आठ साल की शादी में अकेली पड़ी मीरा नौकर कर्ण के करीब आई, मगर एक छिपे कैमरे ने घर का सबसे बड़ा सच खोल दिया

आठ साल की शादी में अकेली पड़ी मीरा नौकर कर्ण के करीब आई, मगर एक छिपे कैमरे ने घर का सबसे बड़ा सच खोल दिया
शादी को आठ साल हो चुके थे।
लेकिन उस रात पहली बार मुझे लगा कि मेरे अपने ही घर की दीवारें मुझे घूर रही हैं।
मैंने सामने खड़े सिद्धार्थ की आंखों में देखा।
वही आदमी जिसके नाम का सिंदूर मैं आठ साल से अपनी मांग में भरती आई थी।
वही आदमी जिसके इंतजार में मैंने न जाने कितनी रातें खिड़की के पास बैठकर काटी थीं।
लेकिन उस रात उसकी आंखों में प्यार नहीं था।
विश्वास भी नहीं था।
सिर्फ शक था।
उसने अपने मोबाइल की स्क्रीन मेरी तरफ कर दी।
वीडियो में मैं थी।
मेरे सामने कर्ण खड़ा था।
मेरे हाथ में उसका हाथ था।
और वीडियो वहीं खत्म हो गया जहां सच शुरू होना चाहिए था।
सिद्धार्थ ने दांत भींचकर पूछा—
“अब भी कुछ कहना बाकी है, मीरा?”
मेरे होंठ कांपे।
“हां।”
“क्या?”
मैंने मोबाइल की तरफ नहीं देखा।
मैंने सीधे उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“वीडियो पूरा चलाओ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कर्ण दरवाजे के पास खड़ा था।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
सिद्धार्थ के बड़े भाई समीर के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी।
वही मुस्कान जिसने उसी पल मुझे समझा दिया कि कहानी उतनी सीधी नहीं थी जितनी मुझे दिखाई जा रही थी।
क्योंकि मुझे मालूम था कि उस वीडियो के आगे क्या हुआ था।
और शायद समीर को भी मालूम था।
इसीलिए उसने वीडियो वहीं काटा था।
लेकिन मैं शुरू से बताती हूं।
क्योंकि कुछ रिश्तों को समझने के लिए उनके टूटने की आवाज नहीं, उनकी लंबी खामोशी सुननी पड़ती है।
मेरा नाम मीरा है।
मेरी शादी सिद्धार्थ से आठ साल पहले हुई थी।
हमारा रिश्ता परिवार की पसंद से तय हुआ था।
शुरुआती दो साल बहुत अच्छे बीते।
सिद्धार्थ हंसता था, मुझे बाजार ले जाता था, मेरे लिए छोटी-छोटी चीजें खरीदता था।
कभी मेरी चूड़ियों की आवाज सुनकर कहता—
“तुम घर में होती हो तो लगता है घर सच में घर है।”
मैं मुस्कुरा देती।
उस वक्त मुझे क्या मालूम था कि कुछ साल बाद यही घर इतना बड़ा हो जाएगा कि उसमें मेरी आवाज भी मुझे वापस सुनाई देने लगेगी।
सिद्धार्थ की नौकरी पहले शहर में थी।
फिर कंपनी ने उसे बाहर के प्रोजेक्ट देना शुरू कर दिया।
कभी मुंबई।
कभी पुणे।
कभी बेंगलुरु।
कभी लगातार पंद्रह दिन बाहर।
कभी पूरा महीना।
वह कहता—
“मीरा, बस दो-तीन साल मेहनत कर लेने दो। फिर जिंदगी आसान हो जाएगी।”
मैं हर बार सिर हिला देती।
मैंने कभी उसका रास्ता नहीं रोका।
मुझे गर्व था कि मेरा पति मेहनती है।
लेकिन धीरे-धीरे मेहनत और रिश्ते के बीच दूरी आने लगी।
पहले वह दिन में चार बार फोन करता था।
फिर दो बार।
फिर सिर्फ रात को।
फिर कभी-कभी सिर्फ एक संदेश—
“आज बहुत थक गया हूं। कल बात करूंगा।”
मैं जवाब लिखती—
“ठीक है। अपना ध्यान रखना।”
कई बार संदेश पढ़ लिया जाता।
जवाब नहीं आता।
घर बड़ा था।
दो मंजिला।
नीचे बैठक, रसोई, पूजा का कमरा।
ऊपर हमारा कमरा और दो खाली कमरे।
ससुर जी गांव में रहते थे।
सासू मां का देहांत शादी के तीसरे साल में हो गया था।
सिद्धार्थ के बड़े भाई समीर और उनकी पत्नी नंदिनी दूसरे शहर में रहते थे, लेकिन परिवार की जमीन-जायदाद और खातों का काफी काम समीर ही संभालता था।
घर में मेरी मदद के लिए चार साल पहले एक लड़का आया था।
नाम था कर्ण।
उम्र चौबीस साल।
पास के गांव से आया था।
पहले वह सिर्फ बाहर का काम करता था।
बाजार से सामान लाना।
बगीचा साफ करना।
भारी चीजें उठाना।
फिर जब पुरानी नौकरानी गांव लौट गई तो धीरे-धीरे वह रसोई और घर के छोटे-मोटे काम भी सीख गया।
वह मुझे “दीदी” कहता था।
मैं उसे कभी नौकर की तरह नहीं देखती थी।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं था कि हमारे बीच कोई खास रिश्ता था।
कम से कम शुरुआत में नहीं।
कर्ण बहुत कम बोलता था।
सुबह चाय बनाकर रख देता।
मैं पूछती—
“नाश्ता किया?”
वह कहता—
“बाद में कर लूंगा।”
मैं डांटती—
“काम से पहले खाना।”
वह मुस्कुरा देता।
यही हमारी दुनिया थी।
साधारण।
साफ।
सीधी।
लेकिन इंसान की जिंदगी हमेशा वहीं नहीं रुकती जहां वह सुरक्षित होती है।
कभी-कभी अकेलापन धीरे-धीरे हमारी कमजोर जगहों को पहचान लेता है।
उस साल सिद्धार्थ लगातार बाहर रहने लगा।
एक महीने में दस या बारह दिन ही घर आता।
वह जब आता भी, उसका आधा समय फोन और लैपटॉप में गुजरता।
एक रात मैंने कहा—
“सिद्धार्थ, कल कहीं बाहर चलें?”
उसने स्क्रीन से नजर उठाए बिना पूछा—
“कहां?”
“कहीं भी।”
“मीरा, कल बहुत काम है।”
“रविवार है।”
“मेरे काम में रविवार नहीं होता।”
मैं चुप हो गई।
कुछ देर बाद उसने शायद मेरी खामोशी महसूस की।
“नाराज हो?”
मैंने झूठ बोला—
“नहीं।”
उसने राहत की सांस ली।
फिर लैपटॉप पर झुक गया।
ऐसे ही नाराज न होने का नाटक करते-करते हम औरतें कई बार अपने भीतर बहुत कुछ जमा करती रहती हैं।
अगली सुबह वह फिर चला गया।
जाते वक्त उसने कहा—
“पता नहीं इस बार कब लौटूंगा।”
मैंने पूछा—
“दस दिन?”
“शायद।”
“पंद्रह?”
उसने बैग उठाया।
“देखते हैं।”
दरवाजा बंद हुआ।
गाड़ी की आवाज दूर चली गई।
और मैं उसी जगह खड़ी रही।
कुछ मिनट बाद पीछे से कर्ण की आवाज आई—
“दीदी, चाय ठंडी हो रही है।”
मैंने पलटकर देखा।
उसके हाथ में ट्रे थी।
चाय।
दो बिस्किट।
और एक छोटा-सा गुलाब।
मैंने पूछा—
“ये फूल क्यों?”
वह थोड़ा झेंप गया।
“बगीचे में टूट गया था। फेंकने से अच्छा लगा आपकी चाय के साथ रख दूं।”
मैंने फूल उठा लिया।
न जाने क्यों उस दिन मेरे गले में कुछ अटक गया।
जिस चीज को मैं सिद्धार्थ से मांग भी नहीं रही थी, वह मुझे एक ऐसे इंसान ने बिना सोचे दे दी थी जिससे कोई उम्मीद ही नहीं थी।
बस एक फूल।
कोई बड़ी बात नहीं।
लेकिन अकेले इंसान के लिए छोटी चीजें भी कई बार बहुत बड़ी हो जाती हैं।
दिन गुजरते गए।
कर्ण हमेशा की तरह काम करता रहा।
लेकिन अब मैं उसे पहले से ज्यादा नोटिस करने लगी।
उसकी ईमानदारी।
उसकी चुप्पी।
उसका बिना कहे पानी रख जाना।
मेरे सिर में दर्द हो तो पूछ लेना—
“दवाई ला दूं?”
बिजली चली जाए तो सीढ़ियां चढ़कर वायर देखना।
बारिश हो तो छत से कपड़े उतार लेना।
एक दिन मैंने मजाक में कहा—
“तुम्हें सब याद कैसे रहता है?”
उसने सीधा जवाब दिया—
“जिस घर का नमक खाते हैं, उसका ध्यान रखना चाहिए।”
उसकी बात साधारण थी।
लेकिन मुझे छू गई।
एक दोपहर हम छत का पुराना सामान साफ कर रहे थे।
गर्मी बहुत थी।
लोहे की अलमारी, किताबों के बक्से, पुराने फोटो फ्रेम।
कर्ण भारी बक्सा नीचे उतार रहा था।
मैंने कहा—
“संभलकर। गिर मत जाना।”
वह हंसा।
“आप चिंता मत करो दीदी। मैं संभाल लूंगा।”
उतरते समय उसका संतुलन बिगड़ा।
उसने दीवार पकड़ ली।
बक्सा नीचे गिरते-गिरते बचा।
मैं घबरा गई।
“कर्ण!”
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
कुछ पल वह मुझे देखता रहा।
मैंने तुरंत हाथ छोड़ दिया।
“चोट तो नहीं लगी?”
“नहीं।”
फिर वह बोला—
“आप डर गई थीं?”
मैंने बनावटी गुस्से से कहा—
“बेवकूफ, सिर फूट जाता तो अस्पताल कौन लेकर जाता?”
वह मुस्कुरा दिया।
“आप।”
मैं भी हंस पड़ी।
बस इतना ही हुआ था।
लेकिन उसी शाम जब मैं कमरे में अकेली बैठी तो मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं उसकी मौजूदगी में सहज महसूस करने लगी हूं।
और उसी एहसास से मैं डर गई।
मैं शादीशुदा थी।
वह मुझसे उम्र में छोटा था।
वह हमारे घर में काम करता था।
सबसे बड़ी बात—
वह मुझ पर भरोसा करता था।
मैं उस भरोसे को कमजोर नहीं करना चाहती थी।
अगले कुछ दिन मैंने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी।
पहले रसोई में बैठकर उससे बातें करती थी।
अब कमरे में चली जाती।
पहले चाय पीते समय पूछ लेती—
“तुम्हारे गांव में सब कैसे हैं?”
अब सिर्फ इतना कहती—
“कप रख दो।”
कर्ण ने फर्क महसूस किया।
लेकिन पूछा नहीं।
यही उसकी आदत थी।
एक शाम बारिश हो रही थी।
बिजली चली गई।
घर में अंधेरा था।
मैं बालकनी में खड़ी बारिश देख रही थी।
कर्ण इनवर्टर ठीक करके आया।
उसने कहा—
“दीदी, अब पंखा चल जाएगा।”
मैंने “ठीक है” कहा।
वह जाने लगा।
फिर अचानक रुक गया।
“मैंने कुछ गलत किया है?”
मेरे भीतर जैसे कोई तार खिंच गया।
“क्यों?”
“आप कुछ दिनों से बहुत कम बोलती हैं।”
मैंने बारिश की तरफ देखते हुए कहा—
“हर बात बोलना जरूरी नहीं होता।”
वह चुप हो गया।
फिर बोला—
“अगर मुझसे गलती हो तो बता देना।”
“तुमसे कोई गलती नहीं हुई।”
“तो फिर?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
आंखों में सच था।
लेकिन पूरा सच बोलने की हिम्मत नहीं थी।
मैंने कहा—
“कभी-कभी इंसान को खुद से थोड़ी दूरी बनानी पड़ती है।”
वह समझा या नहीं, पता नहीं।
लेकिन उसने सिर झुका लिया।
“ठीक है दीदी।”
उस रात मैं देर तक नहीं सोई।
सिद्धार्थ को फोन किया।
उसने कॉल नहीं उठाया।
दस मिनट बाद संदेश आया—
“मीटिंग में हूं।”
मैंने टाइप किया—
“तुम्हारी याद आ रही है।”
काफी देर स्क्रीन देखती रही।
फिर संदेश मिटा दिया।
सिर्फ लिखा—
“फ्री हो तो फोन करना।”
उस रात फोन नहीं आया।
अगले दिन सुबह आया।
“कल बहुत बिजी था।”
मैंने कहा—
“कोई बात नहीं।”
उसने पूछा—
“सब ठीक?”
मैं हंसी।
“हां।”
“कर्ण है घर पर?”
“हां।”
“ठीक है। उसे कहना गैरेज की चाबी देख ले।”
बस।
कॉल खत्म।
मैं फोन हाथ में पकड़े बैठी रही।
अजीब बात थी।
उसे गैरेज की चाबी याद थी।
मेरी आवाज की थकान नहीं।
लेकिन असली बदलाव कुछ दिन बाद आया।
एक शाम कर्ण ने कहा—
“दीदी, मैं सोच रहा हूं गांव चला जाऊं।”
मैंने चौंककर उसकी तरफ देखा।
हम छत पर बैठे थे।
उसके हाथ में दो कप चाय थे।
हवा हल्की ठंडी थी।
दूर मंदिर की घंटी बज रही थी।
“अचानक?”
“मां की तबीयत पहले जैसी नहीं रहती। बाबूजी भी अकेले पड़ गए हैं।”
मैंने उसके चेहरे को देखा।
वह नजरें चुरा रहा था।
मैं समझ गई।
“सिर्फ यही वजह है?”
उसने कुछ नहीं कहा।
“कर्ण।”
उसकी उंगलियां कप के किनारे पर कस गईं।
फिर बहुत धीमी आवाज में बोला—
“यहां रहकर मैं खुद को समझा नहीं पा रहा।”
मेरी सांस अटक गई।
कुछ पल हम दोनों चुप रहे।
मैंने कहा—
“मेरी वजह से?”
उसने तुरंत सिर उठाया।
“आपकी गलती नहीं है।”
“फिर?”
उसने गहरी सांस ली।
“आपने मुझे कभी नौकर नहीं समझा। हमेशा इज्जत दी। बीमारी में दवाई दी। गांव पैसे भेजने थे तो एडवांस दे दिया। घर से फोन आए तो काम छोड़कर बात करने दिया।”
उसकी आवाज भर्रा गई।
“शायद इसी वजह से… मुझे इस घर से ज्यादा लगाव हो गया।”
मैंने कप नीचे रख दिया।
“घर से?”
वह चुप।
मैं समझ गई।
उस पल मेरे भीतर दो आवाजें थीं।
एक कह रही थी—
पूछो।
दूसरी कह रही थी—
मत पूछो।
मैंने दूसरी आवाज सुनी।
“कर्ण, कुछ रिश्ते जितनी दूरी से अच्छे लगते हैं, पास जाकर उतने अच्छे नहीं रहते।”
उसकी आंखें भर आईं।
लेकिन उसने सिर हिलाया।
“मुझे मालूम है।”
“तुम बुरे इंसान नहीं हो।”
“इसीलिए जा रहा हूं।”
उस एक वाक्य ने मुझे भीतर तक हिला दिया।
क्योंकि वह भाग नहीं रहा था।
वह खुद को बचा रहा था।
मुझे भी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
सिर्फ भरोसे की तरह।
“इंसान की असली ताकत यह नहीं कि उसके मन में कभी गलत खयाल न आए। असली ताकत यह है कि वह खयाल आने के बाद भी सही रास्ता चुने।”
कर्ण की आंखों से आंसू निकल आए।
उसने कहा—
“काश मैं आपसे किसी और समय मिला होता।”
मैंने तुरंत रोक दिया।
“नहीं।”
वह चुप हो गया।
“कुछ लोग हमारी जिंदगी में इसलिए नहीं आते कि हम उन्हें पा लें। कुछ लोग इसलिए आते हैं ताकि हमें पता चले कि हमारे अंदर क्या कमी है।”
उसने मेरी तरफ देखा।
मैंने कहा—
“तुम्हारी वजह से मुझे समझ आया कि मैं कितनी अकेली हूं। लेकिन मेरे अकेलेपन का इलाज कोई नया रिश्ता नहीं है। मुझे अपने रिश्ते का सच देखना होगा।”
कर्ण ने सिर झुका लिया।
उस रात हमने बहुत देर तक बातें कीं।
पहली बार बिना किसी झिझक के।
लेकिन पहली बार साफ सीमा के साथ।
तय हुआ कि वह एक सप्ताह बाद गांव चला जाएगा।
मैंने सोचा कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।
वह चला जाएगा।
मैं सिद्धार्थ से खुलकर बात करूंगी।
शायद हम अपना रिश्ता फिर संभाल लेंगे।
लेकिन अगले दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया।
सुबह समीर भैया का फोन आया।
“मीरा, मैं शाम को आ रहा हूं।”
मैंने पूछा—
“सब ठीक है?”
“हां, कुछ कागज सिद्धार्थ के साइन के लिए छोड़ने हैं।”
“वह तो बाहर हैं।”
“तुम रख लेना।”
शाम को समीर आया।
उसके साथ एक अनजान आदमी था।
मैंने पूछा—
“ये?”
“कंपनी का टेक्नीशियन है। सिद्धार्थ ने घर के इंटरनेट के बारे में कहा था।”
मुझे अजीब लगा।
सिद्धार्थ ने मुझसे कुछ नहीं कहा था।
समीर हंस दिया।
“वो तुम्हें क्या-क्या बताएगा? उसके सिर पर काम रहता है।”
उसके शब्द मजाक थे।
लेकिन कहीं न कहीं चुभ गए।
टेक्नीशियन ऊपर गया।
राउटर देखा।
कमरों में घूमता रहा।
मैंने कर्ण से कहा—
“इसके साथ रहना।”
करीब आधे घंटे बाद दोनों नीचे आए।
टेक्नीशियन चला गया।
समीर कुछ देर बैठा रहा।
जाते-जाते उसने मुझे देखा।
“सब ठीक चल रहा है?”
मैंने कहा—
“हां।”
उसकी नजर एक पल के लिए कर्ण पर गई।
“अच्छा है। घर में जवान आदमी हो तो सुरक्षा रहती है।”
मुझे उसका लहजा पसंद नहीं आया।
लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा।
दो दिन बाद रात को कर्ण मेरे कमरे के बाहर आया।
“दीदी।”
“क्या हुआ?”
उसके हाथ में बहुत छोटा-सा काला प्लास्टिक का टुकड़ा था।
“ये पंखे के पास मिला।”
मैंने देखा।
वह कोई साधारण हिस्सा नहीं लग रहा था।
कर्ण ने कहा—
“मुझे लगता है कैमरा है।”
मेरे हाथ से चीज लगभग गिर गई।
“क्या?”
हमने मोबाइल की टॉर्च जलाकर देखा।
वास्तव में वह एक छोटा कैमरा था।
मेरा गला सूख गया।
“किसने लगाया?”
कर्ण ने तुरंत कहा—
“उस दिन जो आदमी आया था…”
मुझे समीर याद आया।
मैंने कहा—
“किसी को कुछ मत बताना।”
“साहब को?”
“अभी नहीं।”
मैं खुद भी नहीं जानती थी कि ऐसा क्यों कहा।
शायद डर गई थी।
शायद मुझे पहले सच जानना था।
हमने कैमरा वहीं रहने दिया।
लेकिन कर्ण ने उसका कोण थोड़ा बदल दिया।
फिर उसी रात उसने पूरे घर की जांच की।
बैठक में एक।
सीढ़ियों के पास एक।
और सबसे खतरनाक—
मेरे बेडरूम के बाहर गलियारे में एक कैमरा।
मैं कांप गई।
“किसी को मेरे कमरे के बाहर कैमरे की क्या जरूरत?”
कर्ण बोला—
“दीदी, ये सुरक्षा के लिए नहीं लगाए गए।”
उसका चेहरा कठोर था।
पहली बार मैंने उसके अंदर डर से ज्यादा गुस्सा देखा।
मैंने उसी वक्त सिद्धार्थ को फोन लगाया।
कॉल नहीं उठा।
दूसरी बार।
तीसरी बार।
कोई जवाब नहीं।
मैंने तस्वीरें भेजीं।
सिर्फ लिखा—
“बहुत जरूरी है। फोन करो।”
करीब एक घंटे बाद उसका फोन आया।
“क्या हुआ?”
मैंने सारी बात बताई।
कुछ पल वह चुप रहा।
फिर बोला—
“कैमरे?”
“हां।”
“शायद समीर भैया ने सुरक्षा के लिए लगवाए होंगे।”
मैं विश्वास नहीं कर पाई।
“मेरे बेडरूम के बाहर?”
“मीरा, हर बात का गलत मतलब मत निकालो।”
यह सुनकर मेरे अंदर कुछ टूट गया।
मैंने कहा—
“मैं गलत मतलब निकाल रही हूं?”
“मैं अभी मीटिंग में हूं।”
“सिद्धार्थ!”
वह चिढ़ गया।
“प्लीज! हर चीज को ड्रामा मत बनाया करो।”
फोन कट गया।
मैं स्क्रीन देखती रह गई।
कर्ण थोड़ी दूरी पर खड़ा था।
शायद उसने पूरी बात नहीं सुनी थी।
लेकिन मेरे चेहरे से सब समझ गया।
उसने पूछा—
“साहब क्या बोले?”
मैंने कहा—
“कुछ नहीं।”
उस रात मैं पहली बार अपने ही कमरे में सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थी।
मैंने दरवाजा बंद किया।
पर्दे खींचे।
कई बार छत को देखा।
कई बार अलमारी।
कहीं कुछ और तो नहीं।
सुबह कर्ण ने कहा—
“दीदी, मैं आज ही गांव चला जाता हूं।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“अगर इन कैमरों का मतलब वही है जो मैं सोच रहा हूं तो कोई कुछ गलत साबित करना चाहता है।”
मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई।
“किसे?”
“आपको।”
उस एक शब्द ने सब कुछ बदल दिया।
मैंने कहा—
“क्यों?”
कर्ण ने जेब से एक कागज निकाला।
“कल रात स्टोर साफ करते समय मिला।”
वह बैंक स्टेटमेंट की कॉपी थी।
सिद्धार्थ और समीर की पारिवारिक कंपनी का एक खाता।
उसमें कई बड़ी रकम एक ऐसी फर्म में ट्रांसफर हुई थीं जिसका नाम मैंने कभी नहीं सुना था।
“आर.एन. ट्रेडिंग।”
मैंने पूछा—
“यह क्या है?”
कर्ण बोला—
“मुझे नहीं पता। लेकिन पिछले महीने समीर भैया फोन पर इसी नाम की बात कर रहे थे।”
“तुमने सुना?”
“गलती से।”
मैंने तुरंत इंटरनेट पर कंपनी का नाम खोजा।
बहुत कम जानकारी।
एक छोटा पंजीकृत कार्यालय।
मालिक का नाम—
नंदिनी समीर मल्होत्रा।
मैं स्क्रीन देखते रह गई।
समीर की पत्नी।
परिवार के पैसे उसकी कंपनी में जा रहे थे।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
तभी मुझे तीन महीने पहले की बात याद आई।
ससुर जी ने फोन पर कहा था—
“मीरा, जमीन का हिस्सा सिद्धार्थ के नाम करवाना है। कागज देख लेना।”
कुछ दिनों बाद समीर आया था।
उसने कहा था—
“तुम्हें इन सब कानूनी चीजों में पड़ने की जरूरत नहीं।”
मैंने भरोसा कर लिया था।
अब सब कुछ जोड़ने लगा था।
अगर परिवार के पैसों में गड़बड़ी थी…
अगर किसी को डर था कि मैं कागज देख सकती हूं…
अगर सिद्धार्थ पहले से मुझसे दूर था…
तो सबसे आसान तरीका क्या था?
मेरे चरित्र पर सवाल।
मैं बैठ गई।
कर्ण बोला—
“दीदी?”
मैंने पहली बार डर के बजाय गुस्सा महसूस किया।
“तुम गांव नहीं जाओगे।”
वह चौंका।
“लेकिन…”
“अभी नहीं।”
“लोग क्या कहेंगे?”
मैंने उसकी आंखों में देखा।
“अब मुझे लोगों से ज्यादा सच की चिंता है।”
हमने फैसला किया कि कैमरों को नहीं हटाएंगे।
बल्कि सबूत इकट्ठा करेंगे।
लेकिन हमने एक गलती कर दी।
हमें लगा था कि सामने वाला नहीं जानता कि हमें कैमरों का पता चल चुका है।
वह जानता था।
तीन दिन बाद सिद्धार्थ अचानक घर लौट आया।
बिना बताए।
मैंने दरवाजा खोला तो वह सामने खड़ा था।
चेहरा कठोर।
पीछे समीर।
मेरे दिल में अजीब डर उठा।
मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।
“तुमने बताया क्यों नहीं?”
सिद्धार्थ अंदर आया।
उसने बैग नीचे रखा।
“सरप्राइज देना था।”
लेकिन आवाज में प्यार नहीं था।
कर्ण रसोई से बाहर आया।
“नमस्ते साहब।”
सिद्धार्थ ने उसे देखा।
बस देखा।
जवाब नहीं दिया।
रात का खाना लगभग खामोशी में हुआ।
मैंने कई बार बात शुरू करनी चाही।
सिद्धार्थ फोन देखता रहा।
समीर मुझे देखता रहा।
खाने के बाद सिद्धार्थ ने कहा—
“मीरा, ऊपर आओ।”
मैं उसके पीछे कमरे में गई।
समीर भी आया।
मैंने पूछा—
“भैया क्यों?”
सिद्धार्थ ने दरवाजा बंद कर दिया।
फिर मोबाइल मेरी तरफ कर दिया।
“ये देखो।”
वीडियो चला।
छत।
मैं और कर्ण।
वही रात जब कर्ण गांव जाने की बात कर रहा था।
वीडियो में आवाज बहुत धीमी थी।
लेकिन तस्वीर साफ थी।
मैं उसका हाथ पकड़ रही थी।
फिर वीडियो कट।
दूसरा वीडियो।
रसोई।
मैं कर्ण को खाना दे रही हूं।
मैं मुस्कुरा रही हूं।
कट।
तीसरा।
बैठक।
हम दोनों एक कागज देख रहे हैं।
वीडियो इस तरह संपादित था जैसे हम कुछ छिपा रहे हों।
सिद्धार्थ ने पूछा—
“ये क्या है?”
मैंने कहा—
“पूरा वीडियो कहां है?”
समीर बीच में बोला—
“मीरा, कम से कम अब झूठ मत बोलो।”
मैंने उसकी तरफ देखा।
“आप चुप रहिए।”
उसका चेहरा बदल गया।
“मुझसे इस लहजे में?”
“हां। क्योंकि कैमरे आपने लगवाए थे।”
सिद्धार्थ ने कहा—
“भैया ने सुरक्षा के लिए लगवाए थे।”
मैं हंस पड़ी।
दर्द से।
“सुरक्षा?”
“मीरा!”
“मेरे बेडरूम के बाहर कैमरा लगाना सुरक्षा है?”
सिद्धार्थ चुप।
समीर बोला—
“अगर कुछ गलत नहीं था तो डर किस बात का?”
मैंने उसकी आंखों में देखा।
“मुझे डर अब नहीं लग रहा।”
तभी कर्ण दरवाजे तक आ गया।
उसने कहा—
“साहब, दीदी ने कुछ गलत नहीं किया।”
सिद्धार्थ का गुस्सा भड़क गया।
“तुम बीच में मत बोलो!”
कर्ण पीछे हट गया।
“मैं सिर्फ सच…”
“सच?”
सिद्धार्थ उसके सामने आ गया।
“मेरे घर में रहते हो। मेरी रोटी खाते हो। और मुझे सच सिखाओगे?”
कर्ण ने सिर झुका लिया।
“गलती मेरी हो सकती है साहब। लेकिन दीदी…”
मैंने तेज आवाज में कहा—
“कोई गलती नहीं हुई!”
सब मेरी तरफ देखने लगे।
मेरे हाथ कांप रहे थे।
लेकिन आवाज नहीं।
“हां, मैं अकेली थी।”
सिद्धार्थ का चेहरा सख्त हुआ।
मैंने जारी रखा—
“हां, मैं कर्ण से बातें करती थी।”
समीर की मुस्कान लौटी।
“देखा?”
मैंने उसकी तरफ उंगली उठाई।
“लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।”
फिर सिद्धार्थ से कहा—
“मैंने शायद अपनी सीमा के पास जाकर खुद को देखा। मुझे समझ आया कि मैं किस हालत में पहुंच चुकी हूं। और उसी दिन मैंने फैसला किया कि मैं अपने पति से बात करूंगी।”
सिद्धार्थ ने ताना मारा—
“बहुत महान फैसला।”
मेरी आंखें भर आईं।
“कम से कम मैंने फैसला किया। तुमने क्या किया?”
वह चुप।
मैंने पहली बार वह सब कहा जो आठ साल से भीतर था।
“मैंने तुम्हारा इंतजार किया।”
“तुम काम में व्यस्त थे।”
“मैंने समझा।”
“तुम कॉल नहीं करते थे।”
“मैंने समझा।”
“तुम घर आते थे लेकिन मेरे पास बैठने का समय नहीं था।”
“मैंने समझा।”
“मैं बीमार हुई, तुमने मैसेज किया—दवा ले लेना।”
मेरी आवाज टूट गई।
“मैंने तब भी समझा।”
सिद्धार्थ की आंखें झुकने लगीं।
“लेकिन क्या कभी तुमने यह समझने की कोशिश की कि मैं किसके सहारे जी रही हूं?”
कमरे में सन्नाटा।
कर्ण नीचे देख रहा था।
मैंने कहा—
“जिस दिन मुझे लगा कि मैं गलत दिशा में जा सकती हूं, हम दोनों पीछे हट गए।”
मैंने कर्ण की तरफ देखा।
“और इस लड़के ने जाने का फैसला किया।”
समीर बोला—
“कहानी अच्छी बना ली।”
मैं पलटी।
“तो पूरा वीडियो चला दीजिए।”
उसका चेहरा एक पल को जम गया।
सिद्धार्थ ने पूछा—
“क्या मतलब?”
मैंने मोबाइल उठा लिया।
वीडियो पीछे किया।
“ये फुटेज किसने भेजा?”
सिद्धार्थ बोला—
“भैया ने।”
“तो इनके पास पूरा फुटेज होगा।”
मैंने समीर की तरफ देखा।
“चलाइए।”
वह हंसा।
“जो जरूरी था वही भेजा।”
“क्यों?”
“क्योंकि वही सच था।”
मैंने कहा—
“नहीं। वह आपका चुना हुआ हिस्सा था।”
तभी कर्ण ने जेब से एक छोटा मेमोरी कार्ड निकाला।
समीर का चेहरा बदल गया।
“ये क्या है?”
कर्ण बोला—
“उस कैमरे की दूसरी रिकॉर्डिंग।”
हम सब चौंक गए।
मुझे भी नहीं मालूम था।
कर्ण ने कहा—
“जिस दिन मुझे कैमरा मिला, मैंने कार्ड बदलने की कोशिश नहीं की। लेकिन कैमरे में क्लाउड के अलावा लोकल रिकॉर्डिंग भी थी।”
सिद्धार्थ ने कार्ड ले लिया।
हमने लैपटॉप में लगाया।
वीडियो खुला।
तारीख वही।
छत पर मैं और कर्ण।
अब आवाज साफ थी।
मेरी आवाज—
“कुछ रिश्ते जितनी दूरी से अच्छे रहते हैं, पास जाकर उतने अच्छे नहीं रहते।”
कर्ण—
“मुझे मालूम है।”
फिर मैं—
“मेरे अकेलेपन का इलाज कोई नया रिश्ता नहीं है।”
फिर कर्ण—
“इसीलिए मैं गांव जा रहा हूं।”
सिद्धार्थ की उंगलियां कीबोर्ड पर स्थिर हो गईं।
वीडियो आगे चला।
मैं उसका हाथ पकड़ती हूं।
और कहती हूं—
“तुम बुरे इंसान नहीं हो। सही रास्ता चुनना ही इंसान की ताकत है।”
समीर का चेहरा उतर चुका था।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
कर्ण बोला—
“आगे की तारीख चलाइए।”
सिद्धार्थ ने अगली फाइल खोली।
वीडियो खाली बैठक का था।
रात के करीब ग्यारह बजे।
कुछ मिनट कुछ नहीं हुआ।
फिर दरवाजा खुला।
समीर अंदर आया।
उसके साथ वही टेक्नीशियन।
मेरी सांस रुक गई।
वीडियो में समीर की आवाज सुनाई दी—
“कैमरा ऐसा होना चाहिए कि दोनों साथ दिखें।”
टेक्नीशियन ने पूछा—
“अगर कुछ हुआ ही नहीं तो?”
समीर हंसा।
“कुछ होने की जरूरत नहीं। दस सेकंड सही जगह से काटो, कहानी खुद बन जाती है।”
कमरे में किसी की सांस तक सुनाई नहीं दे रही थी।
वीडियो में टेक्नीशियन बोला—
“और अगर भाभी ने कैमरा देख लिया?”
समीर—
“तब कहेंगे सुरक्षा के लिए था।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
सिद्धार्थ धीरे से समीर की तरफ मुड़ा।
“भैया?”
समीर बोला—
“सिद्धार्थ, मेरी बात सुन…”
वीडियो अभी चल रहा था।
समीर की आवाज फिर सुनाई दी—
“एक बार सिद्धार्थ का घर टूट गया तो वह खुद कंपनी छोड़ देगा। जमीन के कागज भी हमारे रास्ते से हट जाएंगे।”
सिद्धार्थ का चेहरा सफेद पड़ गया।
“कौन-सी जमीन?”
समीर ने लैपटॉप बंद करने की कोशिश की।
कर्ण ने उसका हाथ रोक लिया।
“पूरा देखिए साहब।”
सिद्धार्थ ने वीडियो जारी रखा।
टेक्नीशियन पूछ रहा था—
“आर.एन. ट्रेडिंग वाली रकम?”
समीर बोला—
“दो महीने और निकालनी है। फिर खाते बंद कर देंगे।”
मेरे हाथ सुन्न पड़ गए।
सिद्धार्थ धीरे से कुर्सी पर बैठ गया।
उसने समीर को देखा।
“तुमने कंपनी के पैसे निकाले?”
समीर गुस्से में बोला—
“मैंने परिवार के लिए किया!”
“किस परिवार के लिए?”
“हमारा ही तो पैसा है!”
सिद्धार्थ चिल्लाया—
“तो चोरी क्यों की?”
समीर का चेहरा लाल हो गया।
“चोरी? पिताजी ने हमेशा तुम्हें ज्यादा दिया! घर तुम्हारे नाम! शहर वाली जमीन तुम्हारे नाम! कंपनी में बराबर हिस्सा! और ऊपर से ये…”
उसने मेरी तरफ देखा।
“ये औरत हर कागज में नाक घुसाने लगी थी।”
मैं दंग रह गई।
“मैंने?”
“पिताजी तुम्हें भरोसे में लेने लगे थे।”
तभी मुझे समझ आया।
ससुर जी के फोन।
जमीन के कागज।
मेरी फाइलें देखने की बात।
सब कुछ।
समीर चाहता था कि मैं बदनाम हो जाऊं।
सिद्धार्थ मुझ पर शक करे।
हमारा तलाक हो।
और परिवार में संपत्ति का समीकरण बदल जाए।
मैंने पूछा—
“तो आपने मेरी जिंदगी खत्म करने के लिए झूठा वीडियो बनाया?”
समीर बोला—
“तुम्हें इतना महत्व मत दो।”
मैंने पहली बार उसे थप्पड़ नहीं मारा।
चिल्लाई नहीं।
बस सीधी खड़ी रही।
और कहा—
“यही आपकी सबसे बड़ी गलती थी।”
“क्या?”
“आपने मुझे महत्व नहीं दिया।”
अगली सुबह घर में पुलिस नहीं आई।
मैंने कोई तमाशा नहीं किया।
मैंने पहले वकील बुलाया।
मेरा नाम अदिति मेहरा था।
वह मेरी कॉलेज की पुरानी दोस्त थी।
सालों से बात नहीं हुई थी।
लेकिन जरूरत के वक्त मैंने उसे फोन किया।
उसने पूरी रिकॉर्डिंग देखी।
बैंक स्टेटमेंट देखे।
कैमरे की तस्वीरें देखीं।
फिर उसने कहा—
“मीरा, अभी एक भी फाइल किसी को मत देना। पहले सबकी कॉपी बनेगी।”
सिद्धार्थ सामने बैठा था।
रात भर वह सोया नहीं था।
उसने मुझसे कई बार बात करनी चाही।
मैंने सिर्फ कहा—
“पहले सच सुरक्षित होगा। रिश्ते की बात बाद में।”
पहली बार शायद उसे समझ आया कि मैं अब वही मीरा नहीं हूं जो हर बात पर कहती थी—
“कोई बात नहीं।”
अदिति ने बैंक रिकॉर्ड निकलवाए।
पता चला पिछले चौदह महीनों में परिवार की कंपनी से बड़ी रकम अलग-अलग फर्जी बिलों के जरिए आर.एन. ट्रेडिंग में भेजी गई थी।
कुछ दस्तावेजों पर सिद्धार्थ के डिजिटल हस्ताक्षर थे।
लेकिन उन दिनों सिद्धार्थ उन शहरों में था ही नहीं जहां से दस्तावेज अपलोड किए गए।
अदिति ने पूछा—
“तुम्हारा ऑफिस लॉगिन किसके पास होता था?”
सिद्धार्थ ने कहा—
“समीर भैया के पास।”
कमरे में फिर खामोशी।
समीर को उसी शाम परिवार के सामने बुलाया गया।
ससुर जी गांव से आए।
चेहरा थका हुआ था।
उन्होंने पूरा वीडियो देखा।
एक बार भी बीच में नहीं बोले।
वीडियो खत्म हुआ।
उन्होंने समीर से सिर्फ पूछा—
“क्यों?”
समीर ने जमीन की तरफ देखा।
“मुझे हमेशा लगा आप सिद्धार्थ को ज्यादा चाहते हैं।”
ससुर जी की आंखें भर आईं।
“इसलिए उसके घर में आग लगा देता?”
समीर बोला—
“मैंने आग नहीं लगाई।”
मैं पहली बार बीच में बोली—
“झूठा शक घर में आग से कम नहीं होता भैया।”
वह मेरी तरफ देख नहीं पाया।
ससुर जी ने कंपनी के कागज सामने रख दिए।
“आज से किसी खाते तक तुम्हारी पहुंच नहीं होगी।”
नंदिनी रोने लगी।
वह कहती रही—
“मुझे कुछ नहीं पता था।”
जांच में बाद में सामने आया कि कंपनी उसके नाम जरूर थी लेकिन दस्तावेज समीर संभालता था।
मामला कानूनी प्रक्रिया में चला गया।
लेकिन मेरे लिए सबसे कठिन मामला कानून का नहीं था।
वह सिद्धार्थ था।
दो दिन बाद कर्ण अपना बैग लेकर मेरे सामने खड़ा था।
“दीदी, अब मुझे जाना चाहिए।”
मैंने पूछा—
“इसलिए कि सब ठीक हो गया?”
वह मुस्कुराया।
“नहीं।”
“फिर?”
“क्योंकि अब इस घर को मेरी जरूरत नौकर की तरह है, सहारे की तरह नहीं।”
मेरी आंखें भर आईं।
वह कितना साधारण लड़का था।
लेकिन कई पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा समझदार।
मैंने कहा—
“तुम्हें लगता है मैं तुम्हें रोकूंगी?”
“पता नहीं।”
मैंने धीमे से कहा—
“नहीं रोकूंगी।”
उसने सिर झुका लिया।
“धन्यवाद।”
“लेकिन एक शर्त है।”
वह मेरी तरफ देखने लगा।
“गांव जाकर पढ़ाई पूरी करोगे।”
वह हंस पड़ा।
“इस उम्र में?”
“चौबीस साल कोई उम्र होती है?”
मैंने उसे एक लिफाफा दिया।
उसने खोला।
उसमें पैसे थे।
वह तुरंत पीछे हट गया।
“नहीं दीदी।”
“ये दान नहीं है।”
“फिर?”
“चार साल की ईमानदारी का हिसाब है।”
“मेरी तनख्वाह मिलती रही।”
“और यह उस इंसान के लिए है जिसने मेरे घर से ज्यादा मेरी इज्जत की रक्षा की।”
उसकी आंखें भर आईं।
उसने लिफाफा वापस करने की कोशिश की।
मैंने कहा—
“अगर मुझे सच में दीदी मानते हो तो रख लो।”
उसने धीरे से लिफाफा ले लिया।
दरवाजे तक पहुंचा।
फिर मुड़ा।
“दीदी।”
“हां?”
“एक बात पूछूं?”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“पूछो।”
“आप खुश रहोगी?”
मैं जवाब नहीं दे पाई।
क्योंकि यही सवाल मैं खुद से पूछने वाली थी।
कर्ण चला गया।
उसके जाने के बाद घर फिर शांत हो गया।
लेकिन इस बार खामोशी पहले जैसी नहीं थी।
पहले मैं उससे डरती थी।
अब मैं उसे सुनती थी।
शाम को सिद्धार्थ मेरे सामने आया।
उसके हाथ में दो कप चाय थे।
वही जगह।
वही बालकनी।
जहां कभी कर्ण मुझे चाय देता था।
सिद्धार्थ ने एक कप मेरी तरफ बढ़ाया।
मैंने नहीं लिया।
वह पास की मेज पर रखकर बैठ गया।
काफी देर हम दोनों चुप रहे।
फिर उसने कहा—
“मुझे माफ कर दो।”
मैंने बाहर देखा।
“किस बात के लिए?”
उसने शायद उम्मीद नहीं की थी कि मैं यह पूछूंगी।
“तुम पर शक करने के लिए।”
मैंने कहा—
“बस?”
वह चुप।
मैंने उसकी तरफ देखा।
“मुझे आठ साल अकेला छोड़ने के लिए?”
उसकी आंखें झुक गईं।
“हर बार काम को मुझसे जरूरी समझने के लिए?”
वह चुप।
“मेरी आवाज सुनकर भी यह न समझने के लिए कि मैं टूट रही हूं?”
उसके होंठ कांपे।
“मीरा…”
“और सबसे ज्यादा?”
वह मेरी तरफ देखने लगा।
“मुझे इतना कमजोर समझने के लिए कि किसी के दस सेकंड के वीडियो से तुम्हारा विश्वास टूट जाए।”
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
मैंने पहली बार सिद्धार्थ को इस तरह देखा।
वह सफल था।
पैसे कमाता था।
बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर था।
लेकिन रिश्ते में शायद वह मुझसे भी ज्यादा अनाड़ी निकला।
उसने कहा—
“मैंने वीडियो देखा और मेरा दिमाग बंद हो गया।”
मैंने शांत आवाज में कहा—
“दिमाग बंद हुआ था या विश्वास पहले से कमजोर था?”
उसने जवाब नहीं दिया।
यही जवाब था।
मैं उठकर जाने लगी।
उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा।
सिर्फ बोला—
“क्या हम दोबारा कोशिश कर सकते हैं?”
मैं रुक गई।
पीछे नहीं मुड़ी।
“अभी नहीं जानती।”
उसकी सांस भारी हो गई।
“मैं इंतजार करूंगा।”
मैंने कहा—
“इंतजार करना ही काफी नहीं होता सिद्धार्थ। मौजूद रहना पड़ता है।”
अगले कई सप्ताह हमारे घर में सब कुछ बदला-बदला रहा।
सिद्धार्थ ने बाहर के लंबे प्रोजेक्ट छोड़ दिए।
मैंने उससे ऐसा करने को नहीं कहा था।
उसने खुद किया।
अब वह शाम को घर आता।
फोन दूर रखता।
कई बार हम साथ खाना खाते लेकिन बात नहीं होती।
कभी अचानक पूछता—
“आज दिन कैसा था?”
मुझे पहली बार अजीब लगता।
मैं कहती—
“ठीक।”
फिर वह पूछता—
“सिर्फ ठीक?”
धीरे-धीरे बात बढ़ती।
लेकिन मैं जल्दी पिघलना नहीं चाहती थी।
क्योंकि रिश्तों को बचाने का मतलब यह नहीं कि दर्द भूल जाओ।
दर्द को समझना पड़ता है।
कभी-कभी उसके सामने बैठकर मुझे कर्ण याद आता।
उसके लिए प्रेम जैसा जो भी भाव मेरे अंदर कुछ समय के लिए उठा था, अब वह वैसा नहीं था।
अब उसमें सम्मान था।
कृतज्ञता थी।
और सबसे जरूरी—
एक सीख।
हम कई बार उस इंसान के प्रति आकर्षित नहीं होते जो हमारे लिए सही है।
हम उस एहसास की तरफ आकर्षित होते हैं जिसकी हमें कमी होती है।
मुझे ध्यान चाहिए था।
सुनने वाला कोई चाहिए था।
मुझे महसूस होना चाहिए था कि मैं दिखाई देती हूं।
कर्ण ने अनजाने में वह कमी भर दी।
लेकिन अगर हम अपनी कमी को प्रेम समझ बैठें तो गलत रास्ते बहुत आसानी से सही लगने लगते हैं।
करीब दो महीने बाद मुझे कर्ण का फोन आया।
“दीदी।”
उसकी आवाज सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“गांव पहुंचकर भूल गए थे?”
वह हंसा।
“काम बहुत था।”
“मां कैसी हैं?”
“अब ठीक हैं।”
“और पढ़ाई?”
कुछ सेकंड चुप।
फिर बोला—
“फॉर्म भर दिया है।”
मैंने खुशी से कहा—
“सच?”
“आपने कहा था।”
“मैंने बहुत बातें कही हैं।”
“कुछ बातें नहीं भूलता।”
हमने पांच मिनट बात की।
बस पांच।
कॉल खत्म होते समय उसने कहा—
“साहब कैसे हैं?”
मैंने सिद्धार्थ की तरफ देखा।
वह सामने बैठा अखबार पढ़ रहा था।
मैंने कहा—
“सीख रहे हैं।”
सिद्धार्थ ने अखबार नीचे किया।
“क्या?”
मैं मुस्कुरा दी।
“कुछ नहीं।”
लेकिन उस कहानी का आखिरी सच अभी बाकी था।
तीन महीने बाद अदिति का फोन आया।
उसने कहा—
“मीरा, ऑफिस आ सकती हो?”
मैंने पूछा—
“मामले में कुछ हुआ?”
उसकी आवाज गंभीर थी।
“समीर वाले मामले से जुड़ा है। लेकिन बात उससे बड़ी है।”
मैं सिद्धार्थ के साथ उसके ऑफिस पहुंची।
अदिति ने एक फाइल सामने रखी।
“हमने आर.एन. ट्रेडिंग के पुराने लेनदेन की जांच की।”
सिद्धार्थ ने पूछा—
“फिर?”
“कंपनी सिर्फ पैसे निकालने के लिए नहीं बनाई गई थी।”
उसने एक संपत्ति दस्तावेज निकाला।
मैंने पढ़ा।
शहर के बाहरी इलाके की लगभग छह एकड़ जमीन।
खरीदार—
आर.एन. ट्रेडिंग।
विक्रेता के कॉलम में परिवार का पुराना ट्रस्ट।
सिद्धार्थ चौंका।
“ये जमीन तो पिताजी ने बेची ही नहीं।”
अदिति बोली—
“कागजों में बिक चुकी है।”
मैंने पूछा—
“दस्तखत?”
उसने मेरी तरफ फाइल घुमाई।
मेरे हाथ जम गए।
दस्तावेज पर हस्ताक्षर मेरे नाम से थे।
“मीरा सिद्धार्थ मल्होत्रा।”
मैं कुर्सी से लगभग उठ गई।
“मैंने कभी ये साइन नहीं किए।”
अदिति बोली—
“मुझे पता है।”
सिद्धार्थ ने पूछा—
“तो किसने?”
अदिति ने दूसरा कागज निकाला।
फॉरेंसिक रिपोर्ट।
“हस्ताक्षर स्कैन किए गए थे।”
मेरी सांस तेज हो गई।
“मेरे साइन इन्हें मिले कहां से?”
अदिति ने कहा—
“यही सबसे दिलचस्प हिस्सा है।”
उसने एक फोटो सामने रखी।
मेरे पुराने बैंक फॉर्म की।
वही फॉर्म जो लगभग डेढ़ साल पहले समीर मेरे पास लाया था।
उसने कहा था—
“नई कंपनी पॉलिसी है। यहां साइन कर दो।”
मैंने बिना पढ़े साइन कर दिए थे।
मेरे हाथ कांपने लगे।
सिद्धार्थ ने मेरा हाथ पकड़ना चाहा।
मैंने इस बार हटाया नहीं।
अदिति ने कहा—
“लेकिन एक और समस्या है।”
“क्या?”
“इस जमीन का सौदा अकेले समीर ने नहीं किया।”
कमरे की हवा जैसे भारी हो गई।
सिद्धार्थ ने पूछा—
“क्या मतलब?”
अदिति ने फाइल से पुराना ईमेल प्रिंटआउट निकाला।
प्रेषक का नाम देखकर सिद्धार्थ जम गया।
मैंने उसकी तरफ देखा।
“कौन?”
उसने जवाब नहीं दिया।
मैंने कागज उसकी उंगलियों से लिया।
नाम पढ़ते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
क्योंकि ईमेल समीर का नहीं था।
नंदिनी का नहीं।
टेक्नीशियन का नहीं।
वह ईमेल भेजा गया था—
सिद्धार्थ के निजी कार्यालय खाते से।
तारीख एक साल पुरानी थी।
विषय लिखा था—
“मीरा के हस्ताक्षर मिल गए हैं। अगला चरण शुरू करो।”
मैं धीरे-धीरे सिद्धार्थ की तरफ मुड़ी।
उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने पहली बार वह ईमेल देखा हो।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“मैंने ये नहीं भेजा।”
अदिति ने कहा—
“हो सकता है।”
“हो सकता है?”
“उस खाते का लॉगिन रिकॉर्ड अभी आना बाकी है।”
मेरी हथेलियां ठंडी पड़ गईं।
मैंने पूछा—
“कितने लोगों के पास उसका पासवर्ड था?”
सिद्धार्थ चुप रहा।
मैंने दोबारा पूछा—
“कितने?”
उसने बहुत धीरे कहा—
“तीन।”
“कौन?”
“मैं।”
वह रुका।
“समीर भैया।”
फिर उसने तीसरा नाम लिया।
और वही नाम सुनकर मेरी सांस रुक गई।
क्योंकि वह इंसान हमारे परिवार का कोई दूर का सदस्य नहीं था।
वह वह व्यक्ति था जो पिछले आठ साल से हर पारिवारिक फैसला चुपचाप प्रभावित करता आया था।
वह इंसान जिसके सामने समीर भी आवाज धीमी कर लेता था।
वह इंसान जिसने मेरी शादी के दिन मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था—
“आज से तुम मेरी बेटी हो।”
सिद्धार्थ ने कांपती आवाज में कहा—
“तीसरा पासवर्ड… पिताजी के पास था।”
मैंने मेज पर रखे दस्तावेजों को देखा।
एक तरफ समीर की साजिश बेनकाब हो चुकी थी।
दूसरी तरफ मेरे नाम पर जाली हस्ताक्षर थे।
और अब उसी धोखे की डोर उस व्यक्ति तक पहुंच रही थी जिस पर हमने सबसे ज्यादा भरोसा किया था।
तभी अदिति का फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी।
“फॉरेंसिक टीम है।”
उसने कॉल उठाया।
हम दोनों उसकी आंखों में बदलते भाव देखते रहे।
कुछ सेकंड बाद उसने फोन नीचे रखा।
मैंने पूछा—
“क्या हुआ?”
अदिति ने मेरी तरफ देखा।
“ईमेल किस डिवाइस से भेजा गया था, पता चल गया।”
सिद्धार्थ खड़ा हो गया।
“किसके?”
अदिति ने जवाब देने से पहले एक फाइल मेरी तरफ बढ़ाई।
“मीरा, इसके बाद जो सामने आएगा, उससे तुम्हारे परिवार की पूरी कहानी बदल सकती है।”
मैंने कांपते हाथों से फाइल खोली।
पहला पन्ना पढ़ते ही मेरा दिल जैसे रुक गया।
क्योंकि उस रात मुझे पहली बार समझ आया—
जिस साजिश को हम समीर की लालच समझ रहे थे…
उसकी शुरुआत उससे भी कई साल पहले हो चुकी थी।
और शायद मेरे विवाह से भी पहले।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।