्या?”
“आज मैं यहीं सोऊंगी।”
अभिनव ने सिर पकड़ लिया।
“ये शर्त मंजूर नहीं है।”
आर्या तुरंत नेहा से लिपट गई।
“नेहा मम्मा!”
नेहा हंसते-हंसते बोली—
“मेरी बेटी है। यहीं सोएगी।”
“अच्छा! शादी होते ही टीम बदल गई?”
आर्या ने जीभ निकाल दी।
उस रात आर्या दोनों के बीच सोई।
आधी रात के बाद जब बच्ची गहरी नींद में थी तो अभिनव उसे उठाकर उसके कमरे में छोड़ आया।
वापस लौटा तो नेहा खिड़की के पास खड़ी थी।
चांदनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
अभिनव कुछ दूरी पर रुक गया।
“डर लग रहा है?”
नेहा ने सच कहा—
“थोड़ा।”
“मुझसे?”
“पुरानी यादों से।”
अभिनव का चेहरा गंभीर हो गया।
वह आगे नहीं बढ़ा।
“उस रात मैंने तुम्हारे कमरे में जिस तरह बात की थी… उसके लिए बहुत पहले माफी मांगनी चाहिए थी।”
नेहा उसकी ओर मुड़ी।
“मुझे लगा था आप मुझे कमजोर समझते हैं।”
“मैं खुद को बहुत मजबूत समझता था।”
“अब?”
“अब पता है कि ताकत किसी को डराने में नहीं होती।”
नेहा की आंखें नम हो गईं।
अभिनव ने हाथ आगे बढ़ाया।
मगर उसके छूने से पहले ही रुक गया।
“इजाजत?”
नेहा ने एक पल उसे देखा।
फिर अपनी हथेली उसकी हथेली पर रख दी।
“हां।”
उस एक शब्द के बाद कमरे से पांच साल पुरानी सारी कड़वाहट जैसे धीरे-धीरे निकलने लगी।
अभिनव ने उसका हाथ थामा।
बस इतना।
ना कोई जल्दबाजी।
ना कोई चुनौती।
कुछ देर दोनों बातें करते रहे।
आर्या के बारे में।
बीते वर्षों के बारे में।
डर के बारे में।
गलतियों के बारे में।
नेहा ने कहा—
“जानते हैं पांच साल पहले जब आपने कहा था कि मैं आपके साथ खुश नहीं रह सकती, मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा किस बात पर आया था?”
“किस पर?”
“आपने मुझे फैसला करने का मौका ही नहीं दिया।”
अभिनव हल्का-सा मुस्कुराया।
“और अब?”
“अब भी अगर ऐसा किया तो…”
“क्या करोगी?”
नेहा ने तकिया उठाया।
“यही।”
तकिया सीधे अभिनव के चेहरे पर लगा।
दोनों हंस पड़े।
कुछ देर बाद कमरे में फिर शांति हो गई।
इस बार अभिनव उसके पास बैठा।
“नेहा।”
“हूं?”
“मुझे तुमसे एक वादा करना है।”
उसने जेब से छोटा-सा मखमली डिब्बा निकाला।
नेहा ने खोला।
अंदर दिल के आकार का बेहद साधारण-सा पेंडेंट था।
“इतने गहनों के बीच ये छोटा-सा?”
अभिनव ने कहा—
“बाकी सब शादी के हैं। ये मेरा है।”
उसने पेंडेंट की पिछली तरफ इशारा किया।
बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था—
“चुनाव।”
नेहा ने पूछा—
“इसका मतलब?”
“तुम मेरी मजबूरी नहीं। मेरी पसंद हो।”
नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।
लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई।
शादी के तीन महीने बाद एक दोपहर अभिनव के ऑफिस में एक रजिस्टर्ड लिफाफा आया।
भेजने वाले का नाम नहीं था।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर कुछ बैंक स्टेटमेंट्स थे।
कई ईमेल प्रिंटआउट।
कुछ तस्वीरें।
और एक पेन ड्राइव।
सबसे ऊपर एक छोटा-सा नोट रखा था—
“आपने अपनी पहली शादी के बारे में आधा सच जाना है।”
अभिनव की भौंहें सिकुड़ गईं।
उसने तुरंत पेन ड्राइव लैपटॉप में लगाई।
पहली फाइल एक ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।
आवाज रोहन मेहरा की थी।
“तुम्हें समझ क्यों नहीं आता अवंतिका? जब तक तुम उस घर से अलग नहीं होगी, निवेशक तुम्हें स्वतंत्र निर्णय लेने वाला पार्टनर नहीं मानेंगे।”
अवंतिका की आवाज आई—
“अभिनव मुझे कभी रोकेगा नहीं।”
रोहन हंसा।
“रोकना जरूरी नहीं। उसे तुम्हारे खिलाफ दिखना जरूरी है।”
अभिनव की उंगलियां ठंडी पड़ गईं।
दूसरी रिकॉर्डिंग।
रोहन—
“उसे उकसाओ। लड़ो। कुछ ऐसा करो कि तलाक तुम्हारी तरफ से मजबूरी लगे।”
अवंतिका—
“और उसके बाद?”
“उसके बाद सिंगापुर। नई कंपनी। नई जिंदगी।”
अभिनव कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसकी सांस भारी होने लगी।
तीसरी फाइल में ईमेल थे।
रोहन ने अवंतिका को बड़े निवेश, कंपनी में हिस्सेदारी और अंतरराष्ट्रीय करियर का सपना दिखाया था।
लेकिन उन्हीं दस्तावेजों में एक और बात थी।
रोहन पहले से विवाहित था।
उसकी दो कंपनियों पर धोखाधड़ी की जांच चल रही थी।
और सबसे चौंकाने वाला तथ्य—
जिस सिंगापुर प्रोजेक्ट के लिए अवंतिका ने सब कुछ छोड़ा था…
वह प्रोजेक्ट कभी अस्तित्व में था ही नहीं।
अभिनव ने तुरंत अपने वकील कबीर को फोन किया।
“मुझे इस लिफाफे का स्रोत पता करना है।”
शाम तक कबीर घर पहुंच गया।
नेहा भी वहीं थी।
सभी दस्तावेज देखने के बाद कबीर बोला—
“किसी ने बहुत व्यवस्थित तरीके से रिकॉर्ड इकट्ठा किया है।”
नंदिनी ने पूछा—
“लेकिन भेजा किसने?”
कबीर ने आखिरी कागज उठाया।
“शायद इसका जवाब इसमें है।”
उसमें सिर्फ एक होटल का नाम और कमरा नंबर लिखा था।
अगली सुबह अभिनव और नेहा वहां पहुंचे।
दरवाज़ा खुला।
सामने जिस महिला को देखकर अभिनव ठहर गया…
वह अवंतिका थी।
पहचानना मुश्किल था।
चेहरे पर थकान।
आंखों के नीचे गहरे घेरे।
बाल साधारण तरीके से बंधे हुए।
ना पहले जैसी चमक।
ना आत्मविश्वास।
अवंतिका ने नेहा को देखा।
फिर अभिनव को।
“मुझे पता था तुम आओगे।”
अभिनव का पहला सवाल था—
“दस्तावेज तुमने भेजे?”
“हां।”
“क्यों?”
“क्योंकि रोहन अब किसी और के साथ वही करने जा रहा है जो उसने मेरे साथ किया।”
अभिनव की आंखें कठोर हो गईं।
“तुमने पांच साल का रिश्ता एक आदमी के कहने पर तोड़ दिया?”
अवंतिका की आंखें भर आईं।
“नहीं। गलती सिर्फ उसकी नहीं थी।”
वह कुर्सी पर बैठ गई।
“मेरे भीतर पहले से असंतोष था। उसने बस उसे हवा दी।”
नेहा शांत बैठी रही।
अवंतिका ने कहा—
“मुझे लगता था घर मुझे रोक रहा है। परिवार मुझे रोक रहा है। आर्या मुझे रोक रही है।”
उसकी आवाज टूट गई।
“लेकिन सच यह था कि मैं खुद अपने सपनों और डर के बीच फंसी थी।”
अभिनव ने पूछा—
“तुम आर्या से क्यों नहीं मिलीं उस दिन?”
अवंतिका ने आंखें बंद कर लीं।
आंसू निकल आए।
“क्योंकि मैं शर्मिंदा थी।”
“वो सीढ़ियों से गिर गई थी।”
“जानती हूं।”
“फिर भी दरवाज़ा बंद कर लिया।”
“और वही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती है।”
नेहा पहली बार बोली—
“आपकी बेटी आज भी कभी-कभी आपके बारे में पूछती है।”
अवंतिका ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“मेरे बारे में?”
“हां।”
“अभिनव ने नहीं रोका?”
नेहा ने अभिनव की ओर देखा।
“अब नहीं।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर अवंतिका ने एक और फाइल नेहा की तरफ बढ़ाई।
“असल वजह जिसके लिए मैंने तुम्हें बुलाया है… ये है।”
नेहा ने फाइल खोली।
उसमें रोहन की कंपनी से जुड़े निवेशकों की सूची थी।
एक नाम लाल निशान से घिरा हुआ था।
नेहा का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी उंगलियां कांपने लगीं।
अभिनव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
नेहा ने धीरे से नाम पढ़ा—
“विक्रम सहगल…”
अभिनव उलझ गया।
“कौन?”
नेहा का गला सूख गया।
“मेरे पिता के पुराने बिजनेस पार्टनर।”
कमरे का माहौल बदल गया।
नेहा की मां के निधन के बाद उसके पिता भी कुछ वर्षों में एक सड़क दुर्घटना में गुजर गए थे।
उस समय सबने इसे हादसा माना था।
अवंतिका ने अगला कागज निकालते हुए कहा—
“रोहन की कंपनी की शुरुआती फंडिंग विक्रम सहगल ने की थी।”
अभिनव ने पूछा—
“इसका नेहा से क्या लेना-देना?”
अवंतिका ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“नेहा के पिता जिस कंपनी के मालिक थे, उसका एक बड़ा हिस्सा कभी नेहा के नाम होना था।”
नेहा की सांस अटक गई।
“क्या?”
“तुम्हें बताया गया कि कंपनी कर्ज में थी।”
“हां।”
“वो झूठ था।”
नेहा के हाथ से फाइल लगभग गिर गई।
अवंतिका ने कहा—
“तुम्हारे पिता की मृत्यु के बाद कंपनी की संपत्ति अलग-अलग फर्जी कंपनियों के नाम ट्रांसफर हुई।”
“किसने की?”
“विक्रम सहगल ने।”
अभिनव तुरंत खड़ा हो गया।
“तुम्हारे पास सबूत हैं?”
“इसी पेन ड्राइव की आखिरी फाइल देखो।”
उसमें पुरानी स्कैन कॉपियां थीं।
शेयरहोल्डिंग दस्तावेज।
डिजिटल हस्ताक्षर।
नकली बोर्ड रिजोल्यूशन।
और एक वसीयत की कॉपी।
वसीयत में स्पष्ट लिखा था—
कंपनी के इक्यावन प्रतिशत शेयर नेहा के नाम होने थे।
नेहा पत्थर बन गई।
उसे पूरी जिंदगी बताया गया था कि उसके पिता कर्ज छोड़कर गए थे।
नंदिनी ने ही उसे आर्थिक रूप से संभाला था।
लेकिन अगर ये दस्तावेज सच थे…
तो नेहा करोड़ों की संपत्ति की कानूनी उत्तराधिकारी थी।
अवंतिका ने कहा—
“रोहन और विक्रम अभी भी साथ काम कर रहे हैं।”
अभिनव का चेहरा सख्त हो गया।
“तुम्हें ये सब कैसे मिला?”
“रोहन के पुराने लैपटॉप से।”
“तुम अब कहां रहती हो?”
अवंतिका हल्का-सा मुस्कुराई।
“जहां खुद कमाकर किराया दे सकूं।”
उसकी आंखें आर्या का नाम आते ही फिर भर गईं।
“मैं तुम्हारी जिंदगी में वापस नहीं आना चाहती, अभिनव।”
नेहा ने उसकी तरफ देखा।
अवंतिका बोली—
“लेकिन अगर कभी आर्या मुझे देखने के लिए तैयार हो… तो मैं उससे एक बार माफी मांगना चाहती हूं।”
अभिनव ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
कुछ क्षण बाद उसने कहा—
“फैसला आर्या का होगा।”
अवंतिका ने सिर झुका लिया।
“ठीक है।”
वापस लौटते समय कार में नेहा एक शब्द नहीं बोली।
उसके हाथ में पिता की वसीयत की कॉपी थी।
अभिनव ने कार सड़क किनारे रोक दी।
“ठीक हो?”
नेहा की आंखें सामने थीं।
“अगर ये सच है तो इतने साल…”
“कबीर जांच करेगा।”
“अगर मेरे पापा को पता चल गया था कि उनके साथ धोखा हो रहा है?”
अभिनव ने उसकी तरफ देखा।
“अभी कोई निष्कर्ष मत निकालो।”
नेहा ने वसीयत सीने से लगा ली।
“मैं जानना चाहती हूं।”
“जानेंगे।”
“कितना भी बुरा सच हो।”
अभिनव ने उसकी हथेली थामी।
“साथ जानेंगे।”
दो सप्ताह तक वकीलों और फॉरेंसिक अकाउंटेंट्स ने दस्तावेज जांचे।
नतीजा साफ था।
वसीयत असली थी।
शेयर ट्रांसफर में अनियमितता थी।
कई हस्ताक्षर संदिग्ध थे।
मामला अदालत तक जा सकता था।
और तभी विक्रम सहगल का फोन आया।
“बहुत पुरानी कब्रें खोद रही हो, नेहा।”
नेहा के हाथ ठंडे पड़ गए।
अभिनव ने स्पीकर ऑन कर दिया।
नेहा ने कहा—
“अगर सब साफ है तो आपको डर क्यों लग रहा है?”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
विक्रम की आवाज आई—
“तुम्हारे पिता भी यही गलती करते थे। हर चीज जानने की जिद।”
अभिनव सीधा बैठ गया।
नेहा की आंखें फैल गईं।
“मेरे पिता की मृत्यु के बारे में आप क्या जानते हैं?”
फोन कट गया।
कमरे में सन्नाटा।
अभिनव ने तुरंत कबीर को फोन किया।
कबीर ने कहा—
“रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखो। और फिलहाल सीधे उस आदमी से मत मिलना।”
उस रात नेहा सो नहीं पाई।
करीब तीन बजे वह बालकनी में खड़ी थी।
अभिनव पीछे आया।
“नींद नहीं आई?”
“नहीं।”
कुछ देर दोनों शहर की लाइटें देखते रहे।
नेहा ने कहा—
“डर लग रहा है।”
“मुझे भी।”
उसने पहली बार स्वीकार किया।
नेहा ने उसे देखा।
अभिनव बोला—
“हिम्मत का मतलब डर ना लगना नहीं है।”
नेहा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“ये बात आपको किसने सिखाई?”
अभिनव ने कहा—
“मेरी पत्नी ने।”
अगली सुबह आर्या स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी कि गेट पर एक कुरियर आया।
छोटा-सा लिफाफा।
नेहा के नाम।
अंदर सिर्फ एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में नेहा के पिता खड़े थे।
उनके साथ विक्रम सहगल।
और तीसरा आदमी।
जिसके चेहरे पर लाल गोला बना था।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“वसीयत चोरी सिर्फ शुरुआत थी।”
नीचे एक तारीख थी।
वही तारीख…
जिसके अगले दिन नेहा के पिता की दुर्घटना हुई थी।
अभिनव ने तस्वीर कबीर को भेजी।
कबीर का फोन तुरंत आया।
“इस तीसरे आदमी को पहचानते हो?”
“नहीं।”
कबीर की आवाज असामान्य रूप से गंभीर थी।
“मैं पहचानता हूं।”
“कौन है?”
“रोहन मेहरा का पिता।”
अभिनव की आंखें फैल गईं।
नेहा वहीं कुर्सी पर बैठ गई।
कबीर ने आगे कहा—
“और एक बात और मिली है।”
“क्या?”
“नेहा के पिता की दुर्घटना की पुलिस फाइल जिस अधिकारी ने बंद की थी… उसने रिटायरमेंट के तीन महीने बाद विक्रम सहगल की कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी।”
नेहा के हाथ से तस्वीर गिर गई।
अभिनव ने उसका हाथ थाम लिया।
लेकिन तभी घर के मुख्य दरवाज़े पर घंटी बजी।
नंदिनी ने दरवाज़ा खोला।
सामने लगभग साठ वर्ष का एक अनजान आदमी खड़ा था।
हाथ में पुराना चमड़े का बैग।
उसने कांपती आवाज में पूछा—
“नेहा बिटिया यहीं रहती हैं?”
नेहा बाहर आई।
आदमी ने उसे देखा तो उसकी आंखें भर गईं।
“आप कौन?”
उसने बैग से छोटी डायरी निकाली।
“मैं आपके पिताजी का ड्राइवर था।”
नेहा की सांस रुक गई।
“उस रात भी?”
आदमी ने सिर झुका दिया।
“हां।”
अभिनव तुरंत आगे आया।
“क्या हुआ था उस रात?”
बूढ़े आदमी ने घर के बाहर देखा।
मानो आज भी किसी से डर रहा हो।
फिर उसने डायरी नेहा के हाथ में दी।
“साहब की गाड़ी का एक्सीडेंट नहीं हुआ था बिटिया।”
नेहा की आंखें फैल गईं।
“तो?”
आदमी की आवाज फुसफुसाहट में बदल गई—
“ब्रेक के साथ छेड़छाड़ की गई थी।”
कमरे में किसी की सांस तक सुनाई दे रही थी।
नेहा की उंगलियां डायरी पर जम गईं।
ड्राइवर ने आगे कहा—
“और साहब को इसका अंदाजा दुर्घटना से एक दिन पहले हो चुका था।”
“फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”
“बताने वाले थे।”
उसने डायरी के आखिरी पन्ने पर उंगली रखी।
वहां सिर्फ तीन नाम लिखे थे।
विक्रम सहगल।
राजीव मेहरा।
और…
तीसरा नाम देखकर अभिनव की आंखें फैल गईं।
नेहा का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
क्योंकि वह नाम किसी बाहरी दुश्मन का नहीं था।
वह उसी परिवार के एक ऐसे सदस्य का नाम था…
जिसने नेहा को उसके माता-पिता के जाने के बाद अपनी बेटी कहकर घर में जगह दी थी।
नेहा के होंठ कांपे।
“ये… कैसे हो सकता है?”
अभिनव ने डायरी उसके हाथ से ले ली।
और उसी पल ऊपर सीढ़ियों से नंदिनी की आवाज आई—
“नेहा…”
सभी ने पलटकर देखा।
नंदिनी का चेहरा उतरा हुआ था।
उनकी आंखों में आंसू थे।
मानो वह नाम उन्होंने भी पढ़ लिया हो।
नेहा ने कांपते हुए पूछा—
“मम्मा… आप इस बारे में क्या जानती हैं?”
नंदिनी ने जवाब देने की कोशिश की।
लेकिन आवाज नहीं निकली।
तभी बाहर अचानक एक कार के तेज ब्रेक लगाने की आवाज आई।
कबीर भागता हुआ भीतर आया।
“दरवाज़े बंद करो!”
अभिनव चौंका।
“क्या हुआ?”
कबीर ने मोबाइल उसकी ओर बढ़ाया।
स्क्रीन पर लाइव सीसीटीवी फुटेज था।
घर के पीछे वाली सड़क पर एक काली कार खड़ी थी।
उसी कार से दो लोग कई घंटों से घर की तस्वीरें ले रहे थे।
कबीर ने गंभीर आवाज में कहा—
“जिसे भी पता चला है कि ये डायरी यहां पहुंच चुकी है… वह अब चुप नहीं बैठेगा।”
नेहा ने पिता की डायरी सीने से लगा ली।
उसकी आंखों में पहली बार डर से अधिक दृढ़ता थी।
“तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे।”
अभिनव उसके साथ खड़ा हो गया।
नेहा ने डायरी फिर खोली।
आखिरी पन्ने के कोने पर बहुत छोटे अक्षरों में पिता की लिखावट थी—
“अगर मुझे कुछ हो जाए तो नेहा को तहखाने वाली तिजोरी तक पहुंचाना।”
नेहा ने सिर उठाया।
“कौन-सी तिजोरी?”
ड्राइवर की आंखें फैल गईं।
“आपको उसके बारे में नहीं बताया गया?”
“नहीं।”
उसने धीमे स्वर में कहा—
“पुराने सहगल फार्महाउस के नीचे एक कमरा है।”
“उसमें क्या है?”
बूढ़े आदमी ने नेहा को देखा।
“आपके पिता कहा करते थे कि अगर कभी उनके साथ कुछ गलत हुआ… तो उस तिजोरी के अंदर रखी चीज एक बहुत बड़े आदमी को जेल तक पहुंचा सकती है।”
उसी क्षण अभिनव के फोन पर अनजान नंबर से संदेश आया।
सिर्फ एक तस्वीर।
सहगल फार्महाउस की।
और नीचे लिखा था—
“तिजोरी तक पहुंचने की कोशिश मत करना।”
नेहा के चेहरे पर भय जम गया।
अभिनव ने संदेश पढ़ा।
फिर पत्नी की ओर देखा।
कुछ महीने पहले इस घर की सबसे बड़ी चिंता एक टूटी हुई शादी थी।
आज उनके सामने करोड़ों की संपत्ति, जाली दस्तावेज, पुरानी दुर्घटना और वर्षों से दबा एक रहस्य खड़ा था।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—
नेहा के पिता की डायरी में तीसरा नाम किसका था?
नंदिनी उसे देखकर इतनी घबरा क्यों गई थीं?
और सहगल फार्महाउस की तिजोरी में आखिर ऐसा क्या रखा था जिसे बचाने के लिए कोई वर्षों बाद भी नेहा की हर हरकत पर नजर रख रहा था?
नेहा ने तस्वीर अपनी मुट्ठी में कस ली।
फिर अभिनव की तरफ देखा।
“इस बार मैं पीछे नहीं हटूंगी।”
अभिनव ने शांत स्वर में कहा—
“और इस बार तुम्हें अकेले भी नहीं जाना पड़ेगा।”
उसी समय ऊपर आर्या की मासूम आवाज गूंजी—
“नेहा मम्मा… आप कहां हो?”
नेहा की आंखें एक पल में नम हो गईं।
उसने सीढ़ियों की ओर देखा।
फिर पिता की डायरी की ओर।
एक तरफ वह परिवार था जिसे उसने प्रेम से पाया था।
दूसरी तरफ वह परिवार था जिसकी सच्चाई उससे वर्षों तक छिपाई गई।
और अब पहली बार…
दोनों दुनिया एक-दूसरे से टकराने वाली थीं।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि सहगल फार्महाउस पहुंचने से पहले ही कोई उनसे एक कदम आगे निकल चुका था।
क्योंकि उसी रात…
शहर से दूर बंद पड़े उस फार्महाउस के नीचे बनी पुरानी तिजोरी का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
धूल से ढकी फाइलों के बीच एक आदमी ने नेहा के पिता की पुरानी वीडियो रिकॉर्डिंग उठाई।
स्क्रीन पर तारीख चमकी।
दुर्घटना से सिर्फ छह घंटे पहले की।
रिकॉर्डिंग में नेहा के पिता कैमरे की ओर देख रहे थे।
उनका चेहरा तनाव से भरा था।
उन्होंने सिर्फ एक वाक्य कहा—
“अगर मेरी बेटी कभी यह वीडियो देख रही है… तो समझ लेना, जिस इंसान पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया है, उसी ने हमारे परिवार को बर्बाद किया।”
स्क्रीन काली हो गई।
और अंधेरे में खड़ा वह रहस्यमय आदमी धीमे से मुस्कुराया।
“बहुत देर कर दी, नेहा…”
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।