शनाया ने जब आंखें खोलीं, तो सबसे पहले उसे अपनी धड़कनों की आवाज सुनाई दी।

शनाया ने जब आंखें खोलीं, तो सबसे पहले उसे अपनी धड़कनों की आवाज सुनाई दी।
कमरे में अजीब-सी खामोशी थी।
भारी पर्दों से ढकी खिड़कियां।
दीवार पर जलता हुआ सिर्फ एक पीला लैंप।
और सामने सोफे पर बैठा वह आदमी, जिसका नाम सुनते ही शहर के बड़े-बड़े कारोबारी अपनी आवाज धीमी कर लेते थे।
देव सिंघानिया।
शनाया ने झटके से उठने की कोशिश की।
उसकी सांस अटक गई।
“देव…?”
देव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस सामने मेज पर रखी एक पुरानी फाइल बंद की और धीरे से उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में गुस्सा नहीं था।
गुस्से से भी ज्यादा डरावनी चीज थी वहां—
बरसों से जमा हुई नफरत।
शनाया ने खुद को संभालते हुए कहा, “मैं यहां कैसे आई?”
देव उठा।
उसके जूतों की धीमी आवाज संगमरमर के फर्श पर गूंजती हुई शनाया के दिल पर चोट कर रही थी।
वह कुछ कदम दूर रुक गया।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें कभी बताया कि देव सिंघानिया उनसे इतनी नफरत क्यों करता है?”
शनाया की भौंहें सिकुड़ गईं।
“मेरे पापा का नाम अपनी गंदी जुबान से मत लेना।”
कुछ क्षण के लिए देव बिल्कुल शांत रहा।
फिर उसके होंठों पर दर्द से भरी फीकी मुस्कान आई।
“यही भरोसा चाहिए था मुझे।”
“क्या मतलब?”
देव ने मेज पर रखी फाइल उसकी तरफ सरका दी।
“खोलो।”
“मुझे तुम्हारे किसी खेल में दिलचस्पी नहीं है।”
“यह खेल नहीं है, शनाया।”
पहली बार देव की आवाज बदल गई।
“यह उस रात का हिसाब है, जिसने मुझसे मेरा पूरा परिवार छीन लिया था।”
शनाया की उंगलियां अनजाने में कांप गईं।
लेकिन उसने फाइल नहीं उठाई।
उसके पिता राजवीर राजपूत शहर के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों में गिने जाते थे। शनाया बचपन से उन्हें अपना आदर्श मानती आई थी।
उसके लिए उसके पिता वह आदमी थे जिसने अपनी पत्नी और बेटी को दुनिया की हर खुशी दी।
और देव?
देव सिंघानिया उसके पिता का सबसे बड़ा कारोबारी दुश्मन था।
कम-से-कम शनाया अब तक यही जानती थी।
उसने देव की आंखों में देखते हुए कहा, “तुम मेरे पापा को बदनाम करके मुझसे क्या चाहते हो?”
देव की मुट्ठी कस गई।
“सच।”
“तुम्हारा सच मुझे नहीं चाहिए।”
“लेकिन बहुत जल्द तुम्हें अपने पिता का सच चाहिए होगा।”
शनाया ने तिरस्कार से मुंह फेर लिया।
तभी देव का फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी और कॉल रिसीव की।
दूसरी तरफ से किसी आदमी की घबराई आवाज आई—
“सर, राजपूत ग्रुप के बोर्ड में हलचल शुरू हो गई है। किसी ने पुराने अकाउंट्स एक्सेस करने की कोशिश की है।”
देव की आंखें सिकुड़ गईं।
“किसने?”
“पता नहीं चला।”
“पता करो।”
उसने फोन काट दिया।
शनाया ने तुरंत पूछा, “तुम मेरे पापा की कंपनी के पीछे पड़े हो?”
देव उसकी तरफ मुड़ा।
“तुम्हारे पिता की कंपनी कभी सिर्फ उनकी नहीं थी।”
यह सुनते ही शनाया कुछ पल चुप रह गई।
देव ने फाइल की तरफ इशारा किया।
“अब शायद तुम्हें इसे खोल लेना चाहिए।”
इस बार शनाया ने फाइल उठा ली।
पहला पन्ना देखते ही उसकी आंखें ठहर गईं।
वह लगभग पच्चीस साल पुराना साझेदारी समझौता था।
दो नाम साफ दिखाई दे रहे थे—
वीरेंद्र सिंघानिया।
राजवीर राजपूत।
शनाया ने दूसरा पन्ना पलटा।
फिर तीसरा।
कंपनी का पुराना नाम था—
सिंघानिया-राजपूत इंडस्ट्रीज।
“ये क्या है?”
“मेरे पिता और तुम्हारे पिता बिजनेस पार्टनर थे।”
“लेकिन पापा ने कभी…”
“बताया नहीं?”
देव की आंखों में कड़वाहट उतर आई।
“बहुत कुछ नहीं बताया उन्होंने।”
शनाया ने अगला पन्ना पलटा।
एक पुरानी अखबार की कटिंग थी।
सिंघानिया परिवार के बंगले में भीषण आग।
उद्योगपति वीरेंद्र सिंघानिया और पत्नी की मृत्यु।
नाबालिग पुत्र देव गंभीर रूप से घायल।
शनाया के हाथ ठंडे पड़ गए।
उसने धीरे से देव की तरफ देखा।
पहली बार वह उसके चेहरे के पीछे छिपा वह बच्चा देख पा रही थी जिसने शायद एक ही रात में सब कुछ खो दिया था।
लेकिन अगले ही क्षण उसने खुद को संभाला।
“इससे मेरे पापा का क्या संबंध?”
देव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने फाइल से एक और दस्तावेज निकालकर उसके सामने रखा।
आग लगने से कुछ दिन पहले कंपनी की हिस्सेदारी बदलने का प्रस्ताव।
उसके नीचे राजवीर के हस्ताक्षर दिखाई दे रहे थे।
और फिर—
बीमा भुगतान।
संपत्ति हस्तांतरण।
कंपनी का नियंत्रण।
आग के बाद लगभग सब कुछ राजवीर राजपूत के पास चला गया था।
शनाया के होंठ सूख गए।
“नहीं।”
उसने कागज वापस मेज पर रख दिया।
“यह सब परिस्थितिजन्य है। इससे कुछ साबित नहीं होता।”
देव उसके जवाब पर पहली बार चौंका।
उसे शायद उम्मीद थी कि शनाया टूट जाएगी।
लेकिन शनाया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“और अगर तुम इतने सालों से इन्हीं कागजों के सहारे मेरे पिता को दोषी मानते आए हो, तो तुम भी उतनी ही बड़ी गलती कर रहे हो जितनी तुम उन पर करने का आरोप लगा रहे हो।”
देव का चेहरा सख्त हो गया।
“मैंने उस रात उन्हें वहां देखा था।”
शनाया ठिठक गई।
“क्या?”
देव की सांस भारी हो गई।
“मैं चौदह साल का था।”
उसकी आवाज धीमी पड़ गई।
“मुझे आज भी याद है। धुआं पूरे घर में भर चुका था। मेरी मां चिल्ला रही थीं। पापा मुझे बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे।”
देव कुछ क्षण बोल नहीं पाया।
फिर उसने कहा—
“और बाहर खड़ी कार के पास मैंने तुम्हारे पिता को देखा था।”
शनाया की आंखों में अविश्वास था।
“तुमने उनसे बात की?”
“नहीं।”
“तुमने उन्हें आग लगाते देखा?”
देव चुप रहा।
“नहीं देखा ना?”
देव की आंखों में गुस्सा चमका।
“उसके बाद उन्हें सब कुछ मिल गया!”
“इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने आग लगाई।”
“तुम अपने पिता को बचाने के लिए—”
“और तुम अपने दर्द को सही साबित करने के लिए फैसला पहले ही सुना चुके हो!”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
शनाया की आवाज कांप रही थी, लेकिन अब डर से नहीं।
“तुम्हारे साथ जो हुआ वह गलत था, देव। बहुत गलत। लेकिन किसी और की बेटी को सजा देकर तुम्हारे माता-पिता वापस नहीं आएंगे।”
देव का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
“तुम नहीं समझोगी।”
“शायद नहीं।”
शनाया की आंखें नम हो गईं।
“लेकिन मैं इतना समझती हूं कि दर्द इंसान को सच खोजने का अधिकार देता है… किसी बेगुनाह पर अपना फैसला थोपने का नहीं।”
देव बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया।
दरवाजा बंद होने की आवाज गूंजी।
शनाया वहीं खड़ी रही।
उसकी उंगलियां अब भी कांप रही थीं।
लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
डर धीरे-धीरे सवालों में बदल रहा था।
और सवाल…
अक्सर सबसे खतरनाक हथियार होते हैं।
उस रात शनाया सो नहीं पाई।
उसने बार-बार उन दस्तावेजों को देखा।
कुछ सही नहीं था।
एक कागज पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।
लेकिन तारीख के नीचे लगी कंपनी की मुहर अलग थी।
शनाया बचपन से अपने पिता के ऑफिस जाती रही थी।
उसे याद था कि राजपूत ग्रुप ने वह लोगो आग लगने के लगभग छह महीने बाद अपनाया था।
तो पच्चीस साल पुराने दस्तावेज पर वह मुहर कैसे हो सकती थी?
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
उसने कागज रोशनी के सामने किया।
नीचे बहुत हल्के अक्षरों में एक कोड छपा था।
RG-Legal/Archive-17.
शनाया ने कोड याद कर लिया।
अगली सुबह देव कमरे में आया तो शनाया पहले से तैयार बैठी थी।
“मुझे मेरे पिता से बात करनी है।”
देव ने ठंडी आवाज में कहा, “नहीं।”
“तो मुझे अपना फोन दो।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे सबूतों में गड़बड़ है।”
देव के कदम रुक गए।
“क्या कहा?”
शनाया ने वह दस्तावेज उसके सामने रखा।
“यह मुहर देख रहे हो?”
“तो?”
“यह राजपूत ग्रुप की पुरानी मुहर नहीं है।”
देव की आंखों में पहली बार संशय आया।
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि मैं राजवीर राजपूत की बेटी हूं। जिस आदमी से तुम नफरत करते हो, उसी की कंपनी में मैंने अपनी गर्मियों की छुट्टियां बिताई हैं।”
वह उठी।
“यह लोगो उस आग के छह महीने बाद डिजाइन हुआ था।”
देव ने तुरंत कागज अपने हाथ में लिया।
शनाया ने कहा—
“अगर मैं सही हूं, तो किसी ने यह दस्तावेज बाद में तैयार किया।”
देव चुप हो गया।
उसके चेहरे का रंग बदल चुका था।
“और अगर तुम गलत हुई?”
“तो मैं खुद तुम्हारे सामने स्वीकार करूंगी कि मेरे पिता ने मुझसे सच छिपाया।”
“और अगर तुम सही हुई?”
शनाया उसकी आंखों में देखने लगी।
“तो तुम्हें स्वीकार करना होगा कि तुम पच्चीस साल से गलत आदमी से नफरत करते रहे हो।”
उस एक वाक्य ने देव के चेहरे से सारी कठोरता छीन ली।
क्योंकि पहली बार उसके सामने ऐसा सवाल खड़ा था जिसका जवाब वह सुनना ही नहीं चाहता था।
उसी दोपहर देव शनाया को अपने निजी ऑफिस में ले गया।
उसने अपने साइबर विशेषज्ञ रुद्र को बुलाया।
“Archive-17.”
देव ने कागज मेज पर रखा।
“इसका पूरा रिकॉर्ड चाहिए।”
रुद्र ने शनाया की तरफ देखा।
“सर, ये राजपूत ग्रुप का इंटरनल रिकॉर्ड है।”
“मुझे पता है।”
“कानूनी तरीके से निकालने में समय लगेगा।”
शनाया तुरंत बोली, “मेरे पास एक्सेस हो सकता है।”
देव ने उसकी तरफ देखा।
“कैसे?”
“मेरे नाम पर कंपनी में बारह प्रतिशत हिस्सेदारी है।”
देव चौंका।
“बारह प्रतिशत?”
“मेरी नानी ने मेरे नाम ट्रस्ट बनाया था। इक्कीस साल की उम्र में शेयर मेरे अधिकार में आ गए।”
“तुमने कभी इस्तेमाल नहीं किया?”
शनाया के चेहरे पर फीकी मुस्कान आई।
“मुझे जरूरत ही नहीं पड़ी। मुझे हमेशा लगता था पापा सब संभाल लेंगे।”
वह कुछ क्षण चुप रही।
“शायद यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”
कानूनी अनुमति के बाद कंपनी के पुराने डिजिटल रिकॉर्ड निकाले गए।
घंटों गुजर गए।
रात के करीब दो बजे रुद्र अचानक स्क्रीन के सामने सीधा बैठ गया।
“सर… कुछ मिला है।”
देव और शनाया दोनों उसके पास पहुंचे।
स्क्रीन पर Archive-17 फोल्डर खुला था।
उसके अंदर स्कैन किए हुए दस्तावेजों के साथ संशोधन इतिहास मौजूद था।
मूल फाइल—
पच्चीस साल पुरानी।
लेकिन जिस दस्तावेज को देव सबूत मानता आया था, उसका डिजिटल संस्करण सिर्फ आठ साल पहले अपलोड हुआ था।
देव के चेहरे से रंग उड़ गया।
“किसने अपलोड किया?”
रुद्र ने लॉग खोला।
यूजर आईडी देखकर वह रुक गया।
“आर. मेहरा।”
शनाया ने पूछा, “कौन?”
लेकिन देव का चेहरा अचानक बदल चुका था।
“राघव मेहरा।”
“कौन है वह?”
देव ने धीरे से कहा—
“मेरे पिता का पुराना अकाउंटेंट।”
कमरे में मौत जैसी खामोशी छा गई।
रुद्र ने दूसरा रिकॉर्ड खोला।
राघव मेहरा आग के बाद राजपूत ग्रुप में शामिल हुआ था।
और पांच साल बाद कंपनी का मुख्य वित्तीय अधिकारी बन गया।
शनाया ने देव की तरफ देखा।
“मतलब वह दोनों कंपनियों में था?”
देव की मुट्ठियां कस गईं।
“हां।”
“तो उसे दोनों परिवारों के अकाउंट्स की जानकारी थी।”
रुद्र ने कहा, “सिर्फ जानकारी नहीं।”
उसने एक और फाइल खोली।
“उसे ट्रांसफर अप्रूवल का अधिकार भी था।”
शनाया का दिल जोर से धड़का।
अब कहानी बदल रही थी।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
रुद्र को उसी फोल्डर में एक ऑडियो फाइल मिली।
रिकॉर्डिंग सिर्फ इकतालीस सेकंड की थी।
आवाज बहुत पुरानी और अस्पष्ट थी।
पहली आवाज देव के पिता वीरेंद्र की थी—
“मैं पुलिस के पास जा रहा हूं।”
दूसरी आवाज सुनते ही देव की सांस थम गई।
राघव मेहरा।
“आप ऐसा नहीं करेंगे।”
“तुमने खातों से पैसा निकाला है, राघव। राजवीर को भी पता चल चुका है।”
फिर कुछ शोर सुनाई दिया।
और रिकॉर्डिंग समाप्त।
शनाया और देव एक-दूसरे को देखते रह गए।
देव ने कुर्सी पकड़ ली।
पच्चीस साल से उसने अपने मन में एक कहानी बनाई थी।
उस कहानी में उसके पिता निर्दोष थे।
उसकी मां निर्दोष थीं।
और राजवीर राजपूत अपराधी।
लेकिन अब उस कहानी के बीच एक तीसरा आदमी खड़ा था।
राघव मेहरा।
अगली सुबह शनाया ने अपने पिता से वीडियो कॉल पर बात की।
राजवीर का चेहरा थका हुआ था।
उन्होंने बेटी को देखते ही कहा—
“शनाया! तुम ठीक हो?”
शनाया की आंखें भर आईं।
“पापा… मुझे आपसे कुछ पूछना है।”
“पहले मुझे बताओ देव ने—”
“उस रात आप सिंघानिया हाउस के बाहर क्यों थे?”
राजवीर अचानक चुप हो गए।
देव पीछे खड़ा उनकी प्रतिक्रिया देख रहा था।
शनाया ने दोबारा पूछा—
“पापा?”
राजवीर ने आंखें बंद कर लीं।
“क्योंकि वीरेंद्र ने मुझे फोन किया था।”
देव आगे बढ़ा।
“क्या कहा था उन्होंने?”
राजवीर ने देव को स्क्रीन पर देखा।
उनके चेहरे पर अपराधबोध उतर आया।
“उन्होंने कहा था कि कंपनी के खातों में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है।”
“राघव?”
राजवीर की आंखें फैल गईं।
“तुम्हें उसका नाम कैसे पता?”
देव के लिए यही जवाब काफी था।
उसने मेज पर हाथ मारा।
“आपने पुलिस को क्यों नहीं बताया?”
राजवीर की आवाज टूट गई।
“मैंने कोशिश की थी।”
“झूठ!”
“देव!”
राजवीर पहली बार ऊंची आवाज में बोले।
“उस रात जब मैं पहुंचा, घर पहले ही जल रहा था। मैंने तुम्हें बाहर निकालने की कोशिश की थी।”
देव जैसे जम गया।
“क्या?”
“तुम बेहोश थे। एक सुरक्षा गार्ड तुम्हें लेकर बाहर आया था। मैंने एम्बुलेंस बुलाई।”
देव की सांसें तेज हो गईं।
उसकी यादों में धुआं था।
आग थी।
चीखें थीं।
और दूर खड़े राजवीर की धुंधली आकृति।
उसने हमेशा माना था कि राजवीर वहां अपनी जीत देखने आए थे।
लेकिन अगर वह मदद करने आए थे?
राजवीर आगे बोले—
“अगली सुबह मुझे एक लिफाफा मिला।”
“किसका?”
“उसमें तुम्हारी अस्पताल की तस्वीरें थीं।”
देव की आंखें सिकुड़ गईं।
“और?”
राजवीर ने भारी आवाज में कहा—
“लिखा था—अगर मैंने पुलिस के सामने राघव का नाम लिया तो अस्पताल में अगली दुर्घटना तुम्हारे साथ होगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
देव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“आपने… मेरी वजह से चुप्पी साधी?”
“मैं डर गया था।”
राजवीर की आंखें नम थीं।
“और यही मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।”
उन्होंने शनाया की तरफ देखा।
“मैंने कंपनी बचा ली, लेकिन सच खो दिया।”
शनाया की आंखों से आंसू निकल आए।
“फिर आपने देव को कभी बताया क्यों नहीं?”
राजवीर के पास कोई अच्छा जवाब नहीं था।
“जितना समय बीतता गया, उतना सच कहना मुश्किल होता गया।”
देव पीछे हट गया।
वह कमरे से बाहर चला गया।
शनाया उसके पीछे नहीं गई।
कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनके बीच किसी तीसरे इंसान का होना भी बोझ बन जाता है।
उस शाम देव अपने माता-पिता की पुरानी तस्वीर के सामने अकेला बैठा रहा।
उसके हाथ में शराब का गिलास नहीं था।
सिगरेट नहीं थी।
कुछ नहीं।
सिर्फ वह तस्वीर।
उसने धीमे से कहा—
“मैं गलत था, पापा?”
कोई जवाब नहीं आया।
दरवाजे के बाहर खड़ी शनाया ने उसकी आवाज सुन ली।
वह अंदर आई।
देव ने उसकी तरफ नहीं देखा।
“तुम मेरा मजाक उड़ाने आई हो?”
“नहीं।”
“कहने आई हो कि तुम सही थीं?”
“नहीं।”
“फिर क्यों आई हो?”
शनाया ने उसके सामने मेज पर पानी रखा।
“क्योंकि सच जानने के बाद इंसान को अकेला छोड़ देना हमेशा सही नहीं होता।”
देव ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखें लाल थीं।
“मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।”
शनाया चुप रही।
देव ने कहा—
“मैं तुम्हें अपने दुश्मन की बेटी समझता रहा।”
“मैं वही हूं।”
“नहीं।”
देव ने सिर हिलाया।
“तुम शनाया हो।”
उसने पहली बार उसका नाम बिना नफरत के लिया था।
“और तुम्हारे पिता के किए या न किए किसी काम की सजा तुम्हें देना गलत था।”
शनाया ने गहरी सांस ली।
“माफी मांगना आसान है, देव।”
“मुझे पता है।”
“भरोसा वापस बनाना मुश्किल है।”
“वह भी पता है।”
“और मैं तुम्हें सिर्फ इसलिए माफ नहीं कर सकती क्योंकि तुम्हारा अतीत दर्दनाक था।”
देव ने सिर झुका दिया।
“मैं उम्मीद भी नहीं कर रहा।”
शनाया ने पहली बार उसकी आंखों में वह चीज देखी जो पहले कभी नहीं दिखी थी—
पछतावा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म होने वाली नहीं थी।
क्योंकि उसी रात रुद्र भागता हुआ कमरे में आया।
“सर!”
देव तुरंत खड़ा हुआ।
“क्या हुआ?”
रुद्र ने लैपटॉप मेज पर रखा।
“राघव मेहरा जिंदा है।”
देव और शनाया दोनों चौंक गए।
“कहां?”
“तीन साल पहले तक दुबई में था। छह महीने पहले भारत वापस आया।”
“अब?”
रुद्र ने स्क्रीन घुमाई।
एक कंपनी का बोर्ड रिकॉर्ड खुला था।
कंपनी का नाम पढ़ते ही शनाया की आंखें फैल गईं।
मेहरा ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स।
और वह कंपनी पिछले छह महीनों से चुपचाप राजपूत ग्रुप के शेयर खरीद रही थी।
देव ने फुसफुसाकर कहा—
“वह वापस क्यों आया?”
रुद्र ने अगली स्क्रीन खोली।
“क्योंकि शायद वह अधूरा काम पूरा करना चाहता है।”
राघव अब राजपूत ग्रुप का लगभग अठारह प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित कर रहा था।
शनाया के पास बारह प्रतिशत था।
राजवीर परिवार के पास बत्तीस प्रतिशत।
बाकी शेयर छोटे निवेशकों के पास थे।
अगर राघव कुछ और बड़े शेयरधारकों को अपने साथ मिला लेता, तो वह कंपनी पर नियंत्रण पाने की स्थिति में पहुंच सकता था।
शनाया समझ गई।
“पच्चीस साल पहले उसने दोनों परिवारों को लड़ाकर फायदा उठाया।”
देव ने कहा, “और अब वह वही खेल दोबारा खेल रहा है।”
“इस बार नहीं।”
शनाया की आवाज बदल चुकी थी।
वह अब वह लड़की नहीं थी जो सुबह डरकर जागी थी।
उसकी आंखों में दृढ़ता थी।
“इस बार हम उसके खेल के मोहरे नहीं बनेंगे।”
देव ने उसकी तरफ देखा।
“हम?”
शनाया कुछ क्षण चुप रही।
“इसका मतलब यह नहीं कि मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”
“समझ गया।”
“इसका मतलब सिर्फ इतना है कि हमारा दुश्मन शायद एक ही है।”
देव के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“डील।”
शनाया ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
“इतनी जल्दी नहीं, मिस्टर सिंघानिया।”
देव की मुस्कान थोड़ी और गहरी हो गई।
“ठीक है।”
अगले कई दिन दोनों ने पुराने रिकॉर्ड खंगालने में बिताए।
शनाया ने पहली बार देव का दूसरा रूप देखा।
वह कर्मचारियों के सामने कठोर था, लेकिन किसी की मेहनत का पैसा नहीं रोकता था।
एक दिन ऑफिस से निकलते समय एक बुजुर्ग कर्मचारी की पत्नी की सर्जरी की बात उसे पता चली।
देव ने बिना अपना नाम बताए अस्पताल का पूरा बिल भरवा दिया।
शनाया ने पूछा—
“उन्हें बताया क्यों नहीं?”
देव ने फाइल देखते हुए कहा—
“मदद अगर एहसान बन जाए तो उसकी कीमत खत्म हो जाती है।”
शनाया कुछ पल उसे देखती रह गई।
यही आदमी कभी उसे अपने बदले का जरिया मानता था।
इंसान आखिर इतना विरोधाभासी कैसे हो सकता है?
लेकिन शनाया ने खुद को याद दिलाया—
किसी की अच्छाई उसके गलत कामों को मिटाती नहीं।
और किसी की गलती उसकी हर अच्छाई को झूठा भी नहीं बनाती।
देव को भी यही सीखना था।
एक रात दोनों ऑफिस में अकेले रिकॉर्ड देख रहे थे।
शनाया लगातार छह घंटे से स्क्रीन के सामने बैठी थी।
अचानक उसे चक्कर आया।
देव ने तुरंत कुर्सी पकड़ ली।
“शनाया?”
“मैं ठीक हूं।”
“तुम ठीक नहीं हो।”
“सिर्फ थक गई हूं।”
देव पानी लेकर आया।
“आज का काम खत्म।”
“लेकिन—”
“यह आदेश नहीं है।”
शनाया ने उसकी तरफ देखा।
देव ने शांत स्वर में कहा—
“सुझाव है। फैसला तुम्हारा।”
शनाया की आंखों में अनायास हल्की मुस्कान आ गई।
देव ने भी महसूस किया कि उसने क्या कहा था।
कुछ दिन पहले तक वह शनाया की जिंदगी के फैसले खुद कर रहा था।
आज वह उससे अनुमति मांगना सीख रहा था।
शायद बदलाव ऐसे ही शुरू होता है।
बहुत छोटे वाक्यों से।
बहुत छोटी आदतों से।
और उन सीमाओं का सम्मान करने से जिन्हें कभी इंसान ने महत्व ही नहीं दिया था।
लेकिन अगले दिन खेल पलट गया।
सुबह नौ बजे शहर के लगभग सभी बड़े न्यूज चैनलों पर एक खबर चल रही थी—
“सिंघानिया और राजपूत परिवार की गुप्त साझेदारी?”
“क्या अरबों की कंपनी पर कब्जे की तैयारी?”
“राजवीर राजपूत की बेटी शनाया और देव सिंघानिया एक साथ!”
किसी ने देव के घर और ऑफिस की तस्वीरें मीडिया को भेज दी थीं।
राघव ने पहला वार कर दिया था।
राजपूत ग्रुप के शेयर गिरने लगे।
बोर्ड में घबराहट फैल गई।
राजवीर ने फोन किया।
“शनाया, तुरंत घर आओ।”
शनाया ने कहा, “मैं बोर्ड मीटिंग में आऊंगी।”
“तुम समझ नहीं रही हो।”
“नहीं पापा।”
शनाया की आवाज शांत थी।
“शायद पहली बार समझ रही हूं।”
दोपहर बारह बजे राजपूत ग्रुप की आपातकालीन बोर्ड मीटिंग शुरू हुई।
कमरे में पंद्रह लोग बैठे थे।
दरवाजा खुला।
शनाया अकेली अंदर आई।
देव बाहर ही रुक गया।
उसने पूछा था—
“मैं साथ चलूं?”
शनाया ने मना कर दिया था।
“यह लड़ाई मुझे खुद लड़नी है।”
देव ने सिर्फ इतना कहा—
“मैं बाहर हूं।”
शनाया बोर्डरूम के बीच जाकर बैठ गई।
कुछ डायरेक्टर उसे शक की नजर से देख रहे थे।
एक वरिष्ठ सदस्य बोला—
“मिस राजपूत, मीडिया में चल रही खबरों के बाद आपकी स्थिति—”
“मेरी स्थिति?”
शनाया ने सामने दस्तावेज रखा।
“मैं इस कंपनी की बारह प्रतिशत शेयरधारक हूं। मेरी स्थिति वही है जो कानून तय करता है।”
कमरे में खामोशी छा गई।
तभी दरवाजा दोबारा खुला।
सफेद बाल।
महंगा सूट।
हाथ में चांदी की छड़ी।
लगभग साठ वर्ष का एक आदमी अंदर आया।
शनाया ने उसे पहली बार देखा था।
लेकिन देव ने बाहर मॉनिटर पर उसका चेहरा देखते ही मुट्ठी कस ली।
राघव मेहरा।
राघव मुस्कुराते हुए शनाया के सामने बैठ गया।
“तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी दिखती हो।”
शनाया ने ठंडी आवाज में कहा—
“और आप वही आदमी हैं जिसने दो परिवारों की जिंदगी बर्बाद की?”
कमरे में सनसनी फैल गई।
राघव हंस पड़ा।
“देव ने तुम्हें अच्छी कहानी सुनाई है।”
“कहानी नहीं।”
शनाया ने मेज पर पेन ड्राइव रखी।
“रिकॉर्ड।”
पहली बार राघव की मुस्कान हल्की पड़ी।
शनाया ने स्क्रीन पर पुराना ऑडियो चलाया।
वीरेंद्र की आवाज गूंजी—
“तुमने खातों से पैसा निकाला है, राघव…”
सभी डायरेक्टर एक-दूसरे को देखने लगे।
राघव फिर भी शांत रहा।
“पुरानी रिकॉर्डिंग। एडिट की जा सकती है।”
शनाया ने सिर हिलाया।
“बिल्कुल।”
वह मुस्कुराई।
“इसीलिए मैं सिर्फ इस पर निर्भर नहीं हूं।”
उसने दूसरी फाइल खोली।
पच्चीस साल पुराने विदेशी खातों से किए गए ट्रांसफर।
तीन शेल कंपनियां।
तीनों के लाभार्थी अलग-अलग नामों से दर्ज थे।
लेकिन अंतिम नियंत्रण एक ही व्यक्ति के पास था—
राघव मेहरा।
राघव का चेहरा उतरने लगा।
शनाया ने कहा—
“और सबसे दिलचस्प बात?”
उसने आखिरी दस्तावेज खोला।
“आग लगने से दो दिन पहले आपने अपनी पत्नी और बेटे के लिए देश से बाहर जाने की टिकट खरीदी थी।”
राघव अचानक खड़ा हो गया।
“यह मीटिंग खत्म हुई!”
“नहीं।”
पीछे से राजवीर की आवाज आई।
दरवाजे पर राजवीर खड़े थे।
उनके साथ पुलिस और कंपनी के वकील भी थे।
राघव का चेहरा सफेद पड़ गया।
राजवीर धीरे-धीरे उसके सामने पहुंचे।
“पच्चीस साल पहले मैं डर गया था।”
उन्होंने कहा।
“आज नहीं डरूंगा।”
राघव पीछे हटने लगा।
तभी उसकी नजर कांच के दरवाजे के बाहर खड़े देव पर पड़ी।
कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
राघव मुस्कुराया।
फिर उसने ऐसा वाक्य कहा जिसने देव के पैरों तले जमीन खिसका दी।
“तुम्हें अब भी लगता है तुम्हारे माता-पिता की मौत उस आग में हुई थी?”
देव का चेहरा जम गया।
“क्या मतलब?”
राघव हंस पड़ा।
“पूरी फाइल नहीं मिली तुम्हें?”
पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
लेकिन वह जाते-जाते देव को देखता रहा।
“अपने पिता की मौत का प्रमाणपत्र देखना, देव।”
“राघव!”
देव आगे बढ़ा।
“क्या मतलब है तुम्हारा?”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसे बाहर ले जाया गया।
लेकिन अब कमरे में मौजूद हर जीत अचानक छोटी लगने लगी थी।
उस रात देव अपने पुराने घर के तहखाने में पहुंचा।
शनाया भी साथ थी।
रुद्र ने पुराने रिकॉर्ड निकलवाए।
मृत्यु प्रमाणपत्र।
वीरेंद्र सिंघानिया।
देव ने तारीख देखी।
फिर समय।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
आग रात 11:40 पर लगी थी।
लेकिन उसके पिता की मृत्यु का आधिकारिक समय—
अगली सुबह 4:20।
देव की सांस रुक गई।
“पापा आग में नहीं मरे थे।”
शनाया ने धीरे से कहा—
“उन्हें अस्पताल ले जाया गया होगा।”
“लेकिन मुझे हमेशा बताया गया कि उनकी मौत घटनास्थल पर हुई।”
रुद्र ने अस्पताल के रिकॉर्ड खोजे।
पुराना डेटा लगभग नष्ट हो चुका था।
लेकिन एक एंट्री बची थी।
अज्ञात पुरुष।
गंभीर रूप से घायल।
रात 12:35 पर भर्ती।
सुबह 3:50 पर—
“Transferred.”
देव स्क्रीन के बिल्कुल पास चला गया।
“कहां?”
रुद्र ने अगली लाइन पढ़ी।
फिर उसका चेहरा बदल गया।
“लोकेशन दर्ज नहीं है।”
देव ने कुर्सी पकड़ ली।
“तो मृत्यु प्रमाणपत्र कैसे बना?”
यही सवाल अब पूरी कहानी बदलने वाला था।
जांच आगे बढ़ी।
राघव पुलिस हिरासत में था।
लेकिन उसने बोलने से इनकार कर दिया।
तभी शनाया को अपनी मां की पुरानी डायरी याद आई।
उसकी मां वर्षों पहले गुजर चुकी थीं।
उनकी चीजें घर के एक बंद कमरे में रखी थीं।
शनाया उसी रात राजपूत हाउस पहुंची।
पुराने संदूक खोले गए।
कपड़े।
तस्वीरें।
चिट्ठियां।
और नीचे—
एक छोटी नीली डायरी।
उसमें आग लगने के लगभग तीन महीने बाद की एक एंट्री थी।
“आज राजवीर फिर उस आदमी से मिलने गया। उसने मुझसे वादा लिया है कि देव को कभी नहीं बताएगा। उसका कहना है बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है।”
शनाया के हाथ कांप गए।
अगली लाइन—
“काश वीरेंद्र खुद अपने बेटे को सच बता पाता।”
शनाया की सांस रुक गई।
वीरेंद्र।
खुद।
अपने बेटे को।
उसने तुरंत देव को फोन किया।
“देव…”
“क्या हुआ?”
“तुम्हें यहां आना होगा।”
“क्यों?”
शनाया कुछ क्षण चुप रही।
“क्योंकि शायद तुम्हारे पिता उस रात नहीं मरे थे।”
फोन के दूसरी तरफ पूरी खामोशी छा गई।
एक घंटे बाद देव राजपूत हाउस पहुंचा।
डायरी पढ़ते समय उसके हाथ पहली बार कांप रहे थे।
“अगर वह जिंदा थे… तो मेरे पास क्यों नहीं आए?”
शनाया के पास जवाब नहीं था।
अगले कई घंटों में उन्होंने डायरी की बाकी एंट्रियां पढ़ीं।
एक नाम बार-बार आता था—
“वी.एस.”
और एक जगह—
“शिमला।”
देव ने तुरंत टीम भेजने की तैयारी की।
लेकिन शनाया ने उसका हाथ रोक दिया।
देव उसकी तरफ देखने लगा।
शनाया ने तुरंत हाथ हटा लिया।
“इस बार पुलिस को साथ लेकर जाएंगे।”
देव समझ गया।
पुराना देव शायद हथियारबंद लोगों के साथ निकल पड़ता।
लेकिन उसने फोन उठाया।
“ठीक है।”
अगली सुबह वे शिमला पहुंचे।
पुराने रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें शहर से दूर एक छोटा निजी पुनर्वास केंद्र मिला।
केंद्र बंद हो चुका था।
लेकिन उसके पूर्व संचालक डॉक्टर आनंद अब भी शहर में रहते थे।
डॉक्टर ने देव का नाम सुनते ही दरवाजा बंद करने की कोशिश की।
देव ने दरवाजा नहीं धकेला।
उसने सिर्फ कहा—
“मैं वीरेंद्र सिंघानिया का बेटा हूं।”
बुजुर्ग डॉक्टर के हाथ कांपने लगे।
कुछ क्षण बाद उन्होंने दरवाजा खोल दिया।
बैठक में पहुंचकर डॉक्टर आनंद ने एक पुरानी तस्वीर निकाली।
देव ने तस्वीर देखते ही सांस रोक ली।
पट्टियों में लिपटा एक आदमी अस्पताल के बिस्तर पर था।
चेहरा लगभग पहचान में नहीं आ रहा था।
लेकिन हाथ में वही घड़ी थी जो देव ने बचपन से अपने पिता की कलाई पर देखी थी।
“ये मेरे पापा हैं।”
डॉक्टर आनंद ने सिर हिलाया।
“थे।”
देव की आंखें भर आईं।
“वह कितने दिन जिंदा रहे?”
डॉक्टर ने देव को देखा।
“दिन नहीं।”
देव का दिल धड़कना भूल गया।
“क्या?”
“वह उस आग के बाद करीब सात साल तक जिंदा रहे।”
देव पीछे हट गया।
शनाया ने भी अविश्वास से डॉक्टर को देखा।
“सात साल?”
“हां।”
देव की आवाज टूट गई।
“तो उन्होंने मुझे ढूंढा क्यों नहीं?”
डॉक्टर ने कहा—
“क्योंकि शुरुआती महीनों में उनकी याददाश्त चली गई थी। जब यादें लौटनी शुरू हुईं, तब उन्हें पता चला कि कोई लगातार तुम्हारी निगरानी कर रहा है।”
“राघव?”
“शायद।”
डॉक्टर ने एक बंद लिफाफा निकाला।
“उन्होंने यह मेरे पास छोड़ा था।”
लिफाफे पर सिर्फ दो शब्द लिखे थे—
मेरे देव के लिए।
देव की आंखों से आखिरकार वह आंसू निकल आया जिसे उसने शायद पच्चीस साल से रोका हुआ था।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर एक पत्र था।
“देव,
अगर यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ तक पहुंची है तो शायद मैं तुम्हारे सामने बैठकर सच कहने की स्थिति में नहीं हूं।
सबसे पहले एक बात याद रखना।
राजवीर ने मुझे धोखा नहीं दिया।
उसने उस रात मेरी जान बचाने की कोशिश की थी।
हम दोनों से गलती हुई कि हमने राघव पर बहुत भरोसा किया।
उसने कंपनी से पैसा चुराया। जब हमने उसे पकड़ लिया, उसने हम दोनों को खत्म करने की योजना बनाई।
मुझे सबसे ज्यादा डर तुम्हारे लिए था।
इसलिए मैंने दुनिया को यह मानने दिया कि मैं मर चुका हूं।
मुझे लगा कुछ महीनों में सबूत मिल जाएंगे और मैं तुम्हारे पास लौट आऊंगा।
लेकिन जिंदगी ने मुझे वह मौका नहीं दिया।
अगर तुम कभी यह पढ़ो, तो बदला मत लेना।
सच सामने लाना।
क्योंकि बदला एक आग है, बेटा।
वह दुश्मन को जलाने से पहले उस इंसान को जला देती है जो उसे अपने भीतर लेकर चलता है।”
देव आगे नहीं पढ़ पाया।
उसके हाथ से पत्र नीचे गिर गया।
वह कुर्सी पर बैठ गया।
उसने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।
शनाया कुछ दूरी पर खड़ी रही।
वह उसके पास जाना चाहती थी।
लेकिन इस बार उसने फैसला देव पर छोड़ा।
कुछ क्षण बाद देव ने खुद उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
शनाया ने उसका हाथ थाम लिया।
देव की आवाज टूट रही थी।
“मैंने अपनी पूरी जिंदगी नफरत में बर्बाद कर दी।”
शनाया ने धीरे से कहा—
“पूरी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई।”
देव ने उसकी तरफ देखा।
यही वह पल था जब नफरत की दीवार में पहली असली दरार पड़ी।
भारत लौटने के बाद राघव के खिलाफ पुराने वित्तीय अपराधों, जालसाजी और आग की घटना से जुड़े सबूतों की जांच शुरू हुई।
लेकिन देव ने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी।
उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई।
सैकड़ों कैमरों के सामने देव खड़ा हुआ।
शनाया पीछे मौजूद थी।
देव ने कहा—
“आज मैं सिर्फ राघव मेहरा के अपराधों की बात करने नहीं आया हूं।”
पूरा हॉल शांत हो गया।
“मैं अपनी गलती स्वीकार करने आया हूं।”
शनाया ने उसकी तरफ देखा।
देव ने कैमरों के सामने स्वीकार किया कि उसने निजी बदले में शनाया की स्वतंत्रता छीनकर उसे दबाव में रखा था।
“मेरे साथ अन्याय हुआ था।”
देव ने कहा।
“लेकिन इससे मुझे किसी और के साथ अन्याय करने का अधिकार नहीं मिला।”
पत्रकारों के कैमरे चमक उठे।
“मैं कानून के सामने अपने हर काम की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हूं।”
शनाया की आंखें नम हो गईं।
वह यह नहीं जानती थी कि उनका रिश्ता आगे क्या होगा।
लेकिन पहली बार देव अपने नाम, ताकत और पैसे के पीछे नहीं छिप रहा था।
वह अपने किए का सामना कर रहा था।
कुछ महीने गुजर गए।
देव और शनाया के बीच दूरी रही।
जानबूझकर।
देव ने शनाया को वापस पाने की कोशिश नहीं की।
न फूल भेजे।
न महंगे तोहफे।
न भावनात्मक दबाव।
उसने सिर्फ एक बार संदेश भेजा—
“मैं तुम्हारे फैसले का सम्मान करूंगा।”
और उसके बाद कुछ नहीं।
शनाया ने अपनी कंपनी में सक्रिय भूमिका संभाली।
उसने राजपूत ग्रुप में पुराने खातों की स्वतंत्र ऑडिट शुरू करवाई।
उसके पिता राजवीर ने चेयरमैन पद छोड़ दिया और सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वर्षों पहले सच छिपाना उनकी गंभीर गलती थी।
शनाया अब किसी की बेटी बनकर कंपनी में नहीं बैठती थी।
वह अपनी जगह खुद बना रही थी।
छह महीने बाद एक शाम वह सिंघानिया फाउंडेशन के कार्यक्रम में पहुंची।
देव मंच पर था।
उसने अपने माता-पिता के नाम से आग में घायल लोगों के इलाज के लिए एक अस्पताल विंग शुरू किया था।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद शनाया बाहर निकल रही थी।
पीछे से देव की आवाज आई—
“शनाया।”
वह रुकी।
देव कुछ दूरी पर खड़ा था।
वह पास नहीं आया।
“कैसी हो?”
“अच्छी।”
“कंपनी?”
“तुम्हारी कंपनी से बेहतर।”
देव पहली बार खुलकर हंसा।
“यह पुरानी शनाया वाला एटीट्यूड है।”
“वह कभी गया ही नहीं था।”
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
फिर देव ने कहा—
“कॉफी?”
शनाया ने उसकी तरफ देखा।
“यह बिजनेस मीटिंग है?”
“नहीं।”
“कोई दबाव?”
“बिल्कुल नहीं।”
“मैं मना कर दूं?”
“तो मैं अकेले कॉफी पी लूंगा।”
शनाया के होंठों पर मुस्कान आ गई।
“ठीक है।”
देव की आंखों में चमक आई।
लेकिन शनाया ने उंगली उठाई।
“सिर्फ कॉफी।”
“सिर्फ कॉफी।”
उस रात दोनों ने पहली बार बिना बदले, बिना परिवार, बिना कारोबार और बिना अतीत की बात किए दो घंटे बिताए।
देव ने उससे उसके सपनों के बारे में पूछा।
शनाया ने उससे उसके डर के बारे में।
दोनों ने जाना कि वे एक-दूसरे को जानते ही नहीं थे।
नफरत ने उन्हें एक-दूसरे की तस्वीर तो दिखाई थी—
इंसान नहीं।
धीरे-धीरे मुलाकातें बढ़ीं।
हर मुलाकात शनाया की इच्छा से।
हर सीमा स्पष्ट।
और देव ने पहली बार जाना कि किसी इंसान को हासिल करने और उसका विश्वास पाने में कितना बड़ा अंतर होता है।
करीब एक साल बाद देव शनाया को उसी पुराने सिंघानिया हाउस के सामने लेकर गया।
घर अब दोबारा बन चुका था।
उस जगह एक छोटा स्मारक था।
वीरेंद्र और मीरा सिंघानिया की तस्वीर लगी थी।
नीचे वीरेंद्र की चिट्ठी की एक पंक्ति लिखी थी—
“बदला आग है; सच रोशनी।”
देव कुछ देर तस्वीर के सामने खड़ा रहा।
फिर उसने शनाया की तरफ देखा।
“मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं।”
शनाया मुस्कुराई।
“कहो।”
“मैं तुमसे प्यार करता हूं।”
शनाया शांत रही।
देव ने तुरंत कहा—
“तुम्हें जवाब देने की जरूरत नहीं है।”
शनाया की आंखें नम हो गईं।
“एक साल पहले वाला देव होता तो?”
देव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“वह जवाब मांगता।”
“और आज वाला?”
“इंतजार कर सकता है।”
शनाया धीरे-धीरे उसके पास आई।
“तो थोड़ा और इंतजार करो।”
देव की मुस्कान फीकी पड़ गई।
लेकिन अगले ही पल शनाया ने कहा—
“क्योंकि मैं चाहती हूं कि जब मैं तुम्हें जवाब दूं, तो वह डर, मजबूरी या अतीत की वजह से नहीं… सिर्फ मेरी इच्छा से हो।”
देव ने सिर हिलाया।
“जितना समय चाहिए।”
शनाया मुड़कर जाने लगी।
फिर दो कदम बाद रुक गई।
पीछे पलटी।
“वैसे… कल शाम सात बजे मैं खाली हूं।”
देव की आंखें चमक उठीं।
“कॉफी?”
“डिनर।”
देव मुस्कुरा दिया।
लेकिन कहानी की आखिरी परत अभी खुलनी बाकी थी।
उसी रात राजवीर के पुराने घर में एक कर्मचारी को बंद स्टडी की दीवार के पीछे छोटा-सा लॉकर मिला।
शनाया को बुलाया गया।
लॉकर पर उसकी मां का नाम लिखा था।
अंदर कुछ पुराने शेयर प्रमाणपत्र थे।
एक चाबी।
और एक वीडियो कैसेट।
कैसेट पर तारीख थी—
आग लगने से ठीक एक दिन पहले की।
पुराने रिकॉर्डिंग उपकरण की मदद से वीडियो चलाया गया।
स्क्रीन पर वीरेंद्र सिंघानिया दिखाई दिए।
उनके साथ राजवीर थे।
दोनों किसी बात को लेकर परेशान थे।
वीरेंद्र कैमरे के सामने बोले—
“अगर हमारे साथ कुछ हो जाए, तो यह रिकॉर्डिंग पुलिस तक पहुंचनी चाहिए।”
शनाया की सांस थम गई।
राजवीर ने एक दस्तावेज कैमरे के सामने किया।
“राघव अकेला नहीं है।”
देव तुरंत स्क्रीन के पास आ गया।
वीडियो में वीरेंद्र ने अगला नाम लिया।
और वह नाम सुनते ही देव और शनाया दोनों के चेहरे से रंग उड़ गया।
क्योंकि वह किसी पुराने कर्मचारी का नाम नहीं था।
वह उस इंसान का नाम था जो पिछले एक साल से उनकी हर जांच में मदद कर रहा था।
हर फाइल तक पहुंच रखता था।
हर योजना जानता था।
और जिसे देव अपने परिवार से भी ज्यादा भरोसेमंद मानता था।
स्क्रीन पर वीरेंद्र की आवाज गूंजी—
“अगर राघव पकड़ा भी जाए, तब भी असली खतरा खत्म नहीं होगा… क्योंकि उसके पीछे जिस परिवार का हाथ है, वह सिंघानिया और राजपूत—दोनों घरों के बेहद करीब है।”
देव ने धीरे-धीरे शनाया की तरफ देखा।
उसी समय उसका फोन बज उठा।
स्क्रीन पर रुद्र का नाम चमक रहा था।
देव ने कॉल उठाया।
लेकिन दूसरी तरफ रुद्र नहीं था।
एक अनजान आदमी की आवाज आई—
“बहुत देर कर दी, देव।”
देव का चेहरा सख्त हो गया।
“रुद्र कहां है?”
दूसरी तरफ हल्की हंसी सुनाई दी।
“जिस सच को तुम्हारे पिता पच्चीस साल पहले दफन नहीं कर पाए… उसे खोजने की कीमत अब तुम्हें चुकानी होगी।”
कॉल कट गई।
शनाया की उंगलियां ठंडी पड़ गईं।
देव ने तुरंत रुद्र की लोकेशन ट्रेस करवाने के लिए फोन उठाया।
लेकिन तभी शनाया की नजर वीडियो के आखिरी फ्रेम पर पड़ी।
वह अचानक चिल्लाई—
“देव, रुको!”
देव पलटा।
शनाया स्क्रीन की तरफ इशारा कर रही थी।
वीडियो के कोने में एक आदमी का आधा चेहरा दिखाई दे रहा था।
देव धीरे-धीरे स्क्रीन के पास गया।
चेहरा देखते ही उसका फोन हाथ से लगभग छूट गया।
क्योंकि वह आदमी कोई अनजान अपराधी नहीं था।
वह वही व्यक्ति था जिसकी तस्वीर देव बचपन से अपने घर के मंदिर जैसे सम्मानित हिस्से में देखता आया था।
और अगर वह सचमुच उस रात वहां मौजूद था…
तो राघव मेहरा सिर्फ एक मोहरा था।
असली खिलाड़ी अभी तक आजाद घूम रहा था।
शनाया ने कांपती आवाज में पूछा—
“देव… ये कौन है?”
देव की आंखों में फिर वही पुरानी आग लौट आई।
लेकिन इस बार वह बदले की आग नहीं थी।
सच जानने की आग थी।
उसने स्क्रीन से नजर हटाए बिना कहा—
“वह आदमी… मेरे पिता का छोटा भाई है।”
और उसी क्षण बाहर एक काली कार आकर रुकी।
घर की घंटी बजी।
दरवाजे के कैमरे की स्क्रीन ऑन हुई।
बाहर एक सफेद बालों वाला आदमी खड़ा था।
उसने सीधे कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा—
“दरवाजा खोलो, देव।”
“पच्चीस साल पुराना हिसाब पूरा करने का वक्त आ गया है…”
और देव तथा शनाया समझ गए—
जिस कहानी को वे खत्म समझ रहे थे…
वह तो शायद अब शुरू हुई थी।
समाप्त!
डिस्क्लेमर: हमारी कहानियाँ असल ज़िंदगी की घटनाओं से प्रेरित हैं, लेकिन मनोरंजन के लिए उन्हें सावधानी से फिर से लिखा गया है। असल लोगों या स्थितियों से कोई भी समानता पूरी तरह से इत्तेफ़ाक है।