बहन की मोहब्बत का बदला लेने निकला आतिफ बेगुनाह सादिया को उठा लाया—लेकिन हवेली के बंद कमरे में खुला ऐसा राज जिसने सब बदल दिया

बहन की मोहब्बत का बदला लेने निकला आतिफ बेगुनाह सादिया को उठा लाया—लेकिन हवेली के बंद कमरे में खुला ऐसा राज जिसने सब बदल दिया
“कहाँ हैं दोनों?”
आतिफ की भारी आवाज़ ने आधी रात के सन्नाटे को ऐसे चीर दिया, जैसे आसमान में अचानक बिजली फट पड़ी हो।
बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। हवेली की ऊँची खिड़कियों पर पानी की धारें लगातार टकरा रही थीं। दूर कहीं बादल गरज रहे थे, लेकिन उस विशाल हॉल के भीतर खड़े लोगों को बारिश से ज्यादा डर उस आदमी की आँखों में दिखाई दे रहे तूफान से लग रहा था।
आतिफ बीच हॉल में खड़ा था।
काली शर्ट की बाँहें कोहनियों तक मुड़ी थीं। जबड़ा कस चुका था। उसकी मुट्ठियाँ इतनी जोर से बंद थीं कि उँगलियों की नसें उभर आई थीं।
सामने राघव और उसके आदमी सिर झुकाए खड़े थे।
“मालिक… हम ढूँढ़ रहे हैं। बस थोड़ा-सा वक्त—”
“वक्त?”
आतिफ ने इतनी धीमी आवाज़ में यह शब्द कहा कि राघव की बाकी बात उसके गले में ही अटक गई।
आतिफ एक कदम आगे आया।
“मेरी बहन मेरे घर से गायब है। वह एक ऐसे लड़के के साथ गई है जिसे मैं जानता तक नहीं… और तुम मुझसे वक्त माँग रहे हो?”
“रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, एयरपोर्ट… हर जगह हमारे आदमी हैं, मालिक। शहर से बाहर जाने वाले रास्तों पर भी—”
“मुझे तुम्हारी सफाई नहीं चाहिए।”
आतिफ की आवाज़ अचानक गूँज उठी।
पूरा हॉल खामोश हो गया।
उसकी छोटी बहन आयरा उसके लिए सिर्फ बहन नहीं थी।
उनके पिता की मौत के बाद आतिफ ने ही उसे पालकर बड़ा किया था। उसकी हर जिद पूरी की। उसके आँसू आने से पहले उसकी परेशानी समझी।
लेकिन शायद यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी।
उसने आयरा को प्यार तो दिया…
आजादी नहीं।
आतिफ को हमेशा लगता रहा कि दुनिया में सिर्फ वही जानता है कि उसकी बहन के लिए क्या सही है।
और उसी शाम आयरा की सगाई शहर के बड़े कारोबारी फ़ैज़ मिर्ज़ा से होने वाली थी।
मेहमान आ चुके थे।
घर रोशनी से जगमगा रहा था।
लेकिन आयरा अपने कमरे से गायब थी।
उसकी मेज पर सिर्फ एक छोटा-सा कागज़ पड़ा था—
“भाई, मुझे माफ कर देना। मैं अपनी जिंदगी किसी सौदे में नहीं दे सकती।”
उस एक पंक्ति ने आतिफ के अहंकार को भीतर तक घायल कर दिया था।
“सुबह होने से पहले आयरा मेरे सामने होनी चाहिए।”
उसने राघव को घूरते हुए कहा।
“लेकिन मालिक…”
“और जिस लड़के के साथ वह गई है, उसे मेरे सामने लाओ। मुझे उससे बात करनी है।”
राघव ने राहत की साँस लेना चाही, लेकिन आतिफ की अगली बात सुनकर उसकी साँस फिर अटक गई।
“मैं जानना चाहता हूँ कि उसमें ऐसा क्या था जिसके लिए मेरी बहन ने अपने पूरे परिवार को छोड़ दिया।”
राघव तुरंत मुड़ा।
तभी आतिफ ने आवाज़ दी—
“राघव।”
वह रुक गया।
“आयरा को कोई नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए।”
“जी, मालिक।”
“एक खरोंच भी नहीं।”
“जी।”
राघव चला गया।
हॉल फिर खामोश हो गया।
आतिफ अकेला खड़ा बारिश देखता रहा।
कुछ देर बाद उसकी माँ, ज़रीन बेगम, सीढ़ियों से नीचे आईं।
“आतिफ।”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
“गुस्से में ऐसा फैसला मत करना जिसका बोझ जिंदगी भर उठाना पड़े।”
आतिफ की आँखें बारिश पर टिकी रहीं।
“अम्मी, उसने पूरे शहर के सामने हमें शर्मिंदा किया है।”
“या शायद वह तुम्हें कुछ बताना चाहती थी और तुमने कभी सुना ही नहीं।”
आतिफ तुरंत पलटा।
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
ज़रीन बेगम की आँखों में दर्द था।
“आयरा उस रिश्ते से खुश नहीं थी।”
“फ़ैज़ में क्या कमी है?”
“बात फ़ैज़ की कमी की नहीं है। बात आयरा की मर्जी की है।”
आतिफ का चेहरा कठोर हो गया।
“उसकी मर्जी उसे अपने भाई की इज्जत मिट्टी में मिलाने की इजाजत नहीं देती।”
ज़रीन बेगम कुछ क्षण उसे देखती रहीं।
फिर बोलीं—
“इज्जत लोगों की खुशी से बड़ी हो जाए, तो घर महल होकर भी जेल बन जाता है, बेटा।”
आतिफ ने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
उसी समय मुख्य दरवाजा खुला।
राघव भीगा हुआ अंदर आया।
“मालिक!”
आतिफ पलटा।
“मिल गए?”
“नहीं… लेकिन लड़के की जानकारी मिल गई।”
आतिफ की आँखें सिकुड़ गईं।
“नाम?”
“अरमान खान।”
“कौन है?”
“एक आर्किटेक्ट है। करीब छह महीने पहले शहर आया था। लेकिन…”
राघव झिझका।
“बोलो।”
“वह मैडम आयरा की सबसे करीबी सहेली सादिया का बड़ा भाई है।”
आतिफ कुछ पल बिल्कुल स्थिर खड़ा रहा।
“सादिया?”
“जी।”
“वही सादिया जो कई बार आयरा से मिलने हवेली आई थी?”
“जी, मालिक।”
आतिफ की आँखों में अचानक कुछ बदल गया।
उसे याद आया।
हल्के नीले कपड़ों में एक लड़की।
सादा चेहरा।
बड़ी आँखें।
वह आयरा के साथ कॉलेज के दिनों से थी।
आतिफ ने उसे कई बार देखा था, मगर कभी ध्यान नहीं दिया।
“तो आयरा और अरमान को मिलाने वाली वही थी?”
राघव ने तुरंत कहा—
“हमारे आदमी ऐसा ही कह रहे हैं।”
“ऐसा ही कह रहे हैं?”
आतिफ की नजर उस पर टिक गई।
राघव घबरा गया।
“मतलब… हमें शक है।”
लेकिन गुस्से में डूबा आतिफ सिर्फ पहली बात सुन चुका था।
“गाड़ियाँ निकालो।”
“मालिक, आप खुद जाएँगे?”
आतिफ ने अपना काला जैकेट उठाया।
“हाँ।”
“लेकिन अगर लड़की को सच में कुछ पता न हो तो?”
यह सवाल राघव ने बहुत धीमे से पूछा।
आतिफ रुक गया।
एक पल के लिए उसकी माँ की बात उसके कानों में गूँजी—
गुस्से में ऐसा फैसला मत करना जिसका बोझ जिंदगी भर उठाना पड़े।
लेकिन अगले ही पल उसने जबड़ा कस लिया।
“तो वह मुझे खुद बता देगी।”
कुछ ही मिनट बाद चार काली गाड़ियाँ हवेली से निकलीं।
बारिश इतनी तेज थी कि सड़क मुश्किल से दिखाई दे रही थी।
दूसरी तरफ शहर के पुराने हिस्से में बने एक छोटे-से घर में सादिया खिड़कियाँ बंद कर रही थी।
उसे नहीं पता था कि अगले कुछ मिनटों में उसकी जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली है।
“अम्मी, आप दवा खा लीजिए।”
उसने रसोई से पानी लाकर माँ के सामने रखा।
“अरमान का फोन आया?”
माँ ने पूछा।
सादिया के हाथ एक पल के लिए रुक गए।
“नहीं।”
“दो दिन से फोन बंद क्यों है उसका?”
“शायद काम में व्यस्त होगा।”
उसने झूठ बोल दिया।
सच्चाई यह थी कि सादिया भी परेशान थी।
अरमान सुबह से फोन नहीं उठा रहा था।
और आयरा का फोन भी बंद था।
उसे दोनों के रिश्ते के बारे में पता जरूर था।
लेकिन आज वे कहाँ थे…
यह वह नहीं जानती थी।
हाँ, आयरा ने कई बार उससे कहा था—
“सादिया, मैं फ़ैज़ से शादी नहीं कर सकती।”
और सादिया ने हमेशा एक ही जवाब दिया था—
“जो फैसला करो, सोचकर करना। भागकर नहीं।”
लेकिन शायद आयरा ने इस बार उसकी बात नहीं मानी थी।
तभी बाहर गाड़ियों के ब्रेक की आवाज़ आई।
सादिया खिड़की के पास गई।
चार काली गाड़ियाँ।
तेज हेडलाइटें।
कई आदमी।
उसका दिल अचानक तेजी से धड़कने लगा।
“अब्बू…”
उसके मुँह से बस इतना निकला।
अगले ही क्षण दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई।
“कौन है?”
उसके पिता नसीर साहब आगे बढ़े।
फिर दूसरी दस्तक।
और तीसरी।
“दरवाजा खोलिए!”
बाहर से आवाज़ आई।
सादिया आगे बढ़ी ही थी कि उसके पिता ने हाथ उठाकर रोक दिया।
“तुम पीछे रहो।”
उन्होंने दरवाजा खोला।
सामने आतिफ खड़ा था।
बारिश में भीगा हुआ।
चेहरा पत्थर जैसा।
उसके पीछे राघव और कुछ आदमी थे।
नसीर साहब ने पूछा—
“आप?”
आतिफ की नजर सीधे अंदर खड़ी सादिया पर गई।
“मुझे इससे बात करनी है।”
“लेकिन आप हैं कौन?”
सादिया आगे आई।
आतिफ ने उसकी आँखों में देखा।
“आतिफ।”
सादिया का चेहरा बदल गया।
नाम वह जानती थी।
आयरा का बड़ा भाई।
“आयरा कहाँ है?”
आतिफ ने पूछा।
सादिया कुछ क्षण चुप रही।
“मुझे नहीं पता।”
“तुम्हारा भाई कहाँ है?”
“मुझे वह भी नहीं पता।”
“दोनों के रिश्ते के बारे में जानती थीं?”
सादिया ने गहरी साँस ली।
“हाँ।”
उस एक शब्द के साथ आतिफ की आँखें और ठंडी हो गईं।
“तो तुमने मेरी बहन से यह बात छिपाई।”
“उसने मुझ पर भरोसा किया था।”
“और मेरे परिवार को धोखा देना तुम्हें ठीक लगा?”
“मैंने किसी को धोखा नहीं दिया।”
सादिया की आवाज़ अब काँप नहीं रही थी।
“आयरा कोई बच्ची नहीं है। वह अपनी जिंदगी का फैसला कर सकती है।”
“मेरी बहन के बारे में मुझे मत सिखाओ।”
“फिर आप उससे पूछते क्यों नहीं कि वह आपसे भागी क्यों?”
कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
राघव तक ने सादिया की तरफ देखा।
किसी ने शायद वर्षों में आतिफ से इस तरह बात नहीं की थी।
आतिफ धीरे-धीरे उसके करीब आया।
“तुम कहना क्या चाहती हो?”
सादिया ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ कि अगर आपकी बहन अपने ही घर से भागी है तो शायद समस्या सिर्फ अरमान नहीं है।”
आतिफ का जबड़ा कस गया।
“सादिया!”
उसकी माँ घबरा गईं।
लेकिन सादिया अब पीछे हटने वाली नहीं थी।
“आयरा आपकी बहन है, आपकी संपत्ति नहीं।”
बस।
यही वह वाक्य था जिसने आतिफ के भीतर जमा गुस्से को विस्फोट बना दिया।
उसने राघव की तरफ देखा।
“इसे साथ लेकर चलो।”
सादिया स्तब्ध रह गई।
“क्या?”
नसीर साहब तुरंत बेटी के सामने आ गए।
“खबरदार! मेरी बेटी को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”
आतिफ ने उनकी तरफ देखा।
कुछ सेकंड दोनों पुरुष आमने-सामने रहे।
फिर आतिफ बोला—
“आपका बेटा मेरी बहन के साथ गायब है। मुझे यकीन है सादिया को कुछ पता है।”
“उसे कुछ नहीं पता!”
“तो जब तक मेरी बहन वापस नहीं आती, यह मेरे घर रहेगी।”
“आप पागल हैं?”
सादिया चीखी।
“आप मुझे जबरदस्ती कहीं नहीं ले जा सकते।”
“मुझे मजबूर मत करो।”
“आप पहले ही कर रहे हैं!”
सादिया की आँखों में आँसू आ गए, मगर आवाज़ मजबूत रही।
“अपने भाई की गलती का बदला बहन से लेना मर्दानगी नहीं होती।”
आतिफ के कदम रुक गए।
उसकी आँखों में एक पल के लिए चोट दिखाई दी।
लेकिन अगले ही क्षण वह फिर कठोर हो गया।
“राघव।”
राघव आगे आया।
सादिया पीछे हटी।
उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी बच्ची कहीं नहीं जाएगी।”
आतिफ ने माँ-बेटी को देखा।
फिर पहली बार उसकी आवाज़ कुछ धीमी हुई।
“मैं इसे नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”
सादिया हँस पड़ी।
लेकिन वह हँसी दर्द से भरी थी।
“जिस आदमी ने आधी रात मेरे घर आकर मेरे माँ-बाप को डरा दिया, उसके वादे पर भरोसा करूँ?”
आतिफ कुछ नहीं बोला।
सादिया ने मोबाइल निकालने की कोशिश की।
राघव ने आगे बढ़कर फोन लेना चाहा, लेकिन आतिफ ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“उसे फोन करने दो।”
सादिया ने तुरंत पुलिस का नंबर मिलाना चाहा।
तभी उसके फोन की स्क्रीन चमकी।
एक संदेश आया था।
अरमान का।
सादिया की आँखें फैल गईं।
आतिफ ने उसके चेहरे का रंग बदलते देख लिया।
“किसका संदेश है?”
“तुमसे मतलब नहीं।”
उसने फोन पीछे कर लिया।
आतिफ ने आगे बढ़कर फोन छीनने की कोशिश नहीं की।
बस बोला—
“अगर वह अरमान है तो उसे फोन करो।”
सादिया चुप रही।
“स्पीकर पर।”
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसने संदेश खोला।
सिर्फ एक लाइन थी—
“आयरा मेरे साथ सुरक्षित है। किसी पर भरोसा मत करना। खासकर फ़ैज़ पर नहीं।”
सादिया की साँस अटक गई।
“क्या लिखा है?”
आतिफ ने पूछा।
सादिया ने उसकी तरफ देखा।
अब उसकी आँखों में डर के साथ उलझन भी थी।
“अरमान ने… फ़ैज़ का नाम क्यों लिखा?”
आतिफ का चेहरा बदल गया।
“मुझे फोन दिखाओ।”
“नहीं।”
“सादिया।”
“यह मेरे भाई का संदेश है।”
“और उसमें मेरी बहन का नाम है।”
दोनों की नजरें टकराईं।
कुछ क्षण बाद सादिया ने फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
आतिफ ने संदेश पढ़ा।
उसकी आँखों में पहली बार गुस्से की जगह संदेह आया।
“फ़ैज़?”
राघव भी आगे आया।
“मालिक…”
आतिफ ने तुरंत अरमान के नंबर पर कॉल किया।
फोन बंद।
फिर आयरा को।
बंद।
उसने फ़ैज़ को फोन लगाया।
कुछ रिंग के बाद कॉल उठी।
“आतिफ? इतनी रात को?”
फ़ैज़ की आवाज़ बेहद सामान्य थी।
“तुम कहाँ हो?”
“घर पर। क्यों?”
“आयरा के बारे में कुछ पता चला?”
कुछ सेकंड की चुप्पी।
“नहीं। तुम्हें मिला कुछ?”
आतिफ की नजर सादिया पर थी।
“नहीं।”
उसने कॉल काट दिया।
लेकिन उसके भीतर अब एक सवाल जन्म ले चुका था।
अरमान ने फ़ैज़ से सावधान रहने को क्यों कहा?
तभी सादिया बोली—
“मुझे आयरा से बात करनी है।”
“मुझे भी।”
“और अगर वह अपनी मर्जी से गई है?”
आतिफ चुप रहा।
“क्या तब आप उसे वापस घसीटकर लाएँगे?”
आतिफ ने जवाब नहीं दिया।
उसकी खामोशी ही जवाब थी।
सादिया ने सिर हिलाया।
“इसीलिए वह आपसे डरती थी।”
यह सुनकर आतिफ की आँखें उठीं।
“क्या कहा?”
“वह आपसे प्यार करती है… लेकिन आपसे डरती भी है।”
आतिफ बिल्कुल स्थिर हो गया।
यह शायद वह बात थी जो किसी ने उसके सामने कभी नहीं कही थी।
“झूठ।”
“काश होता।”
सादिया की आँखों में आँसू थे।
“उसने कितनी रातें मेरे सामने रोते हुए बिताई हैं, आपको अंदाजा भी है?”
आतिफ के चेहरे पर कठोरता बनी रही, मगर भीतर कुछ टूटने लगा।
“उसने कहा था—‘मेरे भाई ने मुझे दुनिया की हर चीज दी है, सिवाय अपनी जिंदगी चुनने का हक।’”
आतिफ ने नजरें फेर लीं।
बारिश की आवाज़ अचानक बहुत तेज लगने लगी।
लेकिन फिर उसने कठोर स्वर में कहा—
“तुम मेरे साथ चल रही हो।”
“क्यों?”
“क्योंकि अरमान तुमसे संपर्क करेगा।”
“और अगर मैं मना कर दूँ?”
“तो मैं यहीं बैठकर इंतजार करूँगा।”
सादिया ने उसे अविश्वास से देखा।
“पूरी रात?”
“जरूरत पड़ी तो पूरी जिंदगी।”
पहली बार उसके शब्दों में धमकी कम और जिद ज्यादा थी।
नसीर साहब बोले—
“मेरी बेटी अकेली कहीं नहीं जाएगी।”
सादिया ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“अब्बू।”
“नहीं।”
“अरमान और आयरा मुश्किल में हो सकते हैं।”
“लेकिन—”
“मैं जाऊँगी।”
सब हैरान रह गए।
आतिफ भी।
सादिया ने उसकी तरफ उँगली उठाई।
“लेकिन मेरी शर्तों पर।”
आतिफ की भौंहें तन गईं।
“पहली बात, मेरा फोन मेरे पास रहेगा। दूसरी, आपके घर में कोई मुझे छुएगा तक नहीं। तीसरी, मेरे माँ-बाप को हर वक्त पता रहेगा कि मैं कहाँ हूँ। और चौथी…”
“और?”
“अगर आयरा कह दे कि वह अपनी मर्जी से गई है, तो आप उसे मजबूर नहीं करेंगे।”
आतिफ कुछ देर उसे देखता रहा।
“आखिरी शर्त मैं अभी नहीं मान सकता।”
“तो मैं भी नहीं चल सकती।”
दोनों के बीच लंबी खामोशी रही।
आखिर आतिफ बोला—
“मैं उसकी बात सुनूँगा।”
“सिर्फ सुनेंगे?”
“फिलहाल इतना ही वादा कर सकता हूँ।”
सादिया ने पिता की तरफ देखा।
फिर सिर हिला दिया।
“ठीक है।”
जब सादिया आतिफ की गाड़ी में बैठी तो उसे अंदाजा नहीं था कि वह सिर्फ अपने भाई को खोजने नहीं जा रही।
वह उस हवेली में कदम रखने जा रही थी जहाँ कई ऐसे राज बंद थे जिनके बारे में खुद आतिफ भी नहीं जानता था।
हवेली पहुँचते ही ज़रीन बेगम ने सादिया को देखा।
“यह लड़की कौन है?”
आतिफ ने संक्षेप में सब बताया।
माँ का चेहरा गुस्से से भर गया।
“तुम उसे आधी रात घर से यहाँ ले आए?”
“अम्मी, अरमान इससे संपर्क करेगा।”
“तो पुलिस की मदद लेते।”
आतिफ चुप रहा।
ज़रीन बेगम सादिया के पास आईं।
“बेटी, तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है।”
सादिया ने हल्की मुस्कान दी।
“डर तो लग रहा है। लेकिन आपके बेटे से ज्यादा मुझे इस वक्त अपने भाई की चिंता है।”
ज़रीन बेगम ने आतिफ को घूरा।
“सुना?”
आतिफ बिना जवाब दिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
“राघव, गेस्ट रूम तैयार करवाओ।”
सादिया को हवेली के ऊपर वाले हिस्से में एक कमरे में रखा गया।
कमरा किसी पाँच सितारा होटल से कम नहीं था।
लेकिन सादिया को वह खूबसूरत कमरा भी पिंजरे जैसा लग रहा था।
वह खिड़की के पास बैठ गई।
मोबाइल सामने रखा था।
रात के करीब तीन बजे फोन फिर चमका।
अरमान।
इस बार कॉल थी।
सादिया ने तुरंत उठा लिया।
“भाई!”
“सादिया, तुम ठीक हो?”
“तुम कहाँ हो? आयरा कहाँ है? घर में क्या हो रहा है तुम्हें पता भी है?”
“मेरी बात ध्यान से सुनो।”
अरमान की आवाज़ घबराई हुई थी।
“आयरा मेरे साथ है और सुरक्षित है।”
“तुम दोनों भागे क्यों?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड चुप्पी रही।
फिर एक लड़की की आवाज़ आई—
“सादिया…”
“आयरा!”
सादिया खड़ी हो गई।
उसी समय कमरे के बाहर से गुजर रहा आतिफ आवाज़ सुनकर रुक गया।
दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था।
“आयरा, तुम ठीक हो?”
“हाँ।”
“तुम्हारे भाई पागल हुए पड़े हैं।”
आयरा कुछ पल चुप रही।
“मुझे पता था।”
“तुमने ऐसा क्यों किया?”
“क्योंकि मेरे पास और रास्ता नहीं था।”
बाहर खड़े आतिफ का चेहरा बदल गया।
“फ़ैज़ के बारे में अरमान ने संदेश क्यों भेजा?”
आयरा की साँस भारी हो गई।
“क्योंकि फ़ैज़ वैसा नहीं है जैसा भाई समझते हैं।”
“मतलब?”
“मेरे पास सबूत हैं।”
आतिफ का दिल जोर से धड़का।
अंदर सादिया ने पूछा—
“किस बात के सबूत?”
“फ़ैज़ भाई के कारोबार को अंदर से नुकसान पहुँचा रहा है। पिछले आठ महीनों में जो तीन बड़े कॉन्ट्रैक्ट लीक हुए… उनके पीछे वही है।”
सादिया स्तब्ध रह गई।
बाहर आतिफ की उँगलियाँ दरवाजे के किनारे पर कस गईं।
“तुम्हें कैसे पता?”
“मैंने उसके लैपटॉप में फाइलें देखी थीं।”
“तुमने आतिफ भाई को बताया क्यों नहीं?”
आयरा की आवाज़ टूट गई।
“बताया था।”
आतिफ की आँखें फैल गईं।
“उन्होंने कहा मैं शादी से बचने के लिए फ़ैज़ पर आरोप लगा रही हूँ।”
आतिफ को वह शाम याद आ गई।
आयरा उसके ऑफिस में आई थी।
उसके हाथ में एक पेन ड्राइव थी।
वह रोते हुए कह रही थी—
“भाई, एक बार इसे देख लीजिए।”
और उसने बिना देखे कहा था—
“बस करो आयरा। फ़ैज़ से निकाह होगा और यही आखिरी फैसला है।”
उसने पेन ड्राइव मेज पर छोड़ दी थी।
आतिफ ने उसे कभी खोला ही नहीं।
“सबूत कहाँ हैं?”
सादिया ने पूछा।
“हवेली में।”
“क्या?”
“मेरे कमरे में नहीं। भाई के पुराने स्टडी रूम में। दीवार पर अब्बू की तस्वीर है। उसके पीछे छोटा लॉकर है।”
आतिफ की साँस थम गई।
उसके पिता का पुराना स्टडी रूम वर्षों से बंद पड़ा था।
“पासवर्ड?”
“भाई के जन्मदिन की तारीख।”
आतिफ अब और नहीं रुका।
उसने दरवाजा खोला।
सादिया चौंककर पलटी।
फोन से आयरा की आवाज़ आई—
“कौन है?”
आतिफ ने हाथ आगे बढ़ाया।
“फोन मुझे दो।”
सादिया ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“सादिया।”
“वादा किया था मेरा फोन मेरे पास रहेगा।”
आतिफ रुक गया।
फिर उसने वहीं से कहा—
“आयरा।”
दूसरी तरफ खामोशी।
कुछ सेकंड बाद बहुत धीमी आवाज़ आई—
“भाई…”
सिर्फ एक शब्द।
लेकिन उस एक शब्द ने आतिफ के भीतर का सारा गुस्सा जैसे खींच लिया।
“तुम ठीक हो?”
उसकी आवाज़ पहली बार भारी नहीं, टूटी हुई थी।
“हाँ।”
“मैं तुम्हें लेने आ रहा हूँ।”
“नहीं।”
आतिफ की आँखें बंद हो गईं।
“मुझसे इतनी नफरत करती हो?”
“आपसे नफरत नहीं करती।”
आयरा रो पड़ी।
“आपसे बहुत प्यार करती हूँ। इसीलिए शायद आपके सामने अपनी बात कहने की हिम्मत कभी नहीं हुई।”
आतिफ कुछ बोल नहीं पाया।
“आप मुझे हमेशा बचाते रहे, भाई। लेकिन कभी-कभी आपकी सुरक्षा ही मेरी कैद बन गई।”
सादिया चुपचाप उसे देख रही थी।
जिस आदमी को उसने कुछ घंटे पहले पत्थर समझा था, उसकी आँखों में पहली बार पछतावा दिखाई दे रहा था।
आतिफ ने धीमे से पूछा—
“फ़ैज़ के खिलाफ जो सबूत हैं… क्या वे सच हैं?”
“हाँ।”
“अगर मैं उन्हें देख लूँ?”
“तब शायद आपको समझ आएगा कि मैं क्यों गई।”
“और अरमान?”
कुछ क्षण की चुप्पी।
“मैं उससे प्यार करती हूँ।”
आतिफ का चेहरा फिर तन गया।
सादिया तुरंत उसकी तरफ देखने लगी।
लेकिन इस बार उसने गुस्सा नहीं किया।
“क्या उसने तुम्हें मजबूर किया?”
“नहीं।”
“तुम अपनी मर्जी से उसके साथ हो?”
“हाँ।”
आतिफ ने लंबी साँस ली।
“मुझे सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए।”
आयरा शायद इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रही थी।
“भाई…”
“सुरक्षित रहना।”
उसने बस इतना कहा।
कॉल कट गई।
सादिया ने फोन नीचे किया।
आतिफ बिना कुछ कहे कमरे से निकल गया।
“कहाँ जा रहे हैं?”
सादिया उसके पीछे आई।
“स्टडी रूम।”
दोनों हवेली के पुराने हिस्से की तरफ बढ़े।
कमरा वर्षों से बंद था।
आतिफ ने चाबी मंगवाई।
दरवाजा खुला।
अंदर धूल की हल्की परत थी।
दीवार पर उसके पिता की बड़ी तस्वीर लगी थी।
आतिफ ने तस्वीर हटाई।
पीछे सच में छोटा डिजिटल लॉकर था।
उसके हाथ कुछ क्षण हवा में ठहरे रहे।
फिर उसने अपनी जन्मतिथि डाली।
बीप।
लॉकर खुल गया।
अंदर एक पेन ड्राइव, कुछ दस्तावेज और एक पुराना फोन रखा था।
सादिया की आँखें फैल गईं।
“आयरा ने ये सब यहाँ कैसे रखा?”
“यह कमरा उसके बचपन की पसंदीदा जगह था।”
आतिफ ने पेन ड्राइव उठाई।
दोनों स्टडी की मेज पर बैठे।
लैपटॉप खोला।
पहली फाइल खुलते ही आतिफ का चेहरा बदल गया।
कॉन्ट्रैक्ट।
बैंक ट्रांसफर।
कंपनी के अंदरूनी दस्तावेज।
और हर रास्ता किसी न किसी तरह फ़ैज़ से जुड़ी कंपनियों तक जा रहा था।
लेकिन सबसे बड़ा झटका आखिरी फोल्डर में था।
उसका नाम था—
“A.S. FINAL.”
आतिफ ने फाइल खोली।
स्क्रीन पर कुछ ईमेल थे।
फ़ैज़ किसी अज्ञात व्यक्ति से बात कर रहा था।
योजना साफ थी।
आतिफ की कंपनी को धीरे-धीरे वित्तीय संकट में धकेलना।
फिर शादी के बाद आयरा के नाम मौजूद शेयरों के जरिए बोर्ड पर नियंत्रण हासिल करना।
सादिया ने अविश्वास से कहा—
“यानी शादी…”
“एक सौदा थी।”
आतिफ ने वाक्य पूरा किया।
उसकी आँखों में अब खुद के लिए गुस्सा था।
वह जिस रिश्ते को अपनी बहन के लिए सबसे सुरक्षित समझ रहा था…
वही उसके खिलाफ रची गई सबसे बड़ी चाल थी।
तभी सादिया की नजर लॉकर में रखे पुराने फोन पर गई।
“यह किसका है?”
आतिफ ने फोन उठाया।
“अब्बू का।”
फोन चार्जर से जोड़ा गया।
कुछ मिनट बाद वह चालू हुआ।
उसमें एक रिकॉर्डिंग थी।
तारीख लगभग तीन साल पुरानी थी।
आतिफ ने प्ले किया।
उसके पिता की आवाज़ सुनाई दी—
“अगर यह रिकॉर्डिंग आतिफ तक पहुँचे, तो समझ लेना मुझे अपने आसपास के लोगों पर शक सही था…”
आतिफ का चेहरा सफेद पड़ गया।
रिकॉर्डिंग आगे चली।
“मिर्ज़ा परिवार कारोबार में हिस्सेदारी चाहता है। मैंने इनकार कर दिया है। फ़ैज़ का बाप दबाव बना रहा है। अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो इसे दुर्घटना समझकर फाइल बंद मत करना…”
कमरे में मौत जैसी खामोशी छा गई।
सादिया ने धीरे से आतिफ की तरफ देखा।
उसके हाथ काँप रहे थे।
उसके पिता की मौत तीन साल पहले एक कार दुर्घटना में हुई थी।
मामला दुर्घटना मानकर बंद कर दिया गया था।
आतिफ कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
“राघव!”
उसकी आवाज़ पूरी हवेली में गूँज गई।
कुछ ही सेकंड में राघव अंदर आया।
“मालिक?”
“फ़ैज़ पर नजर रखो। लेकिन उसे पता नहीं चलना चाहिए कि हमें कुछ मालूम है।”
“जी।”
“और मेरे वकील और पुलिस कमिश्नर को सुबह सबसे पहले बुलाओ।”
राघव चला गया।
आतिफ ने आँखें बंद कर लीं।
सादिया कुछ दूरी पर खड़ी रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
“अब समझ आया आयरा क्यों भागी?”
आतिफ ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसकी आँखों में अहंकार नहीं था।
सिर्फ थकान।
“हाँ।”
“और यह भी समझ आया कि हर बात ताकत से हल नहीं होती?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
सादिया मुड़ने लगी।
“सादिया।”
वह रुकी।
“आज रात तुम्हारे घर जो हुआ…”
शब्द उसके गले में अटक गए।
शायद आतिफ जैसे आदमी के लिए माफी माँगना किसी जंग से कम नहीं था।
“वह गलत था।”
सादिया धीरे से पलटी।
“बस?”
“मुझे माफ कर दो।”
सादिया ने कुछ सेकंड उसे देखा।
“माफी माँगने से डर खत्म नहीं होता।”
“जानता हूँ।”
“मेरे माँ-बाप ने आज जो देखा, वह भी नहीं भूलेंगे।”
“जानता हूँ।”
“और मैं भी इतनी जल्दी नहीं भूलूँगी।”
“मैं तुमसे भूलने को नहीं कह रहा।”
आतिफ की आवाज़ बेहद शांत थी।
“बस गलती सुधारने का मौका माँग रहा हूँ।”
सादिया ने पहली बार उसकी आँखों में लंबे समय तक देखा।
फिर बोली—
“पहले अपनी बहन से माफी माँगिए।”
और चली गई।
सुबह होने तक आतिफ ने एक पल भी नहीं सोया।
लेकिन सुबह होते ही पहला फोन उसने आयरा को किया।
इस बार उसने आदेश नहीं दिया।
सिर्फ कहा—
“घर वापस आ जाओ। अरमान के साथ।”
आयरा चुप रही।
“मैं तुम दोनों की बात सुनूँगा।”
“सच?”
“हाँ।”
“और फ़ैज़?”
आतिफ की नजर सामने रखे दस्तावेजों पर गई।
“अब फ़ैज़ से मेरा हिसाब अलग है।”
दोपहर करीब बारह बजे हवेली के बाहर एक साधारण सफेद कार आकर रुकी।
आयरा उतरी।
उसके साथ अरमान था।
आतिफ सीढ़ियों पर खड़ा था।
अरमान ने आयरा का हाथ पकड़ रखा था।
आतिफ की नजर उस हाथ पर गई।
उसका पुराना गुस्सा एक क्षण के लिए फिर जागा।
लेकिन उसने खुद को रोक लिया।
आयरा धीरे-धीरे भाई के सामने आई।
दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर आतिफ ने कहा—
“मुझे माफ कर दो।”
आयरा की आँखें भर आईं।
अगले ही पल वह भाई के सीने से लग गई।
आतिफ ने उसे बाँहों में भर लिया।
वर्षों का डर उस एक आलिंगन में जैसे पिघल गया।
कुछ दूरी पर खड़ी सादिया यह दृश्य देख रही थी।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
तभी आतिफ की नजर उस पर पड़ी।
दोनों की आँखें मिलीं।
लेकिन यह कहानी इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं थी।
क्योंकि उसी शाम फ़ैज़ हवेली पहुँच गया।
वह अकेला नहीं था।
उसके साथ उसके पिता, दो वकील और कई गार्ड थे।
“मुझे आयरा से मिलना है।”
फ़ैज़ ने कहा।
आतिफ सीढ़ियों से नीचे उतरा।
“क्यों?”
“क्योंकि वह मेरी मंगेतर है।”
“थी।”
फ़ैज़ का चेहरा बदल गया।
“मतलब?”
आतिफ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
“यह रिश्ता खत्म।”
“आतिफ, मजाक मत करो।”
“मैं मजाक नहीं कर रहा।”
फ़ैज़ के पिता आगे आए।
“तुम जानते हो इस रिश्ते के टूटने का कारोबार पर क्या असर होगा?”
आतिफ के होंठों पर ठंडी मुस्कान आई।
“अब मुझे कारोबार पर पड़ने वाले हर असर की पूरी जानकारी है।”
फ़ैज़ की आँखों में एक पल के लिए डर चमका।
बस एक पल।
लेकिन आतिफ ने देख लिया।
“क्या मतलब?”
“मतलब यह कि तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है।”
आतिफ ने राघव को इशारा किया।
स्क्रीन पर दस्तावेज दिखाई देने लगे।
बैंक ट्रांसफर।
ईमेल।
फर्जी कंपनियाँ।
फ़ैज़ का चेहरा उतर गया।
“ये झूठ है।”
“तो अदालत में साबित कर देना।”
उसी समय बाहर पुलिस की गाड़ियाँ आकर रुकीं।
फ़ैज़ पीछे हटा।
“तुम मुझे फँसा रहे हो।”
“नहीं।”
आतिफ ने कहा।
“तुमने खुद अपने लिए रास्ता बनाया है।”
पुलिस अधिकारी अंदर आए।
लेकिन तभी फ़ैज़ हँस पड़ा।
वह हँसी अजीब थी।
बेफिक्र।
“तुम्हें लगता है कहानी यहीं खत्म हो गई?”
आतिफ की आँखें सिकुड़ गईं।
“क्या मतलब?”
फ़ैज़ ने उसकी तरफ झुककर धीमे से कहा—
“तुम्हारे पिता की दुर्घटना के बारे में जो रिकॉर्डिंग मिली है… वह पूरी रिकॉर्डिंग नहीं है।”
आतिफ का दिल रुक-सा गया।
“तुम्हें उस रिकॉर्डिंग के बारे में कैसे पता?”
फ़ैज़ मुस्कराया।
“क्योंकि उस रात कार में तुम्हारे पिता अकेले नहीं थे।”
आतिफ का चेहरा बदल गया।
“कौन था?”
फ़ैज़ ने नजर घुमाकर हॉल में मौजूद लोगों को देखा।
फिर उसकी नजर जाकर एक व्यक्ति पर रुकी।
राघव।
आतिफ धीरे-धीरे पलटा।
राघव का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“राघव?”
उसके हाथ काँप रहे थे।
“मालिक…”
फ़ैज़ हँसा।
“पूछो इससे।”
हॉल में ऐसी खामोशी छा गई कि दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक तक सुनाई दे रही थी।
आतिफ राघव की तरफ बढ़ा।
“मेरे अब्बू की मौत वाली रात तुम कहाँ थे?”
राघव की आँखें झुक गईं।
“मालिक… मैं…”
“मेरी तरफ देखो।”
राघव ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैं कार के पीछे वाली गाड़ी में था।”
आतिफ जैसे पत्थर बन गया।
“तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि…”
राघव की आवाज़ टूट गई।
“क्योंकि हादसा होने से कुछ मिनट पहले मालिक ने मुझे फोन किया था।”
“क्या कहा था?”
राघव ने काँपते हाथों से अपनी जेब से एक पुराना मेमोरी कार्ड निकाला।
“उन्होंने कहा था इसे सिर्फ तब खोलना जब आयरा की शादी मिर्ज़ा परिवार में तय हो।”
सबकी नजर उस छोटे से कार्ड पर टिक गई।
आतिफ ने उसे हाथ में लिया।
“तीन साल से यह तुम्हारे पास था?”
“जी।”
“तुमने मुझे दिया क्यों नहीं?”
“क्योंकि मुझे डर था।”
“किससे?”
राघव की नजर फ़ैज़ से हटकर धीरे-धीरे हवेली में मौजूद एक और व्यक्ति की तरफ गई।
आतिफ ने उसकी नजर का पीछा किया।
और अगले ही पल उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
राघव जिस इंसान को देख रहा था…
वह कोई बाहर का दुश्मन नहीं था।
वह आतिफ के अपने परिवार का सदस्य था।
सादिया ने आतिफ की तरफ देखा।
उसका चेहरा पहली बार पूरी तरह स्तब्ध था।
राघव के होंठ काँपे।
“मालिक… आपके अब्बू के साथ जो हुआ था, उसके पीछे सिर्फ मिर्ज़ा परिवार नहीं था।”
“तो कौन था?”
आतिफ की आवाज़ फुसफुसाहट से ज्यादा नहीं थी।
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
और तभी हवेली की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।
अंधेरा।
किसी के भागने की आवाज़ आई।
“दरवाजे बंद करो!”
आतिफ चिल्लाया।
अगले ही पल काँच टूटने की आवाज़ गूँजी।
सादिया पीछे हटी।
“आतिफ!”
आतिफ ने अंधेरे में उसकी आवाज़ पहचानी और उसकी तरफ बढ़ा।
लेकिन जब कुछ सेकंड बाद आपातकालीन लाइट जली…
राघव जमीन पर बैठा था।
उसके हाथ खाली थे।
आतिफ ने अपनी मुट्ठी खोली।
मेमोरी कार्ड गायब था।
“कार्ड कहाँ है?”
उसने राघव से पूछा।
राघव ने घबराकर सिर हिलाया।
“मेरे पास नहीं है।”
आतिफ की नजर पूरे हॉल में घूमी।
मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था।
कोई बाहर नहीं गया था।
इसका मतलब साफ था।
जिस व्यक्ति ने मेमोरी कार्ड चुराया था…
वह अभी भी उसी हवेली के अंदर मौजूद था।
और उससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह थी कि उस कार्ड में शायद उस इंसान का नाम दर्ज था जिसने तीन साल पहले आतिफ के पिता के खिलाफ साजिश रची थी।
सादिया धीरे-धीरे आतिफ के पास आई।
“अब क्या करेंगे?”
आतिफ ने पहली बार गुस्से के बजाय पूरी सावधानी से आसपास देखा।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“अब किसी पर भरोसा नहीं करेंगे।”
तभी सादिया के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से संदेश आया।
उसने स्क्रीन देखी…
और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
संदेश में सिर्फ एक तस्वीर थी।
तस्वीर हवेली के उसी हॉल की थी।
और वह तस्वीर कुछ सेकंड पहले ही खींची गई थी।
नीचे लिखा था—
“आतिफ से कहना, उसके पिता का कातिल उसके जितना करीब है… उतना वह सपने में भी नहीं सोच सकता।”
सादिया के हाथ काँपने लगे।
आतिफ ने फोन लिया।
लेकिन तस्वीर को ज़ूम करते ही उसकी साँस अटक गई।
पीछे लगे पुराने आईने में एक चेहरा दिखाई दे रहा था।
धुँधला…
लेकिन पहचानने लायक।
आतिफ ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी आँखों में अविश्वास था।
क्योंकि आईने में दिखाई देने वाला वह चेहरा उसी व्यक्ति का था…
जिसे आतिफ पिछले तीन साल से अपने पिता की मौत के बाद परिवार का सबसे बड़ा सहारा समझता आया था।
और तभी ऊपर बंद पड़े स्टडी रूम से किसी चीज के गिरने की तेज आवाज़ आई।
आतिफ और सादिया ने एक साथ सीढ़ियों की तरफ देखा।
दरवाजा धीरे-धीरे अपने आप खुल रहा था।
अंदर अंधेरा था।
और उस अंधेरे से एक आवाज़ आई—
“अगर अपने पिता की मौत का पूरा सच जानना है, आतिफ… तो अकेले अंदर आओ।”
आतिफ का चेहरा सख्त हो गया।
सादिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत जाइए।”
आतिफ ने पहली बार उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे उसकी चिंता उसके लिए मायने रखती हो।
लेकिन अगले ही पल कमरे के अंदर से उसके पिता की पुरानी रिकॉर्डिंग चलने लगी—
“आतिफ… अगर तुम यह सुन रहे हो, तो समझो धोखा घर के बाहर से नहीं आया था…”
और रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
आतिफ की आँखें फैल गईं।
क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था—
आयरा का भागना इस कहानी की शुरुआत भर थी।
असली खेल तीन साल पहले शुरू हुआ था।
और जिस दुश्मन को वह पूरे शहर में खोजता रहा…
वह शायद हर दिन उसी के साथ बैठकर खाना खाता था।
अब सवाल यह नहीं था कि आयरा और अरमान की मोहब्बत का क्या होगा।
सवाल यह था—
उस बंद कमरे में कौन आतिफ का इंतजार कर रहा था?
उसके पिता की मौत की रात वास्तव में क्या हुआ था?
मेमोरी कार्ड किसने चुराया?
और सबसे बड़ा सवाल…
क्या सादिया का आतिफ की जिंदगी में आना महज एक इत्तेफ़ाक था…
या उसके पीछे भी कोई ऐसा राज छिपा था जो आतिफ और सादिया—दोनों की किस्मत हमेशा के लिए बदलने वाला था?
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।