# एक मासूम रूह का सौदा—जिस रात अपनों ने आयत की कीमत लगाई, उसी रात एक अजनबी ने उसकी किस्मत बदलने की कसम खा ली

एक मासूम रूह का सौदा—जिस रात अपनों ने आयत की कीमत लगाई, उसी रात एक अजनबी ने उसकी किस्मत बदलने की कसम खा ली
“देख लीजिए ठाकुर साहब… पूरे शहर में ढूंढेंगे, तब भी ऐसी मासूम लड़की नहीं मिलेगी।”
माया ने मेज पर आयत की तस्वीर रखते हुए कहा तो सामने बैठे ठाकुर दिग्विजय की आंखों में एक अजीब-सी चमक उतर आई।
कमरे में नोटों की गंध थी।
बाहर बारिश होने वाली थी।
और उस तस्वीर में मुस्कुरा रही लड़की को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसी समय उसकी जिंदगी का सौदा किया जा रहा है।
दिग्विजय ने तस्वीर उठाई।
“इतनी भोली है?”
माया के होंठों पर ठंडी मुस्कान फैल गई।
“भोली नहीं, ठाकुर साहब… बेवकूफ समझिए। मां-बाप बचपन में चले गए। बूढ़ी दादी के अलावा दुनिया में कोई नहीं। मैं जो कहती हूं, सच मान लेती है।”
“और अगर उसने मना कर दिया?”
माया ने मेज पर रखी नोटों की गड्डी की तरफ देखा।
उसकी आंखों में रिश्ते नहीं, सिर्फ पैसा था।
“उसकी दादी बीमार है। मैं उससे कहूंगी कि शहर के बड़े डॉक्टर ने इलाज के लिए बुलाया है। दादी का नाम सुनते ही वह आंख बंद करके चली जाएगी।”
दिग्विजय ने नोटों की एक मोटी गड्डी उसकी तरफ सरका दी।
“आधी रकम अभी।”
उसने कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा—
“बाकी तब, जब आज रात नौ बजे तक लड़की मेरे पुराने फार्महाउस पहुंच जाएगी।”
माया ने बिना एक पल गंवाए पैसे अपने बैग में रख लिए।
“आप इंतजार कीजिए।”
उसने जाते-जाते कहा—
“आज रात आयत आपकी हवेली में होगी।”
उसे क्या मालूम था कि जिस लड़की को उसने चंद नोटों के बदले बेच दिया था, उसी लड़की की मासूमियत कुछ ही घंटों बाद शहर के सबसे ताकतवर आदमी की जिंदगी उलटने वाली थी।
और उससे भी बड़ा सच यह था कि उस रात आयत जिस हवेली में पहुंचने वाली थी…
वह दिग्विजय की हवेली थी ही नहीं।
आयत उस समय अपनी छोटी-सी रसोई में बैठी दादी के लिए दलिया बना रही थी।
उसकी उम्र केवल बाईस साल थी।
बड़ी-बड़ी आंखें।
चेहरे पर ऐसी सादगी कि पहली नजर में कोई भी उसके मन की सफाई पढ़ सकता था।
उसकी दुनिया बहुत छोटी थी।
एक पुराना घर।
बीमार दादी।
कुछ अधूरे सपने।
और माया…
जिसे वह अपनी मां मानती थी।
असल में माया उसके पिता की दूसरी पत्नी थी।
पिता के गुजर जाने के बाद आयत ने कभी उसे सौतेली मां नहीं कहा।
वह हमेशा “मां” कहती रही।
माया की कड़वी बातें सहती रही।
सुबह से रात तक घर का काम करती रही।
अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी।
यहां तक कि पिता की छोड़ी छोटी-सी जमा पूंजी भी माया ने कब खत्म कर दी, आयत ने कभी हिसाब नहीं पूछा।
क्योंकि दादी ने उसे एक बात सिखाई थी—
“बेटी, रिश्ता हिसाब से नहीं चलता।”
आयत ने यही बात दिल में बसा ली थी।
मगर वह नहीं जानती थी कि कुछ लोग रिश्तों को भी बाजार में बेच देते हैं।
उस रात करीब साढ़े सात बजे अचानक माया कमरे में आई।
उसके हाथ में एक नया सूट था।
“आयत!”
“जी मां?”
“जल्दी तैयार हो जा।”
आयत चौंकी।
“क्यों?”
माया ने बनावटी चिंता चेहरे पर ओढ़ ली।
“तेरी दादी के लिए डॉक्टर मिल गया है।”
आयत के हाथ से चम्मच लगभग छूट गया।
“सच?”
उसकी आंखें चमक उठीं।
“क्या डॉक्टर दादी को ठीक कर देंगे?”
“शहर का बहुत बड़ा डॉक्टर है। गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करता है। मैंने बड़ी मुश्किल से बात की है।”
आयत दौड़कर माया के पास आई।
“मां, मैं भी चलूंगी।”
“तुझे ही जाना है।”
“अकेली?”
एक पल के लिए उसके चेहरे पर घबराहट आई।
वह शायद ही कभी रात में अकेले घर से निकली थी।
माया ने उसकी ठुड्डी पकड़कर कहा—
“अपनी दादी के लिए इतना भी नहीं कर सकती?”
बस।
यह एक वाक्य काफी था।
आयत की सारी हिचक खत्म हो गई।
“कर सकती हूं।”
उसने तुरंत कहा।
“मैं दादी के लिए कुछ भी कर सकती हूं।”
कुछ देर बाद वह हल्के गुलाबी रंग का सूट पहनकर बाहर आई।
दादी सो रही थीं।
आयत उनके पास गई।
उनके माथे को चूमा।
“दादी… मैं आपकी दवा लेने जा रही हूं। सुबह तक आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगी।”
सोती हुई बूढ़ी औरत ने शायद उसकी आवाज सुनी।
उनकी उंगलियां हल्की-सी हिलीं।
आयत मुस्कुरा दी।
उसे क्या पता था कि शायद वह मुस्कान उसकी जिंदगी की आखिरी बेफिक्र मुस्कान थी।
बाहर एक टैक्सी खड़ी थी।
माया ने दरवाजा खोला।
“बैठ जा।”
आयत बैठ गई।
लेकिन दरवाजा बंद होने से पहले उसने माया का हाथ पकड़ लिया।
“मां…”
“अब क्या है?”
“पता नहीं क्यों… दिल घबरा रहा है।”
एक पल के लिए माया की आंखें उससे मिलीं।
अगर उस क्षण उसके भीतर जरा-सी भी ममता बची होती तो शायद वह सब रोक देती।
लेकिन अगले ही पल उसके दिमाग में नोटों की गड्डियां घूम गईं।
उसने आयत का हाथ झटक दिया।
“हर बात में डरना बंद कर। जा।”
दरवाजा बंद हो गया।
टैक्सी चल पड़ी।
आयत पीछे मुड़कर घर को देखती रही।
और माया वहीं खड़ी रही।
जब तक गाड़ी आंखों से ओझल नहीं हो गई।
फिर उसने बैग खोला।
नोटों को छुआ।
और मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान में आयत के लिए कोई पछतावा नहीं था।
रात गहराने लगी।
अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।
सड़कें धुंधली पड़ गईं।
ड्राइवर को दिग्विजय के पुराने फार्महाउस का रास्ता ठीक से मालूम नहीं था।
उसने कई बार फोन लगाया, लेकिन नेटवर्क नहीं मिला।
एक मोड़ पर वह गलत रास्ते पर चला गया।
करीब आधे घंटे बाद दूर रोशनी से जगमगाती एक विशाल हवेली दिखाई दी।
ड्राइवर ने राहत की सांस ली।
उसे लगा यही जगह होगी।
गाड़ी हवेली के पिछले गेट पर रुकी।
“बेटी, पहुंच गए।”
आयत ने बाहर देखा।
इतनी बड़ी हवेली उसने जिंदगी में पहली बार देखी थी।
“डॉक्टर साहब यहां रहते हैं?”
“मुझे तो यही पता दिया गया था।”
ड्राइवर ने झूठ नहीं बोला।
वह खुद भ्रमित था।
आयत उतर गई।
बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं।
वह गेट की तरफ बढ़ी।
लेकिन वह दिग्विजय का फार्महाउस नहीं था।
वह हवेली थी—
रेयांश मल्होत्रा की।
मल्होत्रा ग्रुप का मालिक।
शहर के सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक।
एक ऐसा आदमी जिसके एक फोन पर बड़े-बड़े सौदे रुक जाते थे।
जिसके सामने लोग बोलने से पहले शब्द तौलते थे।
और जिसकी निजी जिंदगी के बारे में शहर में अनगिनत अफवाहें थीं।
उस रात रेयांश ने एक इवेंट एजेंसी से एक मॉडल को निजी ब्रांड शूट के लिए बुलाया था। शूट देर रात होना था क्योंकि अगली सुबह उसे विदेश निकलना था।
लेकिन जिस मॉडल को पहुंचना था, उसकी गाड़ी रास्ते में खराब हो गई थी।
यह सूचना अभी हवेली तक नहीं पहुंची थी।
पीछे के गेट पर तैनात नए गार्ड ने आयत को देखा।
उसके हाथ में माया द्वारा दिया गया लिफाफा था।
गार्ड ने समझा एजेंसी से लड़की आ गई।
“ऊपर जाइए। सर इंतजार कर रहे हैं।”
आयत ने मासूमियत से पूछा—
“डॉक्टर साहब ऊपर हैं?”
गार्ड फोन पर व्यस्त था।
उसने आधा सुना।
“हां, मैडम। ऊपर।”
आयत सीढ़ियां चढ़ गई।
हर कदम के साथ उसका दिल तेज धड़क रहा था।
विशाल झूमर।
संगमरमर का फर्श।
दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स।
उसे लगा बड़े डॉक्टर शायद ऐसे ही घर में रहते होंगे।
ऊपर पहुंचकर उसने आधा खुला दरवाजा देखा।
उसने धीरे से दस्तक दी।
“अंदर आ जाइए।”
गहरी आवाज सुनाई दी।
आयत अंदर चली गई।
खिड़की के पास एक लंबा आदमी खड़ा था।
काली शर्ट।
चेहरे पर थकान।
आंखों में कठोरता।
रेयांश ने मुड़कर उसकी तरफ देखा।
कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
रेयांश ने सोचा—
एजेंसी ने शायद यही मॉडल भेजी है।
और आयत सोच रही थी—
यही डॉक्टर होंगे।
“बैठिए।”
रेयांश ने कहा।
आयत घबराकर सोफे के किनारे बैठ गई।
“डॉक्टर साहब…”
रेयांश की भौंह सिकुड़ी।
“क्या कहा?”
“मेरी दादी बहुत बीमार हैं।”
आयत ने जल्दी से लिफाफा आगे बढ़ाया।
“मां ने कहा था कि आप उनकी दवा देंगे।”
रेयांश कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
उसे लगा शायद एजेंसी वालों ने शूट के लिए कोई ग्रामीण किरदार तैयार किया है।
“ये कैसा मजाक है?”
उसने कठोर स्वर में पूछा।
आयत सहम गई।
“मजाक?”
“तुम्हें यहां किसने भेजा?”
“मेरी मां ने।”
“किस एजेंसी से हो?”
“एजेंसी?”
आयत की आंखों में सच्ची उलझन थी।
रेयांश आगे बढ़ा।
“नाम?”
“आ… आयत।”
“पूरा नाम?”
“आयत खान।”
“और तुम्हें पता है मैं कौन हूं?”
उसने मासूमियत से सिर हिला दिया।
“डॉक्टर साहब?”
रेयांश का चेहरा बदल गया।
अब पहली बार उसे महसूस हुआ कि कुछ गलत है।
बहुत गलत।
उसने उससे दूरी बना ली।
“एक मिनट।”
वह फोन उठाकर मैनेजर करण को कॉल करने लगा।
उसी समय बिजली चमकी।
आयत घबरा गई।
“क्या हुआ?”
रेयांश ने फोन कान पर रखते हुए पूछा।
“मुझे बिजली की आवाज से डर लगता है।”
उसका जवाब इतना सीधा था कि रेयांश कुछ पल चुप रह गया।
फोन नहीं लगा।
उसने दोबारा कोशिश की।
तभी आयत ने पूछा—
“मेरी दादी की दवा मिल जाएगी ना?”
इस बार रेयांश ने ध्यान से उसका चेहरा देखा।
न मेकअप।
न पेशेवर अंदाज।
न अभिनय का कोई संकेत।
सिर्फ डर।
उम्मीद।
और मासूमियत।
रेयांश ने तुरंत इंटरकॉम उठाया।
“सिक्योरिटी।”
“यस सर।”
“जिस लड़की को ऊपर भेजा है, वह किस गाड़ी से आई?”
“सर, एक टैक्सी से।”
“एजेंसी की गाड़ी?”
कुछ सेकंड चुप्पी रही।
“नहीं सर।”
रेयांश का चेहरा कठोर हो गया।
“ड्राइवर को रोको।”
“सर, वह जा चुका है।”
रेयांश ने फोन रख दिया।
अब आयत भी घबरा गई।
“क्या हुआ?”
रेयांश उसके सामने बैठा।
लेकिन उसने जानबूझकर पर्याप्त दूरी रखी।
“आयत, मेरी बात ध्यान से सुनो।”
“जी?”
“मैं डॉक्टर नहीं हूं।”
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या?”
“मेरा नाम रेयांश मल्होत्रा है।”
“तो… डॉक्टर साहब कहां हैं?”
“मुझे नहीं पता।”
आयत खड़ी हो गई।
उसकी उंगलियां कांपने लगीं।
“नहीं… मां ने कहा था…”
उसने जल्दी से फोन निकालना चाहा।
फिर याद आया—
उसके पास फोन था ही नहीं।
“मुझे घर जाना है।”
वह दरवाजे की तरफ बढ़ी।
रेयांश ने रास्ता नहीं रोका।
“करण!”
उसने जोर से आवाज लगाई।
मैनेजर दौड़ता हुआ आया।
“सर?”
“इस लड़की को कौन लेकर आया, पता लगाओ। टैक्सी नंबर कैमरे में होगा। और अभी।”
“यस सर।”
आयत दरवाजे के पास खड़ी थी।
उसकी सांसें तेज थीं।
“मैं चली जाऊं?”
रेयांश ने उसे देखा।
“बाहर बहुत तेज बारिश है। मैं तुम्हें ड्राइवर के साथ घर भिजवा दूंगा।”
“नहीं।”
उसने तुरंत कहा।
“मैं अकेली चली जाऊंगी।”
उसके स्वर में ऐसा डर था जैसे उसे अचानक हर आदमी पर शक होने लगा हो।
रेयांश ने पहली बार आवाज नरम की।
“ठीक है। मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। लेकिन पांच मिनट इंतजार कर लो। कम से कम पता तो चल जाए तुम्हें यहां क्यों भेजा गया।”
आयत चुप हो गई।
कुछ मिनट बाद करण वापस आया।
लेकिन उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था।
“सर…”
“बोलो।”
करण ने आयत की तरफ देखा।
फिर रेयांश के करीब आकर धीमे स्वर में कहा—
“मामला गंभीर है।”
“क्या हुआ?”
“टैक्सी ड्राइवर मिल गया।”
“फिर?”
“उसे इस लड़की को यहां नहीं लाना था।”
आयत के कान खड़े हो गए।
“तो कहां?”
करण चुप रहा।
रेयांश की आवाज कठोर हो गई।
“करण।”
“ठाकुर दिग्विजय के पुराने फार्महाउस।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
आयत ने धीरे से पूछा—
“क्यों?”
करण जवाब नहीं दे पाया।
रेयांश ने कहा—
“जो पता चला है, साफ-साफ बताओ।”
करण ने गहरी सांस ली।
“ड्राइवर का कहना है कि माया नाम की महिला ने इसे भेजा था। उसे कहा गया था कि लड़की को दिग्विजय के लोगों के हवाले करना है।”
आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मेरी… मां?”
करण ने आंखें झुका लीं।
“हमें शक है कि पैसों का लेन-देन हुआ है।”
“झूठ।”
आयत की आवाज फुसफुसाहट जैसी निकली।
“मां ऐसा नहीं कर सकती।”
कोई कुछ नहीं बोला।
“आप झूठ बोल रहे हैं!”
वह अचानक चीखी।
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
“उन्होंने कहा था दादी की दवा…”
वह पीछे हटने लगी।
“उन्होंने कहा था डॉक्टर…”
उसकी सांस अटक गई।
“मां मुझे क्यों…”
वाक्य पूरा नहीं हुआ।
उसके घुटने जवाब देने लगे।
रेयांश तुरंत आगे बढ़ा, लेकिन उसे छूने से पहले रुक गया।
“आयत।”
वह जमीन पर बैठ गई।
दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
“नहीं…”
उसकी सिसकी निकली।
“उन्होंने मुझे बेच दिया?”
रेयांश की मुट्ठियां भींच गईं।
उसने करण की तरफ देखा।
“पुलिस कमिश्नर को फोन करो।”
आयत ने तुरंत सिर उठाया।
“नहीं!”
“क्यों?”
“दादी…”
उसकी आवाज कांपी।
“माया को पता चला कि मैं पुलिस के पास गई तो वह दादी को…”
रेयांश ने पहली बार उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारी दादी को कोई हाथ नहीं लगाएगा।”
“आप नहीं जानते उन्हें।”
“और तुम मुझे नहीं जानती।”
उसका स्वर शांत था।
“लेकिन एक बात जान लो। आज रात तुम्हें कोई खरीद नहीं सकता।”
आयत की आंखें उसके चेहरे पर टिक गईं।
रेयांश ने फोन उठाया।
“करण, दो गाड़ियां भेजो। एक पुलिस टीम के साथ माया के घर। दूसरी मेडिकल टीम के साथ। आयत की दादी को तुरंत मल्होत्रा अस्पताल में भर्ती करवाओ।”
आयत स्तब्ध रह गई।
“लेकिन पैसे…”
रेयांश ने उसकी बात काट दी।
“तुमसे किसी ने पैसे मांगे?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
“मैं वापस कैसे दूंगी?”
रेयांश कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“हर मदद कर्ज नहीं होती, आयत।”
शायद जिंदगी में पहली बार किसी ने उससे यह कहा था।
वह रो पड़ी।
लेकिन इस बार आंसुओं में सिर्फ डर नहीं था।
कुछ राहत भी थी।
उस रात आयत हवेली के गेस्ट रूम में रही।
दरवाजा अंदर से बंद करने की चाबी उसके हाथ में दी गई।
बाहर एक महिला सुरक्षा अधिकारी तैनात थी।
रेयांश अपने कमरे में नहीं गया।
वह नीचे स्टडी में बैठा रहा।
करीब रात दो बजे करण आया।
उसके हाथ में कुछ दस्तावेज थे।
“सर।”
रेयांश ने सिर उठाया।
“क्या मिला?”
“आप सही थे। पूरा मामला पैसे का है।”
उसने बैंक ट्रांसफर की कॉपी सामने रखी।
“माया ने दिग्विजय के आदमी से रकम ली है।”
रेयांश की आंखें सख्त हो गईं।
“और?”
“सिर्फ इतना नहीं।”
करण ने दूसरा कागज सामने रखा।
“आयत के पिता ने मरने से पहले उसके नाम कुछ संपत्ति छोड़ी थी।”
“कितनी?”
“पुराने शहर में जमीन… और मल्होत्रा इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के पास करीब बारह एकड़।”
रेयांश अचानक सीधा बैठ गया।
“क्या?”
करण ने सिर हिलाया।
“वर्तमान कीमत लगभग तीस करोड़।”
रेयांश कुछ क्षण शांत रहा।
अब कहानी बदल चुकी थी।
“माया को पता है?”
“पूरी तरह।”
“आयत को?”
“शायद नहीं।”
“और दिग्विजय?”
करण ने तीसरा दस्तावेज खोला।
“यही असली खेल है।”
रेयांश की आंखें सिकुड़ गईं।
“दिग्विजय उस जमीन को खरीदने की कोशिश पिछले दो साल से कर रहा है।”
“तो आयत का सौदा…”
“शायद केवल लड़की का नहीं था, सर।”
करण ने धीमे स्वर में कहा—
“उसे रास्ते से हटाकर उसकी संपत्ति हथियाने की योजना भी हो सकती है।”
रेयांश कुर्सी से उठ गया।
उसकी आंखों में अब गुस्सा था।
“माया को गिरफ्तार किया?”
“पुलिस पहुंची तो घर खाली था।”
“दिग्विजय?”
“फार्महाउस से गायब।”
रेयांश की मुट्ठी मेज पर पड़ी।
“दोनों भाग गए?”
“जी।”
“कैसे?”
“शायद उन्हें किसी ने पहले ही खबर कर दी।”
रेयांश खिड़की के पास चला गया।
बारिश अब भी हो रही थी।
कुछ सेकंड बाद उसने पूछा—
“आयत की दादी?”
“मल्होत्रा अस्पताल में हैं। हालत स्थिर है।”
रेयांश ने राहत की सांस ली।
“करण।”
“जी?”
“कल सुबह आयत को उसकी संपत्ति के सारे दस्तावेज दिखाए जाएंगे।”
“ठीक है।”
“और शहर के सबसे अच्छे वकील को बुलाओ।”
करण ने सिर हिलाया।
फिर जाने लगा।
“एक मिनट।”
“जी सर?”
रेयांश की आवाज अचानक धीमी हो गई।
“उस लड़की के साथ जो हुआ… उसके बारे में मीडिया को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।”
करण ने उसकी तरफ देखा।
“उसकी इज्जत की वजह से?”
“उसकी निजता की वजह से।”
रेयांश ने कहा—
“वह कोई खबर नहीं है, करण। वह इंसान है।”
अगली सुबह आयत की आंख खुली तो कुछ सेकंड उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहां है।
फिर पिछली रात याद आई।
माया।
पैसे।
दिग्विजय।
उसकी आंखें भर आईं।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
“कौन?”
“मैं हूं… सुमन।”
बाहर से महिला की आवाज आई।
“सर ने कहा है कि आपकी अनुमति के बिना कोई अंदर नहीं आएगा। अस्पताल से फोन आया है। आपकी दादी होश में हैं।”
आयत एकदम उठ बैठी।
“सच?”
कुछ ही देर में वह अस्पताल पहुंची।
दादी ने उसे देखते ही हाथ फैलाए।
“आयत…”
वह दौड़कर उनके सीने से लग गई।
“दादी!”
दोनों रो पड़ीं।
दरवाजे के बाहर रेयांश खड़ा था।
वह अंदर नहीं गया।
कुछ रिश्तों के बीच खड़े होने का उसे कोई अधिकार नहीं था।
थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए।
“अब खतरा कम है।”
आयत ने हाथ जोड़ दिए।
“डॉक्टर साहब, मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं लेकिन मैं काम करके…”
डॉक्टर मुस्कुराए।
“बिल की चिंता मत कीजिए।”
आयत ने पलटकर रेयांश को देखा।
वह दूर खड़ा फोन पर बात कर रहा था।
उसके भीतर अजीब संघर्ष शुरू हो गया।
वह उस आदमी पर भरोसा करना नहीं चाहती थी।
आखिर वह उसके लिए भी एक अजनबी था।
लेकिन यही अजनबी उस रात उसके और एक भयानक जाल के बीच दीवार बनकर खड़ा हुआ था।
कुछ घंटे बाद रेयांश ने उसे अस्पताल के कॉन्फ्रेंस रूम में बुलाया।
वहां एक महिला वकील बैठी थीं।
“ये एडवोकेट मीरा सक्सेना हैं।”
रेयांश ने परिचय कराया।
“आपकी वकील।”
आयत चौंकी।
“मेरी?”
मीरा मुस्कुराईं।
“अगर आप चाहें तभी।”
आयत बैठ गई।
मीरा ने दस्तावेज सामने रखे।
“आयत, आपके पिता ने आपके नाम जमीन और कुछ निवेश छोड़े थे।”
“मेरे नाम?”
“हां।”
“लेकिन मां ने कहा था अब हमारे पास कुछ नहीं है।”
मीरा ने गंभीर नजरों से उसकी तरफ देखा।
“वही सबसे बड़ा झूठ था।”
आयत के हाथ कांपने लगे।
एक-एक करके दस्तावेज उसके सामने आते गए।
वसीयत।
जमीन।
बैंक रिकॉर्ड।
फर्जी हस्ताक्षर।
माया द्वारा पैसे निकालने की कोशिश।
और अंत में दिग्विजय के साथ हुआ संदिग्ध समझौता।
आयत की आंखों से आंसू गिरते रहे।
जिस औरत को उसने मां कहा…
वह वर्षों से उसे केवल बोझ नहीं समझती थी।
वह उसकी संपत्ति पर कब्जा करने का रास्ता खोज रही थी।
“मैं शिकायत दर्ज करूंगी।”
आयत ने अचानक कहा।
कमरे में बैठे सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।
उसकी आवाज कांप रही थी।
लेकिन इस बार उसमें डर से ज्यादा दृढ़ता थी।
“मैं भागूंगी नहीं।”
मीरा ने पूछा—
“पक्का?”
आयत ने आंखें पोंछीं।
“उन्होंने मेरी चुप्पी को मेरी कमजोरी समझा।”
उसने दस्तावेज पर हाथ रखा।
“अब नहीं।”
रेयांश के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आई।
लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।
अगले दिन सुबह शहर के एक बड़े अखबार में खबर छपी—
“मल्होत्रा हवेली में रहस्यमयी लड़की—क्या बिजनेस टायकून की नई प्रेमिका?”
आयत ने खबर देखी तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
सोशल मीडिया पर उसकी धुंधली तस्वीर घूम रही थी।
लोग कहानियां बना रहे थे।
किसी ने उसे लालची कहा।
किसी ने रेयांश की प्रेमिका।
किसी ने लिखा कि वह पैसे के लिए हवेली पहुंची थी।
आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मैंने कहा था…”
उसकी आंखें भर आईं।
“अमीर लोगों की दुनिया मेरे लिए नहीं है।”
वह अस्पताल से निकलने लगी।
रेयांश सामने आ गया।
“कहां जा रही हो?”
“घर।”
“वह घर सील है।”
“कहीं भी चली जाऊंगी।”
“और दिग्विजय?”
वह रुक गई।
“वह फरार है।”
रेयांश ने कहा।
“जब तक पुलिस उसे पकड़ नहीं लेती, तुम सुरक्षित जगह पर रहोगी।”
“आपकी हवेली में रहकर मेरी इज्जत रोज अखबार में बिकेगी।”
यह वाक्य रेयांश को चुभ गया।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस रास्ते से हट गया।
आयत आगे बढ़ी।
लेकिन शाम तक कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने कल्पना नहीं की थी।
रेयांश मल्होत्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली।
कैमरों के सामने वह अकेला खड़ा था।
पत्रकारों ने सवालों की बौछार कर दी।
“सर, वह लड़की कौन है?”
“क्या आपका रिश्ता है?”
“क्या वह रात आपकी हवेली में थी?”
रेयांश ने माइक्रोफोन पकड़ा।
“हां।”
पूरा हॉल शांत हो गया।
“वह मेरी हवेली में थी।”
कैमरों की फ्लैश चमकने लगीं।
“लेकिन जिस तरह की कहानियां आप बना रहे हैं, वे झूठी हैं।”
उसने सामने देखते हुए कहा—
“एक लड़की धोखे से मेरी संपत्ति पर पहुंची। वह अपराध की संभावित शिकार थी। मैंने पुलिस को सूचना दी और उसे सुरक्षा दी।”
एक पत्रकार ने पूछा—
“उसका नाम?”
रेयांश का चेहरा सख्त हो गया।
“आपको उसका नाम जानने की जरूरत नहीं।”
“लेकिन जनता—”
“जनता को किसी पीड़ित की निजी जिंदगी पर अधिकार नहीं मिलता।”
पूरा हॉल चुप हो गया।
“और जिस मीडिया हाउस ने उसकी तस्वीर बिना अनुमति प्रकाशित की है, उसे कानूनी नोटिस भेजा जा चुका है।”
अस्पताल के कमरे में टीवी पर यह सब देख रही आयत स्तब्ध थी।
रेयांश ने कहीं उसका नाम नहीं लिया।
कहीं उसे अपनी प्रेमिका नहीं कहा।
कहीं अपने प्रभाव का इस्तेमाल उसके फैसले छीनने के लिए नहीं किया।
उसने सिर्फ उसकी निजता बचाई।
दादी ने आयत का हाथ पकड़ लिया।
“बेटी…”
आयत ने उनकी तरफ देखा।
“हर अमीर आदमी बुरा नहीं होता।”
आयत चुप रही।
उस रात पहली बार उसने रेयांश के बारे में सोचते हुए डर महसूस नहीं किया।
कुछ दिन गुजर गए।
दिग्विजय अब भी फरार था।
माया भी गायब थी।
आयत ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करने का फैसला किया।
जब रेयांश को पता चला तो उसने पूछा—
“क्या पढ़ना चाहती हो?”
“कानून।”
वह चौंका।
“कानून?”
आयत ने मीरा की तरफ देखा।
“मैं चाहती हूं कि किसी दूसरी लड़की को अपने अधिकार जानने के लिए किसी रेयांश मल्होत्रा का इंतजार न करना पड़े।”
रेयांश कुछ सेकंड शांत रहा।
फिर मुस्कुराया।
“अच्छा फैसला है।”
“लेकिन फीस मैं खुद दूंगी।”
“मैंने कुछ कहा?”
“आप कहने वाले थे।”
रेयांश हंस पड़ा।
शायद महीनों बाद।
आयत भी अनजाने में मुस्कुरा दी।
फिर तुरंत नजरें झुका लीं।
उस छोटे-से पल में दोनों के बीच कुछ बदल गया।
यह प्रेम नहीं था।
अभी नहीं।
यह भरोसे की पहली पतली-सी डोर थी।
और रेयांश जानता था कि उसे उस डोर को खींचना नहीं है।
सिर्फ टूटने से बचाना है।
एक महीना बीत गया।
दादी घर लौट आईं।
आयत को रेयांश की कंपनी के लीगल फाउंडेशन में इंटर्नशिप मिल गई—लेकिन मीरा ने साफ किया कि चयन टेस्ट के आधार पर हुआ है।
पहले ही दिन आयत ने रेयांश के केबिन में जाकर कहा—
“अगर आपने मेरे लिए नियम बदले हैं तो मैं नौकरी छोड़ दूंगी।”
रेयांश ने फाइल से नजर उठाई।
“तुम्हें हमेशा लगता है कि दुनिया तुम्हारे लिए नियम बदल रही है?”
“आप बदल सकते हैं।”
“बदल सकता हूं।”
वह कुर्सी पर पीछे झुका।
“लेकिन इस बार नहीं बदले।”
“पक्का?”
“तुम टेस्ट में तीस लोगों में दूसरे नंबर पर आई हो।”
आयत चौंकी।
“पहले नंबर पर कौन?”
“तुम्हारी प्रतियोगी।”
“नाम?”
रेयांश मुस्कुराया।
“अब वकील बनने जा रही हो। खुद पता करो।”
आयत पहली बार खुलकर हंसी।
रेयांश उसे देखता रह गया।
लेकिन अगले ही पल उसने नजरें फाइल पर कर लीं।
वह उसके जीवन में एक और ऐसा आदमी नहीं बनना चाहता था जो उसकी इच्छा से पहले अपना अधिकार समझ बैठे।
उधर माया और दिग्विजय छिपकर एक और चाल तैयार कर रहे थे।
एक रात आयत के फोन पर अनजान नंबर से कॉल आया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ माया थी।
आयत का चेहरा सख्त हो गया।
“आयत…”
“मुझे मां मत कहना।”
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
“बेटी, मेरी बात सुन।”
“मैं आपकी बेटी उस दिन मर गई थी जिस दिन आपने उसकी कीमत लगाई।”
माया रोने का अभिनय करने लगी।
“मुझसे गलती हो गई।”
“गलती?”
आयत की आंखें भर आईं।
“गलती चाय में चीनी ज्यादा डाल देना होती है। किसी इंसान का सौदा करना गलती नहीं होता।”
माया चुप हो गई।
फिर उसकी आवाज बदल गई।
“बहुत उड़ने लगी है।”
आयत की उंगलियां फोन पर कस गईं।
“रेयांश के पैसे का घमंड है?”
“नहीं।”
आयत ने शांत स्वर में कहा।
“अपने अधिकार का भरोसा है।”
माया हंसी।
“तो अपने अधिकार बचा लेना।”
कॉल कट गया।
उसी क्षण आयत के फोन पर एक तस्वीर आई।
दादी की।
अस्पताल से निकलती हुई पुरानी तस्वीर।
नीचे लिखा था—
“अगली तस्वीर पुरानी नहीं होगी।”
आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
लेकिन इस बार उसने अकेले डरने की गलती नहीं की।
वह सीधे मीरा के पास गई।
पुलिस को सूचना दी गई।
रेयांश को पता चला तो वह तुरंत पहुंचा।
“आयत!”
वह उसके पास आया।
“तुम ठीक हो?”
“मैं ठीक हूं।”
“दादी?”
“सुरक्षित हैं।”
रेयांश ने राहत की सांस ली।
फिर बोला—
“अब तुम हवेली चलोगी।”
आयत ने उसकी आंखों में देखा।
“नहीं।”
“आयत, खतरा है।”
“तो सुरक्षा बढ़ाइए।”
“तुम समझ नहीं रही—”
“मैं समझ रही हूं।”
उसने पहली बार उसकी बात काटी।
“लेकिन डर के कारण मैं फिर किसी की कैद में नहीं जाऊंगी। चाहे वह कैद सोने की क्यों न हो।”
रेयांश चुप हो गया।
कुछ पल बाद उसने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
आयत शायद बहस की उम्मीद कर रही थी।
“बस?”
“तुम्हारा फैसला है।”
“आप मुझे मजबूर नहीं करेंगे?”
रेयांश की आंखों में अजीब-सी गंभीरता उतर आई।
“आयत, जिंदगी में अगर मैंने तुमसे कुछ सीखा है तो यही कि सुरक्षा और अधिकार में फर्क होता है।”
उसने कहा—
“मैं तुम्हारी सुरक्षा करूंगा। तुम्हारे फैसले नहीं छीनूंगा।”
उस रात आयत बहुत देर तक सो नहीं पाई।
क्योंकि जिस आदमी को वह पहले केवल ताकतवर समझती थी…
अब वह उसे समझदार भी लगने लगा था।
समय बीतता गया।
उनकी मुलाकातें बढ़ीं।
कभी ऑफिस में।
कभी दादी के घर।
कभी कोर्ट की तारीखों पर।
रेयांश ने कभी सीमा पार नहीं की।
आयत ने कभी जल्दी भरोसा नहीं किया।
दोनों के बीच रिश्ता धीरे-धीरे सांस लेने लगा।
एक शाम दादी ने रेयांश से पूछा—
“बेटा, आयत पसंद है?”
रेयांश के हाथ का चाय का कप रुक गया।
आयत रसोई में थी।
“दादी…”
“मुझसे झूठ मत बोलना।”
रेयांश ने कुछ देर बाद कहा—
“बहुत।”
“उसे बताया?”
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे मेरी जरूरत और मेरे प्यार में फर्क समझने का पूरा वक्त मिलना चाहिए।”
दादी उसे देखती रह गईं।
“अगर वह मना कर दे?”
रेयांश मुस्कुराया।
“तो उसकी जिंदगी से चला जाऊंगा।”
“इतनी आसानी से?”
“प्यार किसी की जिंदगी में रहने का लाइसेंस नहीं देता, दादी।”
दरवाजे के पीछे खड़ी आयत ने सब सुन लिया।
उसकी आंखें नम हो गईं।
लेकिन वह सामने नहीं आई।
उसी रात उसने अपनी डायरी में सिर्फ एक लाइन लिखी—
“शायद भरोसा वहीं शुरू होता है, जहां सामने वाला तुम्हारे ‘नहीं’ से डरता नहीं, उसका सम्मान करता है।”
कुछ सप्ताह बाद पुलिस को बड़ी सफलता मिली।
माया पकड़ी गई।
लेकिन दिग्विजय अब भी फरार था।
माया ने पूछताछ में दावा किया कि वह अकेली दोषी नहीं है।
उसने कहा—
“जिसे तुम लोग बचाने वाला समझ रहे हो… असली खेल उसी के घर से शुरू हुआ था।”
पुलिस अधिकारी चौंका।
“किसकी बात कर रही हो?”
माया मुस्कुराई।
“रेयांश मल्होत्रा।”
जब यह बयान आयत तक पहुंचा तो उसका दिल बैठ गया।
नहीं।
यह संभव नहीं था।
लेकिन अगले दिन मीरा उसके पास एक फाइल लेकर आईं।
“आयत… हमें कुछ मिला है।”
“क्या?”
“जिस जमीन के लिए दिग्विजय तुम्हारे पीछे था…”
मीरा रुकीं।
“उसे खरीदने में मल्होत्रा ग्रुप भी दिलचस्पी रखता था।”
आयत की सांस रुक गई।
“क्या?”
मीरा ने दस्तावेज सामने रख दिए।
छह महीने पुराना प्रस्ताव।
खरीदार—
मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर।
आयत के हाथ कांपने लगे।
उसके दिमाग में सारी पुरानी बातें घूम गईं।
रेयांश का उसकी मदद करना।
वकील।
सुरक्षा।
अस्पताल।
नौकरी।
क्या यह सब…
जमीन के लिए था?
उस शाम वह सीधे रेयांश के ऑफिस पहुंची।
दरवाजा खोला।
रेयांश ने उसे देखकर मुस्कुराना चाहा।
लेकिन आयत ने फाइल मेज पर पटक दी।
“यह क्या है?”
रेयांश ने कागज देखा।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें कहां मिला?”
“इसका मतलब सच है?”
“आयत, मेरी बात—”
“सिर्फ हां या नहीं।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
रेयांश ने धीरे से कहा—
“हां।”
आयत की आंखों में आंसू आ गए।
“आपकी कंपनी मेरी जमीन खरीदना चाहती थी?”
“हां।”
“और आपने मुझे बताया नहीं?”
रेयांश चुप रहा।
उस चुप्पी ने आयत का दिल तोड़ दिया।
“तो माया सही थी।”
“नहीं।”
“फिर क्या सच है?”
वह चीखी।
“पहले उसने मेरी कीमत लगाई। फिर दिग्विजय ने मेरी जमीन चाही। और अब…”
उसकी आवाज टूट गई।
“आप भी?”
“बस।”
रेयांश खड़ा हो गया।
लेकिन फिर वहीं रुक गया।
“तुम्हें सच जानने का पूरा अधिकार है।”
उसने इंटरकॉम दबाया।
“करण, पुरानी प्रोजेक्ट फाइल लेकर आओ।”
कुछ देर बाद करण फाइल लेकर आया।
रेयांश ने आयत के सामने खोल दी।
“यह जमीन मल्होत्रा ग्रुप खरीदना चाहता था। लेकिन मुझे नहीं पता था कि मालिक तुम हो।”
“मैं कैसे मानूं?”
“मत मानो।”
आयत चौंकी।
रेयांश ने कहा—
“दस्तावेज देखो।”
फाइल में बोर्ड मीटिंग के मिनट्स थे।
प्रस्ताव।
और फिर एक हस्ताक्षरित आदेश।
आयत ने तारीख देखी।
उस रात के अगले दिन।
आदेश में लिखा था—
“मल्होत्रा ग्रुप तत्काल प्रभाव से उक्त भूमि के अधिग्रहण की सभी कोशिशें समाप्त करता है।”
नीचे रेयांश के हस्ताक्षर थे।
आयत ने उसकी तरफ देखा।
“आपने सौदा क्यों रोका?”
“क्योंकि अगले दिन मुझे पता चला जमीन तुम्हारी है।”
“इसलिए?”
“क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें कभी लगे मेरी मदद के पीछे कोई सौदा था।”
आयत की आंखें भर आईं।
“तो बताया क्यों नहीं?”
रेयांश की आवाज धीमी हो गई।
“यही मेरी गलती थी।”
उसने कहा—
“मैं सोचता रहा सही समय पर बताऊंगा। फिर हर दिन लगा आज नहीं। शायद मुझे डर था कि तुम मुझ पर शक करोगी।”
आयत ने कड़वी हंसी हंसी।
“और अब?”
“अब तुम्हारा शक करना जायज है।”
रेयांश ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
“पूरी कंपनी की जांच करा लो।”
“आप नाराज नहीं हैं?”
“किस बात पर?”
“मैंने आप पर शक किया।”
रेयांश ने उसकी आंखों में देखा।
“तुम्हें धोखा उन लोगों ने दिया जिन पर तुमने आंख बंद करके भरोसा किया था। मैं तुमसे आंख बंद करके भरोसा करने को कभी नहीं कहूंगा।”
आयत की पलकों से आंसू गिर गए।
लेकिन तभी करण का फोन बजा।
उसने कॉल उठाया।
अगले ही पल उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या?”
रेयांश ने पूछा।
करण ने फोन नीचे किया।
“सर…”
“क्या हुआ?”
“दिग्विजय मिल गया।”
“कहां?”
“पुराने फार्महाउस पर।”
रेयांश की आंखें सख्त हो गईं।
“पुलिस को बताओ।”
“पुलिस वहां पहुंच चुकी है।”
करण कुछ क्षण चुप रहा।
“लेकिन उसने एक वीडियो भेजा है।”
“किसका?”
करण ने फोन स्क्रीन उनकी तरफ कर दी।
वीडियो चला।
अंधेरा कमरा।
एक कुर्सी।
और उसके सामने खड़ा दिग्विजय।
वह कैमरे में देखकर मुस्कुरा रहा था।
“आयत…”
उसकी आवाज सुनते ही आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
“तुम सोच रही हो कि तुम्हारी कहानी उस रात शुरू हुई जब माया ने तुम्हें बेचा?”
वह हंसा।
“नहीं।”
“तुम्हारी कहानी बीस साल पहले शुरू हुई थी।”
आयत की सांस रुक गई।
दिग्विजय ने कैमरे के सामने एक पुरानी तस्वीर उठाई।
तस्वीर में आयत के पिता थे।
उनके साथ एक दूसरा आदमी।
और पीछे मल्होत्रा परिवार की पुरानी फैक्ट्री।
दिग्विजय बोला—
“जिस जमीन को तुम अपनी विरासत समझ रही हो… उसके नीचे ऐसा राज दबा है जिसके लिए तुम्हारे पिता ने अपनी जान गंवाई।”
आयत के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
वीडियो में दिग्विजय की मुस्कान और गहरी हो गई।
“और रेयांश…”
उसने कैमरे के करीब आकर कहा—
“अगर तुम सच में आयत को बचाना चाहते हो, तो उसे बताओ कि उसके पिता की मौत वाली रात तुम्हारे पिता कहां थे।”
वीडियो खत्म हो गया।
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा फैल गया।
आयत ने धीरे-धीरे रेयांश की तरफ देखा।
उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।
“रेयांश…”
उसकी आवाज कांपी।
“वह क्या कह रहा था?”
रेयांश ने जवाब नहीं दिया।
“मेरे पापा की मौत का आपके परिवार से क्या संबंध है?”
रेयांश की मुट्ठियां भींच गईं।
करण ने नजरें झुका लीं।
और तभी आयत समझ गई—
कुछ तो था।
कुछ ऐसा जिसे रेयांश उससे छिपा रहा था।
“मुझे सच चाहिए।”
आयत ने कहा।
“अभी।”
रेयांश ने आंखें बंद कीं।
एक लंबी सांस ली।
फिर धीरे से अपनी मेज की सबसे नीचे वाली दराज खोली।
उसने वहां से एक पुराना काला लिफाफा निकाला।
आयत की नजर उस पर जम गई।
लिफाफे पर धुंधली स्याही से उसके पिता का नाम लिखा था।
“यह मेरे पास कई साल से है।”
रेयांश ने कहा।
आयत का दिल जोर से धड़का।
“इसमें क्या है?”
रेयांश ने लिफाफा उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“वही सच…”
उसकी आवाज भारी हो गई।
“जिसके बाद शायद तुम दोबारा मेरा चेहरा देखना भी पसंद न करो।”
आयत के कांपते हाथ लिफाफे तक पहुंचे।
लेकिन जैसे ही उसने उसे खोलना चाहा—
कमरे की सारी लाइटें अचानक बुझ गईं।
अंधेरा।
अगले ही पल नीचे से सिक्योरिटी अलार्म गूंज उठा।
करण दौड़कर दरवाजे की तरफ गया।
“सर! सिस्टम हैक हुआ है!”
“क्या?”
“कोई हवेली के अंदर घुसा है!”
रेयांश तुरंत आयत के सामने आकर खड़ा हो गया।
बाहर भागते कदमों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
आयत ने काले लिफाफे को अपने सीने से लगा लिया।
और तभी अंधेरे गलियारे से किसी महिला की आवाज आई—
“आयत!”
आयत जम गई।
वह आवाज पहचानती थी।
“माया?”
दरवाजे के बाहर खड़ी परछाईं हंसी।
“लिफाफा मत खोलना, बेटी।”
आयत की सांस अटक गई।
माया ने अगला वाक्य कहा—
“क्योंकि उसे खोलते ही तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे पिता को धोखा मैंने नहीं दिया था…”
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर उसकी आवाज आई—
“उन्हें धोखा मल्होत्रा परिवार ने दिया था।”
आयत ने रेयांश की तरफ देखा।
लेकिन अंधेरे में उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ उसकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।
और आयत के हाथ में वह काला लिफाफा कांप रहा था।
वही लिफाफा जिसमें शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बंद था।
क्या रेयांश सच में उसका रक्षक था?
या जिस आदमी पर आयत धीरे-धीरे भरोसा करने लगी थी, उसका परिवार ही उसके पिता की मौत के पीछे छिपा था?
और आखिर उस बारह एकड़ जमीन के नीचे ऐसा क्या था जिसके लिए पहले आयत के पिता ने कीमत चुकाई… फिर माया ने अपनी बेटी का सौदा किया… और अब दिग्विजय अपनी पूरी ताकत लगाकर उस राज को दबाना चाहता था?
आयत ने कांपती उंगलियों से लिफाफे का किनारा फाड़ दिया।
अंदर से एक पुरानी तस्वीर के साथ एक मेमोरी कार्ड जमीन पर गिरा।
तस्वीर पलटते ही उसके पीछे सिर्फ सात शब्द लिखे थे—
“अगर मैं मर जाऊं, कैमरा नंबर सात देखना।”
और ठीक उसी क्षण…
हवेली के बाहर एक गाड़ी के टायर चीखे।
कोई अंधेरे में भाग चुका था।
लेकिन इस बार आयत रोई नहीं।
उसने मेमोरी कार्ड उठाया।
आंखों से आंसू पोंछे।
और पहली बार रेयांश की आंखों में बिना डरे देखकर कहा—
“अब कोई मुझे आधा सच नहीं बताएगा।”
उसकी आवाज धीमी थी।
मगर उसमें वह पुरानी मासूम बेबसी नहीं थी।
“कैमरा नंबर सात खोलिए, रेयांश।”
रेयांश ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि वह जानता था—
उस कैमरे में जो कैद था, उसके सामने आने के बाद सिर्फ दिग्विजय और माया की जिंदगी नहीं बदलने वाली थी।
मल्होत्रा साम्राज्य की नींव भी हिल सकती थी।
और शायद…
आयत और रेयांश के बीच जन्म ले रहा वह अनकहा रिश्ता भी उसी रात हमेशा के लिए खत्म हो सकता था।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।