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जिस औरत को पति ने ठुकराया, वही बनी एक मासूम की आखिरी उम्मीद—लेकिन हवेली के बंद कमरे में छिपा सच उसकी किस्मत बदलने वाला था

जिस औरत को पति ने ठुकराया, वही बनी एक मासूम की आखिरी उम्मीद—लेकिन हवेली के बंद कमरे में छिपा सच उसकी किस्मत बदलने वाला था

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे।

हवेली की ऊपरी मंज़िल पर उस छोटे से कमरे से एक बच्चे के लगातार रोने की आवाज़ आ रही थी।

पीहू उसे अपनी गोद में लिए कभी कमरे में चक्कर काटती, कभी उसके माथे को चूमती और कभी काँपते हाथों से उसे अपने सीने से लगा लेती।

लेकिन बच्चा चुप नहीं हो रहा था।

उसका छोटा-सा चेहरा रोते-रोते लाल पड़ चुका था।

पीहू की अपनी हालत भी उससे कुछ बेहतर नहीं थी।

होंठ सूखे हुए थे।

आँखों के नीचे काले घेरे उतर आए थे।

कई दिनों से ठीक से भोजन न मिलने के कारण उसके हाथ इतने कमज़ोर हो चुके थे कि बच्चे को उठाए रखना भी मुश्किल लग रहा था।

फिर भी वह उसे नीचे रखने के लिए तैयार नहीं थी।

वह धीमे से फुसफुसाई—

“बस थोड़ा-सा और… मेरे बच्चे… बस थोड़ा-सा और सह लो।”

उसकी आँखों से एक आँसू निकलकर बच्चे के गाल पर गिरा।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।

अनंत अंदर आया।

ऑफिस से लौटते ही उसने बच्चे के रोने की आवाज़ सुन ली थी।

उसकी आँखों में पहले चिंता उभरी, फिर उसकी नज़र मेज़ पर रखी दूध की बोतल पर पड़ी।

अगले ही पल उसका चेहरा बदल गया।

“पीहू!”

उसकी भारी आवाज़ से कमरा काँप उठा।

पीहू चौंककर पलटी।

अनंत तेजी से आगे बढ़ा।

“तुम इसे बाहर का दूध दे रही हो?”

पीहू ने घबराकर कहा—

“मैंने बहुत कोशिश की… लेकिन…”

“लेकिन क्या?”

“मेरे शरीर में अब इतना दूध नहीं बन रहा।”

अनंत के चेहरे पर डर गुस्से में बदल गया।

“डॉक्टर ने साफ कहा था कि इसे वह दूध सूट नहीं करता। फिर भी तुम इसकी जान खतरे में डाल रही हो?”

पीहू कुछ क्षण उसे देखती रही।

फिर पहली बार उसके चेहरे पर डर की जगह एक टूटी हुई औरत का आक्रोश दिखाई दिया।

“और मैं क्या करूँ?”

अनंत रुक गया।

पीहू की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन इस बार वह पीछे नहीं हटी।

“क्या मैं पत्थर खाकर तुम्हारे बच्चे के लिए दूध बनाऊँ?”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

“क्या कहा तुमने?”

पीहू ने अपनी भीगी आँखें उसके चेहरे पर जमा दीं।

“सुबह से मैंने सिर्फ आधी सूखी रोटी खाई है।”

अनंत की भौंहें सिकुड़ गईं।

“क्या मतलब?”

“मतलब बहुत साफ है।”

पीहू ने बच्चे को धीरे से बिस्तर पर लिटाया।

उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

“तुम्हारी माँ ने रसोई के सारे डिब्बों पर ताला लगा दिया है। फ्रिज की चाबी उनके पास रहती है। नौकरों को आदेश है कि मुझे उनकी अनुमति के बिना कुछ न दिया जाए।”

अनंत उसे अविश्वास से देखता रहा।

पीहू बोलती गई—

“जिस औरत से तुम उम्मीद करते हो कि वह तुम्हारे बच्चे की माँ बने… उसी को इस घर में भरपेट खाना तक नसीब नहीं है।”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मैं मशीन नहीं हूँ, अनंत।”

“मैं भी एक इंसान हूँ।”

“मुझे भी भूख लगती है।”

“मुझे भी दर्द होता है।”

“और मेरा भी एक बच्चा था…”

आखिरी शब्द के साथ उसका गला भर आया।

वह जल्दी से दूसरी तरफ मुड़ गई।

लेकिन अनंत ने वह एक वाक्य सुन लिया था।

“तुम्हारा बच्चा?”

पीहू चुप रही।

अनंत को अहसास हुआ कि जिस औरत को वह पिछले कई दिनों से सिर्फ अपने बेटे की जरूरत के रूप में देख रहा था, उसके भीतर एक ऐसी कहानी दबी थी जिसके बारे में उसने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की।

लेकिन उस कहानी की शुरुआत इस हवेली में नहीं हुई थी।

उसकी शुरुआत कुछ महीने पहले एक छोटे से घर के बंद दरवाज़े से हुई थी।

उस दिन पीहू का जन्मदिन था।

सुबह से उसके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसी मुस्कान थी।

उसने अपने पति समीर के लिए उसकी पसंद का खाना बनाया था।

शाम को केक खरीदा।

एक छोटा-सा उपहार भी लिया।

उनकी शादी को दो साल हो चुके थे।

पहला साल बहुत खूबसूरत था।

समीर उसके लिए फूल लाता।

देर रात तक बातें करता।

कभी उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहता—

“पीहू, तुम आई हो तो जिंदगी पूरी लगती है।”

और पीहू उन शब्दों पर आँख बंद करके यकीन करती रही।

लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा।

समीर देर से घर आने लगा।

फोन छिपाने लगा।

पीहू के सवालों से चिढ़ने लगा।

कभी कहता बिजनेस मीटिंग है।

कभी कहता दोस्तों के साथ है।

पीहू ने शक किया, फिर खुद ही अपने दिल को समझा दिया।

उसे रिश्ते पर भरोसा था।

या शायद वह भरोसा टूटने की सच्चाई स्वीकार करने से डरती थी।

उस शाम भी वह बिना बताए घर लौट आई।

उसने सोचा था—

समीर उसे देखकर खुश होगा।

वह दरवाज़ा खोलेगी।

केक सामने करेगी।

फिर दोनों पुराने दिनों की तरह साथ बैठेंगे।

शायद उनका बिगड़ता रिश्ता फिर सँभल जाए।

लेकिन बेडरूम का दरवाज़ा खोलते ही उसके हाथ से केक का डिब्बा नीचे गिर गया।

समीर अकेला नहीं था।

कमरे में एक दूसरी औरत मौजूद थी।

दोनों की घबराहट ने वह सब कह दिया था जिसे शब्दों में सुनना जरूरी नहीं था।

पीहू कई सेकंड वहीं खड़ी रही।

उसके कानों में जैसे सारी आवाज़ें बंद हो गईं।

समीर ने जल्दी से खुद को सँभाला।

लेकिन उसके चेहरे पर शर्म नहीं थी।

गुस्सा था।

“तुम यहाँ कैसे आ गई?”

पीहू की आँखों से आँसू बहने लगे।

“यह सवाल तुम मुझसे पूछ रहे हो?”

“कम से कम आने से पहले फोन तो कर सकती थीं।”

पीहू को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के भीतर कुछ तोड़ दिया हो।

“यह मेरा घर है।”

उसने मुश्किल से कहा।

“और तुम मेरे पति हो।”

समीर ने ठंडी हँसी हँसी।

“हर बात का ड्रामा बनाना बंद करो।”

पीहू ने उस दूसरी औरत की तरफ देखा।

वह नजरें चुराकर बाहर चली गई।

दरवाज़ा बंद हुआ तो पीहू ने पूछा—

“कब से चल रहा है यह सब?”

“तुम्हें हर बात जानने की जरूरत नहीं।”

“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ!”

“तो?”

सिर्फ एक शब्द।

लेकिन उस एक शब्द ने पीहू की पूरी शादी की कीमत बता दी।

वह उसे देखती रही।

“जिस आदमी के लिए मैंने अपने परिवार से लड़ाई की… आज वही आदमी मुझे बता रहा है कि मेरी कोई कीमत नहीं?”

समीर ने थके हुए अंदाज़ में कहा—

“तुम्हारे साथ जिंदगी बहुत मुश्किल हो गई है।”

“मैंने क्या माँगा तुमसे?”

पीहू रो पड़ी।

“पैसा?”

“गहने?”

“महँगी गाड़ी?”

“मैंने सिर्फ तुम्हारा साथ माँगा था।”

समीर ने चेहरा फेर लिया।

“तुम मुझे बाँधकर नहीं रख सकती।”

पीहू की आवाज़ में अचानक कठोरता आ गई।

“रिश्ता बंधन नहीं होता, समीर। रिश्ता जिम्मेदारी होता है।”

यह बात शायद उसके अहंकार पर लग गई।

वह पलटा।

“तुम मुझे जिम्मेदारी सिखाओगी?”

कुछ देर बाद वही दरवाज़ा जिसके अंदर पीहू ने अपनी पूरी दुनिया बसाई थी, उसके सामने बंद हो चुका था।

उसका छोटा-सा बैग बाहर पड़ा था।

और वह सीढ़ियों पर अकेली खड़ी थी।

अंदर से समीर की आवाज़ आई—

“अब लौटकर मत आना।”

पीहू ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

एक क्षण को लगा शायद वह खोल देगा।

शायद उसे अपनी गलती का अहसास होगा।

लेकिन अंदर से कोई कदम नहीं आया।

उस रात पीहू अपने भाई अरुण के घर पहुँची।

दरवाज़ा भाभी निशा ने खोला।

पीहू की हालत देखकर उसने पहला सवाल यह नहीं पूछा कि क्या हुआ।

उसने कहा—

“इतनी रात को?”

पीहू का गला भर आया।

“भाभी… समीर ने मुझे घर से निकाल दिया।”

निशा का चेहरा उतर गया।

“अब?”

उस एक शब्द में अपनापन कम, चिंता ज्यादा थी।

लेकिन चिंता पीहू के लिए नहीं थी।

घर के बढ़ते खर्च की थी।

रिश्तेदारों के सवालों की थी।

मोहल्ले की बातों की थी।

अरुण को जब पता चला तो उसने अपनी बहन को गले लगा लिया।

“जब तक तुम्हारा भाई जिंदा है, तुम्हें किसी के आगे सिर झुकाने की जरूरत नहीं।”

पीहू फूट-फूटकर रो पड़ी।

लेकिन किस्मत ने उसके लिए अगली चोट तैयार कर रखी थी।

कुछ सप्ताह बाद सुबह अचानक उसे चक्कर आया।

उल्टी हुई।

जाँच करवाई गई।

डॉक्टर मुस्कुराई।

“आप माँ बनने वाली हैं।”

पीहू कुर्सी पर बैठी रह गई।

उसका हाथ धीरे से अपने पेट पर चला गया।

आँखों से आँसू निकल पड़े।

यह आँसू दुख के थे या खुशी के, वह खुद नहीं जानती थी।

उस आदमी का बच्चा…

जिसने उसे निकाल दिया था।

लेकिन बच्चा तो निर्दोष था।

उस रात उसने पेट पर हाथ रखकर फुसफुसाया—

“तेरे पापा ने मुझे छोड़ दिया तो क्या हुआ?”

“तेरी माँ कभी तुझे नहीं छोड़ेगी।”

यही बच्चा उसके जीने की वजह बन गया।

लेकिन निशा को यह खुशी नहीं लगी।

“अब खर्च और बढ़ेगा।”

वह रोज ताना देती।

“कल को बच्चा पैदा होगा तो कौन सँभालेगा?”

“तुम नौकरी भी नहीं करती।”

“हम कब तक तुम्हारा बोझ उठाएँ?”

पीहू हर बात चुपचाप सुनती रही।

अरुण जितना उसकी ढाल बनने की कोशिश करता, घर में उतना ही तनाव बढ़ता।

पीहू नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से भाई का घर टूटे।

उसने घर से छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए।

कपड़ों पर कढ़ाई।

बच्चों को ट्यूशन।

ऑनलाइन सिलाई के ऑर्डर।

पेट बढ़ रहा था।

शरीर थक रहा था।

फिर भी वह काम करती।

रात को अपने बच्चे से बातें करती।

“बस कुछ दिन और।”

“फिर हम दोनों अपनी छोटी-सी दुनिया बनाएँगे।”

लेकिन सातवें महीने की एक सुबह उसकी कमर में तेज दर्द शुरू हुआ।

डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की।

पर समय से पहले जन्मा बच्चा बहुत कमजोर था।

पीहू ने उसे बस कुछ ही मिनट अपनी गोद में लिया।

छोटी-सी बंद मुट्ठी।

नन्ही उँगलियाँ।

बहुत शांत चेहरा।

उसकी दुनिया फिर एक बार खाली हो गई।

उस रात अस्पताल के कमरे में पीहू ने अपने बच्चे को सीने से लगाए इतना रोया कि नर्स की आँखें भी भर आईं।

उसी अस्पताल की दूसरी मंज़िल पर एक और आदमी अपनी दुनिया बचाने की कोशिश कर रहा था।

उस आदमी का नाम अनंत रायचंद था।

देश की बड़ी निर्माण कंपनियों में से एक का मालिक।

जिस आदमी के एक फोन पर करोड़ों का सौदा तय हो जाता था, उस रात वह अस्पताल के कॉरिडोर में डॉक्टर के सामने हाथ जोड़कर खड़ा था।

उसकी पत्नी नताशा बच्चे को जन्म देते समय गंभीर जटिलताओं के कारण दुनिया छोड़ चुकी थी।

पीछे रह गया था उनका नवजात बेटा।

अंश।

लेकिन अंश की हालत भी लगातार बिगड़ रही थी।

डॉक्टर ने अनंत को समझाया—

“उसका शरीर सामान्य फॉर्मूला मिल्क स्वीकार नहीं कर रहा। हमें कुछ समय के लिए विशेषज्ञ निगरानी में प्राकृतिक स्तनपान या उपयुक्त डोनर मिल्क की व्यवस्था करनी होगी।”

अनंत ने तुरंत कहा—

“जो पैसे चाहिए, मैं दूँगा।”

डॉक्टर ने थकी हुई आवाज़ में कहा—

“हर समस्या पैसों से हल नहीं होती, मिस्टर रायचंद।”

अनंत पहली बार चुप हो गया।

“कोई रास्ता निकालिए।”

“हम कोशिश कर रहे हैं।”

उसी अस्पताल में काम करने वाली अनंत की कंपनी की एक कर्मचारी को पीहू के बारे में पता चला।

उसने बहुत सोचने के बाद अनंत से कहा—

“सर… एक महिला इसी अस्पताल में है। उसने अभी अपना बच्चा खोया है। शायद डॉक्टरों की अनुमति से वह कुछ समय आपके बेटे की मदद कर सके।”

अनंत के लिए वह एक उम्मीद थी।

लेकिन पीहू के लिए?

वह अपनी ही गोद उजड़ने के कुछ घंटों बाद किसी दूसरे बच्चे की माँ कैसे बन सकती थी?

अनंत ने पहले डॉक्टरों के माध्यम से अनुरोध भेजा।

पीहू ने मना कर दिया।

उसे लगा कोई उसके दर्द को समझ ही नहीं रहा।

लेकिन उसी शाम वह गलती से नर्सरी के बाहर से गुज़री।

अंदर अंश रो रहा था।

इतना छोटा।

इतना असहाय।

पीहू के कदम रुक गए।

कुछ देर वह काँच के पार उसे देखती रही।

फिर उसके अपने बच्चे का चेहरा आँखों में घूम गया।

नर्स उसके पास आई।

“आप चाहें तो वापस जा सकती हैं।”

पीहू की आँखों से आँसू निकल पड़े।

“इसकी माँ नहीं है?”

नर्स ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

पीहू ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

कुछ ही मिनट बाद उसने एक फैसला किया।

वह कुछ दिनों तक बच्चे की मदद करेगी।

बस इतनी-सी बात थी।

लेकिन अनंत की माँ सुमित्रा रायचंद को यह मंजूर नहीं था।

उनके लिए परिवार की प्रतिष्ठा सबसे ऊपर थी।

जब उन्होंने पहली बार पीहू को देखा, उनकी नजर में वह कोई दुख झेल चुकी माँ नहीं थी।

वह सिर्फ एक साधारण परिवार की लड़की थी।

“हम पैसे दे देंगे।”

उन्होंने कहा।

पीहू ने उनकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया—

“मैं अपने दूध की कीमत लेने नहीं आई।”

“तो क्यों आई हो?”

पीहू की आँखें भर आईं।

“क्योंकि मैंने अपनी गोद खाली होते देखी है।”

“किसी और की गोद खाली न हो… इसलिए।”

सुमित्रा कुछ क्षण चुप हुईं।

लेकिन उनका दिल पूरी तरह नहीं बदला।

अंश की हालत धीरे-धीरे बेहतर होने लगी।

अनंत रात-दिन उसके पास रहता।

और वहीं उसने पहली बार पीहू को गौर से देखना शुरू किया।

वह बच्चे के कपड़े बदलती।

दवा का समय याद रखती।

हर छोटी रिपोर्ट डॉक्टर से पूछती।

अंश सोता तो उसके बगल में बैठकर घंटों उसका चेहरा देखती रहती।

एक रात अनंत ने पूछा—

“तुम्हें अपने बच्चे की याद नहीं आती?”

पीहू ने उसकी तरफ देखे बिना कहा—

“हर साँस के साथ आती है।”

“फिर अंश को देखकर और दुख नहीं होता?”

पीहू ने बच्चे की छोटी-सी उँगली पकड़ ली।

“होता है।”

“लेकिन शायद किसी और के बच्चे को बचते देख मेरा अपना दर्द थोड़ा कम हो जाता है।”

अनंत पहली बार निरुत्तर हो गया।

अस्पताल से छुट्टी मिलने वाली थी।

लेकिन एक समस्या थी।

डॉक्टर का कहना था कि अंश को अभी कुछ सप्ताह विशेष देखभाल की आवश्यकता होगी।

अनंत चाहता था कि कोई प्रशिक्षित नर्स रखी जाए।

लेकिन अंश पीहू की गोद में जितना शांत रहता, किसी और के साथ नहीं रहता था।

सुमित्रा को यह बात सबसे ज्यादा खटकती।

फिर परिवार में एक नया विवाद शुरू हुआ।

पीहू किस हैसियत से हवेली में जाएगी?

नर्स?

आया?

कर्मचारी?

पीहू ने साफ कहा—

“मैं नौकरी नहीं चाहती।”

“तो फिर?”

अनंत ने पूछा।

“जब तक डॉक्टर जरूरी समझें, मैं बच्चे की मदद कर दूँगी। उसके बाद चली जाऊँगी।”

लेकिन सुमित्रा को समाज की चिंता थी।

“एक जवान लड़की मेरे विधुर बेटे की हवेली में रहेगी तो लोग क्या कहेंगे?”

अनंत चिढ़ गया।

“लोग मेरे बच्चे की जिंदगी बचाएँगे?”

सुमित्रा ने कहा—

“नहीं। लेकिन इस परिवार की मर्यादा भी कोई चीज है।”

स्थिति इतनी बिगड़ी कि अरुण को बुलाना पड़ा।

अरुण ने बहन की तरफ देखा।

“फैसला तुम्हारा होगा।”

पहली बार किसी ने पीहू से यह कहा था।

फैसला तुम्हारा होगा।

पीहू ने सोते हुए अंश को देखा।

फिर बोली—

“मैं जाऊँगी।”

सुमित्रा ने तीखे स्वर में पूछा—

“किस रिश्ते से?”

पीहू ने उत्तर देने से पहले अनंत की तरफ देखा।

लेकिन अनंत के पास भी इसका जवाब नहीं था।

तभी परिवार के पुराने वकील देवेंद्र मेहरा ने एक व्यावहारिक सुझाव दिया—

“दुनिया के सामने किसी रिश्ते का नाम देना जरूरी नहीं। कानूनी संरक्षकता और देखभाल का अनुबंध बनाया जा सकता है।”

पीहू ने राहत की साँस ली।

किसी मजबूरी में शादी करना उसे स्वीकार नहीं था।

वह एक रिश्ते के नाम पर पहले ही अपना जीवन बर्बाद होते देख चुकी थी।

इस बार उसने शर्त रखी—

“मैं आपकी हवेली में जाऊँगी।”

“लेकिन अपनी इज्जत के साथ।”

“मुझ पर कोई अधिकार नहीं जताएगा।”

“मेरी जिंदगी के फैसले मैं खुद करूँगी।”

अनंत ने पहली बार बिना बहस किए कहा—

“मंजूर है।”

यहीं से पीहू उस हवेली में पहुँची।

और यहीं से सुमित्रा की नाराज़गी ने नया रूप ले लिया।

शुरुआत छोटी चीजों से हुई।

पीहू के लिए अलग बर्तन।

नौकरों को दूरी रखने का आदेश।

डाइनिंग टेबल पर उसके बैठने पर आपत्ति।

फिर भोजन कम होने लगा।

पीहू ने कई दिनों तक शिकायत नहीं की।

उसे लगा कुछ सप्ताह की बात है।

वह सह लेगी।

लेकिन उसके शरीर की अपनी सीमा थी।

और उसी रात आखिरकार सब अनंत के सामने आ गया।

पीहू के शब्द सुनकर अनंत सीधा रसोई की तरफ गया।

वास्तव में फ्रिज पर ताला था।

अनाज के बड़े डिब्बों पर ताले थे।

एक नौकरानी ने काँपते हुए सारी बात बता दी।

“मालकिन का आदेश था, साहब।”

अनंत का चेहरा सख्त हो गया।

वह हॉल में पहुँचा।

सुमित्रा सोफे पर बैठी थीं।

“माँ।”

उनकी नजर बेटे पर पड़ी।

“इतनी रात को क्या हुआ?”

अनंत ने मेज पर चाबियों का गुच्छा रख दिया।

“ये ताले क्यों लगे हैं?”

सुमित्रा समझ गईं।

“घर की व्यवस्था है।”

“या पीहू को भूखा रखने की व्यवस्था?”

“अनंत!”

“मैं पूछ रहा हूँ।”

उनकी आवाज़ भी ऊँची हो गई।

“तू मेरे सामने उस लड़की के लिए मुझसे सवाल कर रहा है?”

“मैं एक लड़की के लिए सवाल नहीं कर रहा।”

अनंत की आँखों में दर्द था।

“मैं उस इंसान के लिए सवाल कर रहा हूँ जिसकी वजह से मेरा बेटा आज जिंदा है।”

“वह अपना फायदा देख रही है।”

“कौन-सा फायदा?”

अनंत ने आसपास की भव्य हवेली की ओर इशारा किया।

“इस घर में उसे सम्मान नहीं मिला।”

“भरपेट खाना नहीं मिला।”

“अपनापन नहीं मिला।”

“फिर किस ऐश की बात कर रही हैं आप?”

सुमित्रा चुप हो गईं।

अनंत ने दृढ़ आवाज़ में कहा—

“आज के बाद इस घर की रसोई पर कोई ताला नहीं लगेगा।”

“और पीहू डाइनिंग टेबल पर हमारे साथ खाना खाएगी।”

“यह मेरा आदेश नहीं है।”

वह रुका।

“यह मेरी जिम्मेदारी है।”

उस रात अनंत पहली बार पीहू के कमरे के बाहर कई मिनट खड़ा रहा।

दरवाज़ा खटखटाया।

“अंदर आ जाऊँ?”

पीहू को अजीब लगा।

अब तक इस घर में कोई उससे अनुमति नहीं माँगता था।

“आ जाइए।”

अनंत अंदर आया।

उसके हाथ में खाने की ट्रे थी।

दाल।

हरी सब्जियाँ।

फल।

दूध।

सूप।

पीहू ने ट्रे की तरफ देखा।

“यह क्या है?”

अनंत ने धीमे से कहा—

“बहुत देर से समझ में आई एक छोटी-सी बात।”

“क्या?”

“कि जो इंसान मेरे बच्चे को जीना सिखा रहा है, उसका ख्याल रखना भी मेरी जिम्मेदारी है।”

पीहू की आँखें नम हुईं।

लेकिन उसने तुरंत चेहरा फेर लिया।

“मुझे दया नहीं चाहिए।”

“मुझे पता है।”

“फिर?”

अनंत ने कुर्सी खींची।

“माफी चाहिए।”

पीहू ने उसकी तरफ देखा।

“माफी?”

“मैंने तुम्हें कभी इंसान की तरह देखा ही नहीं।”

अनंत ने सिर झुका लिया।

“मेरे लिए तुम शुरुआत में सिर्फ मेरे बेटे की जरूरत थीं।”

“और यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”

पीहू बहुत देर चुप रही।

फिर बोली—

“माफी शब्द से घाव नहीं भरते।”

“जानता हूँ।”

“तो?”

“इसलिए शब्दों से नहीं, अपने व्यवहार से साबित करूँगा।”

उस रात दोनों के बीच मोहब्बत नहीं हुई।

कोई फिल्मी वादा नहीं हुआ।

सिर्फ सम्मान की पहली नींव रखी गई।

अगले कुछ दिनों में हवेली का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।

अनंत सुबह ऑफिस जाने से पहले पूछता—

“नाश्ता किया?”

पीहू चिढ़ जाती।

“आपको ऑफिस नहीं जाना?”

“जाऊँगा।”

“तो जाइए।”

“पहले बताओ नाश्ता किया?”

“हाँ!”

वह हँस देता।

“ठीक है।”

पीहू को उसकी यह नई आदत कभी परेशान करती, कभी मन ही मन अच्छी भी लगती।

अंश अब स्वस्थ होने लगा था।

उसकी आँखें कमरे की चीजों का पीछा करतीं।

पीहू की आवाज़ सुनते ही हाथ-पाँव चलाने लगता।

एक शाम वह पहली बार मुस्कुराया।

पीहू खुशी से चिल्लाई—

“अनंत!”

अनंत दौड़ता हुआ आया।

“क्या हुआ?”

“देखो!”

वह घबरा गया।

“क्या?”

“मुस्कुराया है!”

अनंत ने राहत की साँस ली।

“तुमने तो मेरी जान निकाल दी।”

पीहू हँस पड़ी।

बहुत दिनों बाद उसकी हँसी कमरे में गूँजी।

अनंत उसे देखता रह गया।

पीहू ने महसूस किया तो उसकी मुस्कान रुक गई।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

अनंत ने नजरें फेर लीं।

लेकिन कुछ तो हुआ था।

उसने पहली बार पीहू को उस औरत के रूप में देखा था जो दर्द से अलग भी कोई पहचान रखती थी।

और शायद पीहू ने भी पहली बार अनंत को उस कठोर आदमी के बजाय एक थके हुए पिता के रूप में देखा था जो अपने बेटे के एक छोटे-से हावभाव पर बच्चे की तरह खुश हो जाता था।

लेकिन हवेली की शांति ज्यादा दिनों तक नहीं रही।

एक सुबह मुख्य द्वार पर काले रंग की कार आकर रुकी।

उससे उतरा समीर।

पीहू का अतीत।

वह आदमी जिसे पीहू सोच चुकी थी कि जिंदगी से हमेशा के लिए बाहर निकाल चुकी है।

समीर ने कई कोशिशों के बाद उसका पता लगाया था।

उसका बिजनेस गिरावट में था।

जिस लोगों के साथ वह रात-दिन पार्टी करता था, उनमें से अधिकांश गायब हो चुके थे।

उसके ऊपर कर्ज था।

और सबसे बड़ी बात—

उसे किसी से पता चला था कि पीहू रायचंद हवेली में रह रही है।

समीर के दिमाग में एक ही बात आई।

पैसा।

वह दरवाज़े पर खड़ा होकर बोला—

“अपनी पत्नी से मिलने आया हूँ।”

गार्ड ने रास्ता रोक लिया।

“यहाँ इस नाम की आपकी कोई पत्नी नहीं रहती।”

समीर हँसा।

“पीहू को बुलाओ।”

आवाज़ सुनकर पीहू बरामदे तक आ गई।

समीर को देखकर उसके कदम रुक गए।

हाथ ठंडे पड़ गए।

पुराना डर शरीर में लौट आया।

समीर मुस्कुराया।

“कैसी हो?”

पीहू कुछ नहीं बोली।

“काफी बदल गई हो।”

“तुम यहाँ क्यों आए हो?”

“अपनी पत्नी को घर ले जाने।”

पीहू की आँखों में गुस्सा उतर आया।

“जिस दिन तुमने दरवाज़ा बंद किया था, उसी दिन हमारा रिश्ता खत्म हो गया।”

समीर पास बढ़ा।

“गुस्से में आदमी बहुत कुछ कह देता है।”

पीहू पीछे नहीं हटी।

“और विश्वासघात?”

समीर की मुस्कान गायब हुई।

“वह भी गुस्से में हुआ था?”

उसी समय पीछे से अनंत की आवाज़ आई—

“कोई परेशानी है?”

समीर ने उसे देखा।

महँगे लेकिन सादे कपड़े।

चेहरे पर आत्मविश्वास।

गार्ड का सम्मान।

समीर तुरंत समझ गया कि वह कौन है।

“तो आप हैं अनंत रायचंद।”

अनंत पीहू के पास आकर खड़ा हो गया।

“और आप?”

“पीहू का पति।”

पीहू ने तुरंत कहा—

“पूर्व पति जैसा भी रिश्ता समझना चाहो। मेरे लिए यह आदमी अजनबी है।”

समीर हँस पड़ा।

“कागज कुछ और कहते हैं।”

अनंत की नजर उसकी आँखों में टिक गई।

“अगर कानूनी मामला है तो मेरे वकील से बात कीजिए।”

“मैं अपनी पत्नी से बात करूँगा।”

“वह आपसे बात नहीं करना चाहती।”

समीर का चेहरा तमतमा गया।

“तू बीच में मत पड़।”

अनंत की आवाज़ फिर भी शांत रही।

“आप जिस घर के दरवाज़े पर खड़े हैं, वहाँ किसी महिला से ऊँची आवाज़ में बात करने की अनुमति नहीं है।”

पीहू ने पहली बार महसूस किया कि कोई उसके लिए खड़ा था…

लेकिन उसके आगे खड़े होकर उसकी आवाज़ छीनने के लिए नहीं।

उसके साथ खड़े होकर।

उसने खुद आगे बढ़कर कहा—

“समीर।”

वह पलटा।

“मैं तुम्हारे पास नहीं लौटूँगी।”

“कभी नहीं।”

“अगर तुम्हें कोई कानूनी बात करनी है, वकील से करना।”

समीर ने जाते-जाते कहा—

“तुम सोचती हो कहानी खत्म हो गई?”

“अभी शुरू हुई है।”

वह चला गया।

उसके जाने के बाद पीहू की टाँगें काँपने लगीं।

अनंत ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन बीच में रुक गया।

“मैं तुम्हें छू सकता हूँ?”

पीहू ने उसकी तरफ देखा।

इतना छोटा-सा सवाल।

लेकिन उसके लिए बहुत बड़ा था।

उसने धीरे से सिर हिला दिया।

अनंत ने बस उसका हाथ थामा।

“वह तुम्हें वापस नहीं ले जा सकता।”

पीहू की आवाज़ धीमी थी।

“मुझे डर वापस ले जाने का नहीं है।”

“फिर?”

“मुझे डर है कि वह मेरा अतीत फिर से इस घर में ले आएगा।”

अनंत ने कहा—

“तो इस बार तुम अकेली नहीं हो।”

अगले दिन वकील देवेंद्र ने कागजात देखे।

पीहू और समीर की कानूनी अलगाव प्रक्रिया वास्तव में अधूरी थी।

समीर ने कभी अंतिम दस्तावेज जमा ही नहीं किए थे।

यह खबर सुनकर पीहू का चेहरा सफेद पड़ गया।

“तो क्या मैं अभी भी…”

देवेंद्र ने कहा—

“कानूनी स्थिति उलझी हुई है, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं। हमारे पास आपके अलग रहने, आर्थिक परित्याग और उसके व्यवहार से जुड़े पर्याप्त तथ्य हैं। हम उचित प्रक्रिया शुरू करेंगे।”

अनंत ने पूछा—

“कितना समय लगेगा?”

“समय से ज्यादा जरूरी है कि पीहू अपनी इच्छा स्पष्ट रखे।”

सभी की नजर पीहू पर गई।

वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर बोली—

“मैं उस रिश्ते से पूरी तरह बाहर आना चाहती हूँ।”

पहले वाली पीहू शायद यह कहते हुए रोती।

आज उसकी आवाज़ स्थिर थी।

कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई।

लेकिन समीर चुप बैठने वाला नहीं था।

उसने शहर में अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं।

पीहू पर आरोप लगाए।

उसके चरित्र पर सवाल उठाए।

कहा कि उसने पैसे के लिए उसे छोड़ा।

सोशल मीडिया पर कुछ झूठे पोस्ट भी किए।

पहले दिन पीहू टूट गई।

कमरा बंद करके बैठी रही।

अनंत को खबर मिली तो उसने दरवाज़ा खटखटाया।

“पीहू?”

कोई जवाब नहीं।

“मैं अंदर नहीं आऊँगा।”

वह दरवाज़े के बाहर बैठ गया।

“लेकिन मैं यहीं हूँ।”

करीब दस मिनट बाद अंदर से आवाज़ आई—

“लोग मुझे क्यों नहीं जीने देते?”

अनंत ने दरवाज़े के दूसरी तरफ सिर टिकाया।

“क्योंकि कुछ लोगों को दूसरों की चुप्पी अपनी ताकत लगती है।”

“मैं क्या करूँ?”

“जो तुम चाहो।”

“और तुम?”

“तुम्हारे फैसले के साथ खड़ा रहूँगा।”

दरवाज़ा धीरे से खुला।

पीहू की आँखें लाल थीं।

“अगर मैं सबके सामने सच बोलूँ?”

“तो बोलो।”

“अगर मैं चुप रहूँ?”

“तो चुप रहो।”

“तुम मुझे नहीं बताओगे कि मुझे क्या करना चाहिए?”

अनंत हल्का-सा मुस्कुराया।

“तुम्हारी जिंदगी है।”

“मैं सिर्फ साथ दे सकता हूँ।”

उसी क्षण शायद पीहू के दिल में कुछ बदल गया।

कुछ दिनों बाद उसने कानूनी सलाह लेकर सार्वजनिक रूप से सिर्फ इतना कहा—

“मेरे निजी जीवन को लेकर कई झूठी बातें कही जा रही हैं। मामला कानूनी प्रक्रिया में है। मैं किसी पर कीचड़ नहीं उछालना चाहती। मैं सिर्फ सम्मान के साथ आगे बढ़ना चाहती हूँ।”

बस।

न कोई तमाशा।

न बदले की भाषा।

न चीख-पुकार।

लेकिन उसी सादगी ने लोगों का नजरिया बदल दिया।

समीर की योजना उलटी पड़ने लगी।

इसी बीच एक और सच सामने आया।

पीहू जब समीर के साथ रहती थी, तब वह उसके नाम पर लिए गए कुछ छोटे निवेश खाते संभालती थी।

समीर ने उनमें से रकम निकालकर निजी खर्चों में लगाई थी।

बैंक रिकॉर्ड सुरक्षित थे।

वकील देवेंद्र ने सारे कागजात अदालत में जमा किए।

समीर के पास जवाब कम पड़ने लगे।

और जिस आदमी को लगता था पीहू जिंदगी भर डरती रहेगी, उसने अदालत में पहली बार उसे सीधी नजरों से देखकर कहा—

“मैं आपसे बदला नहीं चाहती।”

समीर चौंका।

पीहू ने आगे कहा—

“मैं सिर्फ अपना नाम, अपना सम्मान और अपनी स्वतंत्रता वापस चाहती हूँ।”

कुछ महीनों बाद कानूनी रूप से वह अध्याय बंद हो गया।

उस दिन अदालत से बाहर आते समय पीहू ने लंबी साँस ली।

आसमान में बादल थे।

हल्की बारिश शुरू हो गई।

अनंत छाता लेकर उसके पास आया।

पीहू हँसी।

“आज भी पीछे-पीछे?”

“मैं पीछे कहाँ हूँ?”

अनंत उसके बराबर खड़ा हो गया।

“अब साथ हूँ।”

दोनों कार की तरफ चले।

पीहू अचानक रुक गई।

“अनंत।”

“हम्म?”

“मैं कुछ पूछूँ?”

“पूछो।”

“जब अंश पूरी तरह ठीक हो जाएगा… तब?”

अनंत समझ गया कि वह क्या पूछ रही है।

पीहू का हवेली में रहने का समझौता अंश की विशेष देखभाल तक था।

वह समय लगभग समाप्त हो रहा था।

अनंत ने कुछ क्षण बाद कहा—

“तब तुम जहाँ जाना चाहो, जा सकती हो।”

पीहू की आँखों में हल्की उदासी आई।

शायद वह कोई और उत्तर चाहती थी।

लेकिन अगले ही पल अनंत ने कहा—

“और अगर रहना चाहो…”

वह रुक गया।

“तो?”

“तो पहली बार अपनी मर्जी से रहना।”

पीहू उसकी ओर देखने लगी।

अनंत ने गहरी साँस ली।

“मैं तुम्हें अपने बच्चे की जरूरत बनाकर नहीं रोकना चाहता।”

“मैं नहीं चाहता कि तुम कभी यह महसूस करो कि अंश की वजह से तुम्हें इस घर में रहना पड़ा।”

“लेकिन सच यह भी है…”

उसकी आवाज़ हल्की काँपी।

“कि अब मुझे तुम्हारे जाने का खयाल अच्छा नहीं लगता।”

पीहू की पलकों पर नमी उतर आई।

अनंत ने कहा—

“मैंने जिंदगी में रिश्तों को हमेशा जिम्मेदारी, प्रतिष्ठा या मजबूरी के रूप में देखा।”

“तुमने पहली बार मुझे समझाया कि रिश्ता किसी को बाँधने का नाम नहीं है।”

“उसका हाथ पकड़ने का नाम है… और जरूरत पड़े तो छोड़ देने की हिम्मत रखने का भी।”

पीहू ने पूछा—

“और अगर मैं जाने का फैसला करूँ?”

अनंत की आँखों में दर्द उभरा।

फिर भी उसने मुस्कुराकर कहा—

“मैं खुद तुम्हारा सामान गाड़ी में रखूँगा।”

पीहू की आँख से आँसू निकल गया।

“पागल हो।”

“शायद।”

“और अगर रुकूँ?”

अनंत ने बहुत धीरे कहा—

“तो मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत वजह बनकर रुकना।”

उस दिन कोई उत्तर नहीं मिला।

पीहू हवेली लौटी।

रात भर सो नहीं सकी।

सुबह उसने अंश को गोद में लिया।

वह अब उसे देखते ही मुस्कुराता था।

पीहू ने कहा—

“तुम्हारे पापा बहुत अजीब हैं।”

अंश ने उसकी उँगली पकड़ ली।

“पहले गुस्सा करते थे।”

“फिर माफी माँगी।”

“अब कहते हैं जाना हो तो जाओ।”

पीछे से आवाज़ आई—

“बच्चे के सामने मेरी शिकायत हो रही है?”

पीहू पलटी।

अनंत दरवाज़े पर खड़ा था।

“आप चोरी से बातें सुनते हैं?”

“अपना बेटा है।”

“कमरा मेरा है।”

“गलती हो गई।”

वह वापस जाने लगा।

पीहू हँस पड़ी।

“अनंत।”

वह रुका।

“आज शाम जल्दी घर आना।”

उसके चेहरे पर उम्मीद चमकी।

“क्यों?”

“एक बात करनी है।”

“अभी कर लो।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“इंतजार करना सीखिए।”

शाम को अनंत तय समय से भी पहले लौट आया।

हॉल खाली था।

उसने नौकर से पूछा—

“पीहू कहाँ है?”

“ऊपर।”

वह सीढ़ियाँ चढ़ने ही वाला था कि सुमित्रा सामने आ गईं।

“इतनी जल्दी?”

अनंत ने नजरें चुराईं।

“काम खत्म हो गया था।”

“या किसी ने जल्दी बुलाया है?”

अनंत कुछ बोलता, उससे पहले सुमित्रा मुस्कुरा दीं।

“जाओ।”

उनका रवैया भी बदल चुका था।

पीहू की सेवा, उसका धैर्य और अंश के लिए उसका निस्वार्थ प्रेम धीरे-धीरे सुमित्रा की कठोरता पिघला चुका था।

कुछ दिन पहले उन्होंने पहली बार पीहू से माफी माँगी थी।

“मैंने तुम्हें गलत समझा।”

पीहू ने उनके पैर छूने चाहे।

उन्होंने रोककर उसे गले लगा लिया।

“बहू नहीं कहूँगी अभी।”

उन्होंने कहा।

“क्यों?”

पीहू ने पूछा।

“क्योंकि पहले बेटी बनाना है।”

उस दिन पीहू बहुत रोई थी।

अब जब अनंत ऊपर पहुँचा तो कमरे का दरवाज़ा खुला था।

पीहू खिड़की के पास खड़ी थी।

टेबल पर दो कप चाय रखे थे।

“आ गए?”

“तुमने बुलाया था।”

“बैठो।”

अनंत तुरंत बैठ गया।

पीहू हँसी।

“इतने आज्ञाकारी कब से हो गए?”

“जिस दिन से तुम्हारी डाँट सुनना शुरू किया।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

फिर पीहू ने कहा—

“मैंने फैसला कर लिया।”

अनंत के चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई।

“ठीक है।”

पीहू ने उसे गौर से देखा।

“पूछोगे नहीं?”

“डर लग रहा है।”

वह पहली बार इतना असुरक्षित दिखाई दे रहा था।

पीहू उसके सामने आकर खड़ी हुई।

“अगर मैं यहाँ रहूँ… तो अंश की आया बनकर नहीं।”

अनंत धीरे से खड़ा हुआ।

“कभी नहीं।”

“किसी मजबूरी में नहीं।”

“नहीं।”

“किसी एहसान का बदला चुकाने के लिए नहीं।”

“बिल्कुल नहीं।”

पीहू ने अपनी भीगी आँखें उठाईं।

“मैं रहना चाहती हूँ क्योंकि…”

शब्द उसके गले में अटक गए।

अनंत ने इंतजार किया।

“क्योंकि?”

“क्योंकि इस घर ने मुझे दर्द दिया था…”

वह हल्का-सा मुस्कुराई।

“लेकिन इसी घर में मैंने पहली बार सम्मान भी महसूस किया।”

अनंत की आँखें चमक उठीं।

पीहू ने धीरे से कहा—

“और शायद…”

“शायद क्या?”

“मुझे तुमसे मोहब्बत होने लगी है।”

कमरे में कुछ सेकंड पूरी तरह सन्नाटा रहा।

अनंत ने जैसे साँस लेना भूल गया।

“फिर से कहना।”

पीहू शर्माकर पलट गई।

“एक बार कहा है।”

“मैंने ठीक से नहीं सुना।”

“झूठे।”

“सच में।”

“नहीं कहूँगी।”

अनंत हँस पड़ा।

उस हँसी में महीनों बाद पूरा सुकून था।

लेकिन उसने पीहू को छूने की जल्दबाजी नहीं की।

बस हाथ आगे किया।

पीहू ने अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।

अनंत ने पूछा—

“क्या मुझे भी कुछ कहने की अनुमति है?”

“हम्म।”

“मैं तुमसे बहुत पहले मोहब्बत करने लगा था।”

पीहू ने चौंककर देखा।

“कब?”

“जिस दिन तुमने मेरे सामने खड़े होकर कहा था कि तुम मशीन नहीं हो।”

पीहू ने उसकी बाँह पर हल्का-सा हाथ मारा।

“उस दिन आप मुझ पर चिल्ला रहे थे।”

“इसीलिए तो समझ गया।”

“क्या?”

“जो औरत मुझसे डरकर चुप नहीं हुई, वही मेरी जिंदगी सँभाल सकती है।”

पीहू हँसते-हँसते रो पड़ी।

कुछ महीने बाद उसी हवेली में फिर से शहनाई बजी।

लेकिन इस बार कोई मजबूरी नहीं थी।

कोई सौदा नहीं था।

कोई डर नहीं था।

पीहू लाल जोड़े में मंडप तक पहुँची तो उसकी नजर सबसे पहले अनंत पर पड़ी।

अनंत की गोद में अंश था।

सुमित्रा पीहू के पीछे खड़ी थीं।

अरुण की आँखों में आँसू थे।

निशा भी आई थी।

वह पीहू से नजर नहीं मिला पा रही थी।

रस्म शुरू होने से पहले निशा उसके पास आई।

“पीहू…”

पीहू ने देखा।

निशा रो पड़ी।

“मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।”

“जब तुम्हें घर की जरूरत थी, मैंने खर्च गिना।”

“जब तुम्हें सहारे की जरूरत थी, मैंने समाज का डर दिखाया।”

“और जब तुम माँ बनने वाली थीं…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मैंने तुम्हारी तकलीफ को समझने की कोशिश तक नहीं की।”

पीहू की आँखें भी भर आईं।

निशा ने हाथ जोड़ दिए।

“माफ कर सको तो कर देना।”

पीहू ने उसके जुड़े हाथ नीचे कर दिए।

“पुरानी बातों को आज यहीं छोड़ देते हैं।”

“लेकिन एक बात याद रखना भाभी।”

“क्या?”

“किसी टूटे हुए इंसान को सबसे ज्यादा उपदेश नहीं… एक सुरक्षित जगह की जरूरत होती है।”

निशा रोते हुए उसके गले लग गई।

शादी हुई।

इस बार पीहू ने सात फेरे डर से नहीं लिए।

हर फेरे के साथ उसे महसूस हुआ कि वह अपने अतीत से एक कदम दूर जा रही है।

और अपने चुने हुए भविष्य के एक कदम करीब।

एक वर्ष बीत गया।

अंश अब घर में दौड़ने लगा था।

उसके मुँह से पहला साफ शब्द निकला—

“माँ।”

पीहू वहीं बैठ गई।

आँखों से आँसू बहने लगे।

अनंत ने हँसते हुए कहा—

“देखा?”

पीहू ने अंश को सीने से लगा लिया।

“फिर से बोलो।”

“माँ।”

सुमित्रा ने भगवान के सामने हाथ जोड़ दिए।

कुछ महीनों बाद हवेली में एक और खबर आई।

पीहू माँ बनने वाली थी।

डॉक्टर के मुँह से यह सुनते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।

पुरानी यादें लौट आईं।

उसने तुरंत अनंत का हाथ पकड़ लिया।

“मुझे डर लग रहा है।”

अनंत ने उसकी तरफ देखा।

इस बार उसने कोई खोखला वादा नहीं किया।

सिर्फ कहा—

“डरना ठीक है।”

“लेकिन इस बार तुम्हें अकेले नहीं डरना पड़ेगा।”

पूरी गर्भावस्था के दौरान परिवार ने उसका बहुत ख्याल रखा।

सुमित्रा दवाइयों का समय लिखतीं।

अनंत हर डॉक्टर की विजिट में साथ जाता।

अरुण लगभग हर सप्ताह मिलने आता।

और अंश रोज पीहू के पेट पर हाथ रखकर पूछता—

“बेबी?”

नौ महीने बाद पीहू ने दो स्वस्थ जुड़वाँ बेटों को जन्म दिया।

कमरे में जब बच्चों की आवाज़ गूँजी तो पीहू रोती रही।

अनंत ने घबराकर पूछा—

“दर्द हो रहा है?”

वह सिर हिलाते हुए मुस्कुराई।

“नहीं।”

“तो रो क्यों रही हो?”

पीहू ने दोनों बच्चों की तरफ देखा।

“क्योंकि कभी मुझे लगा था कि मेरी गोद हमेशा खाली रहेगी।”

अनंत ने उसके माथे को चूम लिया।

“अब?”

पीहू ने अंश की तरफ देखा, जो सुमित्रा की गोद में खड़ा अपने दोनों छोटे भाइयों को आश्चर्य से देख रहा था।

“अब लगता है भगवान ने मेरी खाली गोद ही नहीं…”

“मेरी पूरी जिंदगी भर दी।”

लेकिन कहानी का आखिरी मोड़ अभी बाकी था।

उसी सप्ताह वकील देवेंद्र अस्पताल पहुँचे।

उनके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।

“मुझे कुछ दिखाना है।”

अनंत ने पूछा—

“क्या?”

देवेंद्र ने फाइल पीहू के सामने रखी।

वह दस्तावेज समीर से जुड़े पुराने बैंक रिकॉर्ड थे।

जाँच के दौरान पता चला था कि पीहू के पिता ने उसकी शादी के समय उसके नाम पर एक छोटी संपत्ति और निवेश छोड़ा था।

समीर ने शादी के शुरुआती महीनों में धोखे से हस्ताक्षर करवाकर उसका बड़ा हिस्सा अपने कारोबार में लगा दिया था।

लेकिन एक खाते की नामांकन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।

वर्षों का ब्याज और संपत्ति की बढ़ी कीमत मिलाकर अब वह रकम काफी बड़ी हो चुकी थी।

पीहू ने हैरानी से पूछा—

“यह सब मेरा है?”

देवेंद्र मुस्कुराए।

“हमेशा से।”

अनंत ने मजाक में कहा—

“तो अब घर की अमीर सदस्य तुम हो।”

पीहू ने उसे घूरा।

“सावधान रहना।”

“क्यों?”

“कभी गुस्सा दिलाया तो मैं अपना घर खरीदकर चली जाऊँगी।”

अनंत ने हँसते हुए कहा—

“घर खरीद लेना।”

“लेकिन मुझे भी साथ ले जाना।”

पीहू मुस्कुरा दी।

उसने उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा अपने लिए रखने के बजाय एक सहायता केंद्र बनाने का फैसला किया।

ऐसी महिलाओं के लिए जिन्हें अचानक अपना घर छोड़ना पड़ा हो।

जहाँ कुछ सप्ताह रहने की सुरक्षित जगह हो।

कानूनी मदद हो।

काम सीखने की सुविधा हो।

और सबसे जरूरी—

कोई उन्हें यह महसूस न कराए कि वे बोझ हैं।

केंद्र का नाम उसने रखा—

“नई राह।”

उद्घाटन के दिन मंच पर उससे पूछा गया—

“आपने यह नाम क्यों चुना?”

पीहू कुछ देर चुप रही।

सामने पहली पंक्ति में अनंत बैठा था।

उसकी गोद में अंश था।

सुमित्रा दोनों जुड़वाँ बच्चों के साथ थीं।

अरुण और निशा पास बैठे थे।

पीहू ने मुस्कुराकर कहा—

“क्योंकि जिंदगी जब एक रास्ता बंद करती है तो हमें अक्सर लगता है कि सफर खत्म हो गया।”

“लेकिन कभी-कभी वही बंद दरवाज़ा हमें उस रास्ते की तरफ मोड़ता है जहाँ हमें पहली बार अपनी असली मंजिल मिलती है।”

तालियाँ बज उठीं।

उसी भीड़ के सबसे पीछे एक आदमी खड़ा था।

समीर।

बदला हुआ।

थका हुआ।

उसका कारोबार लगभग खत्म हो चुका था।

ज्यादातर दोस्त साथ छोड़ चुके थे।

वह बहुत देर पीहू को देखता रहा।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उसने उसे रास्ते में रोकने की कोशिश की।

“पीहू।”

वह पलटी।

समीर की आँखों में पहली बार अहंकार नहीं था।

“दो मिनट बात कर सकती हो?”

पीहू शांत रही।

अनंत कुछ दूरी पर खड़ा था।

वह आगे आ सकता था।

लेकिन नहीं आया।

यह पीहू की लड़ाई थी।

और अब वह जानता था कि पीहू को बचाने की नहीं, उस पर भरोसा करने की जरूरत है।

समीर ने कहा—

“मैं माफी माँगने आया हूँ।”

पीहू ने बस उसे देखा।

“बहुत देर कर दी?”

समीर ने पूछा।

पीहू ने धीरे से कहा—

“माफी में देर नहीं होती।”

समीर की आँखों में उम्मीद आई।

लेकिन पीहू ने आगे कहा—

“वापसी में देर हो सकती है।”

उसकी उम्मीद बुझ गई।

“क्या हमारे बीच कुछ भी नहीं बचा?”

पीहू ने पीछे देखा।

अंश अनंत की उँगली पकड़कर उसकी तरफ दौड़ रहा था।

“माँ!”

पीहू झुककर उसे गोद में उठा लिया।

फिर समीर से कहा—

“तुमने जो रिश्ता तोड़ा था, उसकी राख में मैं जिंदगी भर कुछ खोजती रहती तो शायद आज यहाँ न होती।”

“मैं तुम्हें माफ करती हूँ।”

“लेकिन अपने पुराने जीवन में वापस नहीं जाऊँगी।”

समीर की आँखें भीग गईं।

वह धीरे से सिर हिलाकर चला गया।

पीहू उसे जाते हुए देखती रही।

दिल में न नफरत थी, न मोहब्बत।

बस एक समाप्त अध्याय था।

अनंत उसके पास आया।

“सब ठीक?”

पीहू ने मुस्कुराकर कहा—

“अब बिल्कुल ठीक।”

अंश ने पूछा—

“घर?”

पीहू ने उसके गाल पर चुंबन दिया।

“हाँ।”

“घर।”

शाम को जब उनकी गाड़ी हवेली के मुख्य द्वार से अंदर पहुँची, सूरज ढल रहा था।

खिड़कियों पर सुनहरी रोशनी बिखरी थी।

वही हवेली जो कभी पीहू को एक कैद जैसी लगी थी, आज उसकी हँसी से भरी थी।

अंदर जुड़वाँ बच्चों की आवाज़ें थीं।

सुमित्रा की डाँट में भी अपनापन था।

अनंत की आँखों में सुकून था।

और अंश की दुनिया में पीहू ही उसकी माँ थी।

रात को सबके सो जाने के बाद पीहू बालकनी में खड़ी आसमान देख रही थी।

अनंत पीछे से आया।

“क्या सोच रही हो?”

“अपना सफर।”

“बहुत मुश्किल था?”

पीहू मुस्कुराई।

“अगर मुश्किल न होता तो शायद मंजिल की कीमत समझ नहीं आती।”

अनंत ने पूछा—

“कोई पछतावा?”

पीहू ने कुछ देर सोचकर कहा—

“हाँ।”

अनंत चौंका।

“क्या?”

पीहू ने उसकी तरफ देखा।

“यह कि मैंने बहुत साल दूसरों से अपनी कीमत पूछने में बर्बाद कर दिए।”

अनंत चुप रहा।

पीहू ने उसकी उँगलियाँ थाम लीं।

“अब समझ आया है।”

“क्या?”

“इंसान की कीमत इस बात से तय नहीं होती कि कौन उसे छोड़ गया।”

“इस बात से होती है कि टूटने के बाद वह खुद को कैसे उठाता है।”

अनंत ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“और हमारी कहानी?”

पीहू ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

“हमारी कहानी उस दिन शुरू नहीं हुई थी जब मैं इस हवेली में आई।”

“फिर?”

“उस दिन शुरू हुई थी जब तुमने पहली बार मुझे अपनी मजबूरी नहीं… एक इंसान समझा।”

नीचे कमरे से अंश की नींद भरी आवाज़ आई—

“माँ…”

पीहू तुरंत पलटी।

अनंत हँस पड़ा।

“हमारी रोमांटिक बातों का यही अंत होता है।”

पीहू जाते-जाते बोली—

“अब तीन बच्चों के पिता हो।”

“आदत डाल लो।”

अनंत उसके पीछे चला।

“चार।”

पीहू रुक गई।

“क्या?”

अनंत ने शरारत से कहा—

“तीन बच्चे और एक मैं।”

पीहू ने तकिया उठाकर उसकी तरफ फेंक दिया।

अंश हँसने लगा।

दूसरे कमरे से जुड़वाँ बच्चों की आवाज़ आने लगी।

सुमित्रा ने बाहर से पुकारा—

“तुम दोनों बच्चों को सुला रहे हो या पूरी हवेली जगा रहे हो?”

पीहू और अनंत ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

फिर दोनों हँस पड़े।

कभी जिस घर की दीवारों में तिरस्कार, डर और अकेलापन था, उसी घर में आज हँसी गूँज रही थी।

पीहू का सफर किसी राजकुमार के उसे बचाने की कहानी नहीं था।

यह उस लड़की की कहानी थी जिसने पहले अपना सम्मान वापस पाया।

फिर अपनी आवाज़।

फिर अपनी जिंदगी।

और उसके बाद उसे वह मोहब्बत मिली जिसमें किसी ने उससे यह नहीं कहा—

“मेरी बनकर रहो।”

बल्कि कहा—

“अपनी बनकर रहो… मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

शायद सच्ची मोहब्बत यही होती है।

जहाँ किसी के पंख काटकर उसे अपने पास नहीं रखा जाता।

बल्कि उसके पंखों पर विश्वास करके उसके साथ आसमान तक चला जाता है।

और पीहू के लिए मोहब्बत का असली सफर उस दिन पूरा हुआ जब उसने महसूस किया—

जिस दरवाज़े के बंद होने पर उसने सोचा था उसकी जिंदगी खत्म हो गई…

वही दरवाज़ा दरअसल उस रास्ते की शुरुआत था जो उसे उसके असली घर तक ले आया।

लेकिन कई साल बाद “नई राह” केंद्र के पुराने रिकॉर्ड देखते हुए पीहू को एक बंद लिफाफा मिला।

उस पर कोई नाम नहीं था।

सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“जिस रात तुम्हें समीर के घर से निकाला गया था, किसी ने पूरी घटना कैमरे में रिकॉर्ड की थी… और वह व्यक्ति आज भी तुम्हारी जिंदगी के बेहद करीब है।”

पीहू की उँगलियाँ अचानक रुक गईं।

उसने धीरे से लिफाफा खोला।

अंदर एक पुरानी मेमोरी कार्ड थी।

और पीछे लिखा था—

“अनंत को दिखाने से पहले सच जान लेना।”

पीहू का दिल तेज धड़कने लगा।

उसी क्षण कमरे के बाहर कदमों की आवाज़ आई।

दरवाज़े का हैंडल धीरे-धीरे नीचे हुआ।

और पीहू ने मेमोरी कार्ड अपनी मुट्ठी में कस लिया…

क्योंकि शायद मोहब्बत का सफर खत्म नहीं हुआ था।

शायद उसके अतीत का सबसे बड़ा सच अभी सामने आना बाकी था।

समाप्त!

डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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