**जिस रिश्ते को नूर ने बचपन की भूल समझा, उसी पुराने कागज़ ने उसकी शादी, विरासत और फरहान की छिपी मोहब्बत का सच खोल दिया**

जिस रिश्ते को नूर ने बचपन की भूल समझा, उसी पुराने कागज़ ने उसकी शादी, विरासत और फरहान की छिपी मोहब्बत का सच खोल दिया
रात के पौने एक बज चुके थे।
हवेली के बड़े आंगन में कुछ घंटे पहले तक गूंज रही ढोलक अब खामोश थी। रंग-बिरंगी झालरों की रोशनी हवा के साथ कांप रही थी और गुलाब की पंखुड़ियां संगमरमर के फर्श पर बिखरी पड़ी थीं।
ऊपर की मंजिल की ओर जाती सीढ़ियों पर नूर अपने भारी फिरोजी लिबास का घेरा दोनों हाथों में समेटे धीरे-धीरे चढ़ रही थी।
उसके पैरों में दर्द था।
आंखों में नींद थी।
लेकिन दिल में उससे भी ज्यादा थकान थी।
आज उसकी बड़ी कज़िन मेहर की मंगनी थी।
पूरे दिन नूर ने कभी मेहमानों को चाय दी, कभी बच्चों को संभाला, कभी फूल सजाए और कभी रसोई से आंगन तक दौड़ती रही।
और जब आखिरकार वह अपने कमरे में सोने पहुंची, तो वहां उसकी तीन सहेलियां और दो छोटी कज़िन पूरे बिस्तर पर फैली हुई थीं।
नूर ने कुछ पल उन्हें देखा।
फिर लंबी सांस लेकर कमरे से बाहर निकल आई।
“इस घर में सबके लिए जगह है… बस मेरे लिए नहीं।”
उसने खुद से धीरे से कहा।
यह बात उसने मजाक में कही थी।
लेकिन ना जाने क्यों कहते ही उसके सीने में हल्की-सी चुभन हुई।
बचपन से यही तो होता आया था।
नूर हंसती थी, इसलिए सब मान लेते थे कि उसे दुख नहीं होता।
वह चुपचाप काम कर देती थी, इसलिए हर किसी को लगता था कि उससे कुछ भी करवाया जा सकता है।
और अगर कभी उसने इंकार कर दिया तो उसकी चाची शबनम की वही आवाज पूरे घर में गूंज जाती—
“इतना घमंड किस बात का है? तुम्हारे अब्बू ने कौन-सी दौलत छोड़ रखी है?”
हर बार जीनत बेगम अपनी बेटी को बचाने के लिए कुछ कहतीं।
हर बार नूर मुस्कुराकर बात बदल देती।
लेकिन शब्द कहीं ना कहीं रह जाते थे।
दिल के उसी हिस्से में, जहां इंसान उन जख्मों को छिपाता है जिनके बारे में वह किसी को बताना नहीं चाहता।
नूर सीढ़ियों के आखिरी मोड़ पर पहुंची तो अचानक उसकी नजर सामने बंद पड़े कमरे पर गई।
इंस्पेक्टर फरहान का कमरा।
फरहान उसकी फूफी का बेटा था।
उम्र में उससे सात साल बड़ा।
शहर के पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर।
कम बोलने वाला।
सख्त चेहरे वाला।
और इतना अनुशासित कि घर के बच्चे उसकी मोटरसाइकिल के पास तक जाने से डरते थे।
दो दिन पहले किसी विशेष ड्यूटी के कारण वह शहर से बाहर गया था।
अम्मी ने खुद कहा था—
“कल दोपहर से पहले नहीं आएगा।”
नूर कुछ क्षण दरवाजे के सामने खड़ी रही।
फिर उसके होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।
“बस दो घंटे सोऊंगी। सुबह होने से पहले निकल जाऊंगी।”
उसने धीरे से दरवाजा खोला।
कमरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा फरहान खुद रहता था।
हर चीज अपनी जगह।
टेबल पर करीने से रखी फाइलें।
दीवार पर पुलिस अकादमी की तस्वीर।
अलमारी बंद।
बिस्तर की चादर पर एक भी शिकन नहीं।
नूर ने कमरे की लाइट नहीं जलाई।
खिड़की से आती पीली रोशनी पर्याप्त थी।
उसने भारी दुपट्टा सोफे पर रखा और बिस्तर के एक कोने पर लेट गई।
“इंस्पेक्टर साहब को पता चला तो पूरा कानून मुझ पर लगा देंगे।”
उसने आंखें बंद करते हुए बुदबुदाया।
कुछ ही मिनटों में उसकी सांसें गहरी हो गईं।
उसे क्या पता था कि उसी रात एक ऐसी बात सामने आने वाली थी जो उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल देगी।
सुबह के पांच बजकर सत्रह मिनट पर कमरे का दरवाजा खुला।
फरहान उम्मीद से कई घंटे पहले लौट आया था।
अठारह घंटे की लगातार ड्यूटी उसकी आंखों में साफ दिखाई दे रही थी।
उसने टोपी उतारी।
कमर से सर्विस बेल्ट हटाकर टेबल पर रखी।
जूते उतारे।
और अंधेरे में ही बिस्तर की तरफ बढ़ गया।
उसे सिर्फ दो घंटे सोना था।
मगर जैसे ही वह बैठा, उसे महसूस हुआ कि बिस्तर पर पहले से कोई था।
फरहान एक पल में सतर्क हो गया।
उसने तुरंत बेडसाइड लैंप जला दिया।
पीली रोशनी फैली।
अगले ही क्षण उसकी आंखें फैल गईं।
“नूर?”
नूर घबराकर उठ बैठी।
“आ… आप?”
कुछ सेकंड दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर नूर ने चादर अपने ऊपर खींचते हुए कहा—
“आपको तो कल दोपहर आना था!”
फरहान की भौंह उठी।
“और तुम्हें मेरे कमरे में कब से रहना था?”
नूर का चेहरा लाल हो गया।
“मेरा कमरा भरा हुआ था।”
“तो पूरी हवेली में तुम्हें मेरा ही कमरा मिला?”
“खाली था।”
“अब नहीं है।”
“तो मैं जा रही हूं।”
नूर तुरंत नीचे उतरने लगी।
फरहान एक ओर हट गया।
लेकिन जैसे ही नूर दरवाजे तक पहुंची, उसके पीछे फरहान की आवाज आई—
“नूर।”
वह रुक गई।
“जी?”
“अगली बार किसी के कमरे में जाने से पहले दरवाजा खटखटाया जाता है।”
नूर पलटी।
थकान के बावजूद उसकी आंखों में पुरानी शरारत लौट आई।
“कमरा खाली हो तो?”
फरहान की आंखों में पहली बार हल्की मुस्कान दिखाई दी।
“तब भी।”
नूर ने होंठ दबाए।
“जी, इंस्पेक्टर साहब।”
वह बाहर निकलने ही वाली थी कि अचानक उसकी नजर फरहान की मेज पर रखे पुराने पीले लिफाफे पर पड़ी।
उसके ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—
नूर और फरहान।
नूर की चाल रुक गई।
“ये क्या है?”
फरहान की मुस्कान उसी क्षण गायब हो गई।
उसने तेजी से लिफाफा उठा लिया।
“कुछ नहीं।”
“उस पर मेरा नाम क्यों लिखा है?”
“नूर।”
“दिखाइए।”
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
फरहान कुछ पल चुप रहा।
उसके चेहरे पर वह कठोरता नहीं थी जिससे नूर परिचित थी।
वह जैसे किसी पुराने बोझ के सामने खड़ा था।
नूर उसके करीब आ गई।
“क्या बात है?”
फरहान ने पहली बार नजरें चुरा लीं।
और यही बात नूर को सबसे ज्यादा परेशान कर गई।
क्योंकि इंस्पेक्टर फरहान किसी से नजरें नहीं चुराता था।
“ये मुझे दादा अब्बा की चीजों में मिला था।”
“इसमें क्या है?”
फरहान ने धीरे से लिफाफा खोला।
अंदर पुराना कागज था।
नूर ने उसे पढ़ना शुरू किया।
पहली दो पंक्तियां पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।
कागज एक पुराने पारिवारिक समझौते जैसा था।
उसमें लिखा था कि दादा अब्बा की इच्छा थी कि बड़े होने पर नूर और फरहान का रिश्ता किया जाए।
नीचे दोनों परिवारों के बुजुर्गों के हस्ताक्षर थे।
नूर ने हैरानी से फरहान को देखा।
“ये… क्या मजाक है?”
“मजाक नहीं है।”
“मुझे किसी ने बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि यह सिर्फ परिवार की पुरानी इच्छा थी। तुम्हारी जिंदगी का फैसला नहीं।”
नूर कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
“और आपको पता था?”
“कुछ महीनों से।”
“और आपने मुझे नहीं बताया?”
“मैं सही समय का इंतजार कर रहा था।”
नूर की आंखों में चोट उतर आई।
“मेरी जिंदगी की बात है और सही समय आप तय करेंगे?”
फरहान जवाब नहीं दे पाया।
नूर ने कागज उसके हाथ में वापस रख दिया।
“वाह।”
“नूर, मेरी बात सुनो।”
“नहीं।”
उसने दरवाजा खोला।
फरहान की आवाज पीछे से आई—
“यह कागज तुम्हें किसी चीज के लिए मजबूर नहीं करता।”
नूर ने रुककर उसकी तरफ देखा।
“लेकिन सच छिपाना मजबूर करने से बहुत अलग भी नहीं होता, फरहान भाई।”
दरवाजा बंद हो गया।
फरहान वहीं खड़ा रह गया।
उसके हाथ में पुराना कागज था।
और उसके चेहरे पर पहली बार अफसोस साफ दिखाई दे रहा था।
सुबह हवेली फिर रोशनी और आवाजों से भर गई।
लेकिन नूर बदल चुकी थी।
वह मुस्कुरा रही थी।
मेहमानों से बातें कर रही थी।
मेहर की मदद भी कर रही थी।
मगर उसकी मुस्कान आंखों तक नहीं पहुंच रही थी।
फरहान ने यह बात दूर से ही पहचान ली।
दोपहर के करीब नूर शरबत की ट्रे लेकर मेहमानों के बीच घूम रही थी।
तभी शहर के मशहूर बिल्डर रशीद कुरैशी का बेटा दानिश वहां आया।
महंगे कपड़े।
हाथ में नया फोन।
चेहरे पर जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास।
दानिश कई महीनों से नूर में दिलचस्पी ले रहा था।
नूर हमेशा उससे दूरी बनाकर रखती थी।
उस दिन भी उसने उसे अनदेखा किया।
लेकिन दानिश ने चोरी से अपना कैमरा खोल लिया।
नूर मेहमानों को शरबत दे रही थी और वह दूर से उसकी तस्वीरें लेने लगा।
उसे पता नहीं था कि कमरे के दूसरे कोने से फरहान सब देख रहा था।
फरहान ने तुरंत उसके पास जाकर कहा—
“फोन।”
दानिश चौंका।
“जी?”
“फोन दीजिए।”
“क्यों?”
“आपने अभी जिनकी तस्वीरें ली हैं, उनसे अनुमति ली थी?”
दानिश हंस पड़ा।
“इंस्पेक्टर साहब, फैमिली फंक्शन है। तस्वीर ही तो—”
“डिलीट कीजिए।”
फरहान की आवाज ऊंची नहीं थी।
मगर इतनी ठंडी थी कि दानिश का चेहरा उतर गया।
“ठीक है।”
उसने तस्वीरें डिलीट कर दीं।
फरहान ने सुनिश्चित किया कि हाल में डिलीट किए गए फोल्डर से भी तस्वीरें हट जाएं।
फिर बोला—
“किसी लड़की का सजकर किसी समारोह में आना आपको उसकी तस्वीरें लेने की अनुमति नहीं देता।”
दानिश की आंखों में अपमान उतर आया।
“आप कुछ ज्यादा ही चिंता कर रहे हैं।”
फरहान की नजर कठोर हो गई।
लेकिन इस बार उसने कुछ नहीं कहा।
नूर दूर खड़ी सब देख रही थी।
उसने पहली बार फरहान के व्यवहार में फर्क महसूस किया।
उसने दानिश को धमकाया नहीं था।
उस पर अपना अधिकार नहीं जताया था।
उसने सिर्फ एक बात कही थी—
अनुमति।
नूर के अंदर रात से जमा गुस्सा थोड़ा नरम हुआ।
मगर कहानी इतनी आसान नहीं थी।
उस शाम हवेली के एक कमरे में शबनम चाची नूर की मां जीनत बेगम से बात कर रही थीं।
“दानिश का रिश्ता बुरा नहीं है।”
नूर बाहर से गुजर रही थी।
उसके कदम रुक गए।
“रशीद कुरैशी के पास पैसा है, जमीन है, कारोबार है।”
जीनत बेगम ने कहा—
“लेकिन नूर ने कभी दानिश को पसंद नहीं किया।”
शबनम की आवाज में तंज था।
“लड़कियों की पसंद से घर नहीं चलते, आपा।”
नूर का हाथ दरवाजे की चौखट पर कस गया।
शबनम आगे बोली—
“और वैसे भी नूर कौन-सी करोड़ों की मालकिन है कि उसके लिए राजकुमार आएगा?”
जीनत बेगम की आवाज कठोर हो गई।
“मेरी बेटी की कीमत दौलत से तय मत करो।”
“मैं कीमत नहीं बता रही। हकीकत बता रही हूं।”
तभी दरवाजा खुला।
नूर अंदर आ गई।
“तो हकीकत मुझसे भी कह दीजिए, चाची।”
दोनों औरतें चौंक गईं।
नूर ने सीधे शबनम की तरफ देखा।
“अगर मेरी जिंदगी की बात हो रही है, तो कम से कम कमरे में मुझे भी होना चाहिए।”
“बड़ों की बात में—”
“मेरी शादी की बात में मैं छोटी कैसे हो गई?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
शबनम कुछ कहती, उससे पहले बाहर से एक गंभीर आवाज आई—
“सही कह रही है।”
फरहान दरवाजे पर खड़ा था।
नूर ने उसकी तरफ देखा।
फरहान कमरे में आया।
“नूर की शादी नूर की मर्जी से होगी।”
शबनम ने व्यंग्य से कहा—
“और तुम कौन होते हो फैसला करने वाले?”
फरहान कुछ क्षण शांत रहा।
फिर उसकी नजर नूर पर गई।
“कोई नहीं।”
नूर चौंकी।
फरहान बोला—
“और यही बात मुझे आज सुबह समझ आ गई।”
उसने जेब से पुराना कागज निकाला।
सबकी आंखें उस पर टिक गईं।
“दादा अब्बा ने जो लिखा था, वह उनकी इच्छा थी। नूर की सहमति नहीं।”
फरहान ने कागज मेज पर रखा।
“इस कागज के नाम पर कोई नूर पर दबाव नहीं बनाएगा। मैं भी नहीं।”
नूर के चेहरे पर पहली बार हल्का-सा बदलाव आया।
शबनम की आंखें सिकुड़ गईं।
“अचानक इतनी समझदारी?”
फरहान ने उसकी तरफ देखा।
“देर से आई है। लेकिन आई है।”
वह पलटकर चला गया।
नूर उसे जाते हुए देखती रही।
उस रात नूर को नींद नहीं आई।
वह अपनी खिड़की के पास बैठी रही।
सुबह वाली बात उसके दिमाग में घूमती रही।
कोई नहीं।
फरहान ने पूरे परिवार के सामने खुद को उसके ऊपर अधिकार रखने वाला बताने की बजाय कहा था—
कोई नहीं।
क्योंकि आखिरकार फैसला नूर का था।
रात करीब ग्यारह बजे नीचे आंगन में किसी गाड़ी की आवाज आई।
नूर ने पर्दा हटाया।
फरहान पुलिस जीप में बैठ रहा था।
शायद अचानक ड्यूटी का फोन आया था।
वह जीप का दरवाजा बंद करने वाला था कि उसकी नजर ऊपर नूर की खिड़की पर गई।
दोनों की निगाहें मिलीं।
कोई मुस्कुराया नहीं।
कोई हाथ नहीं हिलाया।
फिर भी उस एक क्षण में बहुत कुछ कहा गया।
फरहान चला गया।
और उसके बाद पूरे छत्तीस दिन तक वापस नहीं आया।
शहर में जमीन के बड़े विवाद के कारण लगातार पुलिस तैनाती चल रही थी।
फरहान रात-दिन ड्यूटी में लगा रहा।
नूर ने शुरू के कुछ दिन खुद को समझाया—
“मुझे क्या फर्क पड़ता है?”
फिर वह हर शाम उसकी फूफी से अनजाने में पूछ बैठती—
“फरहान भाई का फोन आया?”
पांचवें दिन उसने पूछना बंद कर दिया।
दसवें दिन उसने मोबाइल स्क्रीन जरूरत से ज्यादा देखना शुरू कर दिया।
बीसवें दिन उसे खुद पर गुस्सा आने लगा।
और तीसवें दिन उसने स्वीकार कर लिया कि उसे फर्क पड़ता है।
बहुत फर्क पड़ता है।
शायद पुराने कागज की वजह से नहीं।
शायद बचपन की पहचान की वजह से भी नहीं।
बल्कि इसलिए क्योंकि इतने सालों में उसने पहली बार फरहान को इंस्पेक्टर की वर्दी से बाहर देखा था।
एक ऐसे आदमी के रूप में जो गलती कर सकता था।
मान सकता था।
और बदल भी सकता था।
मगर छत्तीसवें दिन फरहान लौटा तो हवेली में उसका स्वागत किसी खुशी से नहीं बल्कि एक नई खबर से हुआ।
दानिश कुरैशी का रिश्ता औपचारिक रूप से आ चुका था।
और उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि नूर के अब्बू अफसान साहब आर्थिक दबाव में थे।
उनकी छोटी फैक्ट्री पिछले छह महीनों से घाटे में थी।
एक बड़ा कर्ज चुकाना था।
और वह कर्ज जिस कंपनी ने खरीदा था…
उसके मालिक रशीद कुरैशी थे।
फरहान ने यह बात सुनते ही पूछा—
“कर्ज और शादी का आपस में क्या संबंध है?”
अफसान साहब ने थकी हुई आवाज में कहा—
“रशीद साहब ने साफ कुछ नहीं कहा।”
“लेकिन इशारा कर दिया?”
अफसान साहब खामोश हो गए।
बस वही खामोशी जवाब थी।
नूर सीढ़ियों के पास खड़ी सब सुन रही थी।
उस शाम खाने की मेज पर शबनम चाची ने जैसे आखिरी वार कर दिया।
“बेटी अगर एक हां कह दे तो पिता का घर बच सकता है।”
नूर का हाथ चम्मच पर रुक गया।
जीनत बेगम ने तुरंत कहा—
“बस करो।”
लेकिन शबनम नहीं रुकीं।
“गलत क्या कह रही हूं? दानिश पढ़ा-लिखा है, अमीर है। और कितनी लड़कियां ऐसा रिश्ता चाहेंगी।”
नूर ने धीरे से पूछा—
“और अगर मैं नहीं चाहती?”
“तुम्हारी एक जिद की कीमत तुम्हारे पिता अपनी फैक्ट्री देकर चुकाएंगे?”
यह वाक्य नूर के सीने में चाकू की तरह उतर गया।
अफसान साहब ने गुस्से से कहा—
“शबनम!”
मगर देर हो चुकी थी।
नूर कुर्सी से उठी।
उसकी आंखें भर चुकी थीं।
फिर भी उसने रोया नहीं।
“अगर मेरी वजह से घर बच सकता है… तो मैं सोचूंगी।”
“नूर!”
जीनत बेगम भी उठीं।
नूर बिना किसी की तरफ देखे ऊपर चली गई।
दरवाजा बंद हुआ।
तभी आंगन से फरहान की आवाज आई—
“नूर कहां है?”
शबनम ने व्यंग्य से कहा—
“उसे अब समझ आ रही है कि जिंदगी सिर्फ मोहब्बत के कागजों से नहीं चलती।”
फरहान का चेहरा बदल गया।
“क्या हुआ?”
कोई जवाब नहीं दे रहा था।
आखिरकार अफसान साहब ने पूरी बात बता दी।
फरहान कुछ सेकंड बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।
फिर उसने सिर्फ इतना पूछा—
“कर्ज कितना है?”
अफसान साहब ने रकम बताई।
फरहान ने गहरी सांस ली।
“और कर्ज की मूल फाइल कहां है?”
“ऑफिस में।”
“कल मुझे चाहिए।”
शबनम हंस पड़ीं।
“पुलिस वाला अब बैंक भी चलाएगा?”
फरहान ने उनकी तरफ देखा।
“नहीं।”
उसकी आवाज बेहद शांत थी।
“लेकिन दबाव और ब्लैकमेल के बीच फर्क जरूर पहचानता हूं।”
अगली सुबह फरहान ने कर्ज के कागज देखने शुरू किए।
दो घंटे बाद उसके माथे पर लकीरें गहरी हो गईं।
कुछ ठीक नहीं था।
मूल कर्ज जितना बताया जा रहा था, उससे बहुत कम था।
पिछले चार महीनों में अजीब तरह के शुल्क जोड़े गए थे।
दो हस्ताक्षर ऐसे थे जिन्हें अफसान साहब अपना मानने से इंकार कर रहे थे।
फरहान ने दस्तावेजों की तस्वीरें लीं।
उन्हें एक पुराने मित्र, एडवोकेट आरिफ के पास भेजा।
दोपहर में जवाब आया—
ये दस्तावेज जांच के लायक हैं। संभव है कुछ हस्ताक्षर जाली हों। कोई भुगतान मत कीजिए।
फरहान सीधा नूर के कमरे के बाहर पहुंचा।
उसने दरवाजा खटखटाया।
“कौन?”
“फरहान।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर दरवाजा खुला।
नूर का चेहरा थका हुआ था।
“क्या बात है?”
“तुम दानिश से शादी के लिए हां मत कहना।”
नूर की आंखें ठंडी हो गईं।
“क्यों?”
“क्योंकि—”
“क्योंकि आपके पास चौदह साल पुराना कागज है?”
फरहान चुप हुआ।
नूर की आंखें नम हो गईं।
“मैं किसी की संपत्ति नहीं हूं, फरहान।”
“मुझे पता है।”
“तो फिर आप मुझे आदेश क्यों दे रहे हैं?”
फरहान ने तुरंत कहा—
“तुम सही हो।”
नूर रुक गई।
फरहान ने आवाज नरम की।
“मुझे कहना चाहिए था—फैसला करने से पहले मुझे एक दिन दो।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे अब्बू का कर्ज वैसा नहीं है जैसा दिख रहा है।”
नूर का चेहरा बदल गया।
फरहान ने उसे दस्तावेज दिखाए।
“कुछ हस्ताक्षर संदिग्ध हैं। वकील जांच रहा है।”
“तो… दानिश का रिश्ता और कर्ज…”
“संभव है जुड़े हुए हों।”
नूर की उंगलियां कांप गईं।
“अगर ये सच हुआ तो?”
“तो तुम्हें किसी को बचाने के लिए अपनी जिंदगी देने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
नूर ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।
“और अगर ये सच नहीं हुआ?”
फरहान कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“तब भी तुम्हें किसी से शादी करने की जरूरत नहीं जिसे तुम नहीं चाहती।”
“फैक्ट्री चली गई तो?”
“घर फिर बनते हैं।”
फरहान की आवाज गहरी हो गई।
“जिंदगी दोबारा नहीं मिलती।”
नूर की आंख से एक आंसू गिर गया।
फरहान का हाथ अनायास उठा।
मगर उसने बीच में ही रोक लिया।
नूर ने उस अधूरे इशारे को देखा।
उसकी आंखों में कुछ नरम हुआ।
“पहले आप बिना पूछे मेरी जिंदगी का सच छिपाते थे।”
फरहान ने सिर झुका लिया।
“गलती थी।”
“अब?”
“अब पूछ रहा हूं।”
वह एक कदम पीछे हटा।
“क्या मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं?”
नूर की आंखों में आंसुओं के बीच हल्की मुस्कान आई।
“हां।”
बस एक शब्द।
लेकिन फरहान के चेहरे से जैसे कई दिनों का बोझ उतर गया।
अगले दो दिन हवेली के भीतर खुशियों के बजाय तनाव का माहौल रहा।
बाहर मेहर की शादी की तैयारी चल रही थी।
अंदर नूर के रिश्ते और फैक्ट्री के कर्ज को लेकर बहस।
इसी बीच फरहान और वकील आरिफ को एक और चौंकाने वाली बात पता चली।
कर्ज खरीदने वाली कंपनी सीधे रशीद कुरैशी के नाम पर नहीं थी।
वह एक छोटी निवेश कंपनी के नाम पर थी—
एस.एन. होल्डिंग्स।
कंपनी की निदेशक कौन थी?
शबनम नसीम।
फरहान स्क्रीन देखता रह गया।
“शबनम चाची?”
आरिफ ने कहा—
“कागज यही कह रहे हैं।”
“उन्हें इससे क्या मिलेगा?”
“यह अभी पता करना होगा।”
उसी शाम नूर सीढ़ियों से उतर रही थी कि उसे नीचे स्टडी रूम से शबनम की आवाज सुनाई दी।
“दानिश को कहो जल्दी करे।”
नूर रुक गई।
फोन स्पीकर पर नहीं था।
लेकिन कमरा शांत होने के कारण दूसरी तरफ की हल्की आवाज सुनाई दे रही थी।
“फरहान कागज देख रहा है।”
शबनम बोलीं—
“उसे देखने दो। शादी तय होते ही मामला खत्म हो जाएगा।”
नूर का दिल तेज धड़कने लगा।
वह फोन निकालकर रिकॉर्डिंग शुरू करने ही वाली थी कि पीछे किसी ने धीरे से कहा—
“आवाज मत करना।”
नूर लगभग चीख पड़ी।
फरहान था।
वह ना जाने कब पीछे आकर खड़ा हुआ था।
फरहान ने संकेत किया।
दोनों दरवाजे से थोड़ा पीछे हो गए।
कुछ मिनट बाद शबनम कमरे से निकलीं।
जैसे ही वह चली गईं, फरहान और नूर अंदर गए।
टेबल पर कुछ नहीं था।
लेकिन डस्टबिन में एक फटा हुआ लिफाफा पड़ा था।
फरहान ने दस्ताने निकाले।
नूर ने हैरानी से पूछा—
“आप जेब में दस्ताने लेकर घूमते हैं?”
“पुलिस वाला हूं।”
“मुझे लगा सिर्फ गुस्सा लेकर घूमते हैं।”
फरहान ने पहली बार हल्की हंसी छोड़ी।
तनाव के बीच नूर भी मुस्कुरा दी।
फटे लिफाफे के अंदर एक बैंक की पर्ची थी।
उसमें बड़ी रकम एस.एन. होल्डिंग्स से किसी निजी खाते में भेजी गई थी।
खाते के आखिरी चार अंक दिखाई दे रहे थे।
आरिफ ने पता लगाया।
खाता दानिश का था।
अब कड़ियां जुड़ रही थीं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल बाकी था।
शबनम ऐसा क्यों कर रही थीं?
उसका जवाब उन्हें अगले दिन मिला।
और वह जवाब सिर्फ कर्ज से जुड़ा नहीं था।
हवेली से जुड़ा था।
जमीन से।
और नूर के नाम से।
अफसान साहब के दिवंगत पिता ने वर्षों पहले अपनी संपत्ति का बंटवारा किया था।
लेकिन शहर के बाहर की बारह एकड़ जमीन कभी औपचारिक रूप से बांटी नहीं गई थी।
हाल ही में वहां से नया एक्सप्रेसवे गुजरने की योजना बनी थी।
जिसके कारण उस जमीन की कीमत अचानक कई गुना बढ़ गई थी।
पुरानी वसीयत में जमीन का बड़ा हिस्सा जीनत बेगम के बाद…
नूर के नाम था।
शबनम को शायद यह बात किसी पुराने मुंशी से पता चल गई थी।
अगर नूर की शादी दानिश से होती और परिवार आर्थिक संकट में डूबा रहता, तो जमीन बेचने का दबाव बनाना आसान था।
अब मामला साफ था।
यह रिश्ता मोहब्बत का नहीं था।
सौदे का था।
लेकिन फरहान तुरंत कार्रवाई नहीं कर सकता था।
उसे ठोस सबूत चाहिए था।
और सबूत उन्हें उम्मीद से पहले मिल गया।
मेहर की शादी से एक रात पहले दानिश हवेली आया।
नूर ने उसे बरामदे में रोक लिया।
फरहान थोड़ी दूरी पर था।
नूर ने जानबूझकर कहा—
“मैंने सोच लिया है।”
दानिश के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“मुझे पता था।”
“लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?”
“अब्बू का पूरा कर्ज खत्म।”
दानिश एक पल रुका।
फिर हंसा।
“शादी के बाद सब हमारा ही तो होगा।”
नूर ने पूछा—
“जमीन भी?”
दानिश की आंखों में क्षण भर के लिए चमक आई।
बस वही एक क्षण पर्याप्त था।
“तुम्हें जमीन के बारे में कैसे पता?”
अब दानिश समझ गया कि उससे गलती हो गई है।
नूर की आवाज ठंडी हो गई।
“तो आपको पता है।”
दानिश ने आसपास देखा।
“नूर, बातें इतनी सीधी नहीं होतीं।”
“तो समझाइए।”
“तुम्हारे पिता का बिजनेस खत्म होने वाला है। शादी के बाद मैं उसे बचा सकता हूं।”
“और बदले में?”
दानिश मुस्कुराया।
“परिवार में हिसाब कौन रखता है?”
उसी क्षण फरहान अंधेरे से सामने आया।
“पुलिस रखती है।”
दानिश का चेहरा सफेद पड़ गया।
फरहान के हाथ में मोबाइल था।
पूरी बातचीत रिकॉर्ड हो चुकी थी।
लेकिन फरहान ने उसे छुआ तक नहीं।
सिर्फ कहा—
“कल सुबह तुम्हें और तुम्हारे पिता को औपचारिक नोटिस मिलेगा।”
“तुम मुझे धमका रहे हो?”
“नहीं।”
फरहान शांत रहा।
“कानूनी प्रक्रिया बता रहा हूं।”
दानिश चला गया।
नूर कई सेकंड तक वहीं खड़ी रही।
उसके हाथ कांप रहे थे।
फरहान उसके पास आया।
“तुम ठीक हो?”
नूर ने सिर हिलाया।
फिर अचानक उसकी आंखें भर गईं।
“अगर हमें ये सब पता नहीं चलता तो?”
फरहान चुप रहा।
“अगर मैं अब्बू को बचाने के लिए हां कर देती?”
“नूर—”
“सब मुझे समझाते रहते कि अच्छी बेटी वही होती है जो घर के लिए कुर्बानी दे।”
उसकी आवाज टूट गई।
“लेकिन कोई ये क्यों नहीं पूछता कि हर कुर्बानी बेटी ही क्यों दे?”
फरहान के पास इसका कोई आसान जवाब नहीं था।
उसने सिर्फ कहा—
“तुम्हें अब कोई कुर्बानी नहीं देनी।”
नूर ने उसकी तरफ देखा।
“और अगर मैं कुछ चुनना चाहूं?”
फरहान की सांस जैसे रुक गई।
“तो चुनो।”
“आपको भी?”
फरहान स्थिर हो गया।
नूर की पलकों पर आंसू थे।
लेकिन इस बार उनमें डर नहीं था।
“वो पुराना कागज भूल जाइए।”
फरहान ने धीरे से कहा—
“भूल चुका हूं।”
“दादा अब्बा की इच्छा भी।”
“वो भी।”
“परिवार की उम्मीदें भी।”
“सब।”
नूर ने लंबी सांस ली।
“अब अगर आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं तो अपनी तरफ से कहिए।”
फरहान कुछ क्षण उसे देखता रहा।
शायद पुलिस पूछताछ में उसने हजारों सवाल किए होंगे।
शायद अपराधियों के सामने कभी उसकी आवाज नहीं कांपी होगी।
लेकिन उस रात पहली बार इंस्पेक्टर फरहान को शब्द ढूंढने पड़े।
“मैं तुम्हें पसंद करता हूं।”
नूर की आंखें थोड़ी बड़ी हुईं।
फरहान ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“शायद ‘पसंद’ बहुत छोटा शब्द है।”
नूर के होंठों पर मुस्कान आ गई।
“पुलिस वाले रोमांस में इतने कमजोर होते हैं?”
“तुम्हारे सामने पहली बार कोशिश कर रहा हूं।”
“अच्छा?”
“मैं तुम्हें उस दिन से अलग नजर से देखने लगा था जब कॉलेज के बाहर तुम्हें एक घायल बच्ची को अस्पताल पहुंचाते देखा था।”
नूर चौंकी।
“वो दो साल पहले की बात है।”
“हां।”
“आप वहां थे?”
“ड्यूटी पर।”
“आपने बताया क्यों नहीं?”
“मैंने बहुत कुछ नहीं बताया।”
नूर ने भौंह उठाई।
फरहान तुरंत बोला—
“और वो मेरी सबसे बड़ी गलती रही।”
नूर हंस पड़ी।
फरहान का चेहरा गंभीर हुआ।
“मैं तुम्हें इसलिए नहीं चाहता क्योंकि किसी कागज पर हमारा नाम साथ लिखा है।”
उसने थोड़ा रुककर कहा—
“मैं चाहता हूं कि अगर कभी मेरा नाम तुम्हारी जिंदगी के साथ लिखा जाए तो तुम्हारी मर्जी से लिखा जाए।”
नूर की आंखें फिर भर आईं।
लेकिन इस बार उसका आंसू गिरने से पहले वह मुस्कुरा दी।
“मुझे सोचने के लिए समय चाहिए।”
फरहान ने सिर हिलाया।
“जितना चाहो।”
“और तब तक कोई हुकुम नहीं।”
“जी।”
“कोई बेवजह डांट नहीं।”
“कोशिश करूंगा।”
“कोशिश?”
“नौकरी का असर है।”
नूर हंस पड़ी।
उसी समय पीछे से मेहर की आवाज आई—
“अच्छा! यहां मीटिंग चल रही है?”
दोनों एक साथ पीछे हटे।
मेहर हाथ कमर पर रखे खड़ी थी।
“पूरा घर तुम्हें ढूंढ रहा है और तुम दोनों यहां कानून और संविधान बना रहे हो?”
नूर का चेहरा लाल हो गया।
फरहान ने गला साफ किया।
“मैं जा रहा हूं।”
मेहर बोली—
“हां, इंस्पेक्टर साहब। वरना मैं अभी सबको बुला लूंगी।”
फरहान चला गया।
मेहर तुरंत नूर के पास आई।
“क्या कहा?”
“कुछ नहीं।”
“तुम्हारा चेहरा बता रहा है बहुत कुछ कहा।”
नूर ने उसे धक्का दिया।
दोनों हंस पड़ीं।
लेकिन अगली सुबह हवेली की खुशी एक बार फिर थम गई।
शबनम गायब थीं।
उनके कमरे की अलमारी खुली थी।
कुछ कपड़े नहीं थे।
और एस.एन. होल्डिंग्स से जुड़े कई कागज भी गायब थे।
फरहान ने तुरंत थाने को सूचना दी।
करीब तीन घंटे बाद खबर आई—
शबनम शहर छोड़ने की कोशिश करते हुए बस अड्डे पर मिल गई थीं।
लेकिन कहानी में अभी एक और मोड़ बाकी था।
पूछताछ में शबनम रो पड़ीं।
उन्होंने स्वीकार किया कि दानिश के पिता ने उन्हें पैसे का लालच दिया था।
लेकिन उन्होंने एक और बात कही—
“ये योजना मेरी नहीं थी।”
फरहान रुक गया।
“तो किसकी थी?”
शबनम ने एक नाम बताया।
और फरहान की आंखों का रंग बदल गया।
हाजी सलीम।
वही आदमी जो पिछले बीस वर्षों से परिवार की जमीन और संपत्ति के कागज संभालता आया था।
वही जिसे सब घर का वफादार मुंशी मानते थे।
और सबसे खतरनाक बात—
उसी ने फरहान को वह पुराना पीला कागज दिया था जिसे सब दादा अब्बा की लिखी पारिवारिक इच्छा समझ रहे थे।
फरहान तुरंत हवेली लौटा।
उसने पुराना दस्तावेज फिर निकाला।
वकील आरिफ ने पहली बार उसे विस्तार से जांचा।
स्याही।
कागज।
हस्ताक्षर।
सबका मिलान हुआ।
दो घंटे बाद रिपोर्ट सामने थी।
फरहान के हाथ ठंडे पड़ गए।
दादा अब्बा के हस्ताक्षर असली थे।
लेकिन नीचे जो अतिरिक्त पंक्ति लिखी थी—
जिसमें नूर और फरहान का रिश्ता तय करने की बात थी—
वह बाद में जोड़ी गई थी।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
नूर ने धीरे से पूछा—
“मतलब?”
आरिफ ने कहा—
“मूल दस्तावेज संपत्ति के बंटवारे के बारे में था।”
“और हमारे रिश्ते वाली बात?”
“बाद में लिखी गई।”
नूर के पैरों तले जमीन खिसक गई।
फरहान ने तुरंत कहा—
“तो किसी ने जानबूझकर हमें गलत बात बताई।”
आरिफ ने सिर हिलाया।
“और संभव है उद्देश्य संपत्ति से जुड़ा हो।”
अब सबकी नजर उस जमीन पर थी जो नूर के नाम आने वाली थी।
पुराने दस्तावेज में एक शर्त थी।
अगर नूर की शादी परिवार द्वारा चुने गए वारिस से होती, तो जमीन का प्रबंधन संयुक्त ट्रस्ट के पास जाता।
फर्जी पंक्ति शायद उसी शर्त को दूसरी दिशा देने के लिए बनाई गई थी।
जीनत बेगम कुर्सी पर बैठ गईं।
“इतने साल से कोई हमारे बच्चों की जिंदगी को कागजों से चला रहा था?”
नूर की आंखें भर आईं।
उसने फरहान की तरफ देखा।
फरहान ने कागज दोनों हाथों से पकड़ रखा था।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं…
अपराधबोध था।
“मैंने इसी कागज के कारण तुम्हें सच बताने में देर की।”
नूर ने कहा—
“आपको पता नहीं था कि ये नकली हिस्सा है।”
“फिर भी।”
उसने कागज मेज पर रख दिया।
“अगर मैंने पहले जांच करवाई होती—”
नूर ने उसे रोक दिया।
“हर गलती का बोझ अकेले मत उठाइए।”
फरहान ने उसकी तरफ देखा।
नूर ने पहली बार बिना झिझक उसका हाथ पकड़ लिया।
“अब सच हमारे सामने है।”
फरहान की उंगलियां धीरे से उसकी उंगलियों के चारों ओर बंद हो गईं।
उस शाम हाजी सलीम गिरफ्तार हो गया।
उसके घर से कई पुराने दस्तावेज मिले।
फर्जी मोहरें।
बैंक रिकॉर्ड।
और जमीन खरीदने वाली कंपनियों से जुड़े समझौते।
दानिश और उसके पिता पर आर्थिक दबाव और दस्तावेजी धोखाधड़ी की जांच शुरू हुई।
अफसान साहब की फैक्ट्री का कर्ज अदालत के आदेश तक रोक दिया गया।
जिस संकट के नाम पर नूर को अपनी जिंदगी का फैसला करने पर मजबूर किया जा रहा था, उसका सच सबके सामने आ गया।
मगर नूर के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात संपत्ति नहीं थी।
उस रात वह अपनी मां के पास बैठी थी।
जीनत बेगम ने उसके बाल सहलाते हुए कहा—
“बेटी, मुझे माफ कर देना।”
“किसलिए?”
“मैंने तुझे मजबूत समझकर कई बार तेरी खामोशी को नजरअंदाज किया।”
नूर की आंखें भर आईं।
“अम्मी…”
“मजबूत बच्चियों को भी मां की जरूरत होती है।”
बस इतना सुनना था।
नूर अपनी मां के गले लगकर रो पड़ी।
वर्षों का दबा दर्द बाहर आता गया।
शबनम के ताने।
लोगों की अपेक्षाएं।
पिता की परेशानी।
दानिश का दबाव।
पुराना झूठा कागज।
सब कुछ।
जीनत बेगम उसे पकड़े रहीं।
“तेरी जिंदगी तेरी है।”
उन्होंने उसके माथे को चूमा।
“और जिस दिन तू शादी करे… सिर्फ वहां करना जहां तुझे सम्मान मिले।”
अगले दिन मेहर की शादी थी।
हवेली फिर रोशनी में नहा गई।
इस बार नूर ने लाल की जगह गहरा हरा लिबास चुना।
उसने आईने में खुद को देखा।
कई दिनों बाद उसे अपना चेहरा हल्का लगा।
नीचे आंगन में मेहर दुल्हन बनी बैठी थी।
ढोलक बज रही थी।
हंसी गूंज रही थी।
तभी फरहान आया।
लेकिन इस बार ना वर्दी थी।
ना पुलिस वाला रौब।
सफेद कुर्ता।
गहरी नीली जैकेट।
और हाथ में छोटा-सा डिब्बा।
नूर ने दूर से उसे देखा।
उसका दिल तेज धड़का।
मेहर की रुखसती के बाद रात गहरी हो चुकी थी।
मेहमान धीरे-धीरे कम हो रहे थे।
नूर छत पर चली गई।
कुछ मिनट बाद पीछे से आवाज आई—
“मैं आ सकता हूं?”
नूर पलटी।
फरहान दरवाजे पर खड़ा था।
नूर मुस्कुराई।
“आप पहली बार अनुमति मांग रहे हैं।”
“सीख रहा हूं।”
“आ जाइए।”
फरहान उसके पास आया।
कुछ क्षण दोनों छत की दीवार के पास खड़े नीचे जगमगाती हवेली देखते रहे।
फिर फरहान ने डिब्बा आगे किया।
नूर ने भौंह उठाई।
“ये क्या है?”
“पहले खोलो।”
अंदर अंगूठी नहीं थी।
एक छोटी-सी चाबी थी।
नूर उलझ गई।
“ये?”
“तुम्हारे नाम से एक जगह किराए पर ली है।”
“क्या?”
“घबराओ मत।”
फरहान हंस पड़ा।
“तुमने कई बार कहा था कि शादी के बाद भी अपना डिजाइन स्टूडियो खोलना चाहती हो।”
नूर की आंखें फैल गईं।
“आपको याद है?”
“तुम्हारी कही बहुत बातें याद हैं।”
“लेकिन ये जगह—”
“सिर्फ छह महीने का किराया मैंने दिया है।”
फरहान तुरंत बोला—
“उसके बाद बिजनेस तुम्हारा, फैसला तुम्हारा, मेहनत तुम्हारी।”
नूर की आंखों में आंसू चमकने लगे।
“आपको लगा अंगूठी से ज्यादा मुझे चाबी पसंद आएगी?”
“मुझे लगा तुम्हें पहले अपना सपना चाहिए।”
“और रिश्ता?”
फरहान ने उसकी तरफ देखा।
“वो तभी जब तुम चाहो।”
नूर काफी देर तक चाबी को देखती रही।
फिर उसने अचानक पूछा—
“अगर मैं मना कर दूं तो?”
फरहान की आंखों में हल्का दर्द आया।
लेकिन आवाज स्थिर रही।
“दुकान फिर भी तुम्हारी रहेगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि किसी की मदद करना शादी का सौदा नहीं होना चाहिए।”
नूर का गला भर आया।
वह कुछ कदम आगे बढ़ी।
“फरहान।”
“हां?”
“मैंने सोच लिया है।”
फरहान बिल्कुल स्थिर हो गया।
नूर ने उसकी आंखों में देखा।
“मुझे पुराने कागज वाला रिश्ता नहीं चाहिए।”
फरहान की आंखों में एक क्षण के लिए दर्द चमका।
फिर उसने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
वह पीछे हटने लगा।
नूर मुस्कुरा दी।
“पूरी बात तो सुन लीजिए, इंस्पेक्टर साहब।”
फरहान रुक गया।
“मुझे दादा अब्बा की इच्छा वाला रिश्ता नहीं चाहिए।”
वह धीरे-धीरे उसके करीब आई।
“मुझे ऐसा रिश्ता चाहिए जिसे हम दोनों खुद चुनें।”
फरहान की सांस अटक गई।
नूर की आंखें नम थीं।
“जिसमें आप मुझे रोकने से पहले पूछें।”
“वादा।”
“गुस्सा आए तो पुलिस की धाराएं ना सुनाएं।”
फरहान हंस पड़ा।
“कोशिश—”
नूर ने आंखें तरेरीं।
“वादा।”
“वादा।”
“मेरे काम को कभी छोटा ना समझें।”
“कभी नहीं।”
“और गायब हों तो कम से कम एक मैसेज।”
“ये सबसे कठिन शर्त है।”
नूर ने मुंह फेर लिया।
फरहान तुरंत बोला—
“मजाक था। वादा।”
नूर हंस पड़ी।
कुछ पल बाद उसने अपनी हथेली आगे की।
“तो फिर… शुरुआत दोबारा करते हैं।”
फरहान ने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं फरहान।”
नूर मुस्कुराई।
“मैं नूर।”
“क्या आप मेरे साथ जिंदगी बिताने के बारे में सोचेंगी?”
नूर ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया।
“देखते हैं।”
फरहान ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
नूर खिलखिला पड़ी।
“हां।”
नीचे अचानक पटाखे की आवाज हुई।
दोनों चौंके।
फिर एक-दूसरे को देखकर हंस पड़े।
तीन महीने बाद नूर का छोटा डिजाइन स्टूडियो खुल गया।
नाम उसने रखा—
नूर क्रिएशंस।
पहले महीने सिर्फ छह ऑर्डर आए।
दूसरे महीने पंद्रह।
छठे महीने तक उसे दो लड़कियों को काम पर रखना पड़ा।
फरहान कभी-कभी शाम को आता।
एक कोने में बैठकर चाय पीता।
और हर बार नूर उसे चेतावनी देती—
“ग्राहकों को पुलिस वाली नजर से मत देखिए।”
वह जवाब देता—
“मेरी नजर सामान्य है।”
“आपकी सामान्य नजर में भी लोग अपना आधार कार्ड निकालने लगते हैं।”
फरहान हंस देता।
उनका रिश्ता अब पहले जैसा नहीं था।
उसमें आकर्षण था।
तकरार थी।
नूर की जिद थी।
फरहान का अनुशासन था।
लेकिन एक चीज बदल चुकी थी—
अब दोनों एक-दूसरे से बात करते थे।
फैसले साझा करते थे।
गलती होने पर माफी मांगते थे।
और शायद पहली बार समझ रहे थे कि मोहब्बत किसी पर अधिकार पाने का नाम नहीं।
किसी के साथ खड़े होने का नाम है।
छह महीने बाद एक साधारण पारिवारिक समारोह में फरहान ने नूर से बाकायदा रिश्ता मांगा।
कोई पुराना कागज सामने नहीं रखा गया।
कोई वसीयत नहीं पढ़ी गई।
सबके सामने सिर्फ एक सवाल पूछा गया—
“नूर, क्या तुम अपनी मर्जी से इस रिश्ते के लिए तैयार हो?”
नूर ने फरहान की तरफ देखा।
वह वही आदमी था जिससे कभी वह डरती थी।
जिस पर कभी नाराज हुई थी।
जिसे कभी “बहुत बुरा” कहा था।
और फिर उसी आदमी को उसने बदलते देखा था।
अपना अहंकार छोड़ते।
अपनी गलती स्वीकारते।
उसके सपनों के लिए जगह बनाते।
नूर की आंखें भर आईं।
उसने मुस्कुराकर कहा—
“कुबूल है।”
कुछ महीनों बाद उनकी शादी हो गई।
जीनत बेगम रोईं।
अफसान साहब ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।
मेहर ने नूर के कान में कहा—
“देखा? कानून वाले को आखिर तुमने ही सीधा किया।”
नूर हंसते-हंसते रो पड़ी।
फरहान ने दूर से पूछा—
“क्या शिकायत हो रही है?”
दोनों बहनों ने एक साथ कहा—
“आपसे मतलब?”
पूरा कमरा हंसी से भर गया।
शादी के बाद भी नूर ने अपना स्टूडियो बंद नहीं किया।
फरहान ने भी कभी नहीं कहा।
कई बार उसकी रात की ड्यूटी होती।
कई बार नूर देर तक डिजाइन बनाती।
कभी नाश्ता जल जाता।
कभी फरहान अपनी चाबी थाने में भूल आता।
कभी दोनों छोटी बात पर नाराज हो जाते।
लेकिन अब दरवाजे पटककर खामोश रहने की बजाय बात होती थी।
एक रविवार सुबह फरहान अठारह घंटे की ड्यूटी करके घर लौटा।
उसने देखा कि लाउंज में उसकी मां और नूर बैठी चाट खा रही थीं।
टेबल पर बिरयानी थी।
रसोई बिल्कुल साफ।
फरहान ने टोपी उतारते हुए पूछा—
“नाश्ता?”
उसकी मां ने कहा—
“आज छुट्टी है।”
“मेरी नहीं है।”
नूर ने चम्मच उठाते हुए कहा—
“तो आपके लिए फ्रिज में उबले अंडे हैं।”
फरहान ने उसे घूरा।
नूर बिल्कुल नहीं डरी।
“क्या?”
“कुछ नहीं।”
वह पास आया।
धीरे से बोला—
“शादी से पहले कितना डरती थीं आप मुझसे।”
नूर मुस्कुराई।
“तब मुझे आपके बारे में गलतफहमी थी।”
“क्या?”
“मुझे लगता था घर में आपकी सरकार चलेगी।”
फरहान की मां जोर से हंस पड़ीं।
“अब पता चल गया?”
नूर ने गर्व से कहा—
“बिल्कुल।”
फरहान ने सिर हिलाया।
“दोनों ने मिलकर मेरा थाना घर में खोल रखा है।”
तीनों हंस पड़े।
ऐसा लग रहा था कि आखिरकार कहानी को उसका सुखद अंत मिल गया है।
लेकिन उसी दोपहर…
दरवाजे की घंटी बजी।
फरहान ने दरवाजा खोला।
बाहर वकील आरिफ खड़ा था।
उसके चेहरे पर चिंता थी।
हाथ में एक पुराना भूरे रंग का लिफाफा।
“तुम्हें अभी मेरे साथ बैठना होगा।”
फरहान की मुस्कान गायब हो गई।
“क्या हुआ?”
आरिफ अंदर आया।
नूर भी लाउंज में आ गई।
“जिस हाजी सलीम ने पुराने दस्तावेज में जालसाजी की थी… उसकी चीजों की अंतिम जांच पूरी हुई है।”
उसने लिफाफा मेज पर रखा।
“ये एक बैंक लॉकर से मिला।”
फरहान ने लिफाफे की सील तोड़ी।
अंदर तीन चीजें थीं।
एक पुरानी तस्वीर।
एक बैंक पासबुक।
और हाथ से लिखा पत्र।
तस्वीर देखते ही फरहान की मां के हाथ से चाय का कप छूट गया।
“ये…”
उनकी आवाज कांप गई।
नूर ने तस्वीर उठाई।
उसमें दादा अब्बा के साथ एक जवान आदमी खड़ा था।
चेहरा कुछ हद तक फरहान जैसा।
पीछे तारीख लिखी थी—
17 अक्टूबर 1998।
फरहान ने मां की तरफ देखा।
“अम्मी… ये कौन है?”
उनकी आंखों में आंसू भर गए।
“तुम्हारे अब्बू।”
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे समय रुक गया हो।
फरहान के पिता को परिवार वर्षों से मृत मानता था।
आरिफ ने धीरे से कहा—
“तस्वीर सबसे बड़ी बात नहीं है।”
उसने पत्र फरहान को दिया।
पत्र की पहली पंक्ति पढ़ते ही फरहान का चेहरा सफेद पड़ गया।
नूर तुरंत उसके पास आई।
“क्या लिखा है?”
फरहान की उंगलियां कांप रही थीं।
उसने पत्र नूर को दे दिया।
नूर ने पढ़ा—
अगर यह खत फरहान तक पहुंच रहा है, तो इसका मतलब है कि सलीम अब सच छिपाने की स्थिति में नहीं है। मैं मरा नहीं था। मुझे परिवार से दूर किया गया था। और नूर के नाम जो जमीन छोड़ी गई है, उसके नीचे सिर्फ दौलत नहीं… वह सबूत है जिसके कारण मुझे गायब होना पड़ा।
नूर की सांस थम गई।
नीचे अगली पंक्ति थी—
फरहान, अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो किसी पर भरोसा मत करना। परिवार के भीतर एक व्यक्ति आज भी सलीम से ज्यादा खतरनाक है।
उसी क्षण बाहर एक कार आकर रुकी।
फरहान ने खिड़की से देखा।
काले रंग की पुरानी कार।
दरवाजा खुला।
लगभग साठ वर्ष का एक आदमी धीरे-धीरे बाहर उतरा।
फरहान की मां खिड़की तक पहुंचीं।
आदमी का चेहरा देखते ही उनके होंठ कांपने लगे।
“या अल्लाह…”
फरहान ने पूछा—
“कौन है?”
उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
“तुम्हारे अब्बू।”
दरवाजे पर दस्तक हुई।
नूर ने फरहान का हाथ पकड़ लिया।
फरहान ने धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए।
जिस पिता की कब्र पर वह हर साल फूल रखता आया था…
वही आदमी उस दरवाजे के दूसरी तरफ खड़ा था।
लेकिन असली सवाल यह नहीं था कि वह जिंदा कैसे था।
असली सवाल था—
अगर फरहान के पिता इतने वर्षों से जिंदा थे…
तो उनकी मौत की झूठी कहानी किसने बनाई?
नूर की जमीन के नीचे ऐसा कौन-सा सबूत दबा था जिसके लिए दो परिवारों की जिंदगी बीस साल तक झूठ में रखी गई?
और सबसे खतरनाक बात…
उस पुराने पत्र में लिखा “परिवार के भीतर का व्यक्ति” आखिर कौन था?
फरहान का हाथ दरवाजे के हैंडल पर पहुंचा।
दूसरी तरफ से फिर दस्तक हुई।
इस बार थोड़ी तेज।
और जैसे ही फरहान ने दरवाजा खोला…
बाहर खड़े आदमी ने उसे देखते ही सिर्फ एक वाक्य कहा—
“दरवाजा बंद करो, बेटा… क्योंकि जिसने मुझे बीस साल पहले मरवाने की कोशिश की थी, उसे पता चल चुका है कि मैं वापस आ गया हूं।”
नूर की उंगलियां फरहान के हाथ पर कस गईं।
और उसी पल उन्हें समझ आ गया—
उनकी मोहब्बत की कहानी खत्म नहीं हुई थी।
शायद असली कहानी तो अब शुरू हुई थी।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।