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# **पाँच लाख के कर्ज़ के बदले हुई मजबूरी की शादी… लेकिन दुल्हन की असली पहचान सामने आते ही माफिया किंग के पैरों तले ज़मीन खिसक गई**

पाँच लाख के कर्ज़ के बदले हुई मजबूरी की शादी… लेकिन दुल्हन की असली पहचान सामने आते ही माफिया किंग के पैरों तले ज़मीन खिसक गई

“पाँच लाख रुपये, खान साहब… मुझे आज और इसी वक्त चाहिए।”

आरव सिद्दीकी की भारी आवाज़ उस छोटे से ड्रॉइंग रूम में गूंजी तो दीवारों तक में जैसे कंपन दौड़ गया।

अगले ही पल उसने अपनी मुट्ठी इतनी जोर से कांच की मेज पर मारी कि मेज के किनारे में दरार पड़ गई।

सामने खड़े अली खान का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

कुछ सप्ताह पहले उनके छोटे से रेस्टोरेंट में आग लग गई थी। वर्षों की कमाई कुछ घंटों में राख हो चुकी थी। घर चलाने तक के पैसे नहीं बचे थे, ऊपर से आरव का पाँच लाख का कर्ज़ उनके सिर पर था।

“आरव बेटा… थोड़ा वक्त दे दो।”

अली खान के कांपते हाथ जुड़ गए।

“मैं तुम्हारा एक-एक रुपया लौटा दूंगा। बस कुछ महीने…”

आरव की आंखें ठंडी हो गईं।

“मैं यहां तुम्हारी मजबूरी सुनने नहीं आया।”

उसके पीछे खड़े चार आदमियों की मौजूदगी ही यह बताने के लिए काफी थी कि आरव कोई साधारण कर्ज़ देने वाला आदमी नहीं था।

शहर में उसका नाम लोग धीमी आवाज़ में लेते थे।

किसी के लिए वह बहुत बड़ा कारोबारी था।

किसी के लिए अपराध की दुनिया का ऐसा नाम, जिसके सामने बड़े-बड़े लोग रास्ता बदल लेते थे।

लेकिन आरव को इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं।

उसके लिए केवल दो चीजें मायने रखती थीं—उसका फैसला और उसका हिसाब।

और आज वह हिसाब लेने आया था।

“मेरे पास अभी कुछ नहीं है।”

अली खान की आंखों से आंसू निकल पड़े।

“रेस्टोरेंट दोबारा शुरू होते ही…”

“बस!”

आरव की आवाज़ गूंजी।

तभी अंदर वाले कमरे का पर्दा तेजी से हटा।

सफेद सलवार-कमीज़ पहने एक लड़की बाहर आई।

उसकी आंखों में डर कम और गुस्सा ज्यादा था।

वह सीधे आरव के सामने आकर खड़ी हो गई।

“मेरे अब्बू से तमीज़ से बात करो।”

पूरा कमरा शांत हो गया।

आरव की भौंह तन गई।

शायद वर्षों बाद किसी ने उसके सामने इतनी ऊंची आवाज़ में बात करने की हिम्मत की थी।

“कौन हो तुम?”

“उनकी बेटी।”

लड़की ने बिना नजरें झुकाए कहा।

“हिना।”

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर धीमे से बोला—

“तो अपने अब्बू को समझाओ कि कर्ज़ लिया है तो चुकाना भी पड़ेगा।”

“चुका देंगे।”

हिना ने तुरंत जवाब दिया।

“लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम हमारे घर में आकर उन्हें बेइज्जत करोगे।”

अली खान घबराकर आगे आए।

“हिना, चुप हो जाओ।”

“नहीं, अब्बू।”

उसकी मुट्ठियां भींच गईं।

“हर बार हम ही क्यों डरें?”

आरव की आंखों में एक अजीब चमक उभरी।

“तुम्हें पता भी है तुम किससे बात कर रही हो?”

हिना एक कदम आगे बढ़ी।

“एक ऐसे आदमी से जिसे लगता है कि पैसे और ताकत के दम पर वह किसी की भी इज्जत खरीद सकता है।”

आरव का जबड़ा कस गया।

उसके आदमी भी सतर्क हो गए।

लेकिन हिना नहीं रुकी।

“पैसे चाहिए ना?”

उसने मेज पर पड़े कागज़ उठाए।

“मिल जाएंगे। लेकिन मेरे अब्बू को दोबारा हाथ लगाने की कोशिश मत करना।”

आरव ने उसके हाथ से कागज़ छीन लिए।

“वरना?”

हिना ने उसकी आंखों में आंखें डाल दीं।

“वरना मैं भूल जाऊंगी कि तुम कौन हो।”

आरव के होंठों पर हल्की, मगर खतरनाक मुस्कान आई।

“दिखाओ।”

और उसी क्षण हिना का हाथ उठा।

चटाक!

थप्पड़ की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजी।

अली खान की सांस अटक गई।

आरव के आदमी स्तब्ध रह गए।

आरव का चेहरा एक तरफ घूम चुका था।

कुछ सेकंड तक उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

फिर बहुत धीरे से उसने अपना चेहरा वापस हिना की तरफ किया।

उसके गाल पर उंगलियों के निशान उभर चुके थे।

“हिना!”

अली खान लगभग चीख पड़े।

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

आरव ने धीरे से अपने गाल को छुआ।

फिर हिना को देखा।

“आज तक…”

उसकी आवाज़ बेहद शांत थी।

“मेरी मां के अलावा किसी ने मुझे थप्पड़ नहीं मारा।”

हिना का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, मगर उसने डर दिखने नहीं दिया।

“तो शायद बाकी लोगों में हिम्मत नहीं थी।”

आरव की मुस्कान गायब हो गई।

उसने अचानक हिना की कलाई पकड़ ली।

हिना ने तुरंत हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

“छोड़ो मुझे!”

अली खान आगे बढ़े।

“मेरी बेटी को छोड़ दो!”

आरव ने हिना को छोड़ने के बजाय उसकी तरफ देखते हुए कहा—

“अब मुझे तुम्हारे अब्बू से एक रुपया भी नहीं चाहिए।”

हिना रुक गई।

अली खान ने भी हैरानी से उसकी ओर देखा।

आरव की आवाज़ और धीमी हो गई।

“कर्ज़ माफ।”

हिना को एक पल के लिए लगा शायद बात खत्म हो गई।

लेकिन आरव का अगला वाक्य सुनकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“बदले में तुम मुझसे शादी करोगी।”

“क्या?”

हिना के होंठ कांपे।

“पागल हो गए हो?”

“बिल्कुल नहीं।”

“मैं तुमसे शादी क्यों करूंगी?”

“क्योंकि आज से तुम्हारे बाप का कर्ज़ मेरा मुद्दा नहीं है।”

आरव उसकी आंखों में देखते हुए बोला—

“अब मेरा मुद्दा तुम्हारा घमंड है।”

अली खान उसके पैरों के पास बैठ गए।

“ऐसा मत करो बेटा।”

उनकी आवाज़ टूट गई।

“मेरी बेटी की जिंदगी खराब मत करो। गलती हो गई उससे।”

हिना की आंखों में आंसू भर आए।

अपने पिता को उस आदमी के सामने झुकते देखकर उसके अंदर कुछ टूट गया।

“अब्बू, उठिए।”

उसने आरव से अपनी कलाई छुड़ाई और पिता को उठाने लगी।

“आप इसके सामने हाथ नहीं जोड़ेंगे।”

फिर उसने आरव की ओर देखा।

“और तुम सुन लो। मैं मरते दम तक तुमसे शादी नहीं करूंगी।”

कमरे का माहौल बदल गया।

आरव कुछ क्षण बिल्कुल शांत रहा।

फिर उसने अपने आदमियों को बाहर जाने का इशारा किया।

सबके जाने के बाद वह हिना के सामने आया।

“सोच लो।”

“सोच लिया।”

“अपने अब्बू के बारे में भी?”

हिना की आंखों में चिंता चमकी।

आरव ने मेज पर पड़े कानूनी कागज़ों की तरफ इशारा किया।

“कर्ज़ के कागज़ मेरे पास हैं। उनका रेस्टोरेंट गिरवी है। यह घर भी अगले चरण में जा सकता है।”

अली खान की आंखें बंद हो गईं।

आरव ने कहा—

“मैं चाहूं तो कल सुबह तक तुम्हारा परिवार सड़क पर होगा।”

हिना का चेहरा उतर गया।

अब पहली बार उसे समझ आया कि सामने वाला आदमी केवल धमकी नहीं दे रहा था।

उसके पास सचमुच इतनी ताकत थी।

“तुम बहुत घटिया इंसान हो।”

उसने आंसू रोकते हुए कहा।

आरव का चेहरा कठोर रहा।

“हो सकता है।”

“और अगर मैंने हां कह दी तो?”

“तुम्हारे अब्बू का कर्ज़ खत्म।”

“रेस्टोरेंट?”

“वापस उनका।”

“घर?”

“कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

हिना ने अपने पिता की तरफ देखा।

वह टूट चुके थे।

कुछ देर पहले तक जिस लड़की की आंखों में आग थी, उसी की पलकों से अब चुपचाप आंसू गिरने लगे।

उसने महसूस किया जैसे जिंदगी ने उसे ऐसी जगह खड़ा कर दिया था जहां कोई रास्ता अच्छा नहीं था।

एक तरफ उसकी आज़ादी।

दूसरी तरफ उसके पिता का सब कुछ।

उसने कांपते होंठ खोले।

“अगर मैंने तुमसे शादी कर ली…”

आरव शांत रहा।

“तो मेरे अब्बू को कभी परेशान नहीं करोगे?”

“नहीं।”

“वादा?”

आरव ने पहली बार बिना व्यंग्य के जवाब दिया।

“आरव सिद्दीकी अपनी बात नहीं बदलता।”

हिना ने आंखें बंद कर लीं।

उसकी हथेलियां कांप रही थीं।

“ठीक है।”

अली खान चौंक गए।

“हिना!”

उसने पिता की तरफ देखकर मुस्कुराने की कोशिश की।

“आपने पूरी जिंदगी मेरे लिए सब कुछ किया है, अब्बू।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“अब मेरी बारी है।”

“नहीं बेटी…”

“मैं तैयार हूं।”

आरव की आंखों में जीत की चमक दिखाई दी।

मगर वह नहीं जानता था कि हिना के झुके हुए चेहरे के पीछे उस वक्त कौन-सा फैसला जन्म ले चुका था।

उसने शादी स्वीकार जरूर की थी।

हार नहीं।

उस रात बेहद सादगी से निकाह हुआ।

घर में कोई सजावट नहीं थी।

कोई खुशी नहीं थी।

कोई शहनाई नहीं थी।

बस कुछ गवाह, एक मौलवी, कुछ कागज़ और एक बेटी की आंखों में छिपे हजारों सवाल थे।

निकाह के बाद जब हिना अपने पिता के गले लगी तो अली खान फूट-फूटकर रो पड़े।

“मुझे माफ कर देना।”

हिना ने उन्हें कसकर पकड़ लिया।

“आपने कुछ नहीं किया।”

“मेरे कर्ज़ ने तुम्हारी जिंदगी…”

“मेरी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है।”

हिना ने धीरे से कहा।

और यह वाक्य आरव ने भी सुन लिया।

वह दरवाजे पर खड़ा उसे देख रहा था।

हिना ने अपने आंसू पोंछे।

फिर पलटकर आरव के सामने आ गई।

“चलें?”

आरव एक पल के लिए हैरान हुआ।

उसे उम्मीद थी कि वह रोएगी, विरोध करेगी, शायद उससे गुहार लगाएगी।

लेकिन हिना की आंखों में अचानक एक अजीब शांति थी।

वह शांति तूफान से पहले वाली थी।

आरव की काली गाड़ी हवेली के सामने जाकर रुकी।

ऊंची दीवारें।

लोहे के बड़े दरवाजे।

हर कोने पर कैमरे।

चारों तरफ सुरक्षा।

हिना ने खिड़की से बाहर देखा।

“घर कम, जेल ज्यादा लगता है।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें यहां किसी चीज़ की कमी नहीं होगी।”

“आजादी की भी नहीं?”

आरव चुप रहा।

हिना हल्का-सा हंसी।

“जवाब मिल गया।”

अंदर पहुंचते ही आरव उसे ऊपर बने अपने कमरे तक ले गया।

दरवाजा बंद हुआ।

दोनों आमने-सामने खड़े थे।

हिना का दिल तेज धड़क रहा था।

लेकिन इस बार उसने साफ कहा—

“एक बात अभी समझ लो।”

आरव ने भौंह उठाई।

“निकाह मेरी मजबूरी था। मेरी रज़ामंदी नहीं।”

उसने अपनी उंगली से दोनों के बीच दूरी दिखाते हुए कहा—

“यह फासला बना रहेगा।”

आरव कुछ पल उसे घूरता रहा।

“तुम भूल रही हो कि अब तुम मेरी पत्नी हो।”

“और तुम भूल रहे हो कि पत्नी कोई खरीदी हुई चीज़ नहीं होती।”

आरव का चेहरा कठोर हो गया।

वह एक कदम आगे आया।

हिना पीछे नहीं हटी।

“मैं तुमसे नहीं डरती।”

“तुम्हारे हाथ कांप रहे हैं।”

“डर और हार अलग-अलग चीजें हैं।”

उस जवाब ने आरव को रोक दिया।

वह उसके बेहद करीब था।

मगर तभी उसने हिना की आंखों में आंसू देखे।

आरव का चेहरा बदल गया।

वह तुरंत पीछे हट गया।

कुछ पल कमरे में केवल घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही।

फिर वह जाकर सोफे पर बैठ गया।

“सो जाओ।”

हिना ने हैरानी से उसकी ओर देखा।

“क्या?”

“मैंने कहा सो जाओ।”

“और तुम?”

“तुम्हारी चिंता नहीं।”

उस रात हिना बिस्तर के एक कोने में बैठी रही।

आरव सोफे पर था।

दोनों में से किसी ने एक-दूसरे से बात नहीं की।

लेकिन नींद किसी को नहीं आई।

सुबह जब हिना की आंख खुली तो आरव कमरे में नहीं था।

उसने तुरंत दरवाजा खोला।

बाहर एक नौकरानी खड़ी थी।

“बेगम साहिबा, आपको कुछ चाहिए?”

“मुझे बाहर जाना है।”

औरत घबरा गई।

“साहब की इजाज़त…”

हिना की आंखें ठंडी हो गईं।

“मैं कैदी हूं?”

औरत ने सिर झुका लिया।

उसी समय पीछे से आवाज़ आई—

“नहीं।”

हिना पलटी।

आरव गलियारे में खड़ा था।

“लेकिन जब तक मुझे तुम पर भरोसा नहीं होता, अकेले बाहर नहीं जाओगी।”

हिना हंस पड़ी।

“भरोसा?”

वह उसके करीब आई।

“जिस आदमी ने मजबूरी का फायदा उठाकर शादी की, वह मुझे भरोसा सिखाएगा?”

आरव कुछ नहीं बोला।

हिना उसके पास से गुजर गई।

दिन बीतने लगे।

लेकिन हवेली में एक अजीब बदलाव आने लगा।

हिना नौकरों से वैसे बात करती जैसे वे परिवार हों।

रसोई में काम करने वाली बुजुर्ग शबाना बी को दवा दिलाती।

गार्ड के बीमार बच्चे के लिए डॉक्टर बुलवाती।

और जब आरव किसी कर्मचारी पर गुस्सा करता तो बीच में खड़ी हो जाती।

“गलती की है तो समझाओ। बेइज्जत मत करो।”

आरव चिढ़ जाता।

“मेरे घर के नियम मत बदलो।”

“घर?”

हिना मुस्कुराती।

“तुम खुद इसे घर मानते हो?”

वह जवाब नहीं दे पाता।

एक शाम हिना ने पहली बार आरव को अलग रूप में देखा।

एक बूढ़ी महिला हवेली आई।

आरव उन्हें देखते ही कुर्सी से उठ गया।

उसने उनके हाथ चूमे।

“अम्मी।”

हिना दरवाजे पर रुक गई।

जिस आदमी को उसने केवल कठोर देखा था, वही अपनी मां के सामने बिल्कुल अलग इंसान था।

अम्मी की नजर हिना पर पड़ी।

“यही है?”

आरव ने सिर हिलाया।

वह हिना के पास आईं।

उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

“बहुत खूबसूरत है।”

हिना ने फीकी मुस्कान दी।

“खूबसूरत चीज़ें भी कभी-कभी गलत जगह पहुंच जाती हैं।”

अम्मी तुरंत समझ गईं कि सब ठीक नहीं है।

रात को उन्होंने आरव से पूछा—

“तुमने उससे शादी कैसे की?”

“अम्मी…”

“सच।”

आरव चुप रहा।

और उस चुप्पी ने सब बता दिया।

अम्मी ने पहली बार अपने बेटे की तरफ निराशा से देखा।

“किसी की मजबूरी जीत नहीं होती, आरव।”

वह वाक्य उसके दिल में उतर गया।

लेकिन उसका अहंकार अभी भी मजबूत था।

“वह चली जाएगी।”

“तो जाने देना।”

आरव ने तुरंत उनकी ओर देखा।

अम्मी बोलीं—

“अगर किसी इंसान को अपने पास रखने के लिए दरवाजे बंद करने पड़ें, तो वह तुम्हारा कभी था ही नहीं।”

अगली सुबह आरव दो दिनों के लिए शहर से बाहर जाने वाला था।

जाने से पहले वह हिना के कमरे में आया।

“मैं दो दिन बाहर रहूंगा।”

हिना किताब पढ़ती रही।

“मुबारक हो।”

“हिना।”

उसने किताब बंद की।

“क्या?”

“कोई बेवकूफी मत करना।”

“मतलब?”

“भागने की कोशिश मत करना।”

हिना की आंखों में फिर वही आग लौटी।

“और अगर करूं?”

आरव उसके सामने झुका।

“तो मुझे तुम्हें ढूंढने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।”

हिना मुस्कुराई।

“इतना यकीन?”

“अपने सिस्टम पर है।”

“देखते हैं।”

आरव चला गया।

रात हुई।

हवेली शांत हो गई।

और ठीक आधी रात को हिना अपने कमरे से बाहर निकली।

लेकिन वह मुख्य दरवाजे की तरफ नहीं गई।

वह सीढ़ियां उतरकर हवेली के उस हिस्से की ओर गई जहां आरव का निजी ऑफिस था।

उसे भागना नहीं था।

उसे कुछ ढूंढना था।

आरव के खिलाफ कुछ ऐसा, जिससे वह अपने पिता को हमेशा के लिए सुरक्षित कर सके।

ऑफिस का दरवाजा बंद था।

लेकिन लॉक नहीं।

हिना अंदर गई।

अलमारियां फाइलों से भरी थीं।

उसने एक-एक दराज खोलनी शुरू की।

कुछ नहीं।

दूसरी।

कुछ नहीं।

तीसरी।

कुछ सामान्य कारोबारी दस्तावेज़।

फिर उसकी नजर मेज के सबसे नीचे वाले छोटे लॉकर पर पड़ी।

उसने हेयरपिन निकाली।

कुछ सेकंड कोशिश की।

क्लिक।

लॉकर खुल गया।

अंदर एक काली पेनड्राइव थी।

साथ में तीन फाइलें।

हिना की सांस रुक गई।

उसने पहली फाइल खोली।

नाम।

तारीखें।

लेन-देन।

कंपनियों की सूची।

दूसरी फाइल।

विदेशी खातों की जानकारी।

तीसरी फाइल पर लाल अक्षरों में लिखा था—

“PROJECT NOOR.”

हिना का हाथ रुक गया।

उसके चेहरे का रंग बदल गया।

उसने तुरंत फाइल खोली।

पहले पन्ने पर एक तस्वीर लगी थी।

और तस्वीर देखकर उसकी सांस अटक गई।

वह तस्वीर…

उसी की थी।

लेकिन नीचे नाम लिखा था—

“इंस्पेक्टर नूर फ़ातिमा।”

हिना ने तुरंत फाइल बंद कर दी।

उसके माथे पर पसीना आ गया।

“यह इसके पास कैसे पहुंची?”

उसने फुसफुसाकर कहा।

उसी समय पीछे से ताली बजने की आवाज़ आई।

हिना पत्थर बन गई।

एक ताली।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

उसने धीरे-धीरे पलटकर देखा।

दरवाजे पर आरव खड़ा था।

काले कपड़ों में।

दोनों हाथ जेब में।

और चेहरे पर बेहद शांत मुस्कान।

“बहुत अच्छा।”

हिना का गला सूख गया।

“तुम…”

“मैं तो दो दिन के लिए बाहर गया था, है ना?”

वह धीरे-धीरे अंदर आया।

“कम से कम तुम्हें यही बताया था।”

हिना ने फाइल अपने पीछे कर ली।

आरव हंसा।

“अब छिपाने का क्या फायदा है?”

“मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो।”

“सच?”

आरव उसके सामने आकर रुक गया।

“तो मैं बता देता हूं।”

उसने फाइल उसके हाथ से ले ली।

“हिना खान…”

फिर उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

“या कहूं इंस्पेक्टर नूर फ़ातिमा?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

हिना के चेहरे से सारी भावनाएं गायब हो गईं।

कुछ सेकंड पहले डरी हुई दिखाई देने वाली लड़की अचानक बिल्कुल बदल गई।

उसकी पीठ सीधी हो गई।

आंखों का डर गायब हो गया।

आरव उसे ध्यान से देख रहा था।

“आखिर असली चेहरा बाहर आ ही गया।”

हिना—या नूर—ने धीमे से पूछा—

“कब से जानते हो?”

“पहले दिन से।”

उसका दिल धक से रह गया।

“झूठ।”

“तुम्हारे अब्बू के रेस्टोरेंट में लगी आग से पहले।”

अब नूर सचमुच चौंकी।

आरव ने मेज से एक तस्वीर उठाई।

तस्वीर में नूर पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में खड़ी थी।

“तुम छह महीने से मेरे नेटवर्क तक पहुंचने की कोशिश कर रही थीं।”

दूसरी तस्वीर।

उसमें वह अली खान के साथ थी।

“अली खान तुम्हारे असली पिता नहीं हैं।”

नूर ने मुट्ठियां भींच लीं।

“उनका नाम अपनी जुबान पर मत लाना।”

आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

“इसलिए तुमने उनकी बेटी बनकर मेरे करीब आने की योजना बनाई।”

नूर ने पहली बार खुलकर स्वीकार किया—

“हां।”

आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

“रेस्टोरेंट का कर्ज़?”

“मेरी योजना का हिस्सा।”

“थप्पड़?”

नूर ने उसकी आंखों में देखा।

“वह असली था।”

आरव कुछ क्षण चुप रहा।

फिर पहली बार उसके चेहरे पर सचमुच हल्की मुस्कान आई।

“उसका मुझे अंदाजा था।”

नूर ने दुपट्टे में छिपी पेनड्राइव कसकर पकड़ ली।

“और शादी?”

अब कमरे की हवा जैसे जम गई।

आरव ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।

“वह मेरी योजना में नहीं थी।”

“तो?”

“तुमने थप्पड़ मारा।”

नूर अविश्वास से उसे देखती रही।

“इसलिए किसी लड़की की पूरी जिंदगी का फैसला कर दिया?”

आरव की नजर नीचे झुक गई।

शायद पहली बार उसके पास अपने किए का कोई अच्छा जवाब नहीं था।

“मैं गुस्से में था।”

“तुम जैसे आदमी हमेशा यही कहते हैं।”

नूर की आवाज़ टूटने लगी।

“गुस्से में था। मजबूर था। हालात ऐसे थे।”

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

“लेकिन कभी सोचते हो सामने वाला इंसान किन हालात से गुजरता है?”

आरव चुप रहा।

“तुम जानते थे मैं कौन हूं।”

“हां।”

“फिर भी तुमने मुझे रोते देखा।”

आरव का चेहरा बदल गया।

“हां।”

“मेरे डर को देखा।”

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

“और फिर भी…”

नूर की आवाज़ भर्रा गई।

“तुमने मुझे उसी डर में रहने दिया।”

यह बात आरव को किसी थप्पड़ से ज्यादा जोर से लगी।

नूर ने पेनड्राइव मेज पर रख दी।

“लो।”

आरव ने हैरानी से उसे देखा।

“क्या?”

“जिसके लिए आई थी, अब नहीं चाहिए।”

“क्यों?”

नूर की आंखों से आंसू गिर पड़े।

“क्योंकि जिस अपराधी को पकड़ने आई थी, उससे नफरत करना आसान था।”

वह उसके करीब आई।

“लेकिन पिछले कुछ दिनों में मैंने तुम्हारे अंदर एक दूसरा आदमी भी देखा।”

आरव की सांस रुक गई।

“और मुझे उसी आदमी से डर लगने लगा।”

“क्यों?”

नूर ने जवाब नहीं दिया।

वह बाहर जाने लगी।

आरव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

फिर अचानक अम्मी की बात याद आई—

अगर किसी को रोकने के लिए दरवाजे बंद करने पड़ें, तो वह तुम्हारा कभी था ही नहीं।

उसका हाथ हवा में ही रुक गया।

नूर दरवाजे तक पहुंच गई।

“दरवाजा खुला है।”

आरव की आवाज़ आई।

नूर पलटी।

“क्या?”

“मुख्य दरवाजा।”

उसकी आवाज़ भारी हो गई।

“गार्ड तुम्हें नहीं रोकेंगे।”

नूर कुछ सेकंड उसे देखती रही।

“तुम मुझे जाने दे रहे हो?”

“हां।”

“तुम्हें पता है मैं पुलिस के पास जा सकती हूं?”

“पता है।”

“यह फाइलें दे सकती हूं।”

“हां।”

“तुम्हें गिरफ्तार करवा सकती हूं।”

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

“अगर यही तुम्हारा फैसला है।”

नूर के चेहरे पर पहली बार उलझन दिखाई दी।

यह वही आरव नहीं था जिससे उसने शादी की थी।

वह बिना कुछ कहे चली गई।

आरव अकेला ऑफिस में खड़ा रहा।

उसकी नजर मेज पर पड़ी पेनड्राइव पर गई।

उसने उसे उठाया।

फिर उसके चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान आई।

“तुम फिर भी नहीं समझीं, नूर।”

उसने फुसफुसाकर कहा।

“इस पेनड्राइव में मेरे खिलाफ सबूत नहीं हैं।”

उधर नूर हवेली के मुख्य दरवाजे से बाहर निकल चुकी थी।

बाहर एक काली कार उसका इंतजार कर रही थी।

ड्राइविंग सीट से एक आदमी उतरा।

“इंस्पेक्टर नूर।”

नूर तुरंत सतर्क हो गई।

“डीसीपी मल्होत्रा?”

“बैठिए।”

नूर कार में बैठ गई।

गाड़ी आगे बढ़ी।

कुछ मिनट बाद डीसीपी मल्होत्रा ने पूछा—

“पेनड्राइव मिली?”

नूर ने उनकी तरफ देखा।

“नहीं।”

मल्होत्रा की आंखों में निराशा चमकी।

“मतलब मिशन फेल?”

नूर खिड़की से बाहर देखने लगी।

“शायद।”

लेकिन उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था।

उसने अचानक पूछा—

“सर, PROJECT NOOR के बारे में आपको कब से पता था?”

मल्होत्रा का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया।

“कौन-सा प्रोजेक्ट?”

नूर की आंखें सिकुड़ गईं।

“कुछ नहीं।”

उसी समय उसका फोन बजा।

अनजान नंबर।

उसने कॉल उठाई।

दूसरी तरफ आरव था।

“तुम कहां हो?”

नूर झुंझला गई।

“मैंने कहा था ना—”

“मेरी बात ध्यान से सुनो।”

आरव की आवाज़ में पहली बार घबराहट थी।

“तुम जिसके साथ हो, उस पर भरोसा मत करना।”

नूर की नजर धीरे से मल्होत्रा पर गई।

“क्या मतलब?”

“तुम्हारे अब्बू के रेस्टोरेंट में आग मैंने नहीं लगवाई थी।”

नूर की सांस अटक गई।

“क्या?”

“और पाँच लाख का कर्ज़ भी असली नहीं था।”

उसके हाथ से फोन लगभग छूट गया।

“आरव, साफ-साफ बोलो।”

आरव की आवाज़ आई—

“जिस आदमी को तुम पिछले छह महीने से मेरा नेटवर्क समझ रही थीं, वह मेरा नहीं था।”

नूर का दिल जोर से धड़का।

मल्होत्रा ने उसकी तरफ देखा।

“सब ठीक है?”

नूर ने फोन थोड़ा दूर किया।

“हां।”

फिर आरव की आवाज़ सुनाई दी—

“मेरे ऑफिस की पेनड्राइव में मेरे अपराधों के सबूत नहीं हैं, नूर।”

“तो क्या है?”

कुछ क्षण खामोशी रही।

फिर आरव ने वह राज बताया जिसने उसकी पूरी दुनिया बदल दी।

“तुम्हारे ही विभाग के उन अधिकारियों की सूची, जो पिछले चार साल से मेरे नाम का इस्तेमाल करके अवैध कारोबार चला रहे हैं।”

नूर की सांस थम गई।

“और उस सूची में सबसे ऊपर…”

आरव रुक गया।

नूर की आंखें धीरे-धीरे मल्होत्रा की ओर उठीं।

आरव ने कहा—

“डीसीपी विक्रम मल्होत्रा का नाम है।”

नूर का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसी क्षण मल्होत्रा ने अचानक ब्रेक लगाया।

गाड़ी सुनसान सड़क पर रुक गई।

उन्होंने धीरे-धीरे नूर की तरफ देखा।

“फोन मुझे दो।”

नूर ने फोन कसकर पकड़ लिया।

“क्यों?”

मल्होत्रा के चेहरे पर अब वह सभ्य मुस्कान नहीं थी।

“क्योंकि लगता है आरव ने तुम्हें जरूरत से ज्यादा बता दिया है।”

नूर समझ चुकी थी।

“रेस्टोरेंट में आग आपने लगवाई थी?”

मल्होत्रा मुस्कुराए।

“तुम बहुत सवाल पूछती हो।”

“अली खान को कर्ज़ में फंसाना भी आपकी योजना थी?”

“हमें तुम्हें आरव के करीब भेजना था।”

नूर की आंखों में गुस्सा भर गया।

“आपने मुझे इस्तेमाल किया।”

“तुम पुलिस अफसर हो। यही तुम्हारा काम है।”

“नहीं।”

नूर ने सिर हिलाया।

“मेरा काम कानून की रक्षा करना है। किसी निर्दोष परिवार की जिंदगी तबाह करना नहीं।”

मल्होत्रा का हाथ धीरे से जैकेट की ओर बढ़ा।

लेकिन उससे पहले सड़क पर तेज हेडलाइट चमकी।

पीछे से कई गाड़ियां आकर रुकीं।

मल्होत्रा चौंक गए।

नूर ने पीछे देखा।

पहली गाड़ी का दरवाजा खुला।

आरव बाहर निकला।

लेकिन वह अकेला नहीं था।

उसके साथ कुछ वर्दीधारी अधिकारी भी थे।

उनमें सबसे आगे क्राइम ब्रांच की कमिश्नर सायरा मिर्ज़ा थीं।

मल्होत्रा का चेहरा उड़ गया।

“सायरा?”

उन्होंने तुरंत दरवाजा खोलने की कोशिश की।

लेकिन नूर ने कार लॉक कर दी।

“इतनी जल्दी क्या है, सर?”

मल्होत्रा ने उसकी तरफ देखा।

अब नूर की आंखों में वह डरी हुई हिना नहीं थी।

इंस्पेक्टर नूर फ़ातिमा वापस आ चुकी थी।

कुछ मिनट बाद मल्होत्रा हिरासत में थे।

सायरा मिर्ज़ा नूर के सामने आईं।

“तुम ठीक हो?”

“हां, मैम।”

फिर नूर की नजर आरव पर गई।

वह कुछ दूरी पर खड़ा था।

“इसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया?”

सायरा ने लंबी सांस ली।

“क्योंकि कहानी उतनी सीधी नहीं है जितनी तुम्हें बताई गई थी।”

“मतलब?”

सायरा ने आरव की तरफ देखा।

“पिछले दो साल से आरव हमारे लिए गुप्त सूचना दे रहा था।”

नूर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“क्या?”

“उसके पिता के पुराने नेटवर्क को कुछ भ्रष्ट अधिकारी चला रहे थे। आरव बाहर से उसी दुनिया का हिस्सा बना रहा ताकि हम पूरे नेटवर्क तक पहुंच सकें।”

नूर को अचानक सारी चीजें याद आने लगीं।

फाइलें।

पेनड्राइव।

उसका ऑफिस खुला छोड़ना।

उसे जाने देना।

“लेकिन उसने मुझे बताया क्यों नहीं?”

सायरा बोलीं—

“क्योंकि हमें शक था कि विभाग में कोई तुम्हारी गतिविधियां मल्होत्रा तक पहुंचा रहा है।”

नूर ने आरव की तरफ देखा।

वह शांत खड़ा था।

मगर उसके चेहरे पर जीत नहीं थी।

सिर्फ थकान थी।

नूर उसके सामने पहुंची।

“तो सब नाटक था?”

आरव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“कर्ज़?”

“नकली।”

“तुम्हारा माफिया नेटवर्क?”

“आधा सच।”

“मुझसे शादी?”

आरव चुप हो गया।

नूर की आंखें भर आईं।

“जवाब दो।”

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

“वह मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”

नूर ठिठक गई।

“मैं तुम्हें अपने पास रखना चाहता था।”

उसने पहली बार बिना अहंकार के कहा—

“और मैंने उस चाहत को अधिकार समझ लिया।”

नूर चुप रही।

“मैं तुम्हारी मजबूरी का फायदा नहीं उठा सकता था।”

आरव की आवाज़ धीमी हो गई।

“फिर भी उठाया।”

उसने नजरें झुका लीं।

“उसके लिए मेरे पास कोई सफाई नहीं है।”

नूर ने शायद पहली बार उसे सचमुच पछताते देखा।

आरव ने जेब से एक लिफाफा निकाला।

“यह क्या है?”

“तुम्हारी आजादी।”

नूर ने कागज़ निकाले।

वे कानूनी दस्तावेज़ थे।

उसने पढ़ना शुरू किया।

अली खान का कर्ज़ पूरी तरह समाप्त।

रेस्टोरेंट उनके नाम।

और साथ में…

निकाह खत्म करने की कानूनी प्रक्रिया के लिए आरव की तरफ से बिना किसी आपत्ति के हस्ताक्षर।

नूर ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने साइन कर दिए?”

“हां।”

“इतनी आसानी से?”

आरव के होंठों पर दर्द भरी मुस्कान आई।

“तुम्हें रोकना आसान है, नूर।”

वह एक कदम पीछे हुआ।

“लेकिन अब समझ आया है कि तुम्हें रोककर जीतना संभव नहीं।”

नूर के हाथ में कागज़ कांप रहे थे।

आरव पलट गया।

वह कुछ कदम चला।

तभी नूर की आवाज़ आई—

“आरव।”

वह रुक गया।

लेकिन पलटा नहीं।

नूर ने पूछा—

“अगर मैं वापस ना आई तो?”

आरव ने आंखें बंद कीं।

फिर धीरे से कहा—

“तो मैं इंतजार नहीं करूंगा।”

नूर का दिल डूब गया।

लेकिन आरव ने आगे कहा—

“मैं तुम्हारी जिंदगी में दोबारा दखल नहीं दूंगा।”

अब वह पलटा।

“मोहब्बत अगर कभी हुई… तो इस बार फैसला तुम्हारा होगा।”

नूर कुछ नहीं कह पाई।

तीन महीने गुजर गए।

भ्रष्ट नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ।

कई बड़े नाम गिरफ्तार हुए।

अली खान का रेस्टोरेंट दोबारा खुल गया।

नूर वापस अपनी नौकरी में आ गई।

और आरव?

उसने धीरे-धीरे अपने पिता से मिले संदिग्ध कारोबार बंद करने शुरू कर दिए।

उसने अपनी सुरक्षा कंपनी को कानूनी ढांचे में बदल दिया।

लेकिन हवेली का एक कमरा वैसा ही रहा।

वही कमरा जहां पहली रात नूर ने उससे कहा था—

“डर और हार अलग-अलग चीजें हैं।”

आरव कभी-कभी उस खाली कमरे के सामने रुक जाता।

फिर बिना अंदर गए आगे बढ़ जाता।

एक शाम अम्मी उसके पास आईं।

“कब तक ऐसे रहोगे?”

आरव मुस्कुराया।

“ठीक हूं।”

“झूठ।”

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

अम्मी ने कहा—

“अगर उससे प्यार करते हो तो जाकर कहो।”

आरव ने सिर हिलाया।

“पहले मैंने उसका फैसला छीना था।”

उसकी नजर दूर आसमान पर टिक गई।

“अब उसके फैसले का इंतजार करना ही मेरी सजा है।”

उसी शाम अली खान के रेस्टोरेंट में बहुत भीड़ थी।

नूर काउंटर पर उनकी मदद कर रही थी।

तभी दरवाजा खुला।

वह अनजाने में उधर देखने लगी।

लेकिन सामने आरव नहीं था।

एक वकील अंदर आया।

“इंस्पेक्टर नूर फ़ातिमा?”

“जी?”

उसने एक बंद लिफाफा दिया।

“आपके लिए।”

“किसने भेजा?”

“आरव सिद्दीकी।”

नूर का दिल तेज धड़कने लगा।

उसने लिफाफा खोला।

अंदर केवल एक छोटा-सा कागज़ था।

“आज से हमारे बीच कोई कर्ज़ नहीं, कोई मजबूरी नहीं, कोई शर्त नहीं। जो रिश्ता जबरदस्ती शुरू हुआ था, उसका फैसला अब सिर्फ तुम्हारा है।”

नूर काफी देर तक उस कागज़ को देखती रही।

नीचे एक और लाइन थी—

“और हां… उस पहले थप्पड़ का हिसाब अब भी बाकी है।”

नूर के होंठों पर अनचाही मुस्कान आ गई।

अली खान ने दूर से बेटी का चेहरा देखा।

“किसका खत है?”

नूर ने तुरंत मोड़ दिया।

“किसी बेवकूफ का।”

“वही बेवकूफ?”

नूर ने पिता को घूरा।

वह हंस पड़े।

“अब्बू!”

कई दिनों बाद नूर खुलकर हंसी।

लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

अगली सुबह नूर पुलिस मुख्यालय पहुंची।

उसकी मेज पर एक नई फाइल रखी थी।

ऊपर लाल मुहर लगी थी—

“CONFIDENTIAL.”

उसने फाइल खोली।

पहले पन्ने पर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में आरव के पिता थे।

उनके साथ मल्होत्रा।

और तीसरा आदमी…

नूर तस्वीर देखते ही जड़ हो गई।

वह आदमी अली खान थे।

उसके हाथ कांपने लगे।

“यह कैसे हो सकता है?”

तभी पीछे से कमिश्नर सायरा की आवाज़ आई—

“नूर।”

वह पलटी।

“मैम, मेरे अब्बू इस तस्वीर में क्यों हैं?”

सायरा कुछ सेकंड चुप रहीं।

फिर उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया।

“क्योंकि एक सच अभी भी तुमसे छिपाया गया है।”

नूर का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“कौन-सा सच?”

सायरा ने उसके सामने दूसरी फाइल रखी।

“अली खान केवल वह आदमी नहीं हैं जिन्होंने तुम्हें बेटी बनाकर पाला।”

नूर की आंखें फैल गईं।

“फिर कौन हैं?”

सायरा ने धीरे से कहा—

“वह उस रात के आखिरी जिंदा गवाह हैं जिस रात आरव के पिता की मौत हुई थी।”

नूर के हाथ से तस्वीर गिर गई।

“क्या?”

“और जिस केस को तुमने बंद समझ लिया था…”

सायरा ने अगला पन्ना पलटा।

उस पर आरव की तस्वीर थी।

नीचे लाल अक्षरों में लिखा था—

“PRIMARY TARGET.”

नूर की सांस अटक गई।

“आरव खतरे में है?”

सायरा ने उसकी आंखों में देखा।

“खतरे में नहीं।”

वह कुछ क्षण रुकीं।

“उसे खत्म करने का आदेश पहले ही दिया जा चुका है।”

नूर ने तुरंत फोन निकाला।

आरव का नंबर मिलाया।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

कोई जवाब नहीं।

उसका दिल बैठने लगा।

उसने दोबारा कॉल की।

इस बार किसी ने फोन उठा लिया।

लेकिन दूसरी तरफ आरव नहीं था।

एक अनजान आदमी की आवाज़ आई—

“इंस्पेक्टर नूर?”

नूर का चेहरा सफेद पड़ गया।

“आरव कहां है?”

दूसरी तरफ हल्की हंसी सुनाई दी।

“जिस आदमी से आपकी मजबूरी की शादी हुई थी, उसके बारे में असली सच जानना है…”

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर आवाज़ आई—

“तो अकेली उस जगह आइए जहां यह पूरी कहानी शुरू हुई थी।”

कॉल कट गई।

नूर कुछ सेकंड फोन को देखती रही।

फिर तेजी से बाहर भागी।

सायरा पीछे से चिल्लाईं—

“नूर, रुको!”

लेकिन नूर नहीं रुकी।

क्योंकि आज पहली बार वह आरव के पास किसी कर्ज़, किसी मिशन या किसी मजबूरी के कारण नहीं जा रही थी।

आज फैसला सिर्फ उसका था।

और उसे अभी तक नहीं पता था कि पुराने जले हुए रेस्टोरेंट के खंडहर में उसका इंतजार करने वाला आदमी आरव का दुश्मन नहीं…

बल्कि वह शख्स था जिसे नूर पिछले पंद्रह साल से मरा हुआ समझती आई थी।

समाप्त!

डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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