मासूम मोहब्बत | एक मासूम बच्ची ने कठोर अरबपति बॉस को पापा कहा, फिर आधी रात खुले राज़ ने सबकी ज़िंदगी बदल दी

मासूम मोहब्बत | एक मासूम बच्ची ने कठोर अरबपति बॉस को पापा कहा, फिर आधी रात खुले राज़ ने सबकी ज़िंदगी बदल दी
मल्होत्रा प्राइम ग्रुप की चौबीसवीं मंज़िल पर उस दोपहर इतनी खामोशी थी कि एयर कंडीशनर की धीमी आवाज़ भी किसी चेतावनी जैसी लग रही थी।
लंबी काँच की मेज़ के एक सिरे पर हर्ष मल्होत्रा बैठा था।
सफेद शर्ट की आस्तीनें कोहनी तक मुड़ी हुई थीं।
कलाई पर भारी घड़ी।
चेहरे पर वही कठोरता जिसके बारे में पूरे कॉर्पोरेट जगत में कहानियाँ मशहूर थीं।
उसके सामने विदेश से आए तीन निवेशक बैठे थे और स्क्रीन पर सैकड़ों करोड़ की एक डील का अंतिम प्रेज़ेंटेशन चल रहा था।
हर्ष ने लेज़र पॉइंटर उठाया।
“अगर सेक्शन डी का स्ट्रक्चरल रिवीजन आज शाम तक—”
तभी उसकी बात बीच में रुक गई।
किसी ने उसकी पैंट का किनारा पकड़कर हल्के से खींचा था।
कमरे में बैठे सभी लोगों के चेहरे सफेद पड़ गए।
हर्ष ने धीरे-धीरे नीचे देखा।
उसके चमकते काले जूतों के पास पाँच साल की एक बच्ची खड़ी थी।
दो छोटी चोटियाँ।
गोल गाल।
हाथ में लाल रंग की मोम पेंसिल।
और आँखों में ऐसा बेखौफ भोलापन मानो सामने शहर का सबसे डरावना बिजनेसमैन नहीं, मोहल्ले का कोई परिचित अंकल खड़ा हो।
बच्ची ने फिर उसकी पैंट खींची।
“बड़े अंकल…”
हर्ष की भौंह तन गई।
“मुझे गोदी चाहिए।”
टेबल के दूसरी ओर बैठे निवेशक लगभग साँस लेना भूल गए।
कंपनी में लोगों ने कर्मचारियों को हर्ष की एक ठंडी नज़र से काँपते देखा था।
उसने एक बार सिर्फ इसलिए पूरी मीटिंग रद्द कर दी थी क्योंकि किसी का फोन तीन बार वाइब्रेट हुआ था।
और आज…
एक अनजान बच्ची उसकी करोड़ों की बैठक के बीच खड़ी उससे गोद माँग रही थी।
काँच के दरवाज़े के बाहर से किसी महिला के तेज कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
“अनु!”
दरवाज़ा खुला।
अनिका जोशी वहीं जम गई।
उसकी साँस जैसे गले में अटक गई थी।
दो महीने पहले ही उसने मल्होत्रा प्राइम में जूनियर ड्राफ्ट्समैन की नौकरी शुरू की थी।
साधारण नौकरी।
साधारण वेतन।
लेकिन उसके लिए वही वेतन उसकी और उसकी बेटी की पूरी दुनिया था।
आज बच्ची की आया अचानक बीमार पड़ गई थी।
मजबूरी में अनिका अनु को ऑफिस लाई थी।
उसने रंग भरने की किताब और कुछ खिलौने देकर उसे अपने क्यूबिकल में बिठाया था।
बस दस मिनट के लिए उसका ध्यान फाइलों में क्या गया, अनु गायब हो गई।
और अब वह सीधे उस इंसान के सामने खड़ी थी जिसकी एक शिकायत अनिका की नौकरी छीन सकती थी।
“सर… मैं… मैं माफ़ी चाहती हूँ…”
अनिका तेजी से आगे बढ़ी।
हर्ष ने सिर्फ एक उँगली उठाई।
“वहीं रुकिए।”
अनिका के कदम जम गए।
हर्ष ने दोबारा बच्ची को देखा।
“गोद में क्यों बैठना है?”
अनु ने स्क्रीन की ओर इशारा किया।
“वो घर देखना है।”
“वो घर नहीं है।”
“तो क्या है?”
कमरे में बैठे एक निवेशक ने होंठ दबाकर हँसी रोकने की कोशिश की।
हर्ष ने उसे ऐसी नज़र से देखा कि उसकी मुस्कान उसी पल गायब हो गई।
फिर वह थोड़ा झुका।
और अगले ही क्षण ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
हर्ष मल्होत्रा ने अनु को अपनी बाँहों में उठाकर गोद में बैठा लिया।
अनिका की आँखें फैल गईं।
पूरा कमरा स्तब्ध था।
अनु स्क्रीन देखने लगी।
“बड़े अंकल, ये तो चिड़िया का पिंजरा लगता है।”
हर्ष ने पहली बार गौर से ड्रॉइंग देखी।
फिर निवेशकों की तरफ मुड़कर बोला,
“वह ग्लास एट्रियम है।”
अनु ने तुरंत कहा,
“पर चिड़िया वाला अच्छा है।”
इस बार कमरे में दबे हुए ठहाके गूँज गए।
हर्ष के चेहरे पर मुस्कान नहीं आई।
लेकिन उसकी आँखों की कठोरता एक पल के लिए जरूर पिघली।
उसने अनु को एक हाथ से संभाले रखा और उसी गंभीर आवाज़ में प्रेज़ेंटेशन पूरा कर दिया।
“बाकी संशोधन शाम पाँच बजे तक। मीटिंग समाप्त।”
लोग इतनी जल्दी अपने लैपटॉप समेटकर निकले मानो किसी चमत्कार के गवाह बनकर भाग रहे हों।
अब कमरे में सिर्फ हर्ष, अनिका और अनु थे।
हर्ष ने फोन पर एक कार्टून लगा दिया और अनु को कुर्सी पर बैठा दिया।
फिर अनिका की तरफ बढ़ा।
हर कदम के साथ अनिका का दिल तेज धड़कने लगा।
“मिस जोशी।”
“जी… सर।”
“मैं कौन हूँ?”
अनिका ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“सर?”
“सवाल मुश्किल था?”
“नहीं। आप… कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। मेरे बॉस।”
हर्ष ने बिना भाव बदले कहा,
“मुझे लगा शायद इस फ्लोर का नया बेबीसिटर हूँ।”
वह वाक्य हल्का था।
लेकिन अनिका के आत्मसम्मान पर चुभ गया।
उसने तुरंत आँखें झुका लीं।
“मुझे माफ़ कर दीजिए। दोबारा ऐसा नहीं होगा।”
“आपका प्रेज़ेंटेशन?”
“तैयार है।”
“लेकर आइए।”
अनिका मुड़ी।
कुछ मिनट बाद जब वह फाइल लेकर लौटी तो उसके हाथ हल्के काँप रहे थे।
“सर, मैं वादा करती हूँ अनु अब—”
हर्ष ने फाइल लेते हुए बेरुखी से कहा,
“अगर आपके पति आपको नौकरी करने भेजते हैं तो उन्हें बच्ची की ज़िम्मेदारी भी उठानी चाहिए। ऑफिस डे-केयर नहीं है।”
कमरे की हवा अचानक बदल गई।
अनिका का चेहरा स्थिर हो गया।
अभी तक उसकी आवाज़ में डर था।
अब नहीं।
उसने हर्ष की आँखों में सीधा देखा।
“अनु के पिता हमारे साथ नहीं हैं, मिस्टर मल्होत्रा।”
हर्ष का हाथ फाइल पर ठहर गया।
अनिका की आवाज़ धीमी थी।
“वह हमें बहुत पहले छोड़कर जा चुके हैं।”
कुछ पल कोई नहीं बोला।
अनिका की आँखों में आँसू नहीं थे।
शायद आँसू बहुत पहले खत्म हो चुके थे।
वहाँ सिर्फ ऐसा सूनापन था जो किसी एक रात में पैदा नहीं होता।
वर्षों का अकेलापन था।
हर्ष ने पहली बार उस महिला को कर्मचारी की तरह नहीं देखा।
एक इंसान की तरह देखा।
“फाइल यहीं छोड़ दीजिए।”
उसकी आवाज़ पहले जैसी कठोर नहीं रही।
“और बच्ची को लेकर अपने डेस्क पर जाइए।”
अनिका ने अनु का हाथ पकड़ा।
दरवाज़े तक पहुँची ही थी कि अनु पीछे मुड़ी।
“बाय, बड़े अंकल!”
हर्ष ने जवाब नहीं दिया।
बस उसे जाते देखता रहा।
कॉरिडोर में पहुँचते ही अनु खिलखिलाई।
“मम्मा, बड़े अंकल अच्छे हैं।”
अनिका ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह नहीं जानती थी कि काँच की दीवार के दूसरी तरफ खड़ा हर्ष अब भी उसी दिशा में देख रहा था।
उस रात से एक रात पहले अनिका के छोटे से किराए के फ्लैट में जो हुआ था, उसकी दहशत अभी उसके शरीर में बाकी थी।
वह रसोई में दाल चढ़ा रही थी जब दरवाज़ा जोर से खटखटाया गया।
सामने विक्रांत खड़ा था।
इमारत का केयरटेकर।
दूर का रिश्तेदार भी।
और पिछले कुछ महीनों से अनिका के लिए मुसीबत बन चुका एक ऐसा आदमी जो उसकी मजबूरी को कमजोरी समझ बैठा था।
“इतनी रात को क्यों आए हैं?”
अनिका ने दरवाज़े की चेन नहीं खोली।
विक्रांत मुस्कुराया।
“किराया लेने आया हूँ।”
“किराया तीन दिन पहले दे चुकी हूँ।”
“किराए के अलावा भी बातें होती हैं।”
उसकी नज़र अनिका को भीतर तक असहज कर रही थी।
अनिका ने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की।
विक्रांत ने पाँव आगे कर दिया।
“इतना घमंड किस बात का है? शहर में अकेली औरत हो। ऊपर से बच्ची। कोई आदमी सिर पर हाथ रख दे तो जिंदगी आसान हो जाएगी।”
अनिका की उँगलियाँ काँपीं।
“अपना पाँव हटाइए।”
“मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ।”
“मुझे आपकी मदद नहीं चाहिए।”
विक्रांत ने आगे बढ़कर उसके कंधे को छूना चाहा।
अगले ही पल एक तेज थप्पड़ की आवाज़ गलियारे में गूँज गई।
अनिका की हथेली लाल थी।
विक्रांत का चेहरा भी।
“दोबारा मेरे करीब आने की कोशिश की तो पुलिस बुलाऊँगी।”
विक्रांत कुछ सेकंड उसे घूरता रहा।
फिर होंठों पर जहरीली मुस्कान फैल गई।
“बहुत अकड़ है।”
उसने धीमे से कहा,
“देखता हूँ कब तक बचाती हो खुद को… और अपनी बच्ची को।”
उस रात अनिका ने एक पल भी चैन से नहीं सोया था।
और आज ऑफिस में हर्ष के एक कठोर वाक्य ने वही घाव खोल दिया था।
दोपहर ढलती रही।
अनिका लैपटॉप पर काम करती रही।
अनु पास बैठी चित्र बना रही थी।
कुछ देर बाद बच्ची ने गर्दन उठाकर सामने वाले काँच के केबिन की ओर देखा।
अंदर हर्ष अपने सहयोगी रोहित के साथ फाइल देख रहा था।
अनु के चेहरे पर चमक आई।
उसने अपनी ड्रॉइंग बुक उठाई।
और दबे कदमों से निकल गई।
हर्ष ने दरवाज़े पर हल्की आहट सुनी।
“रोहित, कल सुबह तक—”
वह रुक गया।
अनु दरवाज़े पर खड़ी थी।
“नमस्ते बड़े अंकल।”
रोहित ने हैरानी से बच्ची को देखा।
“ये फिर…”
“रहने दो।”
हर्ष की आवाज़ आई।
अनु टेबल तक पहुँची।
“मैं खेलने नहीं आई।”
“तो?”
“थैंक यू बोलने आई हूँ।”
उसने ड्रॉइंग बुक खोलकर एक चित्र हर्ष के सामने कर दिया।
चित्र में एक लंबा आदमी था।
बड़ी घड़ी।
काला ट्राउजर।
सफेद शर्ट।
और इतने बड़े कान कि रोहित हँसी नहीं रोक पाया।
“सर, बिल्कुल आप हैं।”
हर्ष ने उसे घूरा।
फिर चित्र को देखा।
“मेरे कान इतने बड़े हैं?”
अनु ने गंभीरता से सिर हिलाया।
“तभी तो आप सबकी बात सुन लेते हो।”
रोहित फिर हँस पड़ा।
इस बार हर्ष के होंठों के किनारे भी हल्के से उठ गए।
“और ये क्यों बनाया?”
“क्योंकि आप अच्छे वाले अंकल हो।”
चार शब्द।
बस चार शब्द।
लेकिन जाने क्यों वे हर्ष के सीने में बहुत गहरे उतर गए।
बचपन से उसने लोगों को उसे ताकतवर, जिद्दी, बेरहम और घमंडी कहते सुना था।
“अच्छा” शायद पहली बार किसी ने कहा था।
उसने अगला पन्ना पलटा।
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
कागज़ पर एक काला चेहरा बना था।
उसके सामने एक छोटी बच्ची रो रही थी।
पास एक टूटा दरवाज़ा।
हर्ष की उँगलियाँ रुक गईं।
“ये कौन है?”
अनु की मुस्कान गायब हो गई।
“गंदे अंकल।”
हर्ष थोड़ा आगे झुका।
“कौन?”
अनु ने आवाज़ धीमी कर ली।
“रात को आते हैं।”
हर्ष की आँखों में ठंड उतर आई।
“कहाँ?”
“हमारे घर।”
“क्या करते हैं?”
अनु होंठ भींचकर बोली,
“दरवाज़ा पीटते हैं। मम्मा को डराते हैं। कल मम्मा ने उनको मारा था। फिर मम्मा पूरी रात नहीं सोई।”
हर्ष की मुट्ठी टेबल पर कस गई।
“मम्मा ने तुम्हें क्या कहा?”
“कहा किसी को मत बताना।”
फिर अनु ने मासूमियत से पूछा,
“आप किसी को बताओगे?”
हर्ष कुछ पल उसे देखता रहा।
“नहीं।”
उसने रोहित की ओर देखा।
बस एक नज़र।
रोहित समझ गया कि मामला गंभीर है।
“मिस जोशी का पता, मकान मालिक, केयरटेकर, आसपास का थाना… एक घंटे में सारी जानकारी चाहिए।”
“सर?”
“एक घंटे में।”
अनु उसी समय बोली,
“मम्मा को मत डाँटना।”
हर्ष ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं डाँटूँगा।”
“प्रॉमिस?”
पहली बार हर्ष मल्होत्रा ने किसी बिजनेस डील से बाहर किसी बच्चे से वादा किया।
“प्रॉमिस।”
करीब एक घंटे बाद रिपोर्ट उसके टेबल पर थी।
विक्रांत का नाम पढ़ते ही हर्ष की आँखें सिकुड़ गईं।
स्थानीय स्तर पर कई शिकायतें।
लेकिन कोई औपचारिक केस नहीं।
किराएदारों को धमकाना।
महिलाओं से बदसलूकी की शिकायतें।
एक स्थानीय पुलिसकर्मी से नजदीकी।
हर्ष ने फोन उठाया।
“समीर।”
दूसरी ओर उसका पुराना दोस्त और कानूनी सलाहकार था।
“एक महिला कर्मचारी को सुरक्षा चाहिए।”
“पुलिस?”
“पुलिस भी। लेकिन पहले यह पता लगाओ कि लोकल चौकी में विक्रांत का आदमी कौन है।”
“हर्ष, ये किसकी बात—”
“अभी सवाल मत पूछो।”
शाम को हर्ष ने अनिका को बुलाया।
“आज आप जल्दी घर जाइए।”
अनिका चौंक गई।
“लेकिन ड्राफ्ट…”
“कल।”
“सुबह तो आपने कहा था कि—”
“मैंने फैसला बदल दिया।”
अनिका उसकी आँखों को पढ़ने की कोशिश करती रही।
“क्यों?”
हर्ष ने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ अनु की काली ड्रॉइंग उसकी ओर सरका दी।
अनिका का रंग उड़ गया।
“ये… बच्चों की ड्रॉइंग है।”
“मिस जोशी।”
हर्ष उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
“आपको झूठ बोलना नहीं आता।”
अनिका की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
“मेरी निजी जिंदगी है।”
“और खतरा भी निजी है?”
“मैं संभाल लूँगी।”
“कब तक?”
हर्ष की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“जब तक वह आदमी आपकी चौखट तोड़कर अंदर नहीं आ जाता?”
अनिका की साँस रुक गई।
“आपने मेरे बारे में पता करवाया?”
“हाँ।”
“किस अधिकार से?”
उसकी आँखों में चोट थी।
“मैं आपकी कर्मचारी हूँ। आपकी संपत्ति नहीं।”
हर्ष कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला,
“सही कहा।”
अनिका ने उम्मीद नहीं की थी कि वह मान जाएगा।
हर्ष ने एक कदम पीछे लिया।
“लेकिन एक बात याद रखिए। मदद स्वीकार करना और किसी की संपत्ति बन जाना एक ही बात नहीं है।”
“मुझे रहम नहीं चाहिए।”
“मैं रहम करता भी नहीं।”
“तो?”
हर्ष ने उसकी आँखों में देखा।
“मैं सिर्फ इतनी बेवकूफी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई आदमी मेरी कंपनी में दिन भर पूरी इमारतों का भार बाँटने का हिसाब लगाए और रात को अपनी ही जिंदगी का बोझ अकेले उठाने पर अड़ी रहे।”
अनिका जवाब नहीं दे सकी।
“घर जाइए।”
हर्ष ने कहा।
“और आज दरवाज़ा किसी के लिए मत खोलिए।”
उस रात करीब साढ़े ग्यारह बजे अनु को हल्का बुखार था।
अनिका ने उसे दवा दी और पास बैठ गई।
कमरे की पीली रोशनी में बच्ची की मासूम साँसें सुनाई दे रही थीं।
अनिका बार-बार दरवाज़े की ओर देखती।
हर्ष के शब्द याद आ रहे थे।
“आज दरवाज़ा किसी के लिए मत खोलिए।”
फिर…
खर्र…
खर्र…
धातु पर किसी औज़ार के रगड़ने की आवाज़ आई।
अनिका सीधी बैठ गई।
हैंडल हिला।
एक बार।
दो बार।
फिर बाहर किसी ने गाली दी।
“नया ताला लगा दिया इसने।”
अनिका की रगों में खून जम गया।
विक्रांत।
वह अकेला नहीं था।
दूसरी आवाज़ आई,
“दो मिनट।”
अनिका की हथेलियाँ काँपने लगीं।
उसने फोन उठाया।
पुलिस?
लेकिन उसे स्थानीय सिपाही और विक्रांत की दोस्ती याद थी।
भाई?
वह हजारों किलोमीटर दूर था।
पड़ोसी?
पुरानी इमारत में लोग दरवाज़ा बंद करके तमाशा सुनना ज्यादा सुरक्षित समझते थे।
तभी उसके दिमाग में एक चेहरा आया।
हर्ष।
नहीं।
वह उसके बॉस थे।
लेकिन अगली ही सेकंड बाहर जोरदार चोट पड़ी।
अनु नींद में कराही।
अनिका ने कंपनी डायरेक्टरी खोली।
वह रोहित को फोन करना चाहती थी।
घबराहट में गलत नंबर दब गया।
फोन की सिर्फ एक घंटी बजी।
“हेलो।”
अनिका की आँखें भर आईं।
वही भारी आवाज़।
“रोहित… प्लीज… वो लोग… दरवाज़ा तोड़ रहे हैं…”
कुछ सेकंड दूसरी तरफ खामोशी रही।
फिर आवाज़ आई,
“अनिका।”
वह जम गई।
“मैं रोहित नहीं। हर्ष बोल रहा हूँ।”
“सर…”
“मेरी बात ध्यान से सुनो।”
हर्ष की आवाज़ ऐसी थी मानो वह सामने खड़ा हो।
“अनु को उठाओ। बाथरूम में जाओ। अंदर से लॉक करो।”
“लेकिन—”
“अभी।”
धड़ाम!
मुख्य दरवाज़ा टूट गया।
अनिका की चीख निकल गई।
“बाथरूम, अनिका!”
हर्ष की आवाज़ फोन में गूँजी।
अनिका ने अनु को गोद में उठाया।
“मम्मा?”
“चुप… मेरी जान…”
बच्ची डर गई।
अनिका उसे लेकर बाथरूम में घुसी।
कुंडी चढ़ाई।
फोन कॉल चालू था।
बाहर भारी कदमों की आवाज़ें फैल गईं।
“कहाँ छुपी हो?”
विक्रांत हँसा।
“आज देखता हूँ कौन बचाता है।”
अनिका ने अनु को अपनी छाती से चिपका लिया।
दरवाज़े पर पहली लात पड़ी।
धड़ाम!
लकड़ी काँपी।
अनु रोने लगी।
“मम्मा…”
“कुछ नहीं होगा।”
अनिका बोल तो रही थी, पर खुद की आवाज़ पर उसे भरोसा नहीं था।
दूसरी लात।
तीसरी।
कुंडी ढीली पड़ने लगी।
फोन में हर्ष की आवाज़ आई,
“अनिका, सुन रही हो?”
“जी…”
“मेरी तरफ ध्यान रखो।”
उसकी आवाज़ अब धीमी थी।
“तुम अकेली नहीं हो।”
अगली चोट इतनी जोरदार थी कि दरवाज़े से लकड़ी का एक टुकड़ा टूटकर गिरा।
अनिका ने आँखें बंद कर लीं।
तभी बाहर से एक और आवाज़ आई।
लेकिन इस बार वह विक्रांत की नहीं थी।
“दरवाज़े से पीछे हटो!”
फिर तेज कदम।
चीख।
कुछ गिरने की आवाज़।
पुलिस की सख्त चेतावनी।
“हाथ ऊपर!”
“कोई नहीं हिलेगा!”
विक्रांत घबराया।
“साहब, गलतफहमी है! घरेलू मामला है!”
फिर हर्ष की बर्फीली आवाज़ आई।
“जिस घर की औरत तुम्हें अंदर आने से मना कर रही हो, वहाँ ताला तोड़ना घरेलू मामला नहीं होता।”
अनिका की आँखें खुल गईं।
वह आ गया था।
कुछ मिनट बाद बाहर शांति हो गई।
बाथरूम के दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
“अनिका।”
उसने साँस रोक ली।
“दरवाज़ा खोलो। सब ठीक है।”
हर्ष।
अनिका की उँगलियाँ इतनी काँप रही थीं कि कुंडी दो बार हाथ से फिसली।
दरवाज़ा खुला।
सामने हर्ष खड़ा था।
कॉलर अस्त-व्यस्त।
आस्तीनें मुड़ी हुईं।
दाहिने हाथ की उँगलियों पर हल्की खरोंच।
पीछे पुलिस विक्रांत और उसके दो साथियों को ले जा रही थी।
अनिका ने बस उसे देखा।
फिर जैसे महीनों का साहस एक ही पल में टूट गया।
उसके घुटने जवाब देने लगे।
हर्ष ने उसे गिरने से पहले पकड़ लिया।
एक बाँह में अनिका।
दूसरी तरफ अनु।
अनिका का सिर उसके सीने से लग गया।
वह बेकाबू होकर रो पड़ी।
“मैं बहुत डर गई थी…”
बस इतना ही कह पाई।
हर्ष ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
“मुझे पता है।”
“मैंने सोचा…”
“कुछ मत सोचो।”
उसने अनु के सिर पर हाथ रखा।
फिर अनिका से बहुत धीमे कहा,
“अब तुम सुरक्षित हो।”
लेकिन कहानी की असली लड़ाई उस रात नहीं शुरू हुई थी।
वह अगली सुबह शुरू हुई।
क्योंकि किसी स्थानीय रिपोर्टर ने पुलिस के साथ हर्ष को अनिका के फ्लैट से निकलते देख लिया था।
एक तस्वीर सोशल मीडिया पर फैल गई।
हर्ष अनिका को बाँहों में उठाकर कार तक ले जा रहा था।
अनिका रात के सदमे और तेज बुखार के कारण बेहोश हो गई थी।
लेकिन इंटरनेट को सच से ज्यादा कहानी चाहिए थी।
सुबह सात बजे तक शीर्षक बदल चुके थे।
“बिजनेस टायकून आधी रात महिला कर्मचारी के घर।”
“मकान मालिक से विवाद के पीछे प्रेम संबंध?”
“रहस्यमयी सिंगल मदर कौन?”
और फिर टिप्पणियाँ।
किसी ने अनिका की नौकरी को लेकर सवाल उठाया।
किसी ने उसके चरित्र को निशाना बनाया।
किसी ने लिखा कि उसने प्रमोशन के लिए मालिक को फँसाया होगा।
अस्पताल के कॉरिडोर में हर्ष एक-एक टिप्पणी पढ़ता गया।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
लेकिन फोन पकड़ी उँगलियाँ सफेद पड़ चुकी थीं।
रोहित दौड़ता हुआ आया।
“सर, पीआर टीम कोशिश कर रही है लेकिन पोस्ट वायरल हो चुका है।”
समीर भी उसके पीछे था।
“हर्ष, बोर्ड के लोग फोन कर रहे हैं।”
हर्ष ने काँच के पार कमरे में देखा।
अनिका बिस्तर पर सो रही थी।
पास के सोफे पर अनु सिकुड़ी हुई थी।
वह बच्ची जिसे दुनिया के बारे में अभी इतना ही पता था कि “बड़े अंकल अच्छे हैं।”
और उसी दुनिया ने उसकी माँ के चरित्र का फैसला कुछ घंटों में कर दिया था।
समीर ने धीमे से कहा,
“उस लड़की को अभी यह सब मत दिखाना।”
लेकिन देर हो चुकी थी।
कमरे का दरवाज़ा खुला।
अनिका जाग चुकी थी।
“सर…”
हर्ष अंदर गया।
“अनु?”
“ठीक है।”
अनिका ने राहत की साँस ली।
“विक्रांत?”
“जेल में है।”
“आपने…”
उसकी आँखें भर आईं।
“आपने हमारी जान बचाई।”
हर्ष कुछ कहता, उससे पहले अनिका की नज़र उसके फोन पर पड़ गई।
स्क्रीन पर उसकी ही तस्वीर थी।
उसने फोन उठा लिया।
एक पोस्ट पढ़ी।
फिर दूसरी।
उसका चेहरा धीरे-धीरे सफेद होने लगा।
“नहीं…”
हर्ष ने फोन लेने की कोशिश की।
अनिका पीछे हट गई।
“लोग… ये मेरे बारे में…”
उसकी साँसें तेज हो गईं।
“मेरी अनु…”
हर्ष ने उसका हाथ पकड़ा।
“फोन मुझे दो।”
“कल स्कूल में कोई उससे पूछेगा तो?”
आँसू बह निकले।
“मैंने क्या किया था? मैं तो बस अपनी बच्ची को बचाना चाहती थी।”
हर्ष चुप रहा।
“क्यों हर बार औरत को ही साबित करना पड़ता है कि वह गलत नहीं थी?”
यह सवाल हर्ष के लिए नहीं था।
पूरी दुनिया के लिए था।
कुछ देर बाद हर्ष उठा।
बाहर आया।
समीर से कहा,
“रजिस्ट्रार से बात करो।”
समीर ने सोचा उसने गलत सुना।
“किससे?”
“मैरिज रजिस्ट्रार।”
रोहित की आँखें फैल गईं।
“सर?”
हर्ष ने बेहद शांत स्वर में कहा,
“मैं अनिका से शादी कर रहा हूँ।”
समीर ने उसका हाथ पकड़कर अलग किया।
“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?”
“नहीं।”
“तुम उस महिला को मुश्किल से जानते हो।”
“जानने के लिए कितना समय जरूरी है?”
“यह जिंदगी है, बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट नहीं!”
हर्ष की आँखों में अचानक वर्षों पुराना दर्द चमक उठा।
“मेरी माँ भी अकेली पड़ गई थीं, समीर।”
समीर चुप हो गया।
हर्ष ने पहली बार उस जख्म को शब्द दिए जिसे वह वर्षों से दुनिया से छिपाता आया था।
“मेरे पिता ने दूसरी औरत चुन ली। समाज ने मेरी माँ को दोषी बनाया। लोगों ने कहा वह पति को संभाल नहीं सकीं। कमजोर थीं। पुराने विचारों की थीं।”
उसकी आवाज़ भारी हो गई।
“मैं चौदह साल का था जब मैंने उन्हें कमरे में अकेले रोते देखा था।”
समीर कुछ नहीं बोला।
“वह रोज थोड़ा-थोड़ा टूटती रहीं।”
हर्ष की नज़र अस्पताल के कमरे पर थी।
“मैं उस कहानी को दोबारा नहीं देखूँगा।”
“लेकिन शादी किसी की प्रतिष्ठा बचाने का तरीका नहीं है।”
“सही।”
हर्ष ने कहा।
“इसलिए फैसला अनिका का होगा।”
वह कमरे में लौटा।
अनिका अभी खिड़की की ओर देख रही थी।
“मुझे तुमसे एक बात करनी है।”
अनिका ने पलटकर देखा।
“हम शादी कर लें।”
कुछ सेकंड उसकी पलकें तक नहीं झपकीं।
“क्या?”
“शादी।”
अनिका ने सोचा वह बुखार में कोई भ्रम सुन रही है।
“आप… मुझ पर तरस खा रहे हैं?”
“नहीं।”
“तो मज़ाक है?”
“मैं मज़ाक नहीं करता।”
“मैं एक छोड़ी हुई औरत हूँ।”
“मुझे पता है।”
“मेरी पाँच साल की बच्ची है।”
“वह बात सबसे पहले पता चली थी।”
“आप शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में हैं।”
“ये भी पता है।”
अनिका की आँखों में गुस्सा उतर आया।
“फिर क्यों?”
हर्ष ने कुर्सी खींची।
उसके सामने बैठ गया।
“दुनिया को चुप कराने के लिए नहीं।”
“तो?”
“क्योंकि कल रात जब तुम्हारा फोन आया…”
वह कुछ पल रुका।
“मैं डर गया था।”
अनिका स्तब्ध रह गई।
हर्ष मल्होत्रा ने शायद जिंदगी में कभी किसी के सामने यह स्वीकार नहीं किया था।
“मैंने सोचा अगर पाँच मिनट देर हो गई तो…”
उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
“मैंने अपनी जिंदगी में करोड़ों खोए हैं। कभी डर नहीं लगा। लेकिन कल तुम्हारी आवाज़ सुनकर लगा कि पहली बार कुछ ऐसा खो सकता हूँ जिसे पैसे से वापस नहीं खरीद पाऊँगा।”
अनिका की आँखें नम हो गईं।
हर्ष ने आगे कहा,
“मैं तुमसे यह नहीं कह रहा कि तुम मुझसे प्यार करती हो। मैं खुद भी नहीं जानता कि जो महसूस कर रहा हूँ उसे क्या नाम दूँ।”
वह थोड़ा झुका।
“लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि तुम्हारे लिए मेरे मन में दया नहीं है।”
“और अनु?”
पहली बार अनिका की आवाज़ बहुत धीमी हुई।
“उसके लिए?”
हर्ष ने सोफे पर सोई बच्ची की ओर देखा।
“उसने मुझे अच्छा आदमी कहा।”
उसके होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आई।
“अब मुझे कम से कम उसके सामने वैसा आदमी बनने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी।”
अनिका की आँखों से आँसू निकल गए।
हर्ष ने हाथ आगे किया।
“फैसला तुम्हारा है।”
कमरे में लंबी खामोशी रही।
अनिका ने अनु को देखा।
फिर सामने बैठे उस आदमी को।
वही आदमी जो कल तक उसके लिए एक कठोर बॉस था।
जिसने उसे अपमानित भी किया।
लेकिन उसी आदमी ने आधी रात उसके टूटते दरवाज़े के सामने दीवार बनकर खड़े होने में एक पल नहीं लगाया।
अनिका ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया।
“एक शर्त।”
हर्ष ने उसकी आँखों में देखा।
“कहो।”
“मैं आपकी पत्नी बनूँगी।”
वह रुकी।
“लेकिन आपकी छाया नहीं।”
हर्ष की आँखों में एक चमक उभरी।
“मंजूर।”
“मैं नौकरी नहीं छोड़ूँगी।”
“क्यों छोड़ोगी?”
“अनु पर मेरा हक कम नहीं होगा।”
हर्ष ने तुरंत कहा,
“और मेरा हक तुमसे छीनकर नहीं बनेगा।”
अनिका ने पहली बार राहत की साँस ली।
“तो…”
उसने अपना हाथ उसकी हथेली पर रख दिया।
“मुझे मंजूर है।”
उस दिन कोई भव्य मंडप नहीं था।
न हजार मेहमान।
न रोशनी।
न संगीत।
अस्पताल के छोटे से निजी कमरे में कुछ कानूनी दस्तावेज थे।
समीर।
दो गवाह।
रोहित।
और सोफे पर बैठी अनु।
हर्ष ने दस्तखत किए।
अनिका ने काँपते हाथ से अपना नाम लिखा।
फिर समीर एक छोटी सिंदूर की डिबिया लाया।
हर्ष ने उसे खोला।
उसकी उँगलियाँ अनिका के माथे तक पहुँचीं।
अनिका की पलकें झुक गईं।
उस एक चुटकी लाल रंग ने जैसे उसकी वर्षों की बेरंग जिंदगी को नया नाम दे दिया।
तभी अनु की आवाज़ आई।
“बड़े अंकल!”
सभी उसकी तरफ देखने लगे।
“आप मम्मा को लाल रंग क्यों लगा रहे हो?”
हर्ष नीचे झुका।
अनु के सामने बैठ गया।
“क्योंकि अब…”
उसने बच्ची की नाक हल्के से दबाई।
“मैं बड़े अंकल नहीं हूँ।”
“तो?”
हर्ष ने उसे गोद में उठा लिया।
“पापा।”
अनु की आँखें गोल हो गईं।
“सच्ची?”
“सच्ची।”
“हमेशा वाले?”
हर्ष का चेहरा बदल गया।
उसने अनु को सीने से लगा लिया।
“हमेशा वाले।”
अनिका ने मुँह फेर लिया।
लेकिन आँसू रोक नहीं सकी।
दो दिन बाद जब काली कार मल्होत्रा विला के विशाल लोहे के गेट से अंदर दाखिल हुई तो अनिका की उँगलियाँ आपस में कस गईं।
उसने इतनी बड़ी हवेली सिर्फ फिल्मों में देखी थी।
सफेद पत्थर की दीवारें।
विशाल लॉन।
ऊँचे पेड़।
फव्वारा।
अनु खिड़की से चिपक गई।
“पापा! आपका घर इतना बड़ा क्यों है?”
हर्ष ने गंभीरता से कहा,
“शायद मुझे कोई छोटा घर बेचने को तैयार नहीं था।”
अनु खिलखिलाई।
अनिका भी मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।
कार रुकी।
हर्ष ने दरवाज़ा खोला।
अनु लॉन की ओर दौड़ी।
फिर अचानक रुक गई।
“यहाँ झूला नहीं है।”
हर्ष ने चारों तरफ देखा।
“नहीं।”
अनु ने मुँह फुलाया।
“फिर इतना बड़ा घर किस काम का?”
हर्ष ने पहली बार खुलकर हँसा।
“कल शाम तक झूला लग जाएगा।”
मुख्य दरवाज़े पर कर्मचारी खड़े थे।
सुनंदा जी आगे आईं।
वह कई वर्षों से घर संभालती थीं।
हर्ष ने अनिका को अपने बराबर खड़ा किया।
न आगे।
न पीछे।
“ये अनिका हैं।”
फिर एक क्षण रुककर बोला,
“मेरी पत्नी।”
सभी ने सम्मान से सिर झुकाया।
“और अनु मेरी बेटी है।”
अनिका ने उसकी ओर देखा।
उसने “अनिका की बेटी” नहीं कहा था।
“मेरी बेटी।”
हर्ष आगे बोला,
“इस घर में जितना अधिकार मेरा है, उतना ही इन दोनों का है।”
ऊपर अनु का कमरा देखकर बच्ची खुशी से चीख पड़ी।
गुलाबी परदे।
किताबें।
खिलौने।
छोटी टेबल।
अनिका दरवाज़े पर खड़ी रह गई।
“ये सब…”
“सुबह तैयार करवाया था।”
हर्ष ने सहज स्वर में कहा।
“लेकिन सुबह तो हमारी शादी भी नहीं हुई थी।”
हर्ष चुप हो गया।
अनिका ने उसकी ओर देखा।
“आपको पहले से पता था?”
“क्या?”
“कि आप हमें यहाँ लाएँगे?”
हर्ष कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“शायद।”
बस इतना कहा।
उस जवाब ने अनिका के भीतर कोई अनजाना एहसास जगा दिया।
रात को दोनों मास्टर बेडरूम में थे।
अनिका दरवाज़े पर ठिठकी रही।
हर्ष ने जैकेट उतारी।
फिर उसकी झिझक समझ गया।
“तुम चाहो तो गेस्ट रूम में सो सकती हो।”
अनिका ने हैरानी से देखा।
“आप…”
“हमारी शादी हुई है।”
हर्ष ने शांत स्वर में कहा।
“तुम्हारी सहमति मेरी पत्नी कहलाने से खत्म नहीं हो जाती।”
अनिका की आँखें भर आईं।
उसका पिछला रिश्ता शायद इसी एक वाक्य से हार गया था।
किसी ने पहली बार उससे पूछा था कि वह क्या चाहती है।
“मैं यहीं रहूँगी।”
वह धीमे से बोली।
“लेकिन…”
“मैं सोफे पर सो जाऊँगा।”
अनिका कुछ कहना चाहती थी।
तभी नीचे मुख्य गेट की घंटी बज उठी।
कुछ देर बाद सुनंदा घबराई हुई आईं।
“भैया…”
“क्या हुआ?”
“जयंत साहब आए हैं।”
हर्ष का चेहरा पलक झपकते बदल गया।
सारा अपनापन जमकर बर्फ हो गया।
“डैड?”
अनिका के हाथ ठंडे हो गए।
हर्ष के पिता विदेश में रहते थे।
सोशल मीडिया की खबर उन तक पहुँच चुकी थी।
नीचे हॉल में जयंत मल्होत्रा तूफान की तरह खड़े थे।
हाथ में अखबार।
चेहरे पर गुस्सा।
हर्ष सीढ़ियाँ उतरकर आया।
“नमस्ते, डैड।”
जयंत ने अखबार मेज़ पर पटक दिया।
“ये क्या तमाशा है?”
हर्ष शांत रहा।
“अखबार है।”
“मुझसे मज़ाक मत करो!”
जयंत की आवाज़ गूँजी।
“एक मामूली कर्मचारी के लिए पूरी दुनिया में हमारा नाम उछल रहा है।”
हर्ष की आँखें सिकुड़ीं।
“वह मामूली कर्मचारी मेरी पत्नी है।”
जयंत ठिठक गए।
“क्या कहा?”
“मैंने अनिका से शादी कर ली।”
जयंत का चेहरा लाल हो गया।
“तुमने एक छोड़ी हुई औरत से शादी कर ली? एक बच्ची की माँ से?”
हर्ष की आवाज़ ठंडी हो गई।
“अपने शब्द चुनकर बोलिए।”
“मैं तुम्हारा पिता हूँ!”
“इसीलिए अभी सिर्फ चेतावनी दे रहा हूँ।”
उसी समय ऊपर से अनिका ने यह सब सुन लिया।
वह सीढ़ियों पर आ खड़ी हुई।
जयंत की नज़र उस पर पड़ी।
फिर उसकी मांग के सिंदूर पर।
“यही है?”
उनकी आँखों में तिरस्कार था।
“कितने पैसे चाहिए तुम्हें?”
अनिका सन्न रह गई।
जयंत आगे बढ़े।
“पचास लाख?”
हर्ष का जबड़ा सख्त हुआ।
“डैड।”
लेकिन जयंत रुके नहीं।
“एक करोड़?”
अनिका का चेहरा अब बदल चुका था।
कुछ अपमान इंसान को तोड़ते नहीं।
जगा देते हैं।
वह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आई।
“मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
जयंत हँसे।
“ऐसी बातें सब शुरुआत में कहते हैं।”
अनिका उनके सामने आकर खड़ी हुई।
उसके हाथ नहीं काँप रहे थे।
“पैसों की कीमत बाजार में लगती है, मिस्टर मल्होत्रा।”
उसने उनकी आँखों में देखा।
“इंसानों की नहीं।”
पूरा हॉल शांत हो गया।
“मैंने आपकी दौलत देखकर आपके बेटे से शादी नहीं की।”
“तो क्या देखकर की?”
अनिका कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“वह इंसान देखकर जो आधी रात मेरी बच्ची की चीख सुनकर अपने घर में नहीं बैठा रहा।”
हर्ष की आँखें उस पर टिक गईं।
“वह आदमी देखकर जिसने मेरे डर को कमजोरी नहीं समझा।”
अनिका की आवाज़ भर्रा गई।
“और अगर फिर भी आपको लगता है कि मैं बिकने आई हूँ तो आपकी कोई भी रकम कम पड़ेगी… क्योंकि मेरा आत्मसम्मान बिक्री के लिए है ही नहीं।”
उसी क्षण अनु ऊपर से दौड़ती हुई आई।
“पापा!”
वह हर्ष की टाँगों से लिपट गई।
हर्ष ने उसे उठा लिया।
जयंत का चेहरा सख्त हो गया।
“मुझे पापा मत बुलवाओ इससे।”
हर्ष की आँखों का रंग बदल गया।
“अनु।”
उसने बच्ची की तरफ देखा।
“ये तुम्हारे दादाजी हैं।”
अनु मासूमियत से बोली,
“नमस्ते दादाजी।”
जयंत के होंठ हिले।
लेकिन शब्द नहीं निकले।
हर्ष ने पिता की ओर देखा।
“आपके और मेरे बीच जो भी है, वह हमारा मामला है।”
उसने अनिका का हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन इन दोनों का अपमान मैं नहीं सहूँगा।”
जयंत ने गुस्से में कहा,
“तुम मेरी संपत्ति के इकलौते वारिस हो!”
“मुझे आपकी संपत्ति नहीं चाहिए।”
“हर्ष!”
“जिस कंपनी में आप आज अपना नाम देखते हैं, उसका वर्तमान विस्तार मैंने खड़ा किया है।”
हर्ष की आवाज़ में पहली बार वर्षों का जमा दर्द था।
“और परिवार?”
उसने अपनी माँ की तस्वीर की ओर देखा।
“परिवार का मतलब मैंने आपसे नहीं सीखा।”
जयंत का चेहरा उतर गया।
हर्ष धीरे से बोला,
“माँ को आपने समाज के डर के कारण अकेला छोड़ा था।”
हॉल की हवा भारी हो गई।
“मैं वही गलती नहीं दोहराऊँगा।”
कुछ क्षण बाद जयंत ने अखबार उठाया।
दरवाज़े की ओर मुड़े।
जाने से पहले एक बार अनु की तरफ देखा।
बच्ची अब भी हर्ष की गर्दन में हाथ डाले थी।
फिर अनिका को देखा।
और बिना कुछ कहे चले गए।
गाड़ी बाहर निकल गई।
अनिका की सारी मजबूती एक ही पल में टूट गई।
उसने हर्ष की ओर देखा।
“आपने अपने पिता से मेरे लिए…”
“तुम्हारे लिए नहीं।”
हर्ष ने कहा।
अनिका चौंकी।
हर्ष उसके सामने आया।
“हमारे लिए।”
उस एक शब्द ने दूरी मिटा दी।
अनिका आगे बढ़ी।
पहली बार उसने खुद हर्ष के सीने पर सिर रखा।
हर्ष की बाँहें धीरे-धीरे उसके चारों ओर कस गईं।
अगली सुबह मल्होत्रा प्राइम में जब अनिका दाखिल हुई तो हर नज़र उसकी ओर उठी।
लेकिन आज वह सिर झुकाकर नहीं चल रही थी।
हर्ष उसके साथ था।
कॉन्फ्रेंस रूम में पहुँचकर उसने सबके सामने कहा,
“स्काईलाइन प्रोजेक्ट का नया लोड-बेयरिंग डिजाइन अनिका ने तैयार किया है।”
किसी ने ताली नहीं बजाई।
सब चौंके हुए थे।
हर्ष ने आगे कहा,
“और स्पष्ट कर दूँ—यह जिम्मेदारी उन्हें मेरी पत्नी होने के कारण नहीं मिली।”
उसने स्क्रीन पर डिजाइन खोला।
“बल्कि इसलिए क्योंकि पिछले तीन महीनों में इस समस्या का सही समाधान पूरी टीम में सिर्फ इन्हें मिला।”
रोहित ने सबसे पहले तालियाँ बजाईं।
फिर बाकी लोग भी।
अनिका की आँखें नम हो गईं।
हर्ष ने धीमे से कहा,
“यहाँ आँसू नहीं।”
अनिका ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“ये खुशी वाले हैं।”
“फिर सीमित मात्रा में अनुमति है।”
पहली बार पूरी टीम ने अपने बॉस को मज़ाक करते सुना।
दिन बीतने लगे।
अनु की हँसी ने मल्होत्रा विला की खामोशी बदल दी।
लॉन में सचमुच लाल झूला लग गया।
दीवारों पर क्रेयॉन की कुछ लकीरें भी बन गईं।
पहले दिन हर्ष ने उन्हें देखकर नौकरों को बुलाया।
अनिका डर गई।
“अनु ने किया है। मैं साफ करा दूँगी।”
हर्ष कुछ देर दीवार देखता रहा।
फिर बोला,
“रहने दो।”
“लेकिन दीवार खराब हो गई।”
“घर पहली बार ठीक हुआ है।”
अनिका कुछ नहीं कह पाई।
एक रात अनु सो चुकी थी।
बारिश हो रही थी।
अनिका बालकनी में खड़ी थी।
हर्ष पीछे आकर रेलिंग से टिक गया।
“ठंड लग जाएगी।”
“आज डर नहीं लग रहा।”
“किससे?”
“बारिश से।”
अनिका मुस्कुराई।
“पहले बारिश होती थी तो उस पुराने फ्लैट की छत टपकती थी।”
हर्ष ने उसकी तरफ देखा।
“और अब?”
“अब लगता है छत मजबूत है।”
दोनों की आँखें मिलीं।
वह सिर्फ घर की बात नहीं कर रही थी।
हर्ष ने हाथ बढ़ाकर उसके चेहरे पर आई लट हटाई।
“अनिका।”
“हूँ?”
“उस दिन अस्पताल में मैंने झूठ बोला था।”
वह चौंकी।
“कौन सा?”
“मैंने कहा था यह सिर्फ व्यावहारिक फैसला है।”
अनिका का दिल तेज धड़कने लगा।
हर्ष थोड़ा करीब आया।
“अब लगता है फैसला बहुत अव्यावहारिक था।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं हर मीटिंग में तुम्हें ढूँढता हूँ।”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“ऑफिस से निकलते वक्त सोचता हूँ अनु ने आज क्या बनाया होगा।”
और फिर…
“रात को इस कमरे में आने की जल्दी रहती है।”
अनिका की पलकें झुक गईं।
“ये सब किसी बिजनेस योजना में नहीं था।”
अनिका हँस दी।
हर्ष ने उसका चेहरा हथेलियों में लिया।
“तुम्हें डर लग रहा है?”
अनिका ने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं।”
“पक्का?”
इस बार उसने खुद एक कदम आगे बढ़ाया।
“पक्का।”
हर्ष ने उसके माथे को चूमा।
वह स्पर्श अधिकार से ज्यादा सवाल था।
अनिका ने आँखें बंद कर लीं।
वर्षों से बंद पड़ा उसका दिल जैसे पहली बार किसी को भीतर आने की अनुमति दे रहा था।
उसने हर्ष की शर्ट पकड़ ली।
“मैंने सोचा था मेरे हिस्से की मोहब्बत खत्म हो चुकी है।”
हर्ष ने फुसफुसाकर कहा,
“शायद शुरू ही अब हुई है।”
उनके बीच की दूरी धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
लेकिन उसी समय…
नीचे स्टडी रूम में हर्ष का फोन बज उठा।
उसने अनिका से थोड़ा अलग होकर फोन उठाया।
स्क्रीन पर समीर का नाम था।
“हाँ?”
दूसरी तरफ समीर की आवाज़ असामान्य रूप से गंभीर थी।
“हर्ष, विक्रांत के मामले में कुछ मिला है।”
“कल बात करेंगे।”
“नहीं।”
समीर ने तुरंत कहा।
“तुम्हें अभी सुनना होगा।”
हर्ष की आँखों की गर्माहट गायब हो गई।
“क्या?”
“विक्रांत के बैंक अकाउंट में पिछले छह महीनों से पैसे आ रहे थे।”
“किससे?”
“एक शेल कंपनी से।”
हर्ष सीधा खड़ा हो गया।
“नाम?”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
“जेएम ग्लोबल कंसल्टिंग।”
हर्ष के चेहरे का रंग बदल गया।
क्योंकि जेएम…
जयंत मल्होत्रा के नाम के शुरुआती अक्षर थे।
“पक्का?”
“इतना ही नहीं।”
समीर ने कहा।
“अनिका का पुराना पता, नौकरी बदलने की जानकारी और उसके घर की तस्वीरें उसी कंपनी के एक मेल अकाउंट से विक्रांत को भेजी गई थीं।”
हर्ष की मुट्ठी कस गई।
“मेरे पिता अनिका को शादी से पहले जानते तक नहीं थे।”
“यही बात सबसे खतरनाक है।”
समीर की आवाज़ और धीमी हो गई।
“क्योंकि शायद मामला अनिका का नहीं है।”
“तो?”
“उसके पूर्व पति का है।”
हर्ष के शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ी।
अनिका बालकनी से उसे देख रही थी।
“हर्ष?”
उसने जवाब नहीं दिया।
फोन में समीर बोला,
“मैंने अनिका के पुराने विवाह रिकॉर्ड निकलवाए।”
हर्ष ने आँखें बंद कर लीं।
“समीर, सीधा बोलो।”
“अनिका ने जिस आदमी से शादी की थी उसका नाम आदित्य जोशी था।”
“मुझे पता है।”
“तुम्हें यह नहीं पता कि आदित्य कौन था।”
हर्ष की साँस धीमी हो गई।
“वह सात साल पहले मल्होत्रा प्राइम की एक सहयोगी कंपनी में फाइनेंस ऑडिटर था।”
हर्ष जैसे पत्थर बन गया।
“क्या?”
“और उसके गायब होने से सिर्फ तीन दिन पहले उसने एक गोपनीय रिपोर्ट बनाई थी।”
“किसके खिलाफ?”
दूसरी तरफ कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर समीर ने वह नाम लिया जिसे सुनकर हर्ष की दुनिया जैसे ठहर गई।
“जयंत मल्होत्रा।”
हर्ष ने धीरे से अनिका की ओर देखा।
वह कुछ दूर खड़ी थी।
चेहरे पर सवाल।
उसे अभी कुछ पता नहीं था।
“रिपोर्ट कहाँ है?”
“गायब।”
“आदित्य?”
“आधिकारिक रिकॉर्ड कहता है वह पत्नी और बेटी को छोड़कर चला गया।”
“और असली रिकॉर्ड?”
समीर की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।
“शायद वह कभी अपनी मर्जी से गया ही नहीं।”
हर्ष की रीढ़ में ठंड उतर गई।
उसी समय घर के मुख्य गेट पर सुरक्षा अलार्म बजा।
हर्ष तेजी से बालकनी की ओर बढ़ा।
नीचे गेट के सामने एक काली कार खड़ी थी।
एक आदमी बाहर उतरा।
लंबा कद।
दाढ़ी।
चेहरे पर थकान।
हाथ में पुराना चमड़े का बैग।
गार्ड इंटरकॉम पर बोला,
“सर, ये आदमी मिसेज मल्होत्रा से मिलना चाहता है।”
हर्ष ने पूछा,
“नाम?”
गार्ड ने जवाब दिया।
और उसी क्षण पीछे खड़ी अनिका के हाथ से पानी का गिलास गिर गया।
काँच फर्श पर टूट गया।
क्योंकि उसने भी वह नाम सुन लिया था।
“आदित्य जोशी।”
अनिका का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसके होंठ काँपे।
“नहीं…”
नीचे खड़ा आदमी कैमरे की तरफ देख रहा था।
फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में अनिका थी।
उसकी गोद में छह महीने की अनु।
और उनके साथ वही आदमी।
इंटरकॉम पर उसकी आवाज़ आई—
“अनिका से कहिए… मैं उसे छोड़कर नहीं गया था।”
अनिका के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई।
हर्ष ने तुरंत उसे थाम लिया।
लेकिन आदमी की अगली बात सुनकर हर्ष की पकड़ भी कस गई।
“और उससे कहना…”
गेट कैमरे के सामने उसने एक पुरानी पेन ड्राइव उठा दी।
“मेरे पास वह सबूत है जिसके लिए मल्होत्रा परिवार ने सात साल से मुझे जिंदा दफन कर रखा था।”
हर्ष की आँखें जम गईं।
अनिका ने भयभीत नज़र से अपने पति को देखा।
नीचे वही आदमी खड़ा था जिसे वह वर्षों से धोखेबाज़ समझती रही थी।
और ऊपर उसके बगल में वह व्यक्ति था जिससे उसने नई जिंदगी शुरू की थी।
तभी अनु की नींद भरी आवाज़ पीछे से आई—
“मम्मा… नीचे कौन आया है?”
अनिका की साँस रुक गई।
क्योंकि अगले ही पल मुख्य गेट पर खड़े आदित्य ने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा—
“मैं अपनी बेटी अनु को लेने नहीं आया…”
उसने पेन ड्राइव मुट्ठी में कस ली।
“मैं उसे उस सच से बचाने आया हूँ जो अगर खुल गया… तो हर्ष मल्होत्रा का पूरा साम्राज्य बिखर जाएगा।”
और उस रात पहली बार हर्ष को समझ आया—
विक्रांत सिर्फ एक मोहरा था।
असल खेल सात साल पहले शुरू हुआ था।
और उसकी अगली चाल…
उसके अपने घर के अंदर छिपी थी।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।