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जिस “ताई” को गाँव ने अकेली और बेबस समझा, उसी के दरवाज़े पर एक रात आया वह सच जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी बदल दी

जिस “ताई” को गाँव ने अकेली और बेबस समझा, उसी के दरवाज़े पर एक रात आया वह सच जिसने उसकी पूरी ज़िंदगी बदल दी

रात के ठीक ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट पर दरवाज़े पर तीसरी बार दस्तक हुई।

प्रिया ने चूल्हे के पास रखा गिलास उठाते-उठाते हाथ रोक लिया।

बाहर बारिश इतनी तेज़ थी कि टीन की छत पर गिरती बूंदों की आवाज़ किसी बेचैन भीड़ जैसी लग रही थी।

कमरे में सिर्फ एक पीला बल्ब जल रहा था।

आदित्य ने लैपटॉप बंद किया और धीरे से पूछा,

“ताई… इस समय कौन हो सकता है?”

प्रिया ने जवाब नहीं दिया।

उसकी निगाह दरवाज़े पर जमी थी।

चेहरे का रंग अचानक उड़ गया था।

फिर चौथी दस्तक हुई।

इस बार दरवाज़े के दूसरी तरफ से एक पुरुष की आवाज़ आई—

“प्रिया… दरवाज़ा खोल।”

प्रिया के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।

उसकी उंगलियां कांपने लगीं।

आदित्य तुरंत उठ खड़ा हुआ।

“कौन है?”

प्रिया ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आंखों में वह डर था जिसे आदित्य पिछले दो महीनों में कभी ठीक से समझ नहीं पाया था।

उसने मुश्किल से होंठ खोले।

“मेरा… पति।”

आदित्य कुछ पल बिल्कुल स्थिर रह गया।

क्योंकि जिस आदमी के बारे में प्रिया ने कहा था कि वह दो वर्षों से उसकी जिंदगी से गायब है…

जिसने कभी उसे ढूंढने की कोशिश तक नहीं की…

जिसके कारण प्रिया अपना घर, अपना शहर और अपनी पुरानी जिंदगी छोड़कर इस छोटे से गांव में आ बसी थी…

वही आदमी आज आधी रात उसके दरवाज़े के बाहर खड़ा था।

और वह अकेला नहीं आया था।

खिड़की की दरार से आदित्य ने बाहर देखा।

काली जीप के पास दो और आदमी खड़े थे।

तभी बाहर से फिर आवाज़ आई—

“मुझे पता है अंदर कौन है, प्रिया।”

एक लंबी खामोशी।

फिर वह आदमी हंसा।

“और मुझे यह भी पता है कि तुमने इतने महीनों से मुझसे क्या छिपा रखा है।”

प्रिया ने अचानक आदित्य का हाथ पकड़ लिया।

उसकी हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी।

और बहुत धीमी आवाज़ में उसने कहा—

“आदित्य… आज अगर मैंने तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं बताई, तो शायद कल बहुत देर हो जाएगी।”

लेकिन उस रात तक पहुंचने की कहानी दो महीने पहले पुणे में शुरू हुई थी।

आदित्य देशमुख, उम्र छब्बीस वर्ष।

एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का।

न बड़े सपनों की चमक आंखों में दिखाता था, न अपनी छोटी सफलताओं का शोर करता था।

साल 2020 में पुणे की एक आईटी कंपनी में उसे नौकरी मिली थी।

तकनीकी काम था।

मशीनों, नेटवर्क, सिस्टम और रिपोर्टों के बीच बीतने वाली जिंदगी।

छह महीनों में उसने काम इतनी जल्दी सीख लिया था कि उसके वरिष्ठ अधिकारी अक्सर उसकी तारीफ करते।

एक सोमवार की मीटिंग में असिस्टेंट मैनेजर ने कहा,

“अहमदनगर के पास हमारे नए प्रोजेक्ट में छह महीने के लिए कुछ कर्मचारियों की जरूरत है।”

फिर सूची पढ़ी गई।

तीसरा नाम था—

“आदित्य देशमुख।”

उसका चेहरा उतर गया।

पुणे उसका शहर था।

मां-बाबा यहीं थे।

घर का खाना, अपना कमरा, परिचित रास्ते।

लेकिन अगली बात सुनते ही उसकी चिंता थोड़ी कम हुई।

वहां वेतन डेढ़ गुना मिलने वाला था।

शाम को घर पहुंचकर उसने मां शोभा और पिता माधव को सब बताया।

मां ने तुरंत पूछा,

“कहां रहोगे?”

“कंपनी ने कहा है खुद व्यवस्था करनी होगी।”

शोभा कुछ देर सोचती रही।

फिर जैसे अचानक कुछ याद आया।

“अरे! अहमदनगर के पास ही तो सुलोचना रहती है।”

सुलोचना उसकी मां की बचपन की सहेली थी।

दोनों का रिश्ता इतना गहरा था कि आदित्य बचपन से उन्हें “मौसी” कहता था।

सुलोचना की दो बेटियां थीं।

बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी।

छोटी बेटी का नाम प्रिया था।

आदित्य ने उसे वर्षों पहले सिर्फ एक बार देखा था।

वह उससे लगभग चार-पांच वर्ष बड़ी थी।

तब भी आदित्य उसे “प्रिया ताई” कहता था, क्योंकि महाराष्ट्र में अपने से बड़ी परिचित लड़की को सम्मान से ताई कहना सामान्य बात थी।

खून का कोई रिश्ता नहीं था।

बस मां की सहेली की बेटी।

लेकिन उस रात जब शोभा ने सुलोचना को फोन किया, तो बातचीत उम्मीद से ज्यादा लंबी चली।

आदित्य बाहर टहलकर वापस आया तो मां चुप बैठी थी।

“क्या हुआ मां? मौसी ने मना कर दिया?”

“नहीं।”

“फिर?”

मां ने गहरी सांस ली।

“प्रिया वहीं पास के एक गांव में अकेली रहती है।”

आदित्य चौंका।

“अकेली?”

उसके बाद जो कहानी मां ने बताई, उसने आदित्य के मन में सालों पुरानी उस लड़की की धुंधली तस्वीर बदल दी।

प्रिया की शादी कम उम्र में राघव नाम के व्यक्ति से हुई थी।

शुरुआत में परिवार को लगा था कि लड़का अच्छा है।

लेकिन विवाह के कुछ महीनों बाद ही सच्चाई सामने आने लगी।

राघव को शराब की गंभीर आदत थी।

काम पर जाता तो कुछ दिन ठीक रहता, फिर कई दिन गायब।

पैसा आता तो घर पर नहीं टिकता।

धीरे-धीरे उसका स्वभाव भी बदल गया।

गुस्सा।

अपमान।

शक।

किसी से बात करने पर सवाल।

घर से बाहर जाने पर सवाल।

पैसे मांगने पर सवाल।

कई बार वह ऐसी बातें कह देता जो किसी भी इंसान के आत्मसम्मान को भीतर तक तोड़ दें।

प्रिया ने लगभग दो साल तक सब सहा।

यह सोचकर कि शायद वह सुधर जाएगा।

लेकिन जिस दिन उसने प्रिया के गहने बेचने की कोशिश की, उस दिन पहली बार उसने विरोध किया।

राघव ने ठंडी नजर से कहा था,

“तुम्हारा है ही क्या इस घर में?”

वही एक वाक्य प्रिया के भीतर कहीं अटक गया।

उस रात उसने पहली बार खुद से पूछा—

अगर इस घर में मेरा कुछ नहीं…

तो क्या मेरी अपनी जिंदगी भी मेरी नहीं?

कुछ सप्ताह बाद वह घर छोड़कर चली गई।

मां के पास भी हमेशा नहीं रह सकती थी।

इसलिए उसने अहमदनगर के पास एक छोटे से गांव में किराए का कमरा लिया।

कभी फैक्ट्री में अस्थायी काम करती।

कभी खेतों में मजदूरी।

कभी महिलाओं के कपड़ों की सिलाई।

सुलोचना जितना बन पड़ता, मदद करती।

लेकिन प्रिया अपनी मां पर बोझ नहीं बनना चाहती थी।

शोभा ने आदित्य की तरफ देखते हुए कहा,

“सुलोचना कह रही थी कि अगर तुम चाहो तो कुछ महीने प्रिया के घर रह सकते हो। उसका घर छोटा है, लेकिन ऑफिस ज्यादा दूर नहीं पड़ेगा।”

आदित्य तुरंत तैयार नहीं हुआ।

“ताई को परेशानी तो नहीं होगी?”

“मैंने यही पूछा था।”

“फिर?”

“वह तैयार है।”

अगले दिन प्रिया का फोन नंबर आदित्य को मिला।

कई मिनट तक वह नंबर देखता रहा।

फिर फोन लगाया।

चार घंटियां गईं।

“हेलो?”

आवाज पहले से अलग थी।

शांत।

थोड़ी थकी हुई।

लेकिन अपनापन था।

“प्रिया ताई?”

“कौन?”

“मैं आदित्य।”

दूसरी तरफ दो सेकंड की चुप्पी रही।

फिर अचानक आवाज़ खिल उठी।

“अरे आदित्य! कितना बड़ा हो गया होगा तू!”

वह हंस पड़ा।

“आवाज से कैसे पता चला?”

“तेरी मां रोज तारीफ करती है।”

दोनों हंस दिए।

बरसों की दूरी जैसे कुछ मिनटों में कम हो गई।

प्रिया ने कहा,

“आजाओ। घर छोटा है, पर दो लोगों के लिए काफी है।”

फिर हल्के मजाक में बोली,

“बस मेरी बनाई सब्जी की शिकायत मत करना।”

आदित्य ने जवाब दिया,

“पहले खाऊंगा, फिर शिकायत की सूची बनाऊंगा।”

उसकी हंसी पहली बार खुलकर सुनाई दी।

शायद कई महीनों बाद।

अगली सुबह आदित्य अहमदनगर के लिए निकल गया।

मां ने टिफिन पकड़ाते हुए कहा,

“अपना ध्यान रखना।”

फिर एक पल रुककर बोली,

“और प्रिया का भी।”

आदित्य ने सहजता से कहा,

“तुम चिंता मत करो।”

उसे नहीं मालूम था कि यही वादा कुछ सप्ताह बाद उसकी जिंदगी का सबसे कठिन वादा बन जाएगा।

दोपहर करीब साढ़े बारह बजे वह गांव के मुख्य फाटक पर उतरा।

धूप तेज़ थी।

सड़क के किनारे एक बड़ा नीम का पेड़ था।

उसी की छांव में हल्की नीली साड़ी पहने एक महिला खड़ी थी।

आदित्य कुछ कदम आगे बढ़ा।

महिला ने गौर से देखा।

फिर अचानक मुस्कुरा दी।

“आदित्य?”

वह भी मुस्कुरा पड़ा।

“ताई?”

प्रिया के चेहरे पर समय ने हल्की गंभीरता जरूर लिख दी थी, लेकिन उसकी मुस्कान वैसी थी जिसे देखकर कोई भी समझ सकता था कि यह औरत बहुत कुछ सहकर भी पूरी तरह कठोर नहीं हुई।

“बाप रे!”

वह हंसते हुए बोली।

“तू इतना लंबा कब हो गया?”

“आप लोगों ने मुझे सालों देखा ही नहीं।”

“चल, बैग दे।”

“मैं उठा लूंगा।”

“शहर के लड़के हो, दो कदम में थक जाओगे।”

“ताई, आईटी में हूं, आईसीयू में नहीं।”

प्रिया खिलखिलाकर हंस पड़ी।

शायद उसी पल उनके बीच की झिझक का पहला पर्दा गिर गया।

घर बहुत बड़ा नहीं था।

आगे छोटा सा बरामदा।

एक मुख्य कमरा।

उसके पीछे रसोई।

बगल में छोटा कमरा जिसे प्रिया ने आदित्य के लिए साफ कर दिया था।

खिड़की के पास एक पुरानी लकड़ी की मेज थी।

उस पर साफ चादर।

पानी की बोतल।

मोबाइल चार्ज करने का एक्सटेंशन बोर्ड।

यहां तक कि मच्छर अगरबत्ती भी।

आदित्य ने चारों तरफ देखा।

“यह सब आपने मेरे लिए किया?”

“और किसके लिए?”

“इतनी मेहनत क्यों?”

प्रिया ने बहुत साधारण आवाज़ में कहा,

“किसी का इंतजार करना भी कभी-कभी अच्छा लगता है।”

वह वाक्य सुनकर आदित्य कुछ पल चुप रहा।

पहले दिन उसने महसूस किया कि प्रिया बहुत बोलती है।

लेकिन अपने बारे में बहुत कम।

वह आदित्य के ऑफिस के बारे में पूछती।

उसके माता-पिता।

पसंदीदा खाना।

स्कूल की शरारतें।

लेकिन जैसे ही बात उसके विवाह पर आती, उसकी आवाज़ धीमी हो जाती।

पहली शाम खाना खाते समय दरवाज़े पर एक बुजुर्ग महिला आईं।

“प्रिया!”

“आइए अक्का।”

महिला ने आदित्य को ऊपर से नीचे तक देखा।

“ये कौन?”

प्रिया ने सहजता से कहा,

“मेरी मां की सहेली का बेटा है। नौकरी के लिए कुछ महीने यहां रहेगा।”

महिला की भौंहें तन गईं।

“तुम दोनों?”

कमरे में दो सेकंड की असहज चुप्पी छा गई।

प्रिया की मुस्कान धीमी पड़ गई।

“हां अक्का।”

महिला बोली,

“गांव है बेटी। लोगों की जुबान का क्या भरोसा।”

यह कहकर चली गई।

दरवाज़ा बंद हुआ।

प्रिया कुछ देर चुप रही।

आदित्य समझ गया।

“अगर मेरे रहने से समस्या हो रही है तो मैं कहीं और…”

“नहीं।”

प्रिया ने तुरंत उसे रोक दिया।

उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी सख्त थी।

“हर बार मैं ही क्यों अपना रास्ता बदलूं?”

आदित्य चुप हो गया।

प्रिया ने फिर नरम स्वर में कहा,

“मैंने पूरी जिंदगी लोगों की बात सुनकर फैसले किए हैं। अब नहीं।”

उस रात आदित्य देर तक जागा।

दूसरे कमरे से बर्तनों की धीमी आवाज़ आती रही।

कुछ सप्ताह में उनका जीवन एक सामान्य लय में ढल गया।

सुबह प्रिया उससे पहले उठती।

“आदित्य! सात बज गए!”

“पांच मिनट।”

“कल भी पांच मिनट कहा था।”

“आज वाले पांच मिनट अलग हैं।”

“उठता है या पानी डालूं?”

दरवाज़ा खुल जाता।

आदित्य बाहर निकलता तो नाश्ता तैयार।

कभी पोहा।

कभी उपमा।

कभी पराठा।

एक दिन आदित्य ने कहा,

“आप रोज मेरे लिए क्यों बनाती हैं? मैं खुद कर सकता हूं।”

प्रिया ने चम्मच हवा में रोककर उसे देखा।

“कर सकते हो?”

“हां।”

“कल बनाना।”

अगली सुबह आदित्य ने चाय बनाई।

पहला घूंट लेते ही प्रिया ने आंखें बंद कर लीं।

आदित्य उत्साहित हुआ।

“कैसी है?”

“भगवान तुम्हारी भावी पत्नी की रक्षा करे।”

आदित्य जोर से हंस पड़ा।

धीरे-धीरे उस छोटे से घर में फिर हंसी सुनाई देने लगी।

प्रिया के चेहरे पर भी बदलाव आने लगा।

वह पहले काम से लौटकर चुप बैठ जाती थी।

अब दरवाज़ा खोलते ही कहती,

“आज ऑफिस में क्या हुआ?”

कभी दोनों बाजार चले जाते।

कभी छत पर बैठकर चाय पीते।

कभी बिजली चली जाती तो मोमबत्ती की रोशनी में पुराने किस्से सुनाते।

लेकिन एक बात आदित्य को परेशान करती।

हर बार कोई मोटरसाइकिल घर के सामने धीमी होती, प्रिया खिड़की की तरफ देखने लगती।

हर अनजान नंबर पर उसका चेहरा तनाव से भर जाता।

एक रात उसने पूछ ही लिया।

“आप अब भी राघव से डरती हैं?”

प्रिया ने उत्तर देने में समय लिया।

फिर कहा,

“कुछ लोगों से डर खत्म हो जाता है आदित्य… लेकिन उनके दिए डर की आदत नहीं जाती।”

आदित्य ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।

“उसने आपको ढूंढने की कोशिश की?”

“नहीं।”

“फिर?”

प्रिया ने हल्की हंसी हंसी।

“शायद मैं उसके लिए उतनी जरूरी कभी थी ही नहीं।”

उस एक वाक्य में इतनी खाली जगह थी कि आदित्य जवाब नहीं दे सका।

उस रात पहली बार उसने महसूस किया कि इंसान सिर्फ मार या अपमान से नहीं टूटता।

कभी-कभी लगातार यह महसूस होना कि तुम्हारी कोई जरूरत नहीं…

वह भी इंसान को अंदर से खोखला कर देता है।

कुछ दिन बाद गांव का वार्षिक मेला था।

प्रिया की सहेलियां कई दिनों से उसे बुला रही थीं।

वह जाना नहीं चाहती थी।

आदित्य ने पूछा,

“क्यों?”

“अकेले अच्छा नहीं लगता।”

“तो मैं चलूंगा।”

प्रिया ने उसकी तरफ देखा।

“सच?”

“ऑफिस से जल्दी निकलने की कोशिश करूंगा।”

उस दिन आदित्य शाम पांच बजे ही घर पहुंच गया।

प्रिया अभी वापस नहीं आई थी।

करीब आधे घंटे बाद वह दोनों हाथों में सामान के थैले लिए आई।

“इतना सामान?”

“घर का राशन।”

आदित्य ने थैले उसके हाथ से ले लिए।

“फोन कर देती।”

“मैं कर सकती हूं अपना काम।”

“पता है।”

आदित्य मुस्कुराया।

“पर हर काम अकेले करना जरूरी थोड़े है।”

प्रिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर पहली बार उसकी आंखों में बहुत हल्की चमक आई।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस भीतर चली गई।

मेले में जाने के लिए प्रिया ने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी।

आदित्य बाहर उसका इंतजार कर रहा था।

दरवाज़ा खुला।

प्रिया बाहर आई।

आदित्य कुछ पल बोलना भूल गया।

प्रिया ने माथे पर छोटी बिंदी लगाई थी।

बाल खुले थे।

कानों में साधारण झुमके।

कोई महंगा श्रृंगार नहीं।

फिर भी उसके चेहरे पर उस दिन एक अलग आत्मविश्वास था।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“बुरी लग रही हूं?”

“नहीं।”

आदित्य ने मुस्कुराकर कहा,

“आज गांव वाले मेले की जगह आपको ही देखते रहेंगे।”

प्रिया ने उसे घूरा।

“बहुत बोलने लगा है।”

“सच बोल रहा हूं।”

“चल।”

दोनों मेले की तरफ निकल गए।

रंगीन बल्ब।

दूर बजता ढोल।

गन्ने के रस की दुकान।

बच्चों के झूले।

खिलौनों की आवाजें।

कई महीनों बाद प्रिया बच्चों की तरह खुश दिखाई दे रही थी।

एक दुकान पर उसने कांच की चूड़ियां देखीं।

उठाई।

कीमत पूछी।

फिर वापस रख दीं।

आदित्य ने पूछा,

“क्यों नहीं लीं?”

“जरूरत नहीं।”

वह आगे बढ़ गई।

कुछ देर बाद आदित्य उसी दुकान पर वापस गया।

नीली चूड़ियों का एक छोटा डिब्बा खरीद लिया।

घर लौटते समय उसने प्रिया को पकड़ा दिया।

“यह क्या?”

“आईटी कंपनी का बोनस।”

डिब्बा खोलते ही प्रिया की आंखें चमक उठीं।

फिर तुरंत गंभीर हो गई।

“आदित्य, मेरे लिए पैसे खर्च मत किया कर।”

“बहुत महंगी नहीं हैं।”

“बात कीमत की नहीं।”

“फिर?”

प्रिया ने चूड़ियों को देखते हुए कहा,

“आदत खराब हो जाती है।”

“किसकी?”

उसने बहुत धीरे उत्तर दिया—

“किसी के ख्याल रखने की।”

आदित्य के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

उसने पहली बार समझा—

जिस चीज को वह सामान्य मानता था, वही प्रिया के लिए असामान्य थी।

अगले दिन से चीजें बदलने लगीं।

बहुत धीरे।

इतनी धीरे कि शुरुआत में दोनों में से किसी ने ध्यान नहीं दिया।

आदित्य देर से आता तो प्रिया बेचैन होती।

प्रिया के सिर में दर्द होता तो आदित्य दवा लेकर आता।

वह मजदूरी से थकी लौटती तो चाय आदित्य बनाता।

चाय खराब होती।

फिर भी प्रिया पीती।

और कहती,

“पहले से दो प्रतिशत बेहतर है।”

एक शाम तेज बारिश हुई।

बिजली चली गई।

छत टपकने लगी।

दोनों बाल्टियां रख रहे थे कि अचानक प्रिया हंसने लगी।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“बताओ।”

वह फर्श पर बैठ गई।

“बस सोच रही हूं… मेरी जिंदगी भी इस छत जैसी है।”

“मतलब?”

“एक छेद बंद करती हूं, दूसरी जगह से पानी टपकने लगता है।”

आदित्य भी उसके सामने बैठ गया।

“छत बदली जा सकती है।”

प्रिया ने उसकी आंखों में देखा।

“हर चीज इतनी आसानी से नहीं बदलती।”

“कोशिश करने में क्या जाता है?”

वह कई सेकंड उसे देखती रही।

शायद उसी रात पहली बार प्रिया ने आदित्य को सिर्फ शोभा की सहेली का बेटा नहीं…

अपने जीवन में टिके रहने वाले किसी व्यक्ति की तरह देखना शुरू किया।

लेकिन गांव की नजरें भी बदल रही थीं।

कुएं के पास दो महिलाओं ने प्रिया को सुनाते हुए कहा,

“आजकल तो अकेली महिलाओं के घर शहर के लड़के रहने लगे हैं।”

दूसरी ने हंसकर कहा,

“जमाना बदल गया है।”

प्रिया बिना जवाब दिए पानी भरती रही।

लेकिन उसकी उंगलियां कांप रही थीं।

घर आकर उसने घड़ा जोर से जमीन पर रखा।

आदित्य ने पूछा,

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“झूठ।”

प्रिया चुप।

“किसी ने कुछ कहा?”

कुछ पल बाद उसकी आंखों में आंसू आ गए।

“मैंने क्या अपराध किया है, आदित्य?”

“ताई…”

“पति के साथ रहूं तो उसकी बेइज्जती सहूं। उससे दूर रहूं तो समाज सवाल करे। अकेली रहूं तो लोग शक करें। किसी की मदद स्वीकार करूं तो लोग कहानी बना लें।”

वह पहली बार फूट पड़ी।

“आखिर औरत जाए तो जाए कहां?”

आदित्य के पास उस सवाल का जवाब नहीं था।

वह बस उसके सामने कुर्सी खींचकर बैठ गया।

“आप कहीं नहीं जाएंगी।”

प्रिया ने आंसुओं के बीच देखा।

“ये आपका घर है।”

“किराए का है।”

“फिर भी।”

“और तुम?”

आदित्य हल्का मुस्कुराया।

“मैं किरायेदार।”

प्रिया रोते-रोते हंस पड़ी।

“बहुत खराब किरायेदार।”

“क्यों?”

“किराया नहीं दिया।”

“आपने मांगा?”

“खाना खाते समय तीन रोटी ज्यादा खाता है, वही किराया है।”

कमरे का भारीपन टूट गया।

लेकिन उस घटना के बाद आदित्य ने निर्णय किया कि वह अब प्रिया के सामने किसी की अपमानजनक बात अनदेखी नहीं करेगा।

कुछ दिन बाद गांव का एक व्यक्ति, पाटिल, घर आया।

उसका व्यवहार शुरू से ही प्रिया के साथ अच्छा नहीं था।

वह बोला,

“प्रिया, गांव में बातें बढ़ रही हैं।”

“किस बात की?”

“इस लड़के की।”

आदित्य अंदर बैठा सब सुन रहा था।

प्रिया ने शांत स्वर में कहा,

“इनका नाम आदित्य है।”

पाटिल ने ताना मारा,

“नाम चाहे जो हो। जवान आदमी है। अकेली औरत के घर रह रहा है।”

प्रिया का चेहरा लाल हो गया।

“वह मेरी मां की सहेली का बेटा है।”

“समाज रिश्ते नहीं देखता।”

तभी आदित्य बाहर आया।

“समाज कौन?”

पाटिल ने उसे देखा।

“बड़े लोगों की बात है।”

आदित्य ने शांत आवाज़ में कहा,

“बड़े लोग किसी अकेली महिला को सुरक्षित महसूस कराते हैं। डराते नहीं।”

पाटिल का चेहरा बदल गया।

“बहुत जुबान चलती है शहर वालों की।”

“जुबान तब चलती है जब किसी सम्मानित महिला के चरित्र पर सवाल उठाया जाए।”

प्रिया ने तुरंत आदित्य का हाथ पकड़कर रोक दिया।

“बस।”

पाटिल चला गया।

दरवाज़ा बंद हुआ।

प्रिया ने गुस्से से कहा,

“तुम्हें उनसे बहस करने की जरूरत नहीं थी।”

“उन्होंने गलत कहा।”

“मुझे आदत है।”

यही सुनकर आदित्य का स्वर अचानक सख्त हो गया।

“यही तो समस्या है।”

प्रिया चौंकी।

आदित्य बोला,

“गलत चीज की आदत पड़ जाना उसे सही नहीं बना देता।”

कमरे में खामोशी छा गई।

प्रिया की आंखें भर आईं।

उसने मुंह फेर लिया।

उस शाम उसने ज्यादा बात नहीं की।

लेकिन रात को जब आदित्य अपने कमरे में जा रहा था, पीछे से आवाज़ आई—

“आदित्य।”

“हां?”

प्रिया ने बहुत धीमे कहा,

“धन्यवाद।”

आदित्य मुस्कुराया।

“किराए में जोड़ लेना।”

प्रिया फिर मुस्कुरा दी।

इसी बीच आदित्य ने एक और चीज नोटिस की।

प्रिया हर महीने अपनी कमाई का कुछ हिस्सा एक पुराने लोहे के डिब्बे में रखती थी।

एक दिन मजाक में उसने पूछा,

“गुप्त खजाना?”

प्रिया तुरंत गंभीर हो गई।

“इसे कभी मत छूना।”

आदित्य पीछे हट गया।

“ठीक है।”

उस दिन पहली बार उसे लगा कि उस डिब्बे में सिर्फ पैसे नहीं हैं।

समय बीतता गया।

आदित्य की छह महीने की पोस्टिंग में अभी चार महीने बाकी थे।

लेकिन उसके लिए पुणे की याद अब पहले जैसी तीखी नहीं रही थी।

वह सुबह प्रिया की आवाज़ सुनने का आदी हो गया था।

शाम को दरवाज़ा खोलते समय उसकी “आ गए?” सुनने का।

खाने के बाद दोनों की चाय।

छत पर बैठना।

छोटी-छोटी नोकझोंक।

उस घर की शांति अब खाली नहीं लगती थी।

एक रविवार प्रिया बीमार पड़ गई।

सुबह उठी ही नहीं।

आदित्य ने दरवाज़ा खटखटाया।

“ताई?”

कोई जवाब नहीं।

दरवाज़ा हल्का खुला था।

प्रिया बिस्तर पर थी।

माथा तप रहा था।

आदित्य घबरा गया।

“इतना तेज बुखार!”

“कुछ नहीं।”

“आपका ‘कुछ नहीं’ कभी कुछ नहीं क्यों नहीं होता?”

वह दवा लाया।

डॉक्टर को बुलाया।

खिचड़ी बनाने की कोशिश की।

खिचड़ी इतनी गाढ़ी हुई कि प्रिया ने कटोरी देखकर पूछा,

“इसे खाऊं या दीवार बनाने में इस्तेमाल करूं?”

आदित्य ने मुंह बनाया।

“बीमार होकर भी मजाक।”

प्रिया ने पहली चम्मच खाई।

“नमक?”

आदित्य जम गया।

“भूल गया।”

प्रिया हंसते-हंसते खांसने लगी।

उस शाम बुखार थोड़ा कम हुआ।

प्रिया सो रही थी।

आदित्य कुर्सी पर बैठा काम कर रहा था।

रात करीब दो बजे उसकी आंख खुली।

प्रिया जाग रही थी।

“पानी चाहिए?”

उसने सिर हिलाया।

आदित्य ने गिलास दिया।

वह पीकर बोली,

“तुम सोए नहीं?”

“काम था।”

“झूठ।”

“ठीक है। आपकी वजह से जागा।”

प्रिया कुछ पल चुप रही।

फिर अचानक पूछ बैठी,

“आदित्य, कोई इंसान किसी दूसरे की जरूरत कब बन जाता है?”

सवाल अप्रत्याशित था।

आदित्य ने कहा,

“जब उसके बिना दिन अधूरा लगे शायद।”

“और अगर वह जरूरत हमेशा के लिए चली जाए?”

“तो दर्द होगा।”

“इसलिए किसी की आदत नहीं डालनी चाहिए।”

आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

“हर रिश्ता खत्म होने के डर से शुरू ही न करें?”

प्रिया चुप।

आदित्य बोला,

“तो जिंदगी में कुछ बचेगा ही नहीं।”

उसने पहली बार महसूस किया कि प्रिया उससे नहीं…

अपने डर से लड़ रही थी।

कुछ दिन बाद एक रजिस्टर्ड पत्र आया।

प्रिया ने लिफाफा देखा और चेहरा सफेद पड़ गया।

भेजने वाले का नाम—

राघव शिंदे।

उसने पत्र खोला।

कुछ पंक्तियां पढ़ीं।

हाथ कांपने लगे।

पत्र जमीन पर गिर गया।

आदित्य ने उठाया।

उसमें लिखा था कि प्रिया को पंद्रह दिनों के भीतर शहर लौटकर कुछ संपत्ति दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने होंगे।

वरना उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

आदित्य ने पूछा,

“कौन सी संपत्ति?”

“मुझे नहीं पता।”

“वकील से बात करनी चाहिए।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“मैं उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहती।”

आदित्य ने पत्र मेज पर रखा।

“भागते रहने से वह संबंध खत्म नहीं होगा।”

प्रिया की आंखों में गुस्सा आया।

“तुम नहीं जानते मैंने क्या सहा है।”

“सही।”

आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

“इसलिए फैसला भी आपका होगा।”

फिर पत्र उसकी ओर बढ़ाया।

“लेकिन फैसला डर के कारण मत कीजिए।”

यह बात प्रिया के भीतर कहीं उतर गई।

अगले दिन दोनों अहमदनगर के एक महिला सहायता केंद्र गए।

वहां वकील मीरा कुलकर्णी ने दस्तावेज देखे।

कुछ देर पढ़ने के बाद उन्होंने पूछा,

“प्रिया, आपके पिता के नाम कोई कृषि जमीन थी?”

प्रिया चौंकी।

“थी।”

“कहां?”

“नगर हाईवे के पास लगभग तीन एकड़। पिता के बाद मां और हम दोनों बहनों के नाम हिस्सा आया था।”

मीरा की भौंहें सिकुड़ीं।

“उस जमीन का अधिग्रहण हुआ है।”

“क्या?”

“औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए।”

फिर उन्होंने मुआवजे की राशि बताई।

प्रिया कुर्सी पर सीधी बैठ गई।

रकम उसकी कल्पना से कहीं ज्यादा थी।

करीब अड़तालीस लाख रुपये में उसका हिस्सा बनता था।

लेकिन दस्तावेजों में एक समस्या थी।

किसी ने प्रिया के नाम पर पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार की थी।

लाभार्थी—

राघव शिंदे।

प्रिया के होंठ सूख गए।

“मैंने कभी हस्ताक्षर नहीं किए।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“फिर यह गंभीर मामला है।”

आदित्य ने पूछा,

“क्या हस्ताक्षर नकली हैं?”

“संभावना है।”

प्रिया कुर्सी पर बैठी रह गई।

वर्षों तक वह रोज मजदूरी करके कुछ सौ रुपये कमाती रही…

और दूसरी तरफ कोई व्यक्ति उसके नाम के लाखों रुपये लेने की तैयारी कर रहा था।

मीरा ने कहा,

“हमें आपके पुराने हस्ताक्षर, बैंक रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेज चाहिए।”

प्रिया अचानक उस लोहे के डिब्बे को याद करके बोली,

“मेरे पास हैं।”

शाम को घर लौटते ही उसने वही डिब्बा निकाला जिसे आदित्य ने कभी खजाना कहा था।

ताला खोला।

अंदर पैसे कम थे।

लेकिन दस्तावेज बहुत थे।

विवाह प्रमाणपत्र।

पुरानी बैंक पासबुक।

आधार की प्रतियां।

पिता की जमीन के कागजात।

कुछ मेडिकल रिपोर्ट।

और सबसे नीचे एक छोटी पेन ड्राइव।

आदित्य ने पूछा,

“ये क्या है?”

प्रिया लंबे समय तक उसे देखती रही।

फिर बोली,

“जिस दिन मैं राघव को छोड़कर आई थी… उससे एक दिन पहले मैंने अपने फोन में कुछ रिकॉर्ड किया था।”

“क्या?”

“उसकी और उसके एक दोस्त की बातचीत।”

आदित्य ने पेन ड्राइव लैपटॉप में लगाई।

आवाज साफ नहीं थी।

लेकिन कुछ शब्द स्पष्ट थे।

“जमीन…”

“हस्ताक्षर…”

“मुआवजा…”

फिर राघव की आवाज़—

“एक बार पैसे मेरे खाते में आ जाएं, उसके बाद वह जहां जाना चाहती है जाए।”

प्रिया की आंखें भर आईं।

उसने शायद पहली बार पूरी तरह समझा—

राघव को उसके जाने का दुख नहीं हुआ था…

क्योंकि उसे प्रिया से ज्यादा उसकी जमीन की जरूरत थी।

आदित्य ने लैपटॉप बंद कर दिया।

प्रिया ने कांपती आवाज़ में कहा,

“देखा?”

“हां।”

“मैं उसके लिए कभी इंसान थी ही नहीं।”

“नहीं।”

आदित्य ने तुरंत कहा।

प्रिया ने आश्चर्य से देखा।

“उसने आपको इंसान की तरह नहीं देखा, इसका मतलब यह नहीं कि आपकी कीमत नहीं थी।”

प्रिया रो पड़ी।

इस बार आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।

वह कुछ दूरी पर बैठा रहा।

क्योंकि कभी-कभी टूटे हुए इंसान को सलाह नहीं…

बस सुरक्षित जगह चाहिए होती है।

अगले कुछ सप्ताह कागजी लड़ाई में गुजरे।

मीरा ने पुलिस शिकायत दर्ज करवाने की सलाह दी।

हस्ताक्षरों की जांच का आवेदन गया।

मुआवजा रोक दिया गया।

राघव को नोटिस जारी हुआ।

इसी दौरान आदित्य और प्रिया के बीच कुछ ऐसा बदल गया जिसे दोनों नाम देने से डर रहे थे।

अब आदित्य पुणे से मां का फोन आने पर अक्सर बाहर जाकर बात करता।

एक दिन शोभा ने पूछा,

“प्रिया कैसी है?”

“अच्छी।”

“और तू?”

“मैं भी।”

मां हंस पड़ी।

“दोनों बहुत अच्छे हो गए लगते हो।”

आदित्य चुप।

मां ने स्वर बदलते हुए पूछा,

“आदित्य?”

“हां?”

“कुछ कहना है?”

वह कई सेकंड तक बोल नहीं पाया।

फिर कहा,

“मां… अगर किसी इंसान का अतीत कठिन हो तो क्या उसे दूसरी जिंदगी शुरू करने का हक है?”

शोभा शांत हो गई।

“हर इंसान को है।”

“समाज?”

“समाज तुम्हारे साथ खाना नहीं खाता, तुम्हारी रातें नहीं काटता, तुम्हारे आंसू नहीं पोंछता।”

आदित्य की आंखें भर आईं।

मां ने आगे कुछ नहीं पूछा।

शायद उसे अपने बेटे की आवाज़ में जवाब मिल गया था।

लेकिन प्रिया खुद को रोक रही थी।

वह आदित्य के करीब थी।

उस पर भरोसा करती थी।

उसके लौटने का इंतजार करती थी।

लेकिन जैसे ही मन भविष्य की तरफ जाता, वह खुद को पीछे खींच लेती।

एक शाम आदित्य ने पूछ लिया,

“मेरी पोस्टिंग खत्म होने के बाद क्या करेंगी?”

प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“जो पहले करती थी।”

“अकेली रहेंगी?”

“आदत है।”

“फिर वही बात।”

“कौन सी?”

“गलत चीज की आदत।”

प्रिया ने चाय का कप रख दिया।

“आदित्य, कुछ बातें सरल नहीं होतीं।”

“मैंने सरल कहा भी नहीं।”

“तुम जवान हो। अच्छी नौकरी है। तुम्हें अच्छी लड़की मिल जाएगी।”

आदित्य का चेहरा बदल गया।

“मैंने किसी लड़की के बारे में पूछा?”

प्रिया चुप।

“मैं आपके बारे में पूछ रहा था।”

उसकी सांस जैसे अटक गई।

“ऐसी बातें मत करो।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे डर लगता है।”

“मुझसे?”

“खुद से।”

यह कहकर वह उठ गई।

आदित्य ने उसका हाथ नहीं पकड़ा।

रास्ता नहीं रोका।

बस पीछे से कहा,

“मैं आपको किसी फैसले के लिए मजबूर नहीं करूंगा।”

प्रिया की आंखें भर आईं।

“लेकिन अपनी भावना झूठ भी नहीं बोलूंगा।”

उस रात दोनों ने अलग-अलग कमरों में बहुत कम नींद ली।

अगले दिन प्रिया सामान्य बनने की कोशिश करती रही।

लेकिन सामान्य कुछ रहा ही नहीं था।

सुबह आदित्य की शर्ट प्रेस करते समय उसने अचानक हाथ रोक लिया।

खुद से पूछा—

मैं यह क्यों कर रही हूं?

कर्तव्य?

आदत?

या प्रेम?

दूसरी तरफ ऑफिस में आदित्य सिस्टम के सामने बैठा था, लेकिन स्क्रीन पर दिखाई दे रहे आंकड़े समझ नहीं आ रहे थे।

लंच टाइम में सहकर्मी ने पूछा,

“कहां खोया है?”

आदित्य हंस दिया।

उसे पहली बार स्वीकार करना पड़ा—

वह प्रिया से प्रेम करने लगा था।

उसकी सुंदरता से नहीं।

उसकी जरूरतमंदता से भी नहीं।

बल्कि उस महिला से जो टूटने के बावजूद सुबह उठकर जिंदगी चलाती थी।

जो दुखी होकर भी दूसरे का टिफिन बनाती।

जो खुद आर्थिक संकट में होकर मां से पैसे लेने में शर्माती।

जो गांव की बातें सुनकर रात में रोती, लेकिन सुबह सिर ऊंचा करके काम पर जाती।

उधर कानूनी मामला तेज़ हो रहा था।

हस्ताक्षर जांच की प्राथमिक रिपोर्ट आई।

दस्तावेजों पर प्रिया के हस्ताक्षर संदिग्ध पाए गए।

अब राघव के खिलाफ मामला मजबूत था।

और शायद इसी कारण वह अचानक गायब रहने के बाद प्रिया के जीवन में फिर सक्रिय हो गया।

पहले फोन।

“शिकायत वापस ले।”

प्रिया ने काट दिया।

दूसरा फोन।

“तुझे पता नहीं तू किससे उलझ रही है।”

प्रिया कांपी।

आदित्य ने कहा,

“रिकॉर्ड करो।”

तीसरा फोन।

“पैसा आधा-आधा कर लेते हैं।”

अब सब स्पष्ट था।

मीरा ने हर कॉल सुरक्षित रखने को कहा।

फिर एक शाम राघव का संदेश आया—

“मैं खुद आ रहा हूं।”

प्रिया का चेहरा पीला पड़ गया।

आदित्य ने पुलिस को सूचना देने की बात की।

प्रिया ने कहा,

“शायद सिर्फ डराने के लिए।”

लेकिन वह सिर्फ डराने के लिए नहीं आया।

और उसी रात कहानी वहां पहुंची जहां से शुरू हुई थी।

रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट।

बारिश।

दरवाज़े पर दस्तक।

“प्रिया… दरवाज़ा खोल।”

आदित्य ने फोन में रिकॉर्डिंग चालू की।

प्रिया ने पुलिस हेल्पलाइन पर पहले से तैयार संदेश भेज दिया।

राघव ने बाहर से कहा,

“मुझे पता है अंदर कौन है।”

फिर हंसा।

“नया आदमी मिल गया?”

प्रिया का चेहरा अपमान से लाल हो गया।

आदित्य आगे बढ़ा।

उसने उसका हाथ पकड़कर रोक दिया।

“नहीं।”

पहली बार प्रिया की आवाज़ में डर से ज्यादा दृढ़ता थी।

“ये मेरी लड़ाई है।”

वह दरवाज़े के पास गई।

दरवाज़ा नहीं खोला।

बस भीतर से बोली,

“क्या चाहिए?”

“तुम्हारे हस्ताक्षर।”

“नहीं करूंगी।”

बाहर कुछ पल शांति रही।

फिर आवाज़ कठोर हो गई।

“तुम्हें लगता है पुलिस बचा लेगी?”

प्रिया की उंगलियां कांपीं।

लेकिन आवाज़ नहीं कांपी।

“मुझे अब बचाने वाला कोई आदमी नहीं चाहिए, राघव।”

आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

प्रिया बोली,

“मैं खुद को बचाना सीख चुकी हूं।”

बाहर से दरवाज़ा जोर से धकेला गया।

आदित्य सतर्क हुआ।

प्रिया पीछे हटी।

राघव चिल्लाया,

“दरवाज़ा खोल!”

तभी दूर से पुलिस वाहन की आवाज़ सुनाई दी।

बाहर खड़े दोनों आदमी जीप की तरफ भागे।

राघव ने गाली दी।

और अगले ही पल वह भी जाने को मुड़ा।

लेकिन पुलिस वाहन रास्ता रोक चुका था।

कुछ मिनटों में पूरा गांव जाग गया।

जिन लोगों ने महीनों प्रिया के चरित्र पर सवाल किए थे, वही लोग अपने दरवाज़ों से झांक रहे थे।

राघव को पुलिस के सामने खड़ा देखकर सबकी फुसफुसाहट बदल गई।

इंस्पेक्टर ने पूछा,

“प्रिया शिंदे कौन?”

दरवाज़ा खुला।

प्रिया बाहर आई।

चेहरा पीला था।

बाल बिखरे थे।

लेकिन सिर झुका नहीं था।

“मैं।”

“आपने शिकायत की थी?”

“जी।”

राघव चिल्लाया,

“ये मेरी पत्नी है! हमारा घरेलू मामला है!”

प्रिया पहली बार उसकी आंखों में देखकर बोली,

“पति होने से तुम्हें मेरे हस्ताक्षर चोरी करने का अधिकार नहीं मिलता।”

पूरा आंगन शांत।

“और पत्नी होने से मुझे तुम्हारी हर गलत बात सहना जरूरी नहीं।”

राघव ने आदित्य की तरफ इशारा किया।

“और यह कौन है?”

इससे पहले आदित्य कुछ कहता, प्रिया बोली,

“जिसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं।”

फिर एक पल रुककर जोड़ा,

“मेरे जीवन में कौन रहेगा, यह तय करने का अधिकार अब तुम्हारे पास नहीं है।”

पुलिस राघव को पूछताछ के लिए ले गई।

जीप गांव से निकल गई।

भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी।

वही अक्का जो पहले आदित्य के रहने पर सवाल कर चुकी थीं, धीरे से प्रिया के पास आईं।

“बेटी…”

प्रिया ने उनकी तरफ देखा।

अक्का की आंखें नीचे थीं।

“हमें पता नहीं था।”

प्रिया ने थकी मुस्कान दी।

“इसीलिए बिना जाने किसी औरत के बारे में बोलना नहीं चाहिए अक्का।”

महिला कुछ नहीं कह सकीं।

घर का दरवाज़ा बंद हुआ।

आदित्य ने पीछे मुड़कर प्रिया को देखा।

वह दीवार से टिक गई।

जैसे शरीर ने अब तक जितनी ताकत रोकी हुई थी, सब एक साथ खत्म हो गई।

उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

आदित्य पास गया।

लेकिन छुआ नहीं।

बस सामने खड़ा रहा।

“सब ठीक है।”

प्रिया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

आदित्य रुक गया।

प्रिया ने आंसुओं के बीच कहा,

“लेकिन पहली बार मुझे लगता है कि एक दिन ठीक हो जाएगा।”

अगले महीनों में बहुत कुछ बदला।

जांच आगे बढ़ी।

राघव द्वारा तैयार कराई गई पावर ऑफ अटॉर्नी फर्जी साबित होने लगी।

मुआवजे पर रोक जारी रही।

प्रिया ने अपने हिस्से पर स्वतंत्र दावा किया।

मीरा ने उसके वैवाहिक अधिकारों और अलग रहने से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया भी शुरू करवाई।

एक दिन प्रिया ने आदित्य से कहा,

“मैं तलाक चाहती हूं।”

आदित्य ने सिर्फ इतना पूछा,

“पक्का?”

“हां।”

“फिर मैं आपके साथ हूं।”

उसने यह नहीं कहा—

मेरे लिए तलाक लो।

उसने यह भी नहीं कहा—

फिर मुझसे शादी करना।

क्योंकि इस बार प्रिया का फैसला किसी पुरुष के लिए नहीं होना चाहिए था।

वह फैसला सिर्फ प्रिया का होना चाहिए था।

यही बात शायद प्रिया को आदित्य से और गहरे जोड़ती चली गई।

तीन महीने बाद आदित्य की अहमदनगर पोस्टिंग समाप्त होने की तारीख आ गई।

घर में अचानक एक अजीब खामोशी रहने लगी।

सामान पैक होने लगा।

कपड़े बैग में।

किताबें।

चार्जर।

ऑफिस के दस्तावेज।

वही कमरा जिसे प्रिया ने उसके आने से पहले सजाया था, फिर खाली होने लगा।

आखिरी शाम दोनों छत पर बैठे थे।

नीचे गांव की रोशनियां थीं।

प्रिया बोली,

“कल कितने बजे?”

“सुबह आठ।”

“मां खुश होंगी।”

“हां।”

“तुम भी खुश हो?”

आदित्य ने उसकी तरफ देखा।

“पता नहीं।”

प्रिया मुस्कुराई।

“तुम्हारा शहर है।”

“घर जगह से नहीं बनता ताई।”

प्रिया की मुस्कान रुक गई।

कुछ देर हवा की आवाज़ ही सुनाई देती रही।

फिर आदित्य बोला,

“एक बात पूछूं?”

“पूछो।”

“मेरे जाने के बाद मेरी याद आएगी?”

प्रिया की आंखें दूर अंधेरे में टिक गईं।

“नहीं।”

आदित्य का दिल बैठ गया।

फिर उसने कहा—

“क्योंकि याद उसे करते हैं जिसे भूल सकें।”

आदित्य बिल्कुल चुप रह गया।

प्रिया की आंखों में आंसू थे।

“तुम्हारे आने से पहले मैं सिर्फ दिन काट रही थी।”

उसकी आवाज़ कांपी।

“तुमने मुझे हंसना याद दिलाया।”

“ताई…”

“पहले सुनो।”

वह पहली बार उसकी आंखों में बिना भागे देख रही थी।

“मुझे तुमसे डर नहीं लगता, आदित्य।”

“फिर?”

“तुम्हें खोने से लगता है।”

आदित्य की सांस गहरी हो गई।

उसने बहुत धीरे कहा,

“मैंने कभी आपको कमजोर समझकर प्यार नहीं किया।”

प्रिया की आंखों से आंसू गिर गए।

“मुझे पता है।”

“मैं आपको बचाने नहीं आया था।”

“पता है।”

“और मैं यह भी नहीं चाहता कि आप मेरा इंतजार करें।”

प्रिया ने पूछा,

“फिर क्या चाहते हो?”

आदित्य ने उत्तर देने में समय लिया।

“जिस दिन आपकी पुरानी जिंदगी के सारे फैसले पूरे हो जाएं… जिस दिन आप बिना डर के खुद से पूछ सकें कि आगे क्या चाहिए…”

वह मुस्कुराया।

“उस दिन अगर जवाब में मेरा नाम आए, तो फोन कर देना।”

प्रिया रोते हुए हंस पड़ी।

“और नहीं आया?”

आदित्य ने भी मुस्कुराकर कहा,

“तो आपकी शादी में खाना खाने आऊंगा।”

प्रिया ने उसके कंधे पर हल्का मुक्का मारा।

“पागल।”

अगली सुबह बस चली।

खिड़की से आदित्य पीछे देखता रहा।

प्रिया सड़क किनारे खड़ी थी।

हाथ नहीं हिला रही थी।

बस देख रही थी।

बस मोड़ पर गायब हुई।

और पहली बार छोटा सा घर प्रिया को पहले से भी ज्यादा खाली लगा।

दिन बीते।

फिर सप्ताह।

आदित्य पुणे लौटकर अपनी पुरानी जिंदगी में शामिल हो गया।

लेकिन पुरानी जिंदगी अब वैसी नहीं रही।

सुबह कोई दरवाज़ा खटखटाकर नहीं कहता—

“उठ! सात बज गए।”

चाय ठीक बनती थी।

लेकिन मजाक करने वाला कोई नहीं।

उधर प्रिया ने भी खुद को काम में लगा लिया।

मुआवजे के मामले में फैसला उसके पक्ष में आने लगा।

तलाक की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी।

उसने मजदूरी छोड़कर गांव में महिलाओं के कपड़ों की छोटी सिलाई इकाई शुरू की।

तीन मशीनें खरीदीं।

फिर पांच।

फिर दो स्थानीय महिलाओं को काम दिया।

एक दिन सुलोचना ने फोन पर शोभा से कहा,

“तुम्हारा बेटा मेरी प्रिया को बदल गया।”

शोभा मुस्कुराई।

“नहीं।”

“फिर?”

“शायद उसने सिर्फ उसे याद दिलाया कि वह बदल सकती है।”

छह महीने बाद आदित्य अपने ऑफिस में बैठा था।

फोन बजा।

प्रिया।

उसने तुरंत उठाया।

“हेलो?”

कुछ सेकंड कोई आवाज़ नहीं।

“ताई?”

“आदित्य…”

आवाज सुनते ही वह कुर्सी से सीधा बैठ गया।

“क्या हुआ?”

“आज फैसला आया।”

उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।

“क्या?”

“कानूनी रूप से मैं अब राघव से अलग हूं।”

आदित्य ने आंखें बंद कर लीं।

उसे खुशी हुई।

लेकिन उसने सिर्फ कहा,

“बधाई।”

प्रिया चुप।

“आप ठीक हैं?”

“हां।”

फिर अचानक पूछा,

“तुमने उस रात एक बात कही थी, याद है?”

“कौन सी?”

“जिस दिन मेरे सारे पुराने फैसले खत्म हो जाएं, उस दिन खुद से पूछूं कि आगे क्या चाहिए।”

आदित्य की उंगलियां फोन पर कस गईं।

“पूछा?”

“हां।”

“जवाब?”

प्रिया कुछ कहने ही वाली थी कि उसके कमरे का दरवाज़ा खुल गया।

एक सहकर्मी अंदर आया।

आदित्य ने हाथ के इशारे से बाहर जाने को कहा।

फोन पर वापस ध्यान दिया।

“ताई?”

लेकिन दूसरी तरफ प्रिया अचानक चुप हो गई थी।

फिर बोली,

“आदित्य… कोई दरवाज़े पर आया है।”

“कौन?”

“पता नहीं।”

उसने फोन हाथ में लिए दरवाज़ा खोला।

बाहर कुरियर वाला खड़ा था।

“प्रिया शिंदे?”

“जी।”

उसने एक मोटा भूरा लिफाफा दिया।

भेजने वाले का नाम नहीं था।

प्रिया ने फोन कान और कंधे के बीच दबाया।

लिफाफा खोला।

अंदर जमीन के पुराने कागजात थे।

कुछ बैंक स्टेटमेंट।

और एक फोटो।

फोटो देखते ही उसके हाथ से फोन लगभग छूट गया।

आदित्य घबरा गया।

“क्या हुआ?”

प्रिया जवाब नहीं दे सकी।

तस्वीर में राघव था।

उसके बगल में खड़ा व्यक्ति कोई अनजान आदमी नहीं था।

वह प्रिया के अपने परिवार का ऐसा व्यक्ति था जिस पर उसकी मां पिछले बीस वर्षों से आंख बंद करके विश्वास करती आई थी।

और फोटो के पीछे सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“राघव अकेला नहीं था।”

प्रिया का चेहरा सफेद पड़ गया।

लिफाफे के भीतर एक और कागज था।

उस पर पांच वर्ष पुराने बैंक ट्रांसफर दर्ज थे।

उसी व्यक्ति के खाते से राघव के खाते में लाखों रुपये गए थे।

और सबसे नीचे लाल पेन से एक तारीख घेर रखी थी।

वही तारीख…

जिस दिन प्रिया की शादी तय हुई थी।

फोन पर आदित्य बार-बार पूछ रहा था—

“ताई, क्या हुआ?”

प्रिया की आंखों से आंसू बह निकले।

लेकिन इस बार वे कमजोरी के आंसू नहीं थे।

उसने तस्वीर को कसकर पकड़ा और कांपती आवाज़ में कहा—

“आदित्य…”

“हां?”

“तुमने पूछा था ना, आगे मुझे क्या चाहिए?”

आदित्य की सांस थम गई।

प्रिया ने अपनी आंखें बंद कीं।

“उस सवाल का जवाब मुझे मिल गया है।”

“क्या?”

उसने धीरे से कहा—

“पहले मुझे उस आदमी का सच चाहिए जिसने मेरी पूरी जिंदगी राघव के हाथ बेच दी…”

वह तस्वीर पलटकर फिर देखने लगी।

“और उसके बाद…”

उसकी आवाज़ नरम पड़ गई।

“शायद मुझे तुम्हारी जरूरत है।”

आदित्य कुछ बोल पाता, उससे पहले प्रिया की नजर लिफाफे के सबसे नीचे दबे एक छोटे कागज पर गई।

उस पर सिर्फ एक पता लिखा था।

पुणे।

और पता आदित्य के घर से मुश्किल से तीन किलोमीटर दूर था।

नीचे एक चेतावनी थी—

“अगर पूरी सच्चाई जाननी है, तो आदित्य को साथ लेकर आना। क्योंकि अगला राज प्रिया से ज्यादा उसी से जुड़ा है।”

प्रिया की धड़कन तेज हो गई।

उसने फोन पर फुसफुसाकर कहा—

“आदित्य…”

“क्या हुआ?”

“कहानी खत्म नहीं हुई है।”

कमरे में फिर वही गहरी खामोशी छा गई।

लेकिन इस बार प्रिया अकेली नहीं थी।

उसे आखिर समझ आ चुका था कि जिंदगी में किसी की जरूरत होना कमजोरी नहीं होता।

कमजोरी तब होती है जब इंसान अपने डर के कारण अपने अधिकार, अपनी आवाज़ और अपना भविष्य किसी और के हाथ में दे दे।

और अब प्रिया ऐसा कभी नहीं करने वाली थी।

लेकिन उस अनजान पते पर कौन उसका इंतजार कर रहा था?

राघव की साजिश के पीछे उसके अपने परिवार का कौन सा चेहरा छिपा था?

और सबसे बड़ा सवाल—

आखिर वह कौन सा राज था जो प्रिया के अतीत को आदित्य के परिवार से जोड़ रहा था?

यह पता लगाने के लिए उन्हें उस दरवाज़े तक जाना ही था…

क्योंकि कभी-कभी प्रेम कहानी का असली मोड़ “आई लव यू” से शुरू नहीं होता।

वह उस क्षण से शुरू होता है जब कोई आपका हाथ पकड़कर यह नहीं कहता कि “मैं तुम्हें बचाऊंगा”…

बल्कि यह कहता है—

“तुम अपनी लड़ाई खुद लड़ो… मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।”

समाप्त!

डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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