जिस लड़की को करोड़पति सूर्यांश ने सड़क पर ठुकराया, उसी राधिका से मजबूरी में शादी हुई—फिर एक छिपे सौदे ने बदल दी दोनों की ज़िंदगी

जिस लड़की को करोड़पति सूर्यांश ने सड़क पर ठुकराया, उसी राधिका से मजबूरी में शादी हुई—फिर एक छिपे सौदे ने बदल दी दोनों की ज़िंदगी
“रुक जाइए… वो औरत मर जाएगी!”
राधिका की चीख ने सड़क पर मौजूद हर इंसान का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया।
सामने एक बुज़ुर्ग औरत घबराई हुई सड़क पार कर रही थी और दूसरी तरफ से काले शीशों वाली महंगी गाड़ियों का काफिला तेज़ी से उसकी ओर बढ़ रहा था।
राधिका ने एक पल भी नहीं सोचा।
वह दौड़ी।
उसने बूढ़ी औरत का हाथ पकड़कर पूरी ताकत से उसे किनारे की तरफ खींच दिया।
औरत तो बच गई…
लेकिन अगले ही पल—
“चर्रर्र…!”
ब्रेक की भयानक आवाज़ गूंजी।
राधिका का शरीर दूसरी गाड़ी से टकराया और वह सड़क पर जा गिरी।
उसके माथे से खून बहने लगा।
आसपास लोग जमा होने लगे।
मगर जिस आलीशान कार से उसकी टक्कर हुई थी, उसके अंदर बैठा इंसान अपनी सीट से हिला तक नहीं।
वह था सूर्यांश वर्धन।
शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक।
एक ऐसा नाम जिसके सामने बड़े-बड़े अधिकारी तक सोच-समझकर बोलते थे।
उसकी घड़ी में हर मिनट की कीमत लाखों में थी और उसके लिए सड़क पर घायल पड़ी एक अनजान लड़की से ज्यादा जरूरी उसकी मीटिंग थी।
उसने कलाई की घड़ी देखी।
चेहरे पर गुस्सा आया।
“नॉनसेंस!”
उसने ठंडे स्वर में कहा।
“इन लोगों को फुटपाथ पर चलना भी नहीं आता? मेरे दस मिनट बर्बाद हो गए।”
उसकी असिस्टेंट बेला ने घबराकर पीछे देखा।
“सर, लड़की के सिर से बहुत खून निकल रहा है।”
सूर्यांश ने एक बार शीशे के पार राधिका को देखा।
फिर नज़र फेर ली।
“आरव और तुम इसे अस्पताल ले जाओ। इलाज करवाओ। कुछ पैसे दे देना और मामला खत्म करो।”
बस।
इतना कहकर उसने ड्राइवर को आगे बढ़ने का इशारा कर दिया।
गाड़ी चली गई।
पीछे सड़क पर बेहोश पड़ी राधिका को शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस इंसान ने उसकी जिंदगी को पैसों में तौलकर पीछे छोड़ दिया था…
कुछ महीनों बाद वही इंसान उसके बिना एक कदम चलने की कल्पना भी नहीं कर पाएगा।
और जिस मंगेतर को वह अपना सबसे बड़ा सहारा समझती थी…
वही उसकी जिंदगी का सबसे महंगा सौदा करने वाला था।
अस्पताल में करीब आधे घंटे बाद राधिका को होश आया।
उसने आंखें खोलीं तो सामने आरव और बेला खड़े थे।
बेला ने राहत की सांस ली।
“शुक्र है आपको होश आ गया। आपका फोन टूट गया है, इसलिए घरवालों को खबर नहीं कर पाए।”
फिर उसने एक मोटा लिफाफा राधिका की ओर बढ़ाया।
“ये आपके इलाज और नुकसान के पैसे हैं।”
राधिका की नज़र लिफाफे पर टिक गई।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
“पैसे?”
वह धीरे से उठकर बैठ गई।
“आप लोगों को लगता है हर चीज़ की कीमत होती है?”
बेला कुछ समझती, उससे पहले राधिका ने लिफाफा उसके हाथ से लिया और दूर फेंक दिया।
नोट जमीन पर बिखर गए।
“जब दिल किया किसी गरीब को कुचल दिया और फिर कुछ नोट फेंककर उसकी जुबान बंद कर दी?”
आरव ने समझाने की कोशिश की।
“देखिए, गलतफहमी हो रही है। हम पीछे वाली गाड़ी में थे। आपकी टक्कर हमारे बॉस की कार से हुई थी।”
राधिका की आंखों में गुस्सा और बढ़ गया।
“तो बुलाइए अपने बॉस को!”
आरव के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
शायद जिंदगी में पहली बार उसे कोई ऐसा इंसान मिला था जो सूर्यांश वर्धन का नाम सुनकर डरा नहीं था।
उसने जेब से कार्ड निकालकर राधिका की तरफ बढ़ा दिया।
“ये उनका ऑफिस है।”
बेला ने आरव को घूरा।
लेकिन अब देर हो चुकी थी।
राधिका ने कार्ड लिया।
उस पर लिखा था—
सूर्यांश वर्धन।
राधिका ने नाम पढ़ते हुए दांत भींचे।
“कल मिलती हूं तुम्हारे बॉस से।”
अगले दिन ठीक दोपहर में सूर्यांश के ऑफिस का दरवाजा खुला।
सूर्यांश फोन पर किसी कर्मचारी को डांट रहा था।
“जितना कहा है उतना करो। मुझे मत सिखाओ कि सही क्या है।”
उसने फोन काटा।
और सामने देखा।
दरवाजे पर वही लड़की खड़ी थी।
साधारण कपड़े।
माथे पर पट्टी।
आंखों में आग।
हाथ में वही पैसों का लिफाफा।
राधिका उसके सामने पहुंची और लिफाफा मेज पर पटक दिया।
“अपने पैसे रखिए।”
सूर्यांश की भौंहें सिकुड़ीं।
“तुम कौन हो?”
राधिका हंस पड़ी।
“वाह! कल आपकी गाड़ी से एक लड़की टकराई और आज आपको याद भी नहीं?”
सूर्यांश की आंखें ठंडी पड़ गईं।
उसे सब समझ आ गया।
“तो?”
राधिका कुछ क्षण उसे देखती रही।
“इन पैसों से अपने लिए थोड़ी इंसानियत खरीद लीजिए।”
“शट अप!”
सूर्यांश की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजी।
लेकिन राधिका नहीं डरी।
“गरीब इंसान की जिंदगी भी उतनी ही कीमती होती है जितनी आपकी। फर्क सिर्फ इतना है कि हमारे पास बड़ी गाड़ियां नहीं हैं।”
सूर्यांश अपनी जगह से उठ गया।
“अपनी जुबान को लगाम दो।”
राधिका एक कदम आगे आई।
“वरना?”
दोनों की आंखें टकराईं।
कमरे में ऐसा तनाव था जैसे किसी ने हवा रोक दी हो।
उसी वक्त दरवाजा खुला।
आरव के साथ एक युवक अंदर आया।
उसे देखकर राधिका चौंक गई।
“विवान?”
विवान का चेहरा सफेद पड़ गया।
“राधिका? तुम यहां?”
राधिका के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।
विवान उसका मंगेतर था।
उसका पुराना दोस्त।
और सूर्यांश की कंपनी में काम करता था।
सूर्यांश ने विवान की तरफ देखा।
“तुम इसे जानते हो?”
विवान ने हिचकते हुए कहा—
“सर… राधिका मेरी मंगेतर है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर सूर्यांश ने ठंडे स्वर में कहा—
“इसे बाहर ले जाओ।”
राधिका जाते-जाते मुड़ी।
“आपके पास दौलत बहुत है मिस्टर वर्धन… लेकिन दिल शायद भगवान देना भूल गए।”
सूर्यांश की मुट्ठियां भींच गईं।
दरवाजा बंद होते ही उसने आरव की तरफ देखा।
“विवान को नौकरी से निकाल दो।”
आरव समझ गया।
तूफान शुरू हो चुका था।
घर पहुंचते ही विवान राधिका पर भड़क उठा।
“तुम्हें क्या जरूरत थी मेरे बॉस से लड़ने की?”
राधिका भी परेशान थी।
“मुझे नहीं पता था वह तुम्हारा बॉस है।”
“अब मेरी नौकरी चली गई तो?”
राधिका चुप हो गई।
विवान की बहन नैना उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। नैना की शादी होने वाली थी और पूरा परिवार विवान की कमाई पर निर्भर था।
आखिरकार राधिका को अपने स्वाभिमान और अपनों की जरूरत के बीच चुनाव करना पड़ा।
दो दिन बाद वह फिर सूर्यांश के ऑफिस पहुंची।
लेकिन दरवाजा खुलते ही उसके कदम रुक गए।
सूर्यांश के साथ एक खूबसूरत औरत खड़ी थी।
नताशा।
सूर्यांश की पत्नी।
राधिका तुरंत नज़रें झुकाकर वापस मुड़ने लगी।
तभी सूर्यांश की आवाज़ आई—
“रुको।”
राधिका रुक गई।
“कुछ कहने आई थीं आप?”
उसके स्वर में व्यंग्य था।
राधिका की उंगलियां कांप रही थीं।
अपने जीवन में शायद पहली बार उसे उस इंसान के सामने झुकना पड़ रहा था जिससे उसे सबसे ज्यादा नफरत थी।
“आई एम सॉरी।”
सूर्यांश ने कान के पास हाथ रखा।
“क्या कहा? सुनाई नहीं दिया।”
राधिका की आंखें नम हो गईं।
वह समझ गई थी कि सूर्यांश जानबूझकर उसे अपमानित कर रहा है।
उसने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“मुझे माफ कर दीजिए और विवान की नौकरी वापस दे दीजिए।”
सूर्यांश के चेहरे पर जीत की हल्की मुस्कान आई।
“बस इतनी सी अकड़ थी?”
यही वह पल था जब राधिका का सब्र टूट गया।
“माफी मैंने अपनी गलती के लिए नहीं, विवान के भविष्य के लिए मांगी है।”
सूर्यांश की मुस्कान गायब हो गई।
राधिका ने आगे कहा—
“और एक बात याद रखिएगा। दौलत हमेशा नहीं रहती। आज आपके आगे सौ लोग खड़े हैं क्योंकि आपके पास पैसा और ताकत है। जिस दिन ये नहीं रहे… शायद आपकी तरफ देखने वाला भी कोई न हो।”
“तुम्हारी वैल्यू क्या है?”
सूर्यांश ने तिरस्कार से पूछा।
राधिका की आंखों से आंसू निकल आए, लेकिन आवाज़ नहीं कांपी।
“मेरी वैल्यू इतनी है कि तुम जैसा इंसान मुझे खरीद नहीं सकता।”
यह कहकर वह चली गई।
लेकिन सूर्यांश वहीं खड़ा रह गया।
पहली बार किसी ने उसके चेहरे पर नहीं…
उसके पुराने घावों पर हाथ रखा था।
राधिका नहीं जानती थी कि सूर्यांश हमेशा से ऐसा नहीं था।
बचपन में उसने अपने माता-पिता को पैसों के लिए लड़ते देखा था।
उसके पिता अहम वर्धन ने परिवार की इच्छा के विरुद्ध प्रेम विवाह किया था।
परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया।
गरीबी आई।
रिश्ते टूटे।
और सूर्यांश की मां अवंतिका उस जिंदगी से परेशान होती चली गईं।
एक दिन घर में इतना बड़ा विवाद हुआ कि उसके पिता वह सदमा सह नहीं सके।
दस साल के सूर्यांश की दुनिया उसी दिन बदल गई।
उसने रिश्तों से भरोसा उठा लिया।
उसके लिए प्यार कमजोरी था।
रिश्ते सौदा थे।
और पैसा वह ताकत थी जिसके बिना इंसान की कोई कीमत नहीं।
इसीलिए राधिका के शब्द उसके भीतर इतने गहरे उतर गए थे।
उधर राधिका की जिंदगी में भी तूफान आने वाला था।
उसके पिता दयाशंकर लंबे समय से दिल की बीमारी से जूझ रहे थे।
एक रात उनकी हालत अचानक बिगड़ गई।
अस्पताल में डॉक्टर ने साफ कह दिया—
“बायपास जल्द करवाना होगा।”
“कितना खर्च आएगा?”
राधिका ने कांपती आवाज़ में पूछा।
“करीब बीस से पच्चीस लाख।”
राधिका के हाथ से रिपोर्ट लगभग छूट गई।
इतने पैसे?
वह एक छोटी फैक्ट्री में सुपरवाइजर थी।
पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उसे बड़ी नौकरी नहीं मिली थी।
उसकी पूरी जिंदगी की कमाई जोड़ दी जाती तब भी पिता के ऑपरेशन के लिए पर्याप्त रकम नहीं बनती।
उस रात अस्पताल की बेंच पर बैठी राधिका पहली बार खुद को बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी।
तभी विवान आया।
उसने अस्पताल का तत्काल बिल भर दिया।
राधिका ने आंसुओं के बीच उसे देखा।
“मैं तुम्हारे पैसे लौटा दूंगी।”
विवान मुस्कराया।
“हमारे बीच हिसाब कब से होने लगा?”
राधिका को लगा था कि वह कितनी भाग्यशाली है।
उसे क्या पता था…
जिस हाथ को वह अपना सहारा समझ रही थी, वही कुछ दिनों बाद उसे दो करोड़ रुपये में किसी और की जिंदगी से बांधने वाला था।
दूसरी तरफ सूर्यांश की हालत लगातार खराब हो रही थी।
राधिका की बातें उसके दिमाग में घूमती रहतीं।
एक शाम उसके दादा का फोन आया।
पुराने जख्म फिर खुल गए।
वह गुस्से में घर से निकला।
गाड़ी की रफ्तार तेज होती गई।
तभी अचानक सड़क पर एक छोटा बच्चा आ गया।
सूर्यांश ने ब्रेक दबाया।
और उसी पल उसे राधिका की आवाज़ याद आई—
“गरीब की जान भी उतनी ही कीमती होती है जितनी अमीर की।”
उसने बच्चे को बचाने के लिए गाड़ी मोड़ दी।
लेकिन सामने से आ रहे भारी वाहन से उसकी कार जा टकराई।
जब सूर्यांश ने आंखें खोलीं…
उसकी जिंदगी बदल चुकी थी।
डॉक्टरों ने उसकी जान बचा ली थी।
लेकिन हादसे ने उसके पैरों को बुरी तरह प्रभावित किया था।
उसे लंबे इलाज और फिजियोथेरेपी की जरूरत थी।
जिस इंसान के एक इशारे पर सैकड़ों लोग दौड़ते थे…
आज वही व्हीलचेयर पर बैठा था।
और तभी जिंदगी ने उसे उसका सबसे कड़वा सच दिखाया।
नताशा अपना सामान पैक कर रही थी।
अवंतिका ने हैरानी से पूछा—
“तुम कहां जा रही हो?”
“मैं यहां नहीं रह सकती।”
“वह तुम्हारा पति है।”
नताशा ने ठंडी हंसी हंसी।
“पति? उसने मुझे कभी पत्नी माना ही नहीं। अब मैं सारी जिंदगी उसकी देखभाल करती रहूं?”
उसने बैग उठाया।
“आप कोई केयरटेकर रख लीजिए।”
दरवाजा बंद हो गया।
सूर्यांश कमरे के अंदर था।
लेकिन शायद हर शब्द उसने सुन लिया था।
जिस आदमी को लगता था कि पैसा हर रिश्ता खरीद सकता है…
उसे उसी की पत्नी उसकी सबसे कमजोर अवस्था में छोड़कर चली गई।
और उसी दिन अवंतिका ने एक फैसला किया।
उन्हें उस लड़की की तलाश करनी थी जिसने सूर्यांश को पहली बार भीतर तक हिलाया था।
राधिका।
आरव और बेला से उन्हें पूरी कहानी पता चली।
अवंतिका समझ गईं कि सूर्यांश को दवा के साथ किसी ऐसे इंसान की जरूरत थी जो उससे डरे नहीं।
जो उसके सामने सच बोल सके।
लेकिन राधिका स्वेच्छा से कभी उस घर में नहीं आती।
तब अवंतिका ने दूसरा रास्ता चुना।
उन्होंने विवान को बुलाया।
टेबल पर प्रस्ताव रखा गया।
“तुम्हें कितने पैसे चाहिए?”
विवान चौंका।
“मैम?”
“तुम्हारी बहन की शादी है। घर गिरवी पड़ा है। तुम्हें पैसे चाहिए और मुझे राधिका।”
विवान का चेहरा बदल गया।
“वह मेरी मंगेतर है।”
अवंतिका ने शांत स्वर में कहा—
“एक साल।”
“सिर्फ एक साल की कॉन्ट्रैक्ट मैरिज। उसे सूर्यांश की पत्नी और केयरटेकर बनकर रहना होगा।”
विवान खड़ा हो गया।
“नहीं।”
अवंतिका ने रकम बढ़ा दी।
“दो करोड़।”
विवान के कदम रुक गए।
दो करोड़।
एक तरफ प्यार।
दूसरी तरफ उसका भविष्य।
बहन की शादी।
गिरवी पड़ा घर।
और वह जिंदगी जिसका सपना वह वर्षों से देख रहा था।
कुछ देर बाद उसकी खामोशी ही उसका जवाब बन चुकी थी।
लेकिन राधिका के सामने उसने पूरी सच्चाई नहीं रखी।
उसने सिर्फ इतना कहा—
“तुम्हें पच्चीस लाख मिलेंगे।”
राधिका का चेहरा सख्त हो गया।
“किसलिए?”
“एक साल के लिए सूर्यांश से कॉन्ट्रैक्ट मैरिज।”
“क्या?”
राधिका पीछे हट गई।
“तुम पागल हो गए हो?”
“सुनो तो…”
“मैं तुम्हारी मंगेतर हूं विवान!”
उसकी आंखों में आंसू भर आए।
“कोई आदमी अपनी मंगेतर को दूसरे आदमी से शादी करने के लिए कैसे कह सकता है?”
विवान ने आखिरी हथियार इस्तेमाल किया।
“अपने पापा के बारे में सोचो।”
राधिका चुप हो गई।
“अगर पैसे न होने की वजह से उनका ऑपरेशन नहीं हुआ तो क्या तुम खुद को माफ कर पाओगी?”
वह वाक्य राधिका के सीने में तीर की तरह लगा।
उस रात उसने अपने पिता को सोते हुए देखा।
उनकी कमजोर सांसें सुनीं।
मां की चिंतित आंखें देखीं।
और आखिरकार उसने अपनी जिंदगी का सबसे कठिन फैसला कर लिया।
“मैं तैयार हूं।”
कुछ दिनों बाद बहुत सीमित लोगों की मौजूदगी में शादी हुई।
जब सूर्यांश को पता चला कि उसकी होने वाली पत्नी राधिका है तो पहले उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान आई।
वह सोच रहा था—
अब बदला पूरा होगा।
लेकिन शादी के बाद पहली रात ही राधिका ने साफ कर दिया—
“मुझे आपके महल में रहने का कोई शौक नहीं है।”
सूर्यांश ने उसकी तरफ देखा।
“तो चली जाओ।”
“कॉन्ट्रैक्ट है।”
“कितने पैसे मिले?”
राधिका की आंखें झुक गईं।
सूर्यांश हंस पड़ा।
“कहां गई तुम्हारी खुद्दारी?”
ये शब्द राधिका के दिल पर लगे।
लेकिन वह कुछ नहीं बोली।
सूर्यांश ने चेकबुक निकाली।
“मां ने जितना दिया है उससे ज्यादा मैं देता हूं। पैसे लौटाओ और चली जाओ।”
राधिका ने चेक नहीं लिया।
“मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटती।”
“क्यों?”
“क्योंकि किसी ने मुझ पर भरोसा किया है।”
सूर्यांश उसे देखता रह गया।
अगले कुछ सप्ताह दोनों के लिए किसी युद्ध से कम नहीं थे।
कभी सूर्यांश जानबूझकर उसे परेशान करता।
कभी राधिका उसके आदेश अनसुने कर देती।
एक रात उसने टीवी की आवाज़ इतनी तेज़ कर दी कि सोफे पर सो रही राधिका परेशान होकर कान ढकने लगी।
सूर्यांश के होंठों पर मुस्कान आ गई।
कुछ देर बाद उसने टीवी बंद किया।
राधिका सो चुकी थी।
ठंड बढ़ रही थी।
सूर्यांश ने नौकरानी को बुलाया।
“अलमारी से कंबल निकालो।”
नौकरानी हैरान रह गई।
“सर?”
“उसके ऊपर डाल दो।”
सूर्यांश ने तुरंत नज़र फेर ली।
वह खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि जिस लड़की को वह घर से निकालना चाहता था…
उसी को ठंड लगने की चिंता उसे क्यों होने लगी थी।
दिन गुजरते गए।
राधिका उसके डॉक्टर से बात करती।
दवाइयों का समय याद रखती।
फिजियोथेरेपी के दौरान उसके पास रहती।
लेकिन कभी उस पर दया नहीं दिखाती।
अगर सूर्यांश कहता—
“मैं नहीं कर सकता।”
तो राधिका जवाब देती—
“आप कर सकते हैं।”
“मैं थक गया हूं।”
“पांच कदम और।”
“मुझे तुम्हारी मदद नहीं चाहिए।”
“ठीक है। गिरिए। फिर खुद उठिए।”
सूर्यांश उसे घूरता।
और राधिका मुस्कराकर कहती—
“देखिए, घूरने से पैर ठीक नहीं होंगे।”
धीरे-धीरे वह पत्थर जैसा आदमी बदलने लगा।
एक दिन सूर्यांश बिस्तर से उठने की कोशिश में लड़खड़ा गया।
राधिका तुरंत दौड़ी और उसे थाम लिया।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे के बेहद करीब थे।
सूर्यांश की आंखों में पहली बार गुस्से की जगह सवाल था।
“तुम मेरी इतनी फिक्र क्यों करती हो?”
राधिका ने सरलता से कहा—
“क्योंकि मुझे यहां आपका ख्याल रखने के लिए लाया गया है।”
सूर्यांश का चेहरा फिर सख्त हो गया।
“मतलब तुम्हें खरीदा गया है।”
राधिका का चेहरा उतर गया।
उसने उसे छोड़ दिया।
“हर बार पैसे की बात जरूरी है?”
“मेरी दुनिया में हर चीज़ की कीमत होती है।”
राधिका ने उसकी आंखों में देखा।
“इसीलिए आपकी दुनिया इतनी खाली है।”
और वह चली गई।
सूर्यांश उस रात नहीं सो पाया।
कुछ समय बाद उसने फिर राधिका को जाने के लिए कहा।
“तुम आजाद हो।”
“नहीं जा सकती।”
“क्यों?”
“कॉन्ट्रैक्ट पूरा नहीं हुआ।”
सूर्यांश कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला—
“मुझे अस्थायी सहारे पसंद नहीं हैं।”
राधिका समझ नहीं पाई।
सूर्यांश ने नज़र फेर ली।
“आदतें कभी-कभी मोहब्बत से ज्यादा खतरनाक होती हैं।”
कमरे में खामोशी छा गई।
“तुम रोज मेरे सामने रहोगी। मेरी हर जरूरत से पहले समझ जाओगी। मुझे फिर से जीना सिखाओगी… और एक साल बाद चली जाओगी।”
उसकी आवाज़ पहली बार टूटी थी।
“तुम्हें शायद फर्क न पड़े। लेकिन अगर मुझे तुम्हारी आदत हो गई तो?”
राधिका का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह बिना जवाब दिए बाहर चली गई।
चार महीने बीत गए।
अब सूर्यांश पहले जैसा नहीं था।
उसकी फिजियोथेरेपी का असर दिखने लगा था।
वह सहारे से खड़ा होने लगा।
राधिका भी बदल रही थी।
वह समझ चुकी थी कि सूर्यांश जन्म से पत्थर दिल नहीं था।
हालात ने उसके चारों ओर दीवारें बना दी थीं।
लेकिन तभी राधिका के हाथ नैना की शादी की तस्वीरें लगीं।
शानदार सजावट।
महंगा घर।
महंगे कपड़े।
और विवान के आसपास घूमती एक दूसरी लड़की।
राधिका के मन में सवाल उठा—
इतने पैसे अचानक कहां से आए?
अगले दिन सच्चाई उसके सामने थी।
अवंतिका ने अनजाने में वह राज खोल दिया जिसे विवान ने महीनों छिपाए रखा था।
“दो करोड़।”
राधिका ने सोचा शायद उसने गलत सुना।
“क्या कहा आपने?”
“मैंने विवान को दो करोड़ दिए थे।”
राधिका के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“किसलिए?”
अवंतिका कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“तुम्हें इस शादी के लिए तैयार करने के लिए।”
राधिका के कानों में आवाज़ गूंजने लगी।
दो करोड़।
विवान ने उसे पच्चीस लाख की कहानी सुनाई थी।
लेकिन असल में…
उसने अपनी मंगेतर के बदले दो करोड़ लिए थे।
जिस आदमी को वह अपना भविष्य समझती थी…
उसने उसी भविष्य की कीमत लगा दी थी।
राधिका सीधे विवान के घर पहुंची।
वहां नैना की शादी का समारोह चल रहा था।
संगीत बज रहा था।
मेहमान हंस रहे थे।
विवान ने राधिका को देखते ही रंग बदल लिया।
“तुम अचानक?”
राधिका उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।
“दो करोड़।”
विवान की सांस अटक गई।
“राधिका, मेरी बात—”
राधिका ने उसका हाथ रोक दिया।
उसकी आंखों में आंसू थे लेकिन आवाज़ बिल्कुल शांत।
“मैं तुम्हारे लिए इंसान नहीं थी?”
“ऐसा नहीं है।”
“फिर मेरी कीमत क्यों लगाई?”
विवान चुप।
राधिका ने कहा—
“पच्चीस लाख मेरे पिता के इलाज के लिए थे। बाकी एक करोड़ पचहत्तर लाख किसके लिए थे?”
विवान के पास जवाब नहीं था।
राधिका को उसी खामोशी में सब समझ आ गया।
घर।
बहन की शादी।
उसकी नई जिंदगी।
सब कुछ उसी सौदे के पैसे से बना था।
राधिका ने आंखें बंद कीं।
एक बूंद आंसू गाल पर उतर आया।
“आज से हमारा रिश्ता खत्म।”
वह मुड़ी और चली गई।
पीछे खड़ा विवान पहली बार समझ पाया कि उसने दो करोड़ में अपना भविष्य नहीं खरीदा था…
उसने उस लड़की को खो दिया था जो शायद पूरी जिंदगी उसके साथ खड़ी रहती।
राधिका ने अपने माता-पिता को सारी सच्चाई बता दी।
दयाशंकर की आंखें भर आईं।
उन्होंने बेटी का हाथ पकड़ लिया।
“बेटी, मजबूरी में लिया गया फैसला पाप नहीं होता। लेकिन अब फैसला तुम्हारा होना चाहिए।”
राधिका देर तक सोचती रही।
क्या वह वर्धन हाउस वापस जाए?
फिर उसे सूर्यांश याद आया।
वह इंसान जिसने शुरुआत में उसे अपमानित किया था…
लेकिन जिसने बाद में उसे जाने के लिए खुद पैसे देने की पेशकश भी की थी।
उसने पहली बार महसूस किया—
सौदा सूर्यांश ने नहीं किया था।
सौदा उसके अपने मंगेतर ने किया था।
वह वापस वर्धन हाउस लौट आई।
लेकिन उस शाम उसकी जिंदगी का एक और चमत्कार इंतजार कर रहा था।
वह बालकनी में खड़ी थी कि पीछे से आवाज़ आई—
“राधिका।”
वह पलटी।
और उसकी सांस रुक गई।
सूर्यांश व्हीलचेयर पर नहीं था।
वह अपने पैरों पर खड़ा था।
उसके हाथ हल्के कांप रहे थे।
कदम अस्थिर थे।
लेकिन वह खड़ा था।
राधिका की आंखों से खुशी के आंसू निकल आए।
“सूर्यांश…”
वह आगे बढ़ना चाहती थी।
फिर रुक गई।
आज वह चाहती थी कि सूर्यांश खुद उसके पास आए।
सूर्यांश ने पहला कदम उठाया।
फिर दूसरा।
तीसरे कदम पर वह लड़खड़ाया।
राधिका तुरंत दौड़ी।
उसने उसे थाम लिया।
कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर राधिका की सारी शिकायतें जैसे टूट गईं।
“आप चल रहे हैं…”
उसकी आवाज़ खुशी से कांप रही थी।
“आप सच में चल रहे हैं!”
सूर्यांश ने पहली बार बिना किसी दीवार के उसे देखा।
“तुम्हारी वजह से।”
“मेरी वजह से नहीं। आपकी मेहनत की वजह से।”
सूर्यांश हल्का मुस्कराया।
“हर बात में मुझसे बहस जरूरी है?”
राधिका भी मुस्करा दी।
लेकिन अगले ही पल सूर्यांश का चेहरा गंभीर हो गया।
“अब मैं ठीक हो रहा हूं।”
“हां।”
“तो तुम चली जाओगी?”
राधिका की मुस्कान धीमी पड़ गई।
यही तो तय हुआ था।
एक साल का कॉन्ट्रैक्ट।
सूर्यांश ठीक होगा।
और वह चली जाएगी।
राधिका ने नज़रें झुका लीं।
“आपकी जिंदगी अब सामान्य हो जाएगी।”
“मेरी जिंदगी कब सामान्य थी?”
सूर्यांश ने पूछा।
राधिका चुप रही।
फिर उसने हिम्मत करके कहा—
“नताशा वापस आ सकती हैं।”
सूर्यांश ने तुरंत जवाब दिया—
“नहीं।”
राधिका ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“हमारा तलाक हो चुका है।”
राधिका हैरान रह गई।
“कब?”
“जब मुझे समझ आया कि रिश्ते नाम से नहीं निभते।”
सूर्यांश धीरे-धीरे उसके पास आया।
अब दोनों के बीच कुछ कदमों का ही फासला था।
“मैं जिंदगी भर सोचता रहा कि हर इंसान मतलबी है। मां से नाराज रहा। दादा से नाराज रहा। नताशा ने मेरे शक को सच कर दिया।”
वह रुका।
“फिर तुम आई।”
राधिका की पलकें कांपीं।
“पहले दिन तुमने मेरे पैसे फेंक दिए।”
सूर्यांश के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“दूसरे दिन मेरे ऑफिस में आकर मुझे इंसानियत खरीदने की सलाह दे दी।”
राधिका शर्मिंदा होकर दूसरी तरफ देखने लगी।
“और फिर तुमने वही किया जिससे मुझे सबसे ज्यादा डर लगता था।”
“क्या?”
“मुझे अपनी मौजूदगी की आदत लगा दी।”
राधिका का दिल तेजी से धड़कने लगा।
सूर्यांश ने धीमे स्वर में कहा—
“मैंने जिंदगी में बहुत चीजें खरीदी हैं राधिका। कंपनियां, जमीनें, घर… लेकिन पहली बार समझ आया है कि कुछ चीजें खरीदी नहीं जातीं।”
राधिका की आंखें नम हो गईं।
“जैसे?”
“भरोसा।”
वह एक कदम और आगे आया।
“और साथ।”
कमरे में लंबी खामोशी छा गई।
सूर्यांश ने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया।
“तुम्हारा कॉन्ट्रैक्ट खत्म।”
राधिका ने उसे देखा।
उसकी आंखों में वही पुराना डर लौट आया।
“मतलब?”
“मतलब अब तुम्हारे ऊपर कोई मजबूरी नहीं।”
सूर्यांश ने कहा।
“तुम चाहो तो आज इसी वक्त जा सकती हो।”
राधिका के सीने में कुछ टूटने लगा।
लेकिन सूर्यांश की बात अभी पूरी नहीं हुई थी।
“और अगर अपनी मर्जी से रुकना चाहो…”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“…तो फिर एक साल के लिए नहीं।”
राधिका की सांस थम गई।
सूर्यांश ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा—
“जिंदगी भर के लिए मेरी हमसफर बनोगी?”
राधिका की आंखों से आंसू निकल पड़े।
उसने पूछा—
“फिर कभी छोड़ेंगे तो नहीं?”
सूर्यांश के चेहरे की सारी कठोरता जैसे पिघल गई।
“जिस इंसान ने मुझे दोबारा चलना सिखाया है, उसे छोड़कर मैं कहां जाऊंगा?”
राधिका ने कांपते हाथ से उसकी हथेली थाम ली।
लेकिन ठीक उसी समय—
दरवाजे के बाहर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।
दोनों ने पलटकर देखा।
दरवाजे पर अवंतिका खड़ी थीं।
उनके हाथ से एक पुरानी फाइल नीचे गिर चुकी थी।
चेहरा सफेद था।
आंखों में डर।
सूर्यांश ने पहली बार गौर किया कि उस फाइल पर उसके पिता अहम वर्धन का नाम लिखा था।
“ये क्या है?”
उसने पूछा।
अवंतिका ने तुरंत फाइल उठाने की कोशिश की।
लेकिन राधिका की नज़र जमीन पर गिरे एक पुराने दस्तावेज़ पर पड़ चुकी थी।
उसने उसे उठाया।
और सिर्फ पहली दो पंक्तियां पढ़ते ही उसका चेहरा बदल गया।
“सूर्यांश…”
उसकी आवाज़ कांप गई।
“तुम्हारे पिता की मौत के बारे में जो तुम्हें बताया गया था… शायद पूरी सच्चाई वो नहीं है।”
सूर्यांश जैसे पत्थर का हो गया।
“क्या मतलब?”
अवंतिका की आंखों से आंसू बह निकले।
बीस साल से दबा हुआ राज आखिरकार सामने आने वाला था।
वही राज जिसने दस साल के एक मासूम बच्चे को पत्थर दिल सूर्यांश वर्धन बना दिया था।
वही राज जिसकी वजह से उसने अपनी मां से नफरत की।
अपने दादा को कभी माफ नहीं किया।
और पूरी दुनिया को स्वार्थी समझता रहा।
राधिका के हाथ में मौजूद कागज़ पर एक नाम लिखा था…
लेकिन वह नाम अवंतिका का नहीं था।
सूर्यांश ने कांपते हाथों से वह दस्तावेज़ लेने की कोशिश की।
तभी अवंतिका ने कहा—
“बेटा… तुम्हारे पिता की मौत सिर्फ हमारे झगड़े की वजह से नहीं हुई थी।”
सूर्यांश के कदम वहीं जम गए।
“तो किसकी वजह से हुई थी?”
अवंतिका ने आंखें बंद कर लीं।
और अगले ही पल उन्होंने जिस इंसान का नाम लिया…
उसे सुनकर राधिका के हाथ से पूरी फाइल नीचे गिर गई।
क्योंकि वह नाम सिर्फ सूर्यांश के अतीत से नहीं जुड़ा था…
उसका संबंध राधिका के परिवार से भी था।
और शायद इसी वजह से राधिका और सूर्यांश की पहली मुलाकात उतनी संयोग भरी नहीं थी जितनी दोनों आज तक समझते आए थे…
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।