जिस प्रोफेसर ने कभी सुरभि से कहा था, “तुम्हें छूने का हक सिर्फ मेरा है,” वही एक साल बाद किसी दूसरी लड़की का हाथ थामकर लौटा—और सबके सामने उसकी शादी का ऐलान हो गया

जिस प्रोफेसर ने कभी सुरभि से कहा था, “तुम्हें छूने का हक सिर्फ मेरा है,” वही एक साल बाद किसी दूसरी लड़की का हाथ थामकर लौटा—और सबके सामने उसकी शादी का ऐलान हो गया
कॉलेज में उस दिन डांस कंपटीशन था।
पूरा कैंपस संगीत, तालियों और लड़कियों की हंसी से गूंज रहा था। कोई मेकअप ठीक कर रही थी, कोई अपनी ड्रेस संभाल रही थी, तो कोई आखिरी बार डांस स्टेप्स दोहरा रही थी।
लेकिन उसी कॉलेज की शांत लाइब्रेरी के एक कोने में सुरभि की दुनिया जैसे बाकी दुनिया से अलग हो चुकी थी।
वह दीवार से लगी खड़ी थी।
उसकी सांसें तेज थीं।
सामने प्रोफेसर रियांश था।
वही रियांश, जिसकी एक नजर सुरभि के चेहरे की मुस्कान गायब कर सकती थी और जिसकी हल्की-सी मुस्कान उसके दिल की धड़कनों को बेकाबू कर देती थी।
“प्रोफेसर… मुझे जाना है।”
सुरभि ने धीमी आवाज में कहा।
“मेरी परफॉर्मेंस शुरू होने वाली है।”
रियांश ने उसकी घबराई आंखों को देखा और हल्का-सा मुस्कुराया।
“परफॉर्मेंस की इतनी चिंता है?”
“हां।”
“और मेरी?”
सुरभि ने तुरंत नजरें नीचे कर लीं।
“आपकी चिंता क्यों करूं?”
“सच?”
रियांश ने पूछा।
सुरभि चुप रही।
उसकी यही खामोशी रियांश के लिए जवाब थी।
दोनों के बीच का रिश्ता किसी सामान्य प्रेम कहानी जैसा नहीं था।
कॉलेज के लिए रियांश सिर्फ एक प्रोफेसर था।
सुरभि उसकी छात्रा।
लेकिन उन दोनों के लिए यह रिश्ता कब औपचारिक सीमाओं से निकलकर भावनाओं की उलझी हुई दुनिया में पहुंच गया था, शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला।
सुरभि उससे प्यार करती थी।
और रियांश?
वह प्यार से कहीं ज्यादा गहरी किसी भावना में डूब चुका था।
उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सुरभि थी।
और सबसे बड़ी समस्या भी।
सुरभि जाने के लिए मुड़ी तो रियांश ने कहा—
“एक मिनट।”
वह रुक गई।
“अब क्या है?”
“गुस्सा हो?”
“नहीं।”
“झूठ।”
सुरभि ने पलटकर उसे देखा।
“आपको हर बात पता होती है तो पूछते क्यों हैं?”
रियांश हंस पड़ा।
“क्योंकि तुम्हारे मुंह से सुनना अच्छा लगता है।”
“मुझे देर हो रही है।”
“ठीक है। जाओ।”
सुरभि ने हैरानी से उसे देखा।
आज इतनी आसानी से?
लेकिन अगले ही पल रियांश ने धीरे से कहा—
“बस स्टेज पर किसी लड़के का हाथ पकड़कर डांस मत करना।”
सुरभि की आंखें फैल गईं।
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे अच्छा नहीं लगेगा।”
“आप मेरे प्रोफेसर हैं या बॉडीगार्ड?”
“दोनों बनने में मुझे कोई दिक्कत नहीं।”
सुरभि ने आंखें घुमाईं।
“बहुत पजेसिव हैं आप।”
“सिर्फ तुम्हारे लिए।”
सुरभि के चेहरे पर अनचाही मुस्कान आ गई।
उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि रियांश देख न सके।
“अब मैं जा रही हूं।”
“जाओ।”
सुरभि तेजी से बाहर निकल गई।
कुछ मिनट बाद हॉल तालियों से गूंज उठा।
स्टेज पर सुरभि की टीम की परफॉर्मेंस शुरू हो चुकी थी।
लाइट्स उसके चेहरे पर पड़ रही थीं।
उसकी आंखों में आत्मविश्वास था।
रियांश हॉल के पिछले हिस्से में खड़ा उसे देख रहा था।
उसकी नजर किसी और पर जा ही नहीं रही थी।
तभी एक महिला प्रोफेसर उसके पास आईं।
“हेलो, प्रोफेसर रियांश।”
रियांश ने उनकी तरफ देखा।
“हेलो।”
“मैं सुनीता हूं। नया सेमेस्टर शुरू होने के बाद शायद पहली बार ठीक से मिल रहे हैं।”
दोनों बातचीत करने लगे।
स्टेज पर डांस करती सुरभि की नजर अचानक उधर चली गई।
रियांश हंस रहा था।
सुनीता मैम भी हंस रही थीं।
सुरभि का अगला स्टेप लगभग बिगड़ गया।
उसकी दोस्त ने धीरे से कहा—
“फोकस!”
सुरभि ने तुरंत खुद को संभाला।
लेकिन अब उसकी आंखें बार-बार रियांश की तरफ जा रही थीं।
परफॉर्मेंस खत्म हुई।
तालियां बजीं।
उधर सुनीता ने मुस्कुराकर पूछा—
“वैसे प्रोफेसर, आपकी शादी हो चुकी है?”
रियांश की नजर अनायास सुरभि पर चली गई।
सुरभि दूर खड़ी पानी पी रही थी, लेकिन उसके कान जैसे यहीं लगे थे।
रियांश ने मुस्कुराकर कहा—
“अभी नहीं।”
“ओह! फिर तो कॉलेज की बहुत-सी लड़कियों के लिए अच्छी खबर है।”
रियांश हल्का-सा हंसा।
“शायद उनके लिए नहीं।”
“क्यों?”
उसने फिर सुरभि की तरफ देखा।
“क्योंकि गर्लफ्रेंड है मेरी।”
सुरभि के हाथ में पकड़ी बोतल वहीं रुक गई।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
लेकिन तभी एक लड़का उसके पास आया।
“सुरभि, चलो। टीम फोटो होने वाली है।”
“हां।”
उस लड़के ने जल्दबाजी में उसका हाथ पकड़ लिया।
बस।
रियांश की मुस्कान उसी पल गायब हो गई।
उसकी आंखें उस हाथ पर टिक गईं।
अगले ही क्षण वह सीधे स्टेज के पास पहुंचा।
“रोहन।”
लड़का पलटा।
“यस, सर?”
“तुम यहां क्या कर रहे हो?”
“सर, टीम फोटो…”
“पिछले टेस्ट में कितने नंबर आए थे?”
लड़के का चेहरा उतर गया।
“सर…”
“अगर अगले एग्जाम में फेल नहीं होना तो फोटो से ज्यादा पढ़ाई पर ध्यान दो।”
“जी, सर।”
लड़का तुरंत चला गया।
सुरभि ने कमर पर हाथ रखा।
“यह क्या था?”
“क्या?”
“उसे ऐसे क्यों डांटा?”
“उसके नंबर कम हैं।”
“और आपको उसके नंबर उसी वक्त याद आए जब उसने मेरा हाथ पकड़ा?”
रियांश चुप रहा।
सुरभि मुस्कुराई।
“जलन हो रही थी?”
“बिल्कुल नहीं।”
“अच्छा?”
“हां।”
“फिर मैं रोहन के साथ फोटो खिंचवाने जा रही हूं।”
वह मुड़ी।
“सुरभि।”
रियांश की आवाज इस बार गंभीर थी।
वह रुक गई।
“क्या?”
“मुझे अच्छा नहीं लगता जब कोई तुम्हारे बहुत करीब आने की कोशिश करता है।”
सुरभि का चेहरा गंभीर हो गया।
“और आप सुनीता मैम के साथ हंस सकते हैं?”
रियांश एक पल उसे देखता रहा।
फिर उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान आई।
“तो असली समस्या यहां है।”
“क्या?”
“मैडम को जलन हो रही है।”
“मुझे कोई जलन नहीं।”
“पक्का?”
“हां।”
“मेरी आंखों में देखकर बोलो।”
सुरभि ने उसकी आंखों में देखा।
लेकिन कुछ सेकंड बाद ही नजरें झुका लीं।
रियांश मुस्कुराया।
“पकड़ी गई।”
“जाइए आप।”
सुरभि नाराज होकर वहां से चली गई।
उस दिन की वह छोटी-सी नोकझोंक शायद उनके रिश्ते की सबसे खूबसूरत यादों में से एक बन सकती थी।
अगर जिंदगी ने आगे उनके लिए कुछ और न लिखा होता।
समय बीता।
सुरभि कॉलेज के तीसरे वर्ष में पहुंच गई।
लेकिन उसके साथ रियांश नहीं था।
उसे पारिवारिक व्यवसाय से जुड़े एक बड़े प्रोजेक्ट के कारण देश से बाहर जाना पड़ा।
पहले उसने कहा था—
“कुछ महीने लगेंगे।”
कुछ महीने छह महीने बन गए।
फिर आठ।
और देखते-देखते पूरा एक साल बीत गया।
एक साल।
सुरभि ने उसे सामने से नहीं देखा था।
शुरुआत में रोज वीडियो कॉल होती थी।
फिर वीडियो कॉल फोन कॉल में बदल गई।
फोन कॉल छोटे होने लगे।
कभी रियांश मीटिंग में होता।
कभी फ्लाइट में।
कभी सुरभि की क्लास होती।
लेकिन सुरभि ने कभी शक नहीं किया।
उसे विश्वास था।
रियांश ने जाते समय उसका हाथ पकड़कर कहा था—
“दूरी सिर्फ शहरों की होगी, हमारे बीच की नहीं।”
सुरभि ने उसी एक वाक्य को पूरे साल अपने दिल में संभालकर रखा।
एक दिन वह क्लास में बैठी किताब पढ़ रही थी।
तभी उसकी सबसे अच्छी दोस्त नेहा लगभग दौड़ती हुई आई।
“सुरभि!”
“क्या हुआ?”
“आज मेरे घर पार्टी है।”
“तो?”
“तो तुम चल रही हो।”
“मैं क्यों?”
“क्योंकि तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो।”
“नेहा, तुम्हारे घर की पार्टी मतलब बड़े-बड़े बिजनेसमैन, रिश्तेदार और तुम्हारा पूरा खानदान। मैं वहां जाकर क्या करूंगी?”
नेहा ने किताब बंद कर दी।
“यह बहाना मेरे सामने नहीं चलेगा।”
“लेकिन—”
“कोई लेकिन नहीं। जिया दी भी इटली से आ रही हैं।”
“जिया?”
“मेरी कजिन। और उनके फियांसे भी आ रहे हैं।”
सुरभि मुस्कुराई।
“ठीक है। तुम्हारी बहन के लिए चल रही हूं।”
“यही हुई ना बात।”
शाम तक नेहा उसे अपने घर ले आई।
घर क्या था, किसी महल से कम नहीं था।
बड़े लॉन में रोशनी लगाई जा रही थी।
फूलों से पूरा प्रवेश द्वार सजा था।
अंदर स्टाफ भाग-दौड़ कर रहा था।
सुरभि ने धीरे से पूछा—
“तुम लोगों की छोटी पार्टी ऐसी होती है?”
नेहा हंस पड़ी।
“अभी तो शुरू भी नहीं हुई।”
दोनों कमरे में तैयार होने चली गईं।
सुरभि आईने के सामने खड़ी अपने बाल ठीक कर रही थी।
तभी पीछे से किसी ने अचानक उसे पकड़कर खुशी में घुमा दिया।
“नेहा! कैसी है तू? मैंने तुझे बहुत मिस किया!”
सुरभि डर गई।
“छोड़ो मुझे!”
वह तुरंत उसकी पकड़ से बाहर आई।
सामने लगभग सत्ताईस-अट्ठाईस साल का एक हैंडसम युवक खड़ा था।
उसकी मुस्कान अचानक गायब हो गई।
“ओह।”
सुरभि गुस्से से बोली—
“ओह क्या? कौन हैं आप?”
“गलती हो गई।”
“इस तरह किसी को पकड़ लेना गलती है?”
“मैंने तुम्हें पीछे से नेहा समझ लिया।”
“तो आंखें इस्तेमाल किया कीजिए।”
लड़का कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर मुस्कुराया।
“समीर।”
“क्या?”
“मेरा नाम समीर है।”
“मैंने पूछा नहीं।”
“लेकिन मैं बताना चाहता था।”
सुरभि ने आंखें घुमाईं।
तभी नेहा अंदर आई।
“समीर भाई!”
“असली नेहा।”
नेहा हंस पड़ी।
“आपने सुरभि को मैं समझ लिया?”
“मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती थी।”
सुरभि ने तुरंत उसकी तरफ देखा।
“फ्लर्ट करना बंद कीजिए।”
“मैं फ्लर्ट नहीं कर रहा।”
“तो?”
“पहचान बढ़ा रहा हूं।”
“मुझे नहीं बढ़ानी।”
समीर ने हाथ उठाए।
“ठीक है, मैडम। जैसा आप कहें।”
लेकिन जाते-जाते उसने पलटकर कहा—
“वैसे गुस्से में आप और अच्छी लगती हैं।”
सुरभि ने कुशन उठाकर उसकी तरफ फेंका।
समीर हंसता हुआ बाहर निकल गया।
नेहा ने सुरभि को देखा।
“क्या बात है!”
“कुछ नहीं।”
“समीर भाई को आज पहली बार किसी लड़की ने दो मिनट में चुप कराया है।”
“तो उनकी आदत खराब है।”
“इटली में बहुत बड़ा बिजनेस संभालते हैं।”
“मुझे क्या?”
“हैंडसम हैं।”
“मुझे क्या?”
“सिंगल हैं।”
“नेहा!”
दोनों हंस पड़ीं।
सुरभि नहीं जानती थी कि कुछ ही घंटों बाद यही समीर उस कहानी का हिस्सा बनने वाला था जो उसके दिल को तोड़ देगी।
रात हुई।
पार्टी शुरू हुई।
सुरभि ने हल्के रंग का खूबसूरत सूट पहना था।
वह नेहा के साथ मेहमानों के बीच खड़ी थी कि अचानक उसकी नजर भीड़ के दूसरी तरफ गई।
और उसकी सांस रुक गई।
रियांश।
वह वहीं था।
पूरे एक साल बाद।
सुरभि की आंखें चमक उठीं।
उसका दिल इतनी तेजी से धड़कने लगा जैसे वह फिर से वही लड़की बन गई हो जो पहली बार रियांश को देखकर घबराई थी।
“रियांश…”
उसके होंठों से नाम निकला।
उसने उसे बताया तक नहीं कि वह भारत वापस आ गया है।
शायद सरप्राइज देना चाहता होगा।
सुरभि मुस्कुराते हुए उसकी तरफ बढ़ी।
एक कदम।
दो कदम।
फिर तीसरा कदम उठाने से पहले वह रुक गई।
रियांश अकेला नहीं था।
उसके पास एक बेहद खूबसूरत लड़की खड़ी थी।
उसका हाथ रियांश की बांह में था।
सुरभि की मुस्कान धीरे-धीरे मिट गई।
शायद कोई रिश्तेदार होगी।
उसने खुद को समझाया।
तभी रियांश ने उस लड़की का हाथ अपने हाथ में लिया।
सुरभि की उंगलियां ठंडी पड़ गईं।
फिर उसकी नजर रियांश से मिली।
बस एक पल के लिए।
सुरभि को लगा अब वह उसकी तरफ आएगा।
उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान आएगी।
शायद वह कहेगा—
“सरप्राइज।”
लेकिन रियांश ने कुछ नहीं कहा।
उसने अपनी नजर हटा ली।
और उस लड़की के साथ सुरभि के सामने से गुजर गया।
जैसे वह उसे पहचानता ही न हो।
सुरभि वहीं खड़ी रह गई।
उसके कानों में पार्टी का संगीत धीरे-धीरे धुंधला पड़ गया।
आंखों में नमी उतर आई।
एक साल तक जिस आदमी की वापसी का इंतजार किया था, वह लौटकर उसके सामने से एक अजनबी की तरह गुजर गया था।
कुछ देर बाद सभी करीबी लोग हॉल में बैठे थे।
सुरभि ने खुद को व्यस्त रखने के लिए पानी की ट्रे उठा ली।
तभी नेहा के पिता ने हंसते हुए कहा—
“तो रियांश बेटा, जिया से शादी कब कर रहे हो?”
ट्रे सुरभि के हाथों में कांप गई।
जिया?
उसने उस लड़की की तरफ देखा।
वही लड़की।
रियांश के पास बैठी हुई।
जिया मुस्कुराई और उसने रियांश का हाथ पकड़ लिया।
“बहुत जल्द, अंकल।”
सुरभि के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसने रियांश को देखा।
शायद वह इंकार करेगा।
शायद कहेगा कोई गलतफहमी है।
शायद सबके सामने नहीं तो आंखों से ही उसे विश्वास दिलाएगा।
लेकिन रियांश शांत बैठा रहा।
उसने जिया का हाथ भी नहीं हटाया।
सुरभि की आंखें भर आईं।
उसी समय समीर उसके पास आ गया।
“लिटिल गर्ल।”
सुरभि ने कोई जवाब नहीं दिया।
“तुम ठीक हो?”
“हां।”
“झूठ बोलने में बहुत खराब हो।”
“मैं ठीक हूं।”
समीर ने उसके हाथ से ट्रे ले ली।
“जाकर बैठो।”
“मैं कर लूंगी।”
“मैंने पूछा नहीं।”
सुरभि ने पहली बार उसकी तरफ ध्यान से देखा।
उसकी शरारती आंखों में इस बार मजाक नहीं था।
चिंता थी।
उधर बैठे रियांश की नजर दोनों पर पड़ चुकी थी।
समीर सुरभि के बहुत करीब खड़ा था।
उसकी मुट्ठियां कस गईं।
चेहरा कठोर हो गया।
लेकिन वह कुछ कह नहीं सकता था।
क्योंकि उसके ठीक बगल में बैठी लड़की को पूरा परिवार उसकी होने वाली पत्नी कह रहा था।
समीर ने मुस्कुराकर घोषणा की—
“कल सब लोग बाहर घूमने चलेंगे।”
फिर वह सुरभि की तरफ झुका।
“और तुम भी।”
“मैं नहीं—”
“तुम चल रही हो।”
दूर बैठा रियांश अचानक उठ गया।
जिया ने पूछा—
“कहां जा रहे हो?”
“कमरे में।”
“लेकिन—”
“थक गया हूं।”
उसकी आवाज ठंडी थी।
वह चला गया।
नेहा तुरंत सुरभि के पास आई।
“यह क्या चल रहा है?”
“क्या?”
“तुम और समीर भाई।”
“कुछ भी नहीं।”
समीर ने पीछे से कहा—
“अभी कुछ नहीं। आगे का मुझे भी नहीं पता।”
“समीर!”
सुरभि गुस्से में बोली।
वह हंसता हुआ चला गया।
नेहा ने सुरभि का हाथ पकड़ा।
“वैसे मुझे तो तुम दोनों अच्छे लगोगे।”
सुरभि के दिल में जैसे किसी ने फिर चोट कर दी।
“नेहा, प्लीज।”
लेकिन नेहा उसकी हालत नहीं समझ पाई।
वह खुशी-खुशी कहती रही—
“और सोच, कितना मजा आएगा। जिया दी की शादी रियांश सर से और अगर तुम्हारी समीर भाई से हो गई तो…”
सुरभि अचानक रुक गई।
“जिया सच में तुम्हारी बहन है?”
“हां। बड़े पापा की बेटी।”
“रियांश उनसे कहां मिले?”
“इटली में। शायद बिजनेस के दौरान। पिछले कुछ महीनों में दोनों परिवारों ने शादी की बात भी तय कर दी।”
पिछले कुछ महीनों में।
सुरभि के कानों में वही शब्द घूमते रहे।
वही महीने जब रियांश उसे फोन पर कहता था—
“काम बहुत है।”
वही महीने जब वह उसके मैसेज का घंटों जवाब नहीं देता था।
वही महीने जब सुरभि खुद को समझाती थी कि उसका रियांश व्यस्त है।
तो क्या वह व्यस्त नहीं था?
क्या वह जिया के साथ था?
कमरे में पहुंचते ही सुरभि चुपचाप बिस्तर पर लेट गई।
नेहा कुछ देर बाद वॉशरूम चली गई।
सुरभि छत को देखती रही।
उसकी आंख से एक आंसू निकला और तकिए पर गिर गया।
“क्यों?”
उसने खुद से पूछा।
“अगर तुम्हें जिया पसंद थी तो मुझे बता देते, रियांश।”
उसकी आवाज टूट गई।
“मैं तुम्हें रोकती नहीं।”
उसी वक्त कमरे की रोशनी चली गई।
अंधेरा।
सुरभि उठकर बैठ गई।
“नेहा?”
कोई जवाब नहीं।
अचानक उसे महसूस हुआ कि कमरे में कोई और मौजूद है।
उसका दिल जोर से धड़का।
“कौन है?”
एक परछाईं उसके सामने आई।
सुरभि पीछे हट गई।
“कौन?”
उस व्यक्ति ने कुछ नहीं कहा।
सुरभि घबरा गई और तुरंत आवाज लगाने लगी—
“नेहा—”
तभी एक जानी-पहचानी आवाज आई।
“इतनी जल्दी किसी और के साथ घूमने का प्लान भी बना लिया?”
सुरभि जम गई।
यह आवाज…
“रियांश?”
कुछ सेकंड बाद मोबाइल की हल्की रोशनी जली।
सामने वही चेहरा था।
एक साल बाद।
इतने करीब।
सुरभि की आंखों में जमा आंसू अचानक गुस्से में बदल गए।
“आप?”
“हां, मैं।”
“यहां क्यों आए हैं?”
“तुमसे बात करने।”
सुरभि हंस पड़ी।
लेकिन वह हंसी दर्द से भरी थी।
“अब क्या बात बची है?”
“बहुत कुछ।”
“तो जाकर अपनी होने वाली पत्नी से कीजिए।”
वह उठकर जाने लगी।
रियांश उसके सामने आ गया।
“सुरभि।”
“रास्ते से हटिए।”
“पहले मेरी बात सुनो।”
“एक साल से सुन रही हूं!”
उसकी आवाज कांप गई।
“आपने कहा था वापस आएंगे।”
“मैं आया।”
“मेरे लिए?”
रियांश चुप हो गया।
यही खामोशी सुरभि को तोड़ गई।
“नहीं ना?”
उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
“आप जिया के लिए आए हैं।”
“सुरभि…”
“मत लीजिए मेरा नाम!”
उसने पहली बार इतनी कठोर आवाज में उससे बात की थी।
“आपको पता है मैं पूरे साल क्या सोचती रही? मैं हर दिन इंतजार करती रही कि कब आप वापस आएंगे। आपकी एक कॉल के लिए घंटों फोन हाथ में रखती थी। और आप?”
उसने कांपती उंगली दरवाजे की तरफ उठाई।
“आप वापस आए और मुझे बताया तक नहीं।”
रियांश उसकी तरफ बढ़ा।
सुरभि पीछे हट गई।
“मेरे करीब मत आइए।”
वह वहीं रुक गया।
सुरभि ने आंसू पोंछे।
“आपकी शादी होने वाली है।”
रियांश ने उसकी आंखों में देखा।
“तुम्हें समीर पसंद है?”
सुरभि स्तब्ध रह गई।
“क्या?”
“मैंने पूछा, तुम्हें समीर पसंद है?”
सुरभि को विश्वास नहीं हुआ।
“मैं यहां आपकी शादी के बारे में पूछ रही हूं और आपको समीर की चिंता है?”
“हां।”
“क्यों?”
रियांश की आंखों में वही पुरानी बेचैनी लौट आई।
“क्योंकि जिस तरह वह तुम्हें देख रहा था, मुझे पसंद नहीं आया।”
सुरभि ने कड़वी हंसी हंसी।
“आपको पसंद नहीं आया?”
“नहीं।”
“आपके पास यह कहने का हक नहीं है।”
रियांश चुप।
“जिस दिन आपने किसी दूसरी लड़की का हाथ पकड़कर मुझे नजरअंदाज किया, उसी दिन आपने वह हक खो दिया।”
यह सुनकर रियांश के चेहरे का भाव बदल गया।
सुरभि दरवाजे की तरफ बढ़ी।
इस बार उसने उसे नहीं रोका।
सिर्फ इतना कहा—
“जो तुम देख रही हो, कहानी उतनी सीधी नहीं है।”
सुरभि रुक गई।
लेकिन पलटी नहीं।
“हर धोखा देने वाला यही कहता है।”
“मैंने तुम्हें धोखा नहीं दिया।”
अब सुरभि पलटी।
“तो जिया कौन है?”
रियांश की आंखें कुछ पल के लिए बंद हुईं।
“मैं अभी नहीं बता सकता।”
सुरभि की आंखों में फिर आंसू आ गए।
“फिर मेरे पास भी सुनने के लिए कुछ नहीं है।”
वह बाहर चली गई।
रियांश अंधेरे कमरे में अकेला खड़ा रहा।
उसने जेब से फोन निकाला।
स्क्रीन पर एक मैसेज चमक रहा था—
“Remember the agreement. One mistake, and Surbhi will know everything.”
रियांश की आंखें कठोर हो गईं।
उसने मैसेज डिलीट कर दिया।
दूसरी तरफ जिया अपने कमरे में उसका इंतजार कर रही थी।
दरवाजा खुला।
रियांश अंदर आया।
जिया मुस्कुराई।
“कहां थे?”
“कुछ काम था।”
जिया उसके पास आई।
“रियांश, कुछ ही दिनों में हमारी शादी की तारीख तय हो जाएगी।”
रियांश ने उसकी तरफ देखा।
“हां।”
“फिर भी तुम खुश नहीं लगते।”
“मैं थका हूं।”
जिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा—
“या फिर वजह कोई और है?”
रियांश का चेहरा कठोर हो गया।
“क्या मतलब?”
जिया मुस्कुराई।
“कुछ नहीं।”
लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान सामान्य नहीं थी।
जैसे वह कुछ जानती हो।
अगली सुबह सभी घूमने जाने के लिए तैयार थे।
सुरभि ने जाने से मना कर दिया।
लेकिन नेहा नहीं मानी।
आखिर वह भी सबके साथ निकल गई।
दो गाड़ियां थीं।
जिया तुरंत रियांश के साथ बैठ गई।
सुरभि दूसरी गाड़ी की तरफ बढ़ी।
समीर ने उसके लिए दरवाजा खोला।
“मैडम।”
“मैं खुद खोल सकती हूं।”
“पता है।”
“फिर?”
“कभी-कभी किसी को खास महसूस करवाना अच्छा लगता है।”
सुरभि ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।
दूर से रियांश यह सब देख रहा था।
जिया ने उसकी तरफ देखा।
“क्या देख रहे हो?”
“कुछ नहीं।”
“तो चलें?”
रियांश ने गाड़ी स्टार्ट कर दी।
कुछ घंटों बाद सभी एक खूबसूरत रिसॉर्ट पहुंचे।
सुरभि कोशिश कर रही थी कि रियांश की तरफ न देखे।
लेकिन दिल बार-बार हार रहा था।
दोपहर में सब लोग झील के पास बैठे थे।
समीर सुरभि को कॉफी देकर उसके पास बैठ गया।
“एक सवाल पूछूं?”
“नहीं।”
“फिर भी पूछूंगा।”
“आप हमेशा ऐसे ही हैं?”
“हां।”
सुरभि मुस्कुरा दी।
समीर गंभीर हो गया।
“कल तुम रो रही थीं?”
सुरभि की मुस्कान गायब हो गई।
“नहीं।”
“फिर झूठ।”
“आपको क्या फर्क पड़ता है?”
समीर कुछ पल शांत रहा।
“शायद पड़ने लगा है।”
सुरभि ने उसकी तरफ देखा।
“समीर…”
“घबराओ मत। कोई फिल्मी प्रपोजल नहीं करने वाला।”
उसने कॉफी की चुस्की ली।
“बस इतना कह रहा हूं कि अगर कभी बात करनी हो तो मैं सुन सकता हूं।”
पहली बार सुरभि को लगा कि उसकी शरारत के पीछे एक समझदार इंसान भी था।
“थैंक यू।”
कुछ दूरी पर खड़ा रियांश दोनों को देख रहा था।
जिया उसके पास आई।
“उन्हें अकेला छोड़ दो।”
“मैंने कुछ कहा?”
“तुम्हारा चेहरा कह रहा है।”
रियांश ने जिया की तरफ देखा।
जिया धीरे से बोली—
“समीर को सुरभि पसंद है।”
“मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
“सच?”
“हां।”
“तो अच्छा है।”
जिया मुस्कुराई।
“क्योंकि अंकल भी सोच रहे हैं कि अगर दोनों एक-दूसरे को पसंद करें तो रिश्ते की बात आगे बढ़ाई जा सकती है।”
रियांश का हाथ वहीं रुक गया।
“क्या?”
“समीर और सुरभि की शादी।”
कुछ सेकंड तक रियांश बिल्कुल शांत रहा।
फिर उसने कहा—
“ऐसा कुछ नहीं होगा।”
जिया की आंखें सिकुड़ गईं।
“क्यों?”
रियांश को अपनी गलती का एहसास हुआ।
“क्योंकि अभी वे एक-दूसरे को जानते तक नहीं।”
जिया मुस्कुराई।
“जान जाएंगे।”
रियांश ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसी शाम सब लोग रिसॉर्ट के गार्डन में डिनर कर रहे थे।
अचानक नेहा के पिता ने मजाक में कहा—
“समीर, अब इटली वापस अकेले जाने का इरादा है या यहां से कोई पसंद भी कर ली?”
समीर ने बिना झिझके सुरभि की तरफ देखा।
सुरभि असहज हो गई।
“पापा…”
नेहा हंसने लगी।
“मुझे तो पता है इन्हें कौन पसंद है।”
सभी की नजर सुरभि पर चली गई।
सुरभि का चेहरा लाल हो गया।
“नेहा, चुप रहो।”
समीर मुस्कुराया।
“उसे परेशान मत करो।”
यह एक साधारण वाक्य था।
लेकिन रियांश के लिए नहीं।
क्योंकि वह सुरभि को परेशान होने से बचाने वाला व्यक्ति कभी खुद हुआ करता था।
और आज उसकी जगह कोई दूसरा खड़ा था।
तभी जिया ने सबके सामने रियांश का हाथ पकड़ लिया।
“और हमारी शादी की डेट भी जल्दी फाइनल कर लीजिए।”
सब हंस पड़े।
सुरभि ने सिर झुका लिया।
रियांश ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में जो दर्द था, उसने उसे अंदर तक हिला दिया।
रात को सुरभि बालकनी में अकेली खड़ी थी।
हवा उसके बाल उड़ा रही थी।
तभी पीछे से कदमों की आवाज आई।
“फिर से आप?”
उसने बिना पलटे कहा।
रियांश उसके बराबर आकर खड़ा हो गया।
“तुम्हें कैसे पता?”
“आपके आने पर मेरी जिंदगी मुश्किल हो जाती है। पहचान जाती हूं।”
रियांश के चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान आई।
“इतनी नाराज हो?”
“नाराजगी अपनों से होती है।”
यह वाक्य सीधा उसके दिल पर लगा।
“और मैं?”
सुरभि ने उसकी तरफ देखा।
“आपने खुद तय कर लिया कि आप क्या हैं।”
रियांश कुछ बोलता, उससे पहले उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर एक नाम चमका—
MR. KHANNA.
रियांश ने कॉल काट दी।
फिर तुरंत मैसेज आया।
“अगर शादी से पीछे हटे तो फाइल कल सुबह पुलिस के पास होगी।”
सुरभि ने मैसेज नहीं पढ़ा।
लेकिन उसने रियांश के चेहरे का रंग बदलते जरूर देखा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“फिर वही जवाब।”
वह जाने लगी।
तभी रियांश ने कहा—
“सुरभि, अगर एक दिन तुम्हें पता चले कि मैंने जो कुछ किया, वह तुम्हें बचाने के लिए किया था… तब?”
सुरभि रुक गई।
“तो उस दिन मुझसे सच कहिएगा।”
उसने पलटकर उसकी आंखों में देखा।
“क्योंकि झूठ से बचाया गया इंसान भी आखिर में टूटता ही है।”
और वह चली गई।
रियांश देर तक वहीं खड़ा रहा।
अगली सुबह एक और तूफान उनका इंतजार कर रहा था।
नाश्ते की टेबल पर जिया के पिता ने अचानक एक लिफाफा निकाला।
“हमने पंडित जी से बात कर ली है।”
सभी खुश हो गए।
“अगले महीने की सत्रह तारीख बहुत शुभ है।”
जिया की मां ने पूछा—
“मतलब?”
“जिया और रियांश की शादी।”
तालियां बज उठीं।
सुरभि के हाथ से चम्मच गिर गया।
टन!
पूरा कमरा कुछ पल के लिए शांत हो गया।
सुरभि तुरंत झुकी।
“सॉरी।”
उसने चम्मच उठाया।
लेकिन जब सिर उठाया तो उसकी आंखें सीधे रियांश से मिलीं।
इस बार सुरभि की आंखों में सवाल नहीं था।
सिर्फ टूटता हुआ विश्वास था।
रियांश ने होंठ खोले।
लेकिन बोल नहीं पाया।
उसी वक्त समीर ने अचानक कहा—
“तो फिर मैं भी एक बात कह दूं?”
सभी उसकी तरफ देखने लगे।
“क्या?”
समीर ने सुरभि की तरफ देखा।
“अगर सुरभि को ऐतराज न हो तो मैं उसे जानना चाहता हूं।”
सुरभि स्तब्ध।
नेहा खुशी से लगभग उछल पड़ी।
“मुझे पता था!”
जिया हंस पड़ी।
लेकिन रियांश की कुर्सी पीछे खिसक गई।
वह खड़ा हो गया।
“यह मजाक बंद करो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
समीर ने पहली बार उसे गंभीरता से देखा।
“मैं मजाक नहीं कर रहा।”
“तुम उसे जानते कितने दिन से हो?”
“किसी को जानने के लिए सालों की जरूरत नहीं होती।”
रियांश की आंखों में गुस्सा उतर आया।
समीर भी खड़ा हो गया।
“और वैसे भी फैसला सुरभि का होगा।”
यह वाक्य सुनकर रियांश चुप हो गया।
क्योंकि वह सही था।
सबकी नजर अब सुरभि पर थी।
सुरभि ने रियांश को देखा।
फिर जिया का हाथ उसके हाथ के पास देखा।
और धीरे से कहा—
“समीर सही कह रहे हैं।”
रियांश की सांस अटक गई।
सुरभि ने आगे कहा—
“किसी को जानने में कोई बुराई नहीं।”
बस।
रियांश बिना कुछ कहे वहां से चला गया।
सुरभि की आंखें उसके पीछे गईं।
दिल चीख रहा था—
रुक जाओ।
लेकिन दिमाग कह रहा था—
जिसने तुम्हें छोड़ा, उसके पीछे मत जाओ।
उस रात सुरभि सो नहीं सकी।
करीब दो बजे उसके फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
“अगर तुम रियांश की शादी की असली वजह जानना चाहती हो तो कल सुबह 10 बजे पुराने सिटी कैफे आना। अकेली।”
सुरभि सीधी बैठ गई।
उसने दोबारा मैसेज पढ़ा।
असली वजह?
उसने जवाब लिखा—
“आप कौन हैं?”
कुछ सेकंड बाद उत्तर आया।
“वही इंसान जो जानता है कि रियांश ने एक साल पहले तुम्हें क्यों छोड़ा।”
सुरभि के हाथ कांपने लगे।
अगली सुबह वह किसी को बताए बिना कैफे पहुंच गई।
कोने की टेबल पर लगभग पचास साल का एक आदमी बैठा था।
“सुरभि?”
“जी।”
“बैठिए।”
“आप कौन हैं?”
आदमी ने सामने एक फाइल रख दी।
“मेरा नाम आदित्य मेहरा है। मैं रियांश के पिता की कंपनी का पूर्व कानूनी सलाहकार हूं।”
सुरभि का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“आपने मुझे यहां क्यों बुलाया?”
उसने फाइल खोली।
अंदर कुछ बैंक स्टेटमेंट, कॉन्ट्रैक्ट और तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर देखकर सुरभि का चेहरा सफेद पड़ गया।
तस्वीर में उसके पिता थे।
“ये मेरे पापा…”
“हां।”
“इनका रियांश से क्या संबंध?”
आदित्य ने गंभीर आवाज में कहा—
“रियांश की जिया से शादी प्रेम विवाह नहीं है।”
सुरभि की सांस रुक गई।
“तो?”
“यह एक समझौता है।”
“कैसा समझौता?”
आदित्य कुछ कहने ही वाला था कि कैफे का दरवाजा जोर से खुला।
रियांश अंदर आया।
उसकी आंखों में ऐसा गुस्सा था जैसा सुरभि ने पहले कभी नहीं देखा था।
“मिस्टर मेहरा!”
आदित्य शांत बैठा रहा।
रियांश तेजी से उनके पास आया।
“मैंने आपको कहा था कि सुरभि को इसमें शामिल मत कीजिए।”
सुरभि उठ खड़ी हुई।
“तो सच है?”
रियांश ने उसकी तरफ देखा।
“सुरभि…”
“आपकी शादी कोई समझौता है?”
वह चुप।
“मेरे पापा की तस्वीर इस फाइल में क्यों है?”
रियांश का चेहरा उतर गया।
“तुम्हें घर जाना चाहिए।”
“नहीं।”
“सुरभि।”
“आज नहीं!”
उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
“एक साल से आप मेरे लिए फैसले कर रहे हैं। कब बात करनी है। क्या बताना है। कितना सच बताना है। लेकिन आज फैसला मैं करूंगी।”
उसने फाइल अपने हाथ में उठा ली।
“मैं पूरा सच जानूंगी।”
रियांश ने पहली बार नजरें झुका लीं।
आदित्य ने धीरे से कहा—
“उसे जानने दीजिए।”
कुछ पल बाद रियांश कुर्सी पर बैठ गया।
जैसे अचानक उसके कंधों पर रखा एक साल पुराना बोझ बहुत भारी हो गया हो।
उसने सुरभि की तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता की कंपनी तीन साल पहले लगभग दिवालिया हो गई थी।”
सुरभि हैरान रह गई।
“लेकिन पापा ने कभी…”
“उन्होंने तुम्हें नहीं बताया।”
“आगे?”
“उनकी कंपनी को बचाने के लिए मेरे परिवार की कंपनी ने निवेश किया था। लेकिन जिस डील पर साइन हुए, उसमें बाद में कुछ दस्तावेज बदले गए।”
“किसने?”
रियांश ने जवाब नहीं दिया।
आदित्य बोला—
“जिया के पिता के बिजनेस ग्रुप ने।”
सुरभि की आंखें फैल गईं।
“क्या?”
“दस्तावेज ऐसे बनाए गए कि वित्तीय धोखाधड़ी का पूरा आरोप तुम्हारे पिता पर जा सकता था।”
सुरभि की आंखों में डर उतर आया।
“तो रियांश…”
“उसे यह बात एक साल पहले पता चली।”
अब सुरभि समझने लगी थी।
“और जिया?”
रियांश ने धीमी आवाज में कहा—
“उसके पिता के पास मूल फाइल है।”
सुरभि की आंखों से आंसू गिर पड़े।
“उन्होंने शर्त रखी?”
रियांश चुप रहा।
यही उसकी स्वीकृति थी।
“मेरे लिए?”
“तुम्हारे पिता के लिए।”
“और आपने मान लिया?”
“मेरे पास वक्त नहीं था।”
“मुझे बता सकते थे!”
“और तुम क्या करती?”
“कम से कम आपके साथ खड़ी होती!”
रियांश की आवाज पहली बार ऊंची हुई।
“यही तो नहीं चाहता था मैं!”
सुरभि चुप हो गई।
रियांश की आंखें लाल थीं।
“तुम्हें पता है वे लोग कितने ताकतवर हैं? तुम एक कॉलेज स्टूडेंट थीं। तुम्हारे पिता पहले ही कमजोर स्थिति में थे। अगर मैं तुम्हें बताता तो तुम खुद को दोष देती।”
“तो आपने सोचा मुझे धोखा महसूस करवाना बेहतर है?”
उस सवाल का रियांश के पास कोई जवाब नहीं था।
सुरभि फूटकर रो पड़ी।
“आपको मेरी रक्षा करने का हक किसने दिया, अगर उसकी कीमत मेरा भरोसा था?”
रियांश की आंखें भी नम हो गईं।
लेकिन तभी आदित्य ने कहा—
“कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”
दोनों उसकी तरफ देखने लगे।
उसने फाइल से एक पेन ड्राइव निकाली।
“कल रात मुझे कंपनी के पुराने सर्वर का बैकअप मिला।”
रियांश सीधा हो गया।
“क्या मिला?”
“ओरिजिनल कॉन्ट्रैक्ट।”
रियांश की आंखें फैल गईं।
“आप सीरियस हैं?”
“सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट नहीं।”
आदित्य ने पेन ड्राइव टेबल पर रखी।
“एक रिकॉर्डिंग भी है।”
“किसकी?”
“उस मीटिंग की जिसमें दस्तावेज बदलने का आदेश दिया गया था।”
सुरभि ने कांपते हाथ से पेन ड्राइव देखी।
रियांश की सांस जैसे वापस लौट आई।
अगर यह सबूत असली था…
तो शादी की मजबूरी खत्म हो सकती थी।
लेकिन उसी क्षण आदित्य का फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी और चेहरा सफेद पड़ गया।
“क्या हुआ?”
रियांश ने पूछा।
आदित्य ने फोन उसकी तरफ बढ़ाया।
स्क्रीन पर उनके ऑफिस के CCTV की लाइव तस्वीर थी।
दो आदमी अंदर फाइलें तलाश रहे थे।
और नीचे एक मैसेज लिखा था—
“जो कॉपी तुम्हारे पास है, वही आखिरी नहीं है। और अगर शादी रुकी, अगला निशाना फाइल नहीं होगा।”
रियांश ने तुरंत सुरभि की तरफ देखा।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“तुम अभी मेरे साथ चल रही हो।”
“कहां?”
“ऐसी जगह जहां वे तुम्हें ढूंढ नहीं पाएंगे।”
लेकिन सुरभि ने पहली बार उसका हाथ रोक दिया।
“नहीं।”
रियांश स्तब्ध रह गया।
सुरभि ने अपने आंसू पोंछे।
उसकी आंखों में अब दर्द के साथ एक नया आत्मविश्वास था।
“एक साल आपने अकेले लड़ाई लड़ी।”
उसने पेन ड्राइव उठा ली।
“अब नहीं।”
“सुरभि, यह खेल नहीं है।”
“और मैं बच्ची नहीं हूं।”
“मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता।”
“तो मुझे सच से बाहर रखकर दोबारा वही गलती मत कीजिए।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर सुरभि ने वह सवाल पूछा जिसका जवाब उसकी पूरी जिंदगी बदल सकता था—
“एक बात बताइए।”
“क्या?”
“अगर यह मजबूरी नहीं होती… तो क्या आप आज भी मुझसे शादी करना चाहते?”
रियांश की आंखों में एक साल का दर्द उतर आया।
उसने बिना एक पल सोचे कहा—
“मैंने चाहना कब बंद किया था?”
सुरभि की आंखें भर आईं।
लेकिन इस बार उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।
क्योंकि कहानी अब सिर्फ टूटे हुए प्यार की नहीं थी।
यह उस सच की कहानी बनने वाली थी जिसके पीछे करोड़ों की कंपनी, एक नकली समझौता, सुरभि के पिता का भविष्य और रियांश की मजबूरी छिपी थी।
और उन तीनों को अभी यह नहीं मालूम था कि कैफे के बाहर खड़ी काली कार में बैठी जिया अपने फोन पर उनकी पूरी बातचीत सुन चुकी थी।
उसने धीरे से ईयरफोन निकाला।
उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
उसने किसी को कॉल किया।
“डैड…”
दूसरी तरफ से भारी आवाज आई—
“क्या हुआ?”
जिया ने कैफे की खिड़की से सुरभि और रियांश को देखा।
फिर बहुत शांत स्वर में बोली—
“रियांश को ओरिजिनल कॉन्ट्रैक्ट मिल गया है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर सामने वाले व्यक्ति ने सिर्फ एक सवाल पूछा—
“और लड़की?”
जिया की मुस्कान गायब हो गई।
“वह अब सब जानती है।”
दूसरी तरफ से जवाब आया—
“तो शादी की तारीख आगे करनी पड़ेगी।”
जिया की आंखें सिकुड़ गईं।
“कितनी आगे?”
“अगले महीने नहीं।”
एक ठंडी हंसी सुनाई दी।
“अगले सात दिन में।”
जिया ने कॉल काट दिया।
उधर कैफे के अंदर सुरभि ने पेन ड्राइव अपनी मुट्ठी में कस ली थी।
उसे लगा था कि सच सामने आने के बाद उसकी और रियांश की सबसे बड़ी मुश्किल खत्म हो गई।
लेकिन उसे क्या पता था…
असली खेल तो अब शुरू हुआ था।
क्योंकि जिस शादी को रोकने के लिए उनके हाथ में पहला सबूत आया था, उसी शादी का निमंत्रण अगले चौबीस घंटों में पूरे शहर में भेजा जाने वाला था।
और कार्ड पर तारीख देखकर सुरभि के पैरों तले जमीन खिसकने वाली थी—
सिर्फ सात दिन बाद।
लेकिन उससे भी बड़ा झटका कार्ड के पीछे छिपा था।
वहां रियांश और जिया के नाम के नीचे एक तीसरा नाम लिखा था।
एक ऐसा नाम जिसे देखकर सुरभि समझ जाएगी कि यह साजिश उसके पिता से शुरू नहीं हुई थी।
बल्कि उसकी अपनी मां की मौत से जुड़ा वह राज था जिसे उसके परिवार ने वर्षों से उससे छिपाकर रखा था…
और शायद रियांश को भी अभी तक उसका पूरा सच नहीं पता था।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।