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25 लाख में अपनों ने साक्षी का सौदा कर दिया, मगर जिस अरबपति ने उसे अपनाया उसने ऐसा राज खोला कि पूरी हवेली कांप उठी

25 लाख में अपनों ने साक्षी का सौदा कर दिया, मगर जिस अरबपति ने उसे अपनाया उसने ऐसा राज खोला कि पूरी हवेली कांप उठी

मई की वह दोपहर ऐसी थी जैसे आसमान ने आग की चादर ओढ़ ली हो।

घड़ी में ठीक दो बजे थे।

सूरज सिर के ऊपर ठहरा हुआ लगता था और पुरानी हवेली के पीछे बने टूटे-फूटे आंगन की ईंटें इतनी गर्म थीं कि उन पर नंगे पैर रखना मुश्किल था।

उसी तपती जमीन पर साक्षी पिछले चार घंटों से घुटनों के बल बैठी कपड़े धो रही थी।

उसके सामने चादरों, भारी पर्दों और रंग-बिरंगे कपड़ों का ऐसा ढेर था मानो पूरे घर का बोझ उसके सामने रख दिया गया हो।

साबुन के तीखे झाग में डूबी उसकी उंगलियां लाल पड़ चुकी थीं।

जिन हाथों से कभी वह अपनी स्कूल की कॉपियों में मोती जैसे अक्षर लिखा करती थी, आज उन्हीं हाथों की त्वचा जगह-जगह से छिल गई थी।

पसीने की बूंदें माथे से लुढ़ककर उसकी पलकों पर ठहर रही थीं।

वह बार-बार दुपट्टे के कोने से चेहरा पोंछती, फिर कपड़ों पर झुक जाती।

“बस थोड़ा और…”

उसने खुद से कहा।

लेकिन जैसे ही उसने कमर सीधी करने की कोशिश की, पीठ में तेज दर्द उठा।

“आह…”

उसके होंठों से धीमी कराह निकली।

उसने आंखें बंद कर लीं।

एक पल को उसे अपनी मां याद आ गई।

मां होती तो शायद उसके हाथों पर तेल लगाती।

कहती—

“मेरी बेटी से इतना काम कौन करवाएगा?”

और पिता हंसते हुए तुरंत जवाब देते—

“मेरी राजकुमारी तो पढ़ेगी, बहुत आगे जाएगी।”

राजकुमारी…

यह शब्द अब साक्षी को किसी दूसरी जिंदगी की कहानी लगता था।

दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में माता-पिता के चले जाने के बाद उसकी दुनिया एक ही रात में बदल गई थी।

उसके पिता की अच्छी-खासी संपत्ति थी।

शहर के बाहर जमीनें थीं।

पुरानी हवेली थी।

कुछ दुकानें थीं।

बैंक में जमा पूंजी थी।

साक्षी तब सिर्फ बीस साल की थी।

दुनियादारी नहीं समझती थी।

चाचा महेश ने रोते हुए उसके सिर पर हाथ रखा था।

“बेटा, अब मैं ही तुम्हारा पिता हूं।”

चाची कमला ने उसे सीने से लगाया था।

“तू चिंता मत कर। जब तक हम हैं, तुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी।”

उस दिन साक्षी ने सच में उन्हें अपना सहारा मान लिया था।

उसे क्या पता था कि वही हाथ धीरे-धीरे उसकी सारी संपत्ति के कागजों पर कब्जा कर लेंगे।

वही लोग जो रिश्तेदार बनकर आए थे, एक दिन मालिक बन बैठेंगे।

और घर की असली वारिस…

घर की नौकरानी।

“साक्षी!”

हवेली के भीतर से कमला की कर्कश आवाज गूंजी।

साक्षी चौंक गई।

“ओ साक्षी! मर गई क्या?”

वह घबराकर खड़ी हुई।

“जी चाची!”

“जी चाची की बच्ची! जल्दी अंदर आ! मेहमान आने वाले हैं। ड्रिंक्स तैयार कर!”

साक्षी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

सुबह से उसने सिर्फ आधी रोटी खाई थी।

पानी पीने का भी समय नहीं मिला था।

उसने आसमान की तरफ देखा।

जैसे मन ही मन पूछ रही हो—

“और कितना?”

लेकिन जवाब में सिर्फ तपती धूप थी।

वह अपने गीले हाथ कुर्ते पर पोंछती हुई अंदर भागी।

हवेली का मुख्य हॉल बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग था।

एसी की ठंडी हवा।

फूलों की खुशबू।

चमकते झूमर।

मखमली सोफे।

चांदी के बर्तन।

और बीच में लाल रंग का भारी लहंगा पहने रिया आईने के सामने खड़ी थी।

रिया साक्षी की चचेरी बहन थी।

कमला उसके बालों को ठीक करते हुए बोली—

“चेहरा थोड़ा और ऊपर रख।”

रिया मुस्कुराई।

“मम्मी, मैं ठीक लग रही हूं न?”

“ठीक?”

कमला ने गर्व से कहा—

“तू आज रानी लग रही है।”

फिर वह रिया के कान के पास झुक गई।

“याद रखना, रियांश सिंह राठौड़ जैसा आदमी रोज-रोज नहीं मिलता। अगर वह तुझ पर फिदा हो गया तो समझ हमारी सात पुश्तें बैठकर खाएंगी।”

रिया ने अपने होंठों की लिपस्टिक ठीक करते हुए कहा—

“आप चिंता मत करो। मैं संभाल लूंगी।”

कमला हंस पड़ी।

उसी समय साक्षी चुपचाप किचन की तरफ बढ़ने लगी।

कमला की नजर उस पर पड़ गई।

“रुक!”

साक्षी ठिठक गई।

कमला उसके पास आई।

साक्षी के भीगे कपड़ों, उलझे बालों और थके चेहरे को ऊपर से नीचे तक देखा।

“इसी हालत में घूमेगी?”

“चाची, कपड़े धोते हुए—”

“मुझे कहानी मत सुना!”

कमला ने दांत भींचे।

“आज बहुत बड़े लोग आ रहे हैं। सामने ज्यादा मत दिखना। समझी?”

साक्षी ने सिर झुका लिया।

“जी।”

“और ट्रे गिराई न, तो आज खाना भूल जाना।”

साक्षी के चेहरे पर दर्द की एक हल्की रेखा उभरी।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

कुछ ही देर बाद हवेली के बाहर अचानक कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।

एक के बाद एक चार काली लग्जरी कारें मुख्य द्वार के सामने आकर रुकीं।

सुरक्षाकर्मी तेजी से उतरे।

मुख्य दरवाजा खुला।

हॉल में बैठे लोग एक साथ खड़े हो गए।

और अगले ही पल वह आदमी अंदर आया जिसका नाम पूरे शहर में ताकत और दौलत के साथ लिया जाता था।

रियांश सिंह राठौड़।

करीब छह फीट लंबा कद।

काले रंग का सिला हुआ सूट।

चेहरे पर गंभीरता।

आंखों में ऐसी ठंडक कि सामने वाला अपनी बात कहने से पहले दो बार सोचे।

कहा जाता था कि रियांश ने अपने पिता के डूबते हुए कारोबार को सिर्फ सात साल में अरबों के साम्राज्य में बदल दिया था।

राठौड़ इंडस्ट्रीज।

रियल एस्टेट।

होटल।

एक्सपोर्ट।

टेक्नोलॉजी।

शहर के आधे बड़े प्रोजेक्टों पर उसका नाम किसी न किसी रूप में जुड़ा था।

लेकिन उसकी दौलत से ज्यादा चर्चा उसके स्वभाव की थी।

वह कम बोलता था।

मुस्कुराता उससे भी कम था।

और गलत बात बर्दाश्त बिल्कुल नहीं करता था।

महेश दौड़ता हुआ आगे आया।

“स्वागत है रियांश साहब! हमारे छोटे से घर को आपने—”

रियांश ने सिर्फ हल्का सा सिर हिलाया।

उसकी नजर हॉल में घूमी।

रिया मुस्कुराते हुए आगे आई।

“हैलो मिस्टर राठौड़।”

“हैलो।”

बस इतना।

रिया की मुस्कान हल्की पड़ गई।

कमला ने तुरंत बात संभाली।

“रिया ने आपके लिए खास इंतजाम किए हैं।”

रियांश ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह सोफे पर बैठ गया।

उसी समय साक्षी भारी ट्रे लेकर किचन से बाहर आई।

उसके कदम धीमे थे।

हाथ थकान से कांप रहे थे।

ट्रे में छह गिलास थे।

साक्षी की कोशिश थी कि वह किसी की नजर में आए बिना ट्रे रखकर लौट जाए।

लेकिन रियांश की नजर उस पर पड़ चुकी थी।

उसने एक पल साक्षी को देखा।

फिर दोबारा देखा।

न कोई गहना।

न मेकअप।

न सजे हुए बाल।

पीला सा साधारण सूट।

भीगी आस्तीनें।

हाथों पर साबुन से पड़ी लाल दरारें।

चेहरे पर थकावट।

और आंखों में एक अजीब सी खामोश उदासी।

वह बाकी सब लोगों से अलग लग रही थी।

इतनी अलग कि रियांश रिया की बात सुनते-सुनते चुप हो गया।

साक्षी धीरे-धीरे उसके पास पहुंची।

लेकिन तभी उसकी नजर धुंधली हुई।

पेट में तेज ऐंठन हुई।

उसने खुद को संभालने की कोशिश की।

अचानक उसका पैर कालीन के मुड़े हुए कोने में अटक गया।

ट्रे उसके हाथ से छूट गई।

एक गिलास घूमता हुआ नीचे गिरा।

और संतरे का जूस सीधे रियांश के महंगे चमड़े के जूतों पर जा गिरा।

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।

साक्षी की सांस रुक गई।

उसके हाथ हवा में ही ठहर गए।

“म…माफ कीजिए…”

लेकिन वह अपनी बात पूरी करती उससे पहले—

चटाक!

एक तेज तमाचा उसके गाल पर पड़ा।

साक्षी का चेहरा एक तरफ घूम गया।

कमला गुस्से से कांप रही थी।

“नालायक!”

हॉल में बैठे कई लोगों ने नजरें फेर लीं।

रिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई।

साक्षी ने धीरे से अपना गाल पकड़ लिया।

आंखों में पानी भर आया।

कमला चिल्लाई—

“तुझे एक काम दिया जाता है और वह भी ठीक से नहीं होता!”

फिर उसने रियांश की तरफ देखा।

“माफ कीजिएगा साहब। अनाथ लड़की है। हमने दया करके घर में रख लिया है। दिमाग भी थोड़ा कमजोर है।”

साक्षी ने तुरंत सिर उठाया।

उसके चेहरे पर चोट से ज्यादा तकलीफ उन शब्दों की थी।

कमला ने उसकी बांह पकड़कर झटका दिया।

“निकल यहां से!”

साक्षी लड़खड़ा गई।

वह बिना कुछ बोले वहां से भाग गई।

दरवाजा बंद हुआ।

और रियांश की नजर उसी दिशा में अटक गई।

महेश हंसने की कोशिश करते हुए बोला—

“गरीब बच्ची है साहब। समझ नहीं है।”

रियांश ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आंखों की ठंडक अचानक और गहरी हो गई।

“गरीब?”

महेश की हंसी रुक गई।

“ज…जी?”

“कुछ नहीं।”

रियांश ने अपना रुमाल निकाला।

जूतों पर गिरे जूस को खुद साफ किया।

रिया फिर उसके पास आ बैठी।

लेकिन अब रियांश का ध्यान वहां नहीं था।

उधर साक्षी हवेली के पिछले बरामदे में दीवार के सहारे बैठी थी।

उसने होंठ भींच लिए ताकि आवाज बाहर न निकले।

लेकिन आंसू रुक नहीं रहे थे।

गाल जल रहा था।

पीठ दुख रही थी।

पेट भूख से सिकुड़ रहा था।

उसने कांपते हाथों से अपने चेहरे को ढक लिया।

“मम्मी…”

उसकी आवाज टूट गई।

“आप मुझे अपने साथ क्यों नहीं ले गईं?”

रात गहरी हो गई।

मेहमान जा चुके थे।

रिया नाराज थी क्योंकि रियांश ने जाते समय उससे कोई खास बात नहीं की थी।

महेश और कमला भी निराश थे।

लेकिन उन्हें क्या पता था कि असली तूफान अभी आने वाला था।

रात के बारह बजने के कुछ मिनट बाद हवेली के बाहर फिर वही काली कार रुकी।

महेश चौंक गया।

“इतनी रात को?”

दरवाजा खुला।

रियांश अंदर आया।

इस बार उसके साथ कोई मेहमान नहीं था।

सिर्फ उसका निजी वकील और एक सुरक्षा अधिकारी।

कमला जल्दी से मुस्कुराई।

“रियांश साहब! आप? रिया तो सो गई है। मैं अभी उसे—”

“मुझे रिया से नहीं मिलना।”

रियांश की आवाज सीधी थी।

महेश ने पूछा—

“फिर?”

“उस लड़की को बुलाइए।”

“कौन?”

“जिसे आपने आज सबके सामने थप्पड़ मारा था।”

कमला का चेहरा बदल गया।

“साक्षी?”

“हां।”

कुछ मिनट बाद साक्षी अपने छोटे से कमरे में बैठी थी जब दरवाजा खुला।

कमला भीतर आई।

“बाहर चल।”

साक्षी सहम गई।

“क्या हुआ?”

“बहुत सवाल मत पूछ।”

साक्षी जैसे ही कमरे से बाहर निकली, सामने रियांश को देखकर उसके कदम रुक गए।

उसे लगा शायद वह जूते खराब करने का हिसाब लेने आया है।

उसने तुरंत हाथ जोड़ दिए।

“मुझसे गलती हो गई थी। मेरे पास आपके जूतों के पैसे नहीं हैं, लेकिन मैं काम करके—”

“बस।”

रियांश ने कहा।

साक्षी चुप हो गई।

उसने पहली बार उसके कमरे की तरफ देखा।

एक टूटा हुआ पलंग।

पुराना पंखा।

कोने में लोहे का संदूक।

दीवार पर माता-पिता की धुंधली तस्वीर।

यह वही हवेली थी जहां कुछ घंटे पहले उसने लाखों की सजावट देखी थी।

लेकिन इस लड़की का कमरा किसी नौकर के कमरे से भी बदतर था।

रियांश की नजर महेश पर गई।

“यह यहीं रहती है?”

महेश हकलाया—

“जी… इसे सादगी पसंद है।”

रियांश ने कुछ नहीं कहा।

उसने अपनी जेब से चेकबुक निकाली।

कमला की आंखें चमक उठीं।

“मुझे साक्षी अपने साथ ले जानी है।”

कमरे में खामोशी छा गई।

साक्षी ने डरकर उसकी तरफ देखा।

महेश ने पूछा—

“क…किसलिए?”

रियांश ने बिना पलक झपकाए कहा—

“कल सुबह कानूनी तौर पर इससे शादी करूंगा।”

“क्या?”

कमला के मुंह से निकला।

साक्षी पीछे हट गई।

रिया जो आवाज सुनकर दरवाजे तक आई थी, वहीं जम गई।

“यह मजाक है!”

रिया चीखी।

रियांश ने उसे देखा तक नहीं।

महेश के भीतर का लालच धीरे-धीरे डर पर भारी पड़ने लगा।

उसने गला साफ किया।

“देखिए साहब… साक्षी हमारी जिम्मेदारी है। हमने इसे पाला है। बहुत खर्चा किया है।”

साक्षी ने हैरानी से चाचा को देखा।

रियांश के होंठों पर बेहद ठंडी मुस्कान आई।

“कितना खर्च?”

महेश चुप।

कमला तुरंत बोली—

“अरे साहब, पैसे से क्या रिश्ते खरीदे जाते हैं?”

रियांश ने चेक पर कुछ लिखा।

पन्ना फाड़कर मेज पर रख दिया।

“पच्चीस लाख।”

महेश के चेहरे का रंग बदल गया।

कमला की आंखें फैल गईं।

रिया अविश्वास से मां को देखती रह गई।

साक्षी को लगा जैसे कमरे की हवा खत्म हो गई हो।

उसने कांपती आवाज में कहा—

“आप लोग… सच में…”

उसकी बात अधूरी रह गई।

महेश ने चेक उठा लिया।

साक्षी के चेहरे पर जो कुछ बचा था, वह भी टूट गया।

रियांश ने उसकी तरफ देखा।

“चलो।”

साक्षी वहीं खड़ी रही।

“मैं… आपके साथ क्यों जाऊं?”

“क्योंकि यहां रहना तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है।”

“लेकिन आपने भी पैसे दिए हैं।”

उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

“फिर फर्क क्या है?”

कमरे में खामोशी छा गई।

पहली बार किसी ने रियांश से इस तरह सवाल किया था।

वह कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर बोला—

“फर्क तुम्हें अभी समझ नहीं आएगा।”

उसने उसके पास जाकर बहुत धीमे स्वर में कहा—

“लेकिन आज रात तुम्हें यहां नहीं छोड़ सकता।”

साक्षी ने पीछे मुड़कर चाचा-चाची की तरफ देखा।

कमला चेक को ऐसे पकड़े थी जैसे उसे खजाना मिल गया हो।

महेश हिसाब लगाने में लगा था।

रिया गुस्से से जल रही थी।

किसी की आंखों में उसके लिए चिंता नहीं थी।

साक्षी ने एक लंबी सांस ली।

फिर पिता की तस्वीर उठाई।

उसे अपने सीने से लगाया।

और बिना कुछ कहे रियांश के पीछे चल पड़ी।

काली कार रात की सड़कों पर दौड़ रही थी।

साक्षी खिड़की से बाहर देख रही थी।

शहर की रोशनियां तेजी से पीछे छूट रही थीं।

उसने अपने घुटनों को दोनों बाहों से पकड़ रखा था।

रियांश सामने बैठा था।

कुछ मिनट तक दोनों के बीच चुप्पी रही।

आखिर साक्षी ने पूछा—

“क्या आपकी जिंदगी में पहले से कोई है?”

“नहीं।”

“फिर मुझसे शादी क्यों?”

रियांश ने बाहर देखते हुए कहा—

“क्योंकि आज जिस तरह तुम्हें अपमानित किया गया… वह मैंने पहले भी देखा है।”

“कहां?”

रियांश ने उत्तर नहीं दिया।

कुछ देर बाद कार एक विशाल लोहे के गेट के सामने रुकी।

ऊपर लिखा था—

राठौड़ पैलेस।

गेट खुला।

साक्षी की आंखें फैल गईं।

संगमरमर की लंबी सीढ़ियां।

फव्वारे।

रोशनी में नहाए पेड़।

दूर तक फैला बगीचा।

यह घर नहीं, किसी फिल्म का महल लगता था।

साक्षी कार से उतरी तो अपनी चप्पलों की तरफ देखने लगी।

उसे डर था कि कहीं उसकी धूल से चमकता फर्श गंदा न हो जाए।

रियांश ने उसकी झिझक देख ली।

“यह फर्श तुम्हारे पैरों से महंगा नहीं है।”

साक्षी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

वह आगे बढ़ गया।

ऊपर की मंजिल पर एक विशाल कमरे का दरवाजा खोला गया।

“आज से यह तुम्हारा कमरा है।”

साक्षी ने अंदर देखा।

मुलायम बिस्तर।

सफेद परदे।

खिड़की से दिखाई देता शहर।

फूलों का गुलदस्ता।

अलमारी में नए कपड़े।

उसकी आंखों में अविश्वास था।

“मेरे लिए?”

“हां।”

“मैं यहां क्या करूंगी?”

“जो तुम करना चाहो।”

साक्षी ने धीरे से पूछा—

“नौकरानी का काम?”

रियांश के कदम रुक गए।

“नहीं।”

“फिर?”

वह उसकी तरफ मुड़ा।

साक्षी ने साहस जुटाया।

“क्या आप मुझे मारेंगे?”

रियांश का चेहरा बदल गया।

“क्या?”

“अगर मुझसे कोई गलती हो गई तो?”

उसका स्वर इतना मासूम था कि रियांश कुछ पल बोल नहीं सका।

फिर उसने बेहद शांत स्वर में कहा—

“मेरी तरफ देखो।”

साक्षी ने डरते हुए नजरें उठाईं।

“मैंने तुम्हें खरीदा नहीं है।”

“लेकिन आपने पैसे—”

“वे पैसे तुम्हारी कीमत नहीं थे।”

रियांश ने उसकी बात काटी।

“वे उन लोगों की असलियत की कीमत थे।”

साक्षी चुप हो गई।

“उन्होंने तुम्हें पच्चीस लाख के लिए छोड़ दिया।”

वह बोला।

“अब मैं यह जानता हूं कि वे तुम्हारे रिश्तेदार नहीं, तुम्हारे दुश्मन हैं।”

रियांश की आंखों में कठोरता लौट आई।

“और एक बात याद रखना।”

वह थोड़ा करीब आया।

“रियांश सिंह राठौड़ की पत्नी किसी के सामने सिर झुकाकर नहीं जीती।”

साक्षी की सांसें थम गईं।

“लेकिन मैं आपकी पत्नी नहीं हूं।”

“कल कागज भी यही कहेंगे।”

“और मेरा दिल?”

इस प्रश्न पर रियांश पहली बार बिल्कुल चुप रह गया।

फिर धीरे से बोला—

“तुम्हारे दिल पर मेरा कोई अधिकार नहीं होगा।”

वह मुड़ा।

“जब तक तुम खुद न चाहो।”

दरवाजा बंद हुआ।

साक्षी ने उस बंद दरवाजे को लंबे समय तक देखा।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह आदमी कठोर है या दयालु।

रक्षक है या कोई नया रहस्य।

कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई।

एक बुजुर्ग महिला अंदर आई।

“आ जाऊं बिटिया?”

साक्षी ने सिर हिलाया।

महिला के हाथ में खाने की ट्रे थी।

“मेरा नाम शारदा है। सब शारदा मां कहते हैं।”

उन्होंने ट्रे सामने रखी।

गरम रोटी।

पनीर की सब्जी।

दाल।

चावल।

खीर।

साक्षी खाने को देखकर कुछ पल स्थिर रही।

“क्या हुआ?”

शारदा मां ने पूछा।

“कुछ नहीं।”

उसने रोटी उठाई।

पहला निवाला मुंह में जाते ही उसकी आंखें भर आईं।

फिर वह जल्दी-जल्दी खाने लगी।

शारदा मां उसे देखती रहीं।

“धीरे खाओ बिटिया।”

साक्षी रुक गई।

उसे शर्म आई।

“माफ कीजिए।”

“माफी किस बात की?”

शारदा मां का चेहरा नरम पड़ गया।

“सुबह से खाना नहीं खाया था?”

साक्षी चुप रही।

उसकी चुप्पी ने उत्तर दे दिया।

शारदा मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“अब भूखी मत रहना।”

बस इतना सुनना था।

साक्षी फूट पड़ी।

शारदा मां ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

कई महीनों बाद किसी ने उसे ऐसे छुआ था जिसमें आदेश नहीं, अपनापन था।

अगली सुबह राठौड़ परिवार के निजी मंदिर में सादगी से विवाह की कानूनी और पारिवारिक रस्में हुईं।

न कोई भारी भीड़।

न मीडिया।

न दिखावा।

साक्षी ने साधारण लाल साड़ी पहनी।

रियांश सफेद शेरवानी में था।

जब उसने साक्षी के गले में मंगलसूत्र पहनाया, उसकी उंगलियां हल्का सा कांपीं।

रियांश ने महसूस किया।

लेकिन कुछ कहा नहीं।

रात में साक्षी कमरे के एक किनारे बैठी रही।

रियांश अंदर आया।

साक्षी तुरंत सीधी हो गई।

उसके चेहरे पर डर पढ़ा जा सकता था।

रियांश ने दूरी बनाए रखी।

“तुम यहां सो सकती हो।”

उसने बेड की तरफ इशारा किया।

“और आप?”

“सोफा काफी बड़ा है।”

साक्षी ने उसकी तरफ देखा।

“आप सच में…”

“साक्षी।”

रियांश ने उसकी बात काटी।

“तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं होगा।”

उसने अपना तकिया उठाया।

“जब तक तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं होता, मैं तुम्हारी सीमा के बाहर रहूंगा।”

साक्षी कुछ नहीं बोली।

लेकिन उस रात पहली बार उसके भीतर का डर थोड़ा कम हुआ।

कुछ दिनों बाद साक्षी की पहली रसोई की रस्म थी।

शारदा मां ने कहा—

“जो तुम्हें सबसे अच्छा आता है वही बनाओ।”

साक्षी मुस्कुराई।

“मां मुझे सूजी का हलवा और आलू की पूरी सिखाती थीं।”

“तो आज वही बनेगा।”

वह रसोई में काम कर रही थी कि पीछे से किसी महिला की आवाज आई—

“तो तुम हो वो पच्चीस लाख वाली लड़की?”

साक्षी मुड़ी।

सामने लंबी, खूबसूरत और बेहद आत्मविश्वासी महिला खड़ी थी।

तान्या मेहरा।

रियांश की पुरानी बिजनेस सहयोगी।

और वह महिला जो वर्षों से उम्मीद लगाए बैठी थी कि एक दिन रियांश उससे शादी करेगा।

तान्या ने साक्षी को ऊपर से नीचे देखा।

“कमाल है।”

वह हंसी।

“मैंने सोचा था कम से कम कोई मॉडल होगी।”

साक्षी चुप रही।

“या किसी बड़े परिवार की बेटी।”

तान्या थोड़ा और करीब आई।

“लेकिन तुम तो सच में नौकरानी जैसी लगती हो।”

साक्षी के हाथ रुक गए।

उसने चूल्हे की तरफ देखा।

तान्या फुसफुसाई—

“ध्यान रखना। पैसा देकर घर में लाई गई चीजें अक्सर घर की मालकिन नहीं बनतीं।”

तभी पीछे से आवाज आई—

“बस।”

तान्या का चेहरा बदल गया।

रियांश दरवाजे पर खड़ा था।

उसकी आंखों में गुस्सा था।

“रियांश, मैं तो सिर्फ—”

“तुम सिर्फ मेरी पत्नी का अपमान कर रही थीं।”

“पत्नी?”

तान्या ने तिरस्कार से कहा।

“एक लड़की जिसे तुमने—”

“एक शब्द और नहीं।”

रियांश की आवाज ऊंची नहीं थी।

लेकिन इतनी कठोर थी कि तान्या चुप हो गई।

“साक्षी इस घर की मालकिन है।”

उसने कहा।

“जिसे यह सम्मान देना नहीं आता, उसके लिए इस घर का दरवाजा खुला नहीं है।”

तान्या की आंखें भर आईं।

वह तेजी से बाहर चली गई।

साक्षी ने नीचे देखा।

रियांश उसके पास आया।

“ठीक हो?”

“मुझे आदत है।”

साक्षी ने धीमे से कहा।

रियांश की भौहें तन गईं।

“अब यह आदत बदलनी होगी।”

साक्षी ने पहली बार हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ देखा।

“आप हर बार मेरी रक्षा करेंगे?”

रियांश कुछ क्षण चुप रहा।

“जब तक तुम खुद करना नहीं सीख जाती।”

यह जवाब साक्षी के दिल में उतर गया।

शाम को मेहमानों ने उसके बनाए खाने की बहुत तारीफ की।

मिस्टर खन्ना ने हंसते हुए कहा—

“रियांश, बिजनेस की पसंद अच्छी थी यह तो सब जानते हैं। आज पता चला जिंदगी की पसंद उससे भी अच्छी है।”

साक्षी शर्म से लाल हो गई।

रियांश ने सिर्फ उसकी तरफ देखा।

लेकिन उसकी आंखों में गर्व साफ था।

उसी रात दोनों बगीचे में बैठे थे।

चांदनी सफेद फूलों पर पड़ रही थी।

साक्षी ने धीरे से पूछा—

“आपने मुझमें क्या देखा था?”

“क्या मतलब?”

“इतनी लड़कियां थीं वहां।”

वह मुस्कुराई।

“रिया भी।”

रियांश ने सामने देखा।

“सब मुझे प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।”

फिर उसने साक्षी की तरफ देखा।

“तुम सिर्फ खुद को संभालने की कोशिश कर रही थीं।”

साक्षी चुप।

“और तुम्हारी आंखों में एक सवाल था।”

“कौन सा?”

“क्या दुनिया में कोई ऐसा इंसान बचा है जिस पर भरोसा किया जा सके?”

साक्षी की मुस्कान गायब हो गई।

“शायद था।”

“था?”

रियांश ने पूछा।

साक्षी ने धीमे से कहा—

“अब लगता है शायद है।”

उनके बीच कुछ बदल रहा था।

धीरे-धीरे।

बिना किसी घोषणा के।

साक्षी अब रियांश के आने का इंतजार करने लगी।

रियांश ऑफिस से देर करता तो वह शारदा मां से पूछती—

“आज बहुत काम है क्या?”

और जब कार की आवाज आती, उसके चेहरे पर अनजाने ही मुस्कान आ जाती।

एक शाम वह कॉफी लेकर रियांश के स्टडी रूम में गई।

दरवाजा आधा खुला था।

रियांश के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में एक खूबसूरत महिला एक छोटे बच्चे को गोद में लिए मुस्कुरा रही थी।

साक्षी धीरे से बोली—

“आपकी मां?”

रियांश ने तस्वीर नीचे रख दी।

“हां।”

“बहुत सुंदर थीं।”

“बहुत कमजोर भी थीं।”

साक्षी ने उसकी तरफ देखा।

रियांश की आंखों में पहली बार दर्द खुलकर दिखाई दिया।

“मेरे पिता बेहद अमीर परिवार से थे। लेकिन उन्हें रिश्तों से ज्यादा पैसा पसंद था।”

वह धीरे-धीरे बोलने लगा।

“मेरी मां एक साधारण परिवार से थीं। शादी के बाद पिता हर दिन उन्हें याद दिलाते थे कि वह उन्हें खरीदकर लाए हैं।”

साक्षी की उंगलियां कप के हैंडल पर कस गईं।

“जब उनका परिवार आर्थिक संकट में था, मेरे पिता ने मदद के बदले यह शादी करवाई।”

रियांश की आवाज भारी हो गई।

“मैं छोटा था। सब समझता नहीं था।”

उसने तस्वीर उठा ली।

“लेकिन उनकी आंखों का डर समझता था।”

साक्षी उसके पास बैठ गई।

“एक रात मां ने मुझसे कहा था…”

रियांश रुक गया।

“क्या?”

“अगर कभी ताकतवर बनो, तो अपनी ताकत किसी को दबाने के लिए नहीं… किसी को खड़ा करने के लिए इस्तेमाल करना।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“मैं उन्हें बचा नहीं पाया।”

“आप बच्चे थे।”

“लेकिन वह एहसास कभी नहीं गया।”

उसने साक्षी की तरफ देखा।

“उस दिन जब कमला ने तुम्हें सबके सामने थप्पड़ मारा… मुझे मां दिखाई दीं।”

साक्षी की आंखें भर आईं।

उसने धीरे से अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

“आपने मुझे बचा लिया।”

रियांश ने उसकी उंगलियों को देखा।

फिर पहली बार उन्हें बहुत सावधानी से पकड़ लिया।

“नहीं।”

वह बोला।

“मैं चाहता हूं कि एक दिन तुम खुद को बचाने के लिए किसी रियांश की जरूरत महसूस न करो।”

इधर पुरानी हवेली में अलग कहानी चल रही थी।

पच्चीस लाख का बड़ा हिस्सा महेश कुछ ही हफ्तों में गंवा चुका था।

गलत निवेश।

जुआ।

दिखावा।

कर्ज।

कमला का महंगा शौक।

रिया की खरीदारी।

पैसा उतनी ही तेजी से गायब हुआ जितनी तेजी से आया था।

एक रात महेश ने गुस्से में गिलास मेज पर पटका।

“सब उस साक्षी की वजह से है!”

कमला चिल्लाई—

“उसकी वजह से? पैसा तुमने उड़ाया है!”

“वह अब करोड़पति के घर बैठी है!”

महेश ने कहा।

“और हम यहां कर्ज में डूब रहे हैं!”

रिया ने कड़वाहट से कहा—

“जिस जगह मुझे होना चाहिए था, वहां वह बैठी है।”

कमला अचानक शांत हो गई।

उसकी आंखों में चालाकी उतर आई।

“तो उसे याद दिलाना पड़ेगा कि वह है कौन।”

“कैसे?”

“सुना है अगले हफ्ते रियांश बहुत बड़ी पार्टी दे रहा है।”

कमला मुस्कुराई।

“हम वहीं जाएंगे।”

पार्टी की रात राठौड़ पैलेस जगमगा रहा था।

शहर के बड़े उद्योगपति, कलाकार, अधिकारी और मीडिया से जुड़े लोग मौजूद थे।

साक्षी ने गहरे नीले रंग की सिल्क साड़ी पहनी थी।

गले में रियांश का दिया एक साधारण लेकिन खूबसूरत हीरे का हार था।

वह सीढ़ियों से नीचे आई तो रियांश कुछ क्षण उसे देखता रह गया।

साक्षी उसके सामने आकर रुकी।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“फिर देख क्यों रहे हैं?”

रियांश ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“यकीन कर रहा हूं कि तुम वही लड़की हो जो पहले दिन मुझसे पूछ रही थी कि क्या यहां भी नौकरानी बनना पड़ेगा।”

साक्षी हंस पड़ी।

“अभी भी खाना तो मैं ही बनाती हूं।”

“क्योंकि तुम्हें पसंद है।”

“जी।”

“इसलिए।”

तभी मुख्य दरवाजे पर हलचल हुई।

साक्षी की मुस्कान जम गई।

महेश और कमला अंदर आ रहे थे।

बिना निमंत्रण।

साक्षी की उंगलियां कांपने लगीं।

रियांश ने महसूस किया।

उसने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।

कमला जोर से बोली—

“अरे वाह! हमारी बेटी तो हमें पहचानना ही भूल गई!”

कई लोग मुड़े।

साक्षी का चेहरा सफेद पड़ गया।

महेश ने ऊंची आवाज में कहा—

“बड़े घर की बहू बनते ही गरीब रिश्तेदार अच्छे नहीं लगते।”

रियांश आगे बढ़ा।

“आप दोनों यहां क्यों आए हैं?”

कमला हंसी।

“अपनी बच्ची से मिलने।”

“झूठ।”

रियांश का उत्तर सीधा था।

महेश का चेहरा कस गया।

“साहब, इतनी नाराजगी क्यों?”

वह जानबूझकर जोर से बोला—

“आखिर हमने साक्षी आपको सिर्फ पच्चीस लाख में दी थी।”

चारों तरफ खुसर-पुसर शुरू हो गई।

साक्षी की आंखें नम हो गईं।

महेश ने मौका देखकर कहा—

“अब वह यहां रानी बनकर बैठी है। तो सोचा थोड़ा हिस्सा हमें भी—”

“बस!”

आवाज रियांश की नहीं थी।

साक्षी की थी।

सबकी नजरें उसकी तरफ मुड़ गईं।

उसकी आंखों में आंसू थे।

लेकिन इस बार उनमें डर नहीं था।

वह धीरे-धीरे चाचा के सामने पहुंची।

“आपने अभी क्या कहा?”

महेश थोड़ा हिचका।

“साक्षी, देख बेटा—”

“बेटा?”

साक्षी की आवाज टूटकर भी मजबूत थी।

“जब मम्मी-पापा गए थे तब आपने कहा था आप मेरे पिता हैं।”

महेश नजरें चुराने लगा।

“फिर आपने मेरी पढ़ाई बंद करवाई।”

एक कदम।

“मेरे कागज अपने पास रखे।”

एक और कदम।

“मुझसे नौकरानी जैसा काम करवाया।”

कमला बोली—

“हमने तुझे पाला है!”

साक्षी ने उसकी तरफ देखा।

“पालना?”

उसके होंठ कांपे।

“दिन में एक रोटी देकर?”

कमला चुप।

“बुखार में काम करवाकर?”

सन्नाटा।

“मेरी मां के गहने बेचकर?”

कमला का चेहरा उड़ गया।

यह बात शायद किसी को पता नहीं थी।

साक्षी की आंखों में आग थी।

“रिश्ते खून से नहीं बनते चाची।”

वह बोली।

“रिश्ते तब बनते हैं जब कोई आपके टूटने पर आपको संभाले।”

उसने रियांश की तरफ देखा।

“आप लोगों ने मुझे बेचा था।”

फिर आवाज कठोर हुई।

“इन्होंने मुझे सम्मान दिया।”

महेश गुर्राया—

“बहुत जुबान चलने लगी है तेरी!”

रियांश एक कदम आगे बढ़ा।

महेश तुरंत चुप हो गया।

लेकिन साक्षी ने रियांश का हाथ रोक दिया।

“नहीं।”

सब चौंके।

“आज मुझे बोलने दीजिए।”

रियांश पीछे हट गया।

साक्षी ने चाचा-चाची से कहा—

“आज के बाद अगर आप मेरे पास पैसे मांगने आए… या इस घर में तमाशा किया… तो रिश्ता नहीं, कानून बात करेगा।”

महेश हंसा।

“कानून?”

उसने तिरस्कार से कहा।

“तेरे पास है क्या?”

साक्षी कुछ बोलती उससे पहले रियांश की नजर दूर खड़े अपने वकील अरविंद शर्मा से मिली।

अरविंद ने बहुत हल्का सा सिर हिलाया।

रियांश की आंखों में एक रहस्यमयी चमक आई।

“जल्दी पता चल जाएगा।”

उसने कहा।

सिक्योरिटी ने महेश और कमला को बाहर निकाल दिया।

लेकिन उस रात असली कहानी शुरू हुई।

मेहमानों के चले जाने के बाद अरविंद एक मोटी फाइल लेकर रियांश के स्टडी रूम में पहुंचा।

“सर।”

उसने फाइल सामने रखी।

“जांच पूरी हो गई।”

रियांश ने फाइल खोली।

पहला पन्ना देखकर उसकी आंखें सिकुड़ गईं।

“यह असली है?”

“जी।”

“फॉरेंसिक?”

“दस्तखत मैच हो चुके हैं।”

अरविंद ने कहा।

“साक्षी के पिता ने अपनी मृत्यु से आठ महीने पहले वसीयत बनाई थी।”

रियांश पढ़ता रहा।

“सारी जमीन…”

“साक्षी के नाम।”

“हवेली?”

“साक्षी के नाम।”

“बैंक खाते?”

“साक्षी।”

“कंपनी के शेयर?”

“साक्षी।”

रियांश ने अगला पन्ना पलटा।

“तो महेश ने?”

“फर्जी वसीयत बनाई।”

अरविंद ने जवाब दिया।

“पुराने वकील को रिश्वत दी गई। संपत्ति ट्रांसफर करवाई गई। कुछ कागजों पर साक्षी के नकली हस्ताक्षर भी हैं।”

रियांश की मुट्ठी बंद हो गई।

“कुल कीमत?”

अरविंद ने कहा—

“आज की बाजार कीमत के हिसाब से करीब एक सौ तीन करोड़।”

कुछ पल कमरे में बिल्कुल खामोशी रही।

फिर रियांश ने पूछा—

“और सबूत?”

“बैंक रिकॉर्ड।”

एक फाइल खुली।

“रिश्वत का भुगतान।”

दूसरी फाइल।

“सीसीटीवी फुटेज।”

तीसरी।

“पुराने रजिस्ट्रार का बयान।”

रियांश ने कुर्सी से पीठ टिकाई।

“पुलिस?”

“कार्रवाई के लिए तैयार है।”

“अभी नहीं।”

अरविंद ने हैरानी से पूछा—

“सर?”

रियांश की नजर खिड़की से बाहर चली गई।

“दो साल से साक्षी के लिए सारे फैसले दूसरे लोग लेते आए हैं।”

वह बोला।

“अब आखिरी फैसला उसका होगा।”

अगली सुबह उसने साक्षी को स्टडी में बुलाया।

लेकिन फाइल नहीं दिखाई।

“तुम पढ़ाई कहां तक कर रही थीं?”

रियांश ने पूछा।

साक्षी हैरान हुई।

“बीकॉम का दूसरा साल।”

“छोड़ना क्यों पड़ा?”

“चाचा ने कहा फीस के पैसे नहीं हैं।”

रियांश के चेहरे पर हल्का तनाव आया।

“दोबारा पढ़ना चाहोगी?”

साक्षी की आंखें चमक उठीं।

“क्या?”

“और मेरे ऑफिस में काम सीखना।”

“मैं?”

“हां।”

वह घबरा गई।

“मुझे बिजनेस नहीं आता।”

“सीखा जा सकता है।”

“लोग हंसेंगे।”

“हंसने दो।”

“मैं गलती कर दूंगी।”

“करो।”

साक्षी उसे देखती रही।

रियांश मुस्कुराया।

“गलती करना अपराध नहीं है। कोशिश न करना जरूर नुकसान है।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पहली बार राठौड़ इंडस्ट्रीज के मुख्य कार्यालय पहुंची।

कांच की ऊंची इमारत।

सैकड़ों कर्मचारी।

तेज कदमों से चलते लोग।

मीटिंग रूम।

बड़ी स्क्रीन।

साक्षी का दिल घबरा रहा था।

उसने धीरे से रियांश की आस्तीन पकड़ी।

“मैं वापस चली जाऊं?”

“नहीं।”

“सब देख रहे हैं।”

“देखने दो।”

“क्यों?”

“क्योंकि कुछ महीनों बाद यही लोग तुम्हें सुनेंगे।”

साक्षी ने अविश्वास से उसकी तरफ देखा।

रियांश ने उसे अलग कैबिन दिया।

लेकिन उसने साफ कहा—

“तुम यहां मेरी पत्नी बनकर नहीं बैठोगी।”

साक्षी चौंकी।

“क्या?”

“यहां तुम्हें अपनी योग्यता से जगह बनानी होगी।”

फिर उसने फाइल सामने रखी।

“आज से शुरुआत।”

साक्षी मुस्कुराई।

“चुनौती दे रहे हैं?”

“हां।”

“ठीक है।”

उस दिन से वह बदलने लगी।

सुबह पढ़ाई।

दिन में ऑफिस।

शाम को बिजनेस रिपोर्ट्स।

रियांश उसे बैलेंस शीट समझाता।

मार्केटिंग टीम बैठकों में शामिल करती।

शारदा मां रात में दूध लेकर आतीं तो कई बार साक्षी फाइलों पर झुकी सो जाती।

धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास लौटने लगा।

एक दिन बोर्ड मीटिंग में एक प्रोजेक्ट की लागत पर चर्चा चल रही थी।

सभी वरिष्ठ अधिकारी एक महंगे प्रस्ताव के पक्ष में थे।

साक्षी चुप बैठी थी।

रियांश ने अचानक पूछा—

“तुम क्या सोचती हो?”

कमरे में सब उसकी तरफ देखने लगे।

साक्षी घबराई।

फिर उसने रिपोर्ट पलटी।

“मुझे लगता है इसमें समस्या है।”

एक अधिकारी मुस्कुराया।

“क्यों?”

“इन तीन सप्लायरों की कीमत अलग-अलग दिख रही है।”

उसने स्क्रीन पर आंकड़े दिखाए।

“लेकिन बैंक विवरण के अनुसार तीनों का भुगतान एक ही खाते से जुड़ा है।”

कमरा शांत हो गया।

रियांश आगे झुक गया।

जांच हुई।

साक्षी सही थी।

कंपनी लाखों की धोखाधड़ी से बच गई।

मीटिंग खत्म होने के बाद रियांश ने पूछा—

“कैसा लग रहा है?”

साक्षी की आंखें चमक रही थीं।

“पहली बार लगा मैं सिर्फ किसी की पत्नी नहीं हूं।”

रियांश ने उत्तर दिया—

“मैं भी यही चाहता था।”

लेकिन दूसरी तरफ महेश और कमला की हालत खराब होती जा रही थी।

कर्ज देने वाले रोज दरवाजे पर आ रहे थे।

फिर एक दिन उन्हें एक निमंत्रण मिला।

राठौड़ इंडस्ट्रीज की महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस।

साथ में निजी संदेश—

“साक्षी से जुड़े वित्तीय मामले पर समझौता।”

महेश की आंखें चमक उठीं।

“मैंने कहा था न!”

उसने कमला से कहा।

“उन्हें डर लग गया है। हमें और पैसे देंगे।”

कमला ने तुरंत नई साड़ी निकाली।

उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह निमंत्रण नहीं…

जाल था।

प्रेस कॉन्फ्रेंस वाले दिन हॉल मीडिया से भरा था।

कैमरे।

पत्रकार।

बिजनेस जगत के लोग।

महेश और कमला सबसे आगे बैठे थे।

चेहरों पर लालच छिपाए नहीं छिप रहा था।

मंच पर रियांश आया।

उसके साथ साक्षी थी।

अब वह वही डरी हुई लड़की नहीं लगती थी।

सफेद साड़ी।

सादा मेकअप।

सीधा आत्मविश्वासी चेहरा।

रियांश ने माइक उठाया।

“आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस हमारे किसी नए कारोबार के बारे में नहीं है।”

फ्लैश चमके।

“यह एक चोरी के बारे में है।”

महेश की मुस्कान हल्की हुई।

पीछे की स्क्रीन जल उठी।

पहले साक्षी के पिता की तस्वीर आई।

साक्षी की सांस अटक गई।

फिर दस्तावेज।

“यह स्वर्गीय राजेंद्र शर्मा की असली वसीयत है।”

साक्षी ने तुरंत रियांश की तरफ देखा।

उसकी आंखों में सवाल था।

रियांश ने सिर झुकाकर संकेत दिया—

हां।

स्क्रीन पर लिखा था—

संपूर्ण संपत्ति की एकमात्र उत्तराधिकारी: साक्षी शर्मा।

साक्षी के हाथ कांपने लगे।

उसने होंठ पर हाथ रख लिया।

महेश अचानक खड़ा हो गया।

“यह झूठ है!”

रियांश ने उसकी तरफ देखा।

“बैठ जाइए।”

“फर्जी है!”

पीछे अगला वीडियो चल पड़ा।

पुराने रजिस्ट्रार कार्यालय का फुटेज।

महेश एक व्यक्ति को लिफाफा देता दिखाई दे रहा था।

फिर बैंक रिकॉर्ड।

फिर नकली हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक रिपोर्ट।

फिर उस वकील का रिकॉर्डेड बयान जिसने पैसे लेकर दस्तावेज बदले थे।

कमला के चेहरे से रंग उड़ गया।

“महेश…”

वह फुसफुसाई।

महेश पीछे हटने लगा।

लेकिन हॉल के दरवाजे खुल चुके थे।

पुलिस अंदर आई।

“महेश शर्मा?”

वह कांप गया।

“आपको धोखाधड़ी, जालसाजी और संपत्ति हड़पने के आरोप में पूछताछ के लिए हमारे साथ चलना होगा।”

कमला रोने लगी।

“नहीं!”

महेश अचानक साक्षी की तरफ दौड़ा।

“बेटा! मुझे बचा ले!”

साक्षी पीछे हट गई।

वही आदमी।

वही आवाज।

जिसने कभी कहा था—

“अब मैं ही तुम्हारा पिता हूं।”

उसकी आंखों के सामने पिछले दो साल घूम गए।

टूटे हाथ।

अधूरी पढ़ाई।

भूखी रातें।

तमाचा।

पच्चीस लाख का चेक।

महेश उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा था।

“बेटा…”

साक्षी ने धीरे से कहा—

“मैं आपकी बेटी उस दिन मर गई थी…”

महेश ने सिर उठाया।

“…जिस दिन आपने मेरी कीमत पच्चीस लाख लगाई थी।”

पूरा हॉल खामोश।

साक्षी की आंखों से आंसू बहे।

“मैं बदला नहीं चाहती।”

उसने कहा।

“मैं सिर्फ अपना हक चाहती हूं।”

फिर पुलिस की तरफ देखा।

“कानून अपना काम करे।”

महेश टूट गया।

कमला रोती रही।

“हमसे गलती हो गई!”

साक्षी ने उसकी तरफ देखा।

“गलती वह होती है चाची जो एक बार हो।”

उसका स्वर धीमा था।

“आपने दो साल तक हर सुबह मुझे तोड़ा है।”

पुलिस दोनों को लेकर जाने लगी।

कमला पीछे मुड़कर चीखी—

“हम तुम्हारे अपने हैं!”

साक्षी ने उत्तर दिया—

“अपने कभी अपनों का सौदा नहीं करते।”

दरवाजा बंद हो गया।

साक्षी की टांगों से जैसे ताकत निकल गई।

रियांश तुरंत उसके पास आया।

उसने उसका हाथ थाम लिया।

“ठीक हो?”

साक्षी ने आंसुओं के बीच कहा—

“मुझे क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि मैं चाहता था सच तुम्हें कमजोर नहीं, मजबूत हालत में मिले।”

“अगर मैं टूट जाती?”

“तो मैं पकड़ लेता।”

साक्षी उसे देखती रह गई।

फिर पहली बार लोगों की परवाह किए बिना उसने रियांश को गले लगा लिया।

कुछ सप्ताह बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई।

साक्षी की सारी संपत्ति उसे वापस मिल गई।

एक सौ करोड़ से अधिक की संपत्ति।

जमीनें।

हवेली।

बैंक खाते।

कंपनी में हिस्सेदारी।

वह चाहती तो पुराने घर को बेच सकती थी।

लेकिन उसने नहीं बेचा।

एक सुबह वह रियांश के साथ उसी हवेली पहुंची।

वही पिछला आंगन।

वही टूटी ईंटें।

वही जगह जहां वह घंटों कपड़े धोती थी।

साक्षी कुछ देर वहां खड़ी रही।

रियांश ने पूछा—

“क्या सोच रही हो?”

“इसे गिरवा दूं?”

उसने पूछा।

“तुम्हारी संपत्ति है।”

साक्षी ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

वह मुड़ी।

“यहां एक स्कूल बनेगा।”

“स्कूल?”

“और एक सुरक्षित आवास।”

उसकी आंखों में दृढ़ता थी।

“उन लड़कियों के लिए जिन्हें परिवार बोझ समझता है।”

रियांश के चेहरे पर गर्व उभरा।

“नाम?”

साक्षी ने सोचा।

“आशा।”

कुछ महीनों में पुरानी हवेली बदलने लगी।

जहां कभी उसकी चीखें दीवारों से टकराकर लौटती थीं, वहां अब बच्चों की हंसी सुनाई देने लगी।

जहां वह भूखी सोती थी, वहां एक बड़ी रसोई बनी।

जहां चाची उसे बंद करती थी, वहां लाइब्रेरी खुली।

साक्षी ने अपने माता-पिता की तस्वीर मुख्य हॉल में लगवाई।

नीचे सिर्फ एक पंक्ति—

“उन्होंने मुझे सपने देखने सिखाए।”

एक शाम उद्घाटन के बाद वह अकेली तस्वीर के सामने खड़ी थी।

“पापा…”

उसने फुसफुसाया।

“आपकी राजकुमारी वापस आ गई।”

पीछे से रियांश की आवाज आई—

“राजकुमारी नहीं।”

साक्षी पलटी।

रियांश मुस्कुराया।

“रानी।”

साक्षी हंस पड़ी।

दोनों का रिश्ता भी अब बदल चुका था।

जो शादी मजबूरी में शुरू हुई थी, उसमें अब इंतजार था।

परवाह थी।

छोटी-छोटी नोकझोंक थी।

एक रात रियांश बहुत देर से घर लौटा।

साक्षी डाइनिंग टेबल पर सो गई थी।

उसके सामने खाना ढका हुआ था।

रियांश ने शारदा मां से पूछा—

“यह अभी तक सोई क्यों नहीं?”

शारदा मां मुस्कुराईं।

“कह रही थी आपके बिना खाना नहीं खाएगी।”

रियांश कुछ पल उसे देखता रहा।

उसने धीरे से साक्षी के कंधे पर शॉल रखी।

साक्षी की आंख खुल गई।

“आ गए?”

“हां।”

वह तुरंत उठी।

“खाना गरम करती हूं।”

“पहले एक बात बताओ।”

“क्या?”

“मेरे लिए इंतजार क्यों?”

साक्षी मुस्कुराई।

“पति हैं मेरे।”

“यह जवाब शादी वाले कागज का है।”

रियांश ने कहा।

“दिल वाला जवाब?”

साक्षी का चेहरा लाल हो गया।

“खाना ठंडा हो रहा है।”

“साक्षी।”

“मुझे भूख लगी है।”

वह भाग गई।

रियांश पहली बार खुलकर हंस पड़ा।

कुछ दिन बाद साक्षी रात में अपने कमरे में आई तो वहां गुलाब की पंखुड़ियां नहीं थीं।

मोमबत्तियों का दिखावा नहीं था।

सिर्फ टेबल पर एक छोटा सा डिब्बा रखा था।

उसके पास एक चिट्ठी।

“खोलो।”

पीछे से रियांश की आवाज आई।

साक्षी ने डिब्बा खोला।

अंदर वही साधारण सा पेन था जैसा उसके पिता उसे पढ़ाई के लिए दिया करते थे।

उसने हैरानी से देखा।

“यह?”

“तुमने बताया था तुम्हारे पिता कहते थे एक दिन तुम बड़े कागजों पर हस्ताक्षर करोगी।”

साक्षी की आंखें भर आईं।

रियांश ने उसके सामने फाउंडेशन के ट्रस्ट दस्तावेज रखे।

“आज से आशा फाउंडेशन की चेयरपर्सन तुम हो।”

साक्षी का हाथ कांप गया।

उसने उसी पेन से हस्ताक्षर किए।

फिर उसने रियांश की तरफ देखा।

“आप हर बार मुझे कुछ ऐसा क्यों देते हैं जिसकी कीमत पैसे से नहीं लगती?”

रियांश ने जवाब दिया—

“क्योंकि जब पहली बार तुम्हें देखा था, तुम्हारी कीमत पैसे में लगाई जा रही थी।”

वह उसके करीब आया।

“मैं चाहता हूं तुम्हें हर दिन याद रहे कि इंसान की कीमत किसी चेक पर नहीं लिखी जा सकती।”

साक्षी रो पड़ी।

“मैं आपसे प्यार करती हूं।”

शब्द अचानक निकल गए।

दोनों स्थिर हो गए।

साक्षी की आंखें फैल गईं।

वह घबराकर पीछे हटने लगी।

“मैं… मेरा मतलब…”

रियांश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“दोबारा कहो।”

“नहीं।”

“साक्षी।”

“बिल्कुल नहीं।”

उसके होंठों पर मुस्कान थी।

रियांश ने पहली बार शरारती अंदाज में कहा—

“मीटिंग में इतनी बहादुर और यहां डर?”

साक्षी ने नजरें नीचे कर लीं।

“मैं आपसे प्यार करती हूं।”

इस बार उसने धीरे से कहा।

रियांश की आंखें नम हो गईं।

उसने साक्षी का चेहरा अपने हाथों में लिया।

“मैं शायद उस दिन से करता हूं जिस दिन तुमने मेरे जूते खराब किए थे।”

साक्षी हंसते हुए रो पड़ी।

“इतने महंगे जूते थे।”

“लेकिन सौदा अच्छा था।”

साक्षी ने उसे हल्का सा धक्का दिया।

“फिर सौदा!”

“ठीक है।”

रियांश हंसा।

“जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला।”

समय गुजरता गया।

एक दिन रियांश ऑफिस से लौटा तो पूरा राठौड़ पैलेस दीयों और फूलों से सजा था।

उसने शारदा मां से पूछा—

“क्या है आज?”

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“आपकी पत्नी से पूछिए।”

साक्षी सीढ़ियों पर खड़ी थी।

चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसमें कोई बड़ा राज छिपा था।

“यह सब क्या है?”

रियांश ने पूछा।

साक्षी नीचे आई।

उसने एक छोटा सा लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

“खुद पढ़िए।”

रियांश ने कागज निकाला।

कुछ सेकंड तक पढ़ता रहा।

फिर जैसे सांस लेना भूल गया।

उसने धीरे से नजर उठाई।

“साक्षी…”

साक्षी की आंखों में खुशी के आंसू थे।

“आप पिता बनने वाले हैं।”

रियांश के हाथ कांप गए।

वह आदमी जिसके सामने बड़े-बड़े उद्योगपति संभलकर बोलते थे…

आज एक छोटे से कागज को पकड़कर रो रहा था।

उसने साक्षी को सीने से लगा लिया।

“सच?”

“जी।”

“बिल्कुल?”

साक्षी हंस पड़ी।

“रिपोर्ट झूठ नहीं बोल रही।”

रियांश घुटनों के बल बैठ गया।

उसने साक्षी के पेट पर हाथ रखा।

“हैलो।”

साक्षी ने हंसते हुए पूछा—

“अभी से?”

“मेरे बच्चे से मेरी पहली मीटिंग है।”

“और एजेंडा?”

“यह बताना कि इसकी मां दुनिया की सबसे बहादुर औरत है।”

साक्षी की आंखों में फिर आंसू आ गए।

कुछ सप्ताह बाद रियांश उसे एक जगह लेकर गया।

कार वही पुरानी हवेली के पास रुकी।

लेकिन वह हवेली अब आशा फाउंडेशन बन चुकी थी।

उसके पीछे खाली जमीन पर एक नया बगीचा तैयार किया गया था।

हजारों गुलाबी गुलाब।

बीच में सफेद संगमरमर की छोटी सी जगह।

साक्षी आश्चर्य से देखती रही।

“यह क्या है?”

रियांश कुछ कदम आगे गया।

फिर घुटनों के बल बैठ गया।

साक्षी ने हैरानी से मुंह पर हाथ रख लिया।

“रियांश…”

उसने अंगूठी निकाली।

“पहली बार मैंने तुमसे पूछा भी नहीं था।”

वह बोला।

“तुम्हें एक जिंदगी से उठाकर दूसरी जिंदगी में ले आया।”

साक्षी की आंखें नम थीं।

“उस समय मैंने सोचा था मैं तुम्हें बचा रहा हूं।”

उसने सिर हिलाया।

“लेकिन सच यह है साक्षी…”

“तुमने मुझे बचाया।”

साक्षी रो पड़ी।

“मेरे भीतर जो इंसान सालों पहले मर गया था, उसे तुमने वापस जिंदा किया।”

उसने अंगूठी आगे बढ़ाई।

“आज कोई सौदा नहीं।”

उसकी आवाज भर्रा गई।

“कोई मजबूरी नहीं।”

“कोई पच्चीस लाख नहीं।”

“सिर्फ मैं हूं।”

“और मेरी पूरी जिंदगी।”

उसने पूछा—

“क्या तुम इस बार अपनी मर्जी से मेरी पत्नी बनना चाहोगी?”

साक्षी की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

वह भी उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।

“आप बहुत देर कर चुके हैं।”

रियांश चौंका।

“क्या?”

साक्षी मुस्कुराई।

“मैं बहुत पहले आपकी हो चुकी हूं।”

दोनों हंस पड़े।

रियांश ने अंगूठी उसके हाथ में पहना दी।

उसी समय साक्षी की नजर संगमरमर की पट्टिका पर गई।

उस पर लिखा था—

“जहां किसी इंसान की कीमत कभी पैसे से नहीं लगाई जाएगी।”

साक्षी ने उसे पढ़ा।

फिर उस पुराने आंगन की तरफ देखा जहां कभी वह गर्मी में अकेली बैठी कपड़े धोती थी।

उसे वह दिन याद आया।

लाल हुए हाथ।

सूखे होंठ।

चाची की चीख।

वह तमाचा।

पच्चीस लाख का चेक।

उस रात उसे लगा था उसकी जिंदगी खत्म हो गई है।

उसे क्या पता था…

जिस सौदे को वह अपनी सबसे बड़ी बेइज्जती समझ रही थी…

वही सौदा उसके अपनों के चेहरे से नकाब उतार देगा।

वही उसे उसकी चोरी हुई विरासत वापस दिलाएगा।

वही उसे एक डरी हुई लड़की से आत्मनिर्भर महिला बनाएगा।

और वही उसे उस आदमी तक ले जाएगा जिसने उसे अपने महल में जगह देने से पहले उसके दिल में खोया हुआ भरोसा वापस लौटाया।

लेकिन किस्मत ने उनकी कहानी में अभी आखिरी पन्ना लिखा ही नहीं था।

उसी शाम, जब रियांश और साक्षी वापस राठौड़ पैलेस पहुंचे, मुख्य दरवाजे पर उनका वकील अरविंद इंतजार कर रहा था।

उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी।

हाथ में एक पुराना भूरा लिफाफा था।

“सर…”

उसने धीमे से कहा।

रियांश रुक गया।

“क्या हुआ?”

अरविंद ने साक्षी की तरफ देखा।

“यह आज आशा फाउंडेशन की पुरानी दीवार तोड़ते समय मिला है।”

साक्षी की भौंहें सिकुड़ गईं।

“क्या?”

अरविंद ने लिफाफा आगे बढ़ाया।

उस पर धुंधली स्याही से लिखा था—

“सिर्फ मेरी बेटी साक्षी के लिए।”

साक्षी की सांस अटक गई।

“यह…”

उसकी उंगलियां कांपने लगीं।

“पापा की लिखावट है।”

रियांश ने तुरंत लिफाफा खोला।

अंदर कुछ तस्वीरें थीं।

एक चाबी।

और एक पुरानी डायरी का पन्ना।

साक्षी ने पढ़ना शुरू किया।

पहली पंक्ति पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“मेरी प्यारी साक्षी,

अगर यह पत्र तुम्हारे हाथ में है, तो इसका मतलब है कि जो दुर्घटना दुनिया को हादसा बताई गई… शायद वह हादसा नहीं था…”

साक्षी के हाथ से पन्ना लगभग छूट गया।

“क्या?”

रियांश की आंखें कठोर हो गईं।

साक्षी ने अगली पंक्ति पढ़ी।

“महेश मेरी संपत्ति चाहता है, लेकिन वह अकेला नहीं है। उसके पीछे ऐसा आदमी है जिसका नाम मैं इस पत्र में नहीं लिख सकता। सबूत मैंने एक बैंक लॉकर में रख दिए हैं। चाबी इसी लिफाफे में होगी…”

साक्षी ने कांपते हाथ से वह छोटी चाबी उठा ली।

उस पर सिर्फ एक नंबर खुदा था—

317।

पत्र की आखिरी पंक्ति पढ़ते ही उसकी सांस जैसे थम गई।

“और साक्षी… अगर कभी तुम्हारी जिंदगी में राठौड़ परिवार का कोई व्यक्ति आए, तो उस पर भरोसा करने से पहले यह जरूर जान लेना कि तुम्हारी मां की कहानी और उनकी कहानी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।”

साक्षी ने धीरे-धीरे चेहरा उठाया।

उसकी नजर रियांश पर टिक गई।

रियांश भी बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

साक्षी की आवाज मुश्किल से निकली—

“मेरी मां का… आपके परिवार से क्या रिश्ता था?”

रियांश के पास जवाब नहीं था।

लेकिन तभी अरविंद के फोन पर संदेश आया।

उसने स्क्रीन देखी।

उसका चेहरा बदल गया।

“सर…”

“क्या हुआ?”

अरविंद ने फोन रियांश की तरफ बढ़ा दिया।

बैंक लॉकर नंबर 317 पिछले चौबीस घंटों में खोलने की कोशिश की गई थी।

और बैंक के कैमरे में जो आदमी दिखाई दिया था…

वह महेश नहीं था।

वह कोई ऐसा व्यक्ति था जिसे देखकर रियांश सिंह राठौड़ के चेहरे से पहली बार पूरी तरह रंग उतर गया।

साक्षी ने धीमे से पूछा—

“कौन है?”

रियांश ने स्क्रीन को कसकर पकड़ लिया।

उसके होंठों से सिर्फ दो शब्द निकले—

“मेरे पिता…”

और उसी पल साक्षी समझ गई—

पच्चीस लाख में हुआ उसका सौदा शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा राज नहीं था।

असली कहानी तो अब शुरू होने वाली थी।

समाप्त!

डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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